बुधवार, 8 नवंबर 2017

ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ?



ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ?

-अरुण मिश्र  

ज़िस्म  ये  रूह  है,  मिट्टी  है,  ख़ला  है,  क्या है ?
नूर   है,  आग   है,   पानी  है,  हवा  है,   क्या है ?

साँस   की   बंसरी   को    रोज़    नये  सुर   देता;
कोई  फ़नकार  है,  शायर  है,  ख़ुदा  है,  क्या है ?

कभी  डसती,  कभी  लहराती,  कभी  छा जाती;
कोई  नागिन है,  ज़ुल्फ़  है  कि,  घटा है,  क्या है?

आँखें   इस्रार   करें,   लब  पे  मुसल्सल   इन्कार;
कोई आदत है  कि,  ज़िद है  कि, अदा है,क्या है?

इश्क़ को हुस्न के रखते हो मुक़ाबिल जो, 'अरुन ';
है  ये  ख़ुद्दारी,  जुनूँ   है  कि,  अना  है,   क्या  है ?
                                        *

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

गर दिवाली का नतीजा........


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गर दिवाली का नतीजा न दिवाला होता...
-अरुण मिश्र 

गर  दिवाली  का  नतीजा  न  दिवाला    होता। 
चाँद  का  मुँह  तो अमावस को न काला होता।।

तेल - बाती   के   लिए   सारे   दिए   हैं  बेचैन।
रौशनी कैसे  हो,  कुछ  जलने  तो वाला  होता।।

बिना  मिठाइयां, फीके   तो  न   लगते त्यौहार।
काश ! खाया  न   कभी,  मीठा  निवाला  होता।।

गुड़  कहाँ,  दूध  कहाँ, आँटा   कहाँ  से  लायें।
इस से  बेहतर  था,  कोई  ख़्वाब  न पाला होता।।

तंगदस्ती  से   ‘अरुन’ ,  तंग  रहे  होंगे  जरूर।
वर्ना  दरवाज़े  से,  क्या  दोस्त को  टाला  होता।।
                                  *


रविवार, 15 अक्तूबर 2017

श्री लक्ष्मी-गणेश जी की आरती

आरति श्री लक्ष्मी-गणेश की....

            वर्ष २०११ में दीवाली-पूजन के समय मन में यह विचार 
आया कि,  इस अवसर पर जब लक्ष्मी-गणेश की साथ-साथ 
पूजा होती है तो,एक संयुक्त आरती भी होनी चाहिए | पर, घर में 
उपलब्ध आरती सग्रहों में ऐसी कोई संयुक्त आरती नहीं मिली | 
गणेश जी की जहाँ कई आरती मिली, वहीँ लक्ष्मी जी की  केवल 
एक आरती ही मिल पाई | ऐसा शायद सरस्वती-पुत्रों के लक्ष्मी 
मैय्या के प्रति सहज पौराणिक अरुचि के कारण हो, जो 
अनावश्यक ही,  "लक्ष्मी समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम......"  का 
दुराग्रह पाले रहते हैं और इसी कारण प्रायः उन की विशेष कृपा 
से वंचित रह जाते हैं |
           अस्तु, इस दृष्टिकोण से एक संयुक्त आरती लिखने का 
प्रयास  किया जो, मेरी जानकारी में हिंदी की पहली और एकमात्र 
श्री लक्ष्मी-गणेश जी की संयुक्त आरती है। तीन छंदों की यह आरती 
दीपावली-पूजन के उपयोगार्थ, समस्त भक्त-जनों को सादर-सप्रेम 
प्रस्तुत हैं |     -अरुण मिश्र .

पुनश्च  :

          वर्ष २०१२ की दीपावली पर मेरे संगीतकार मित्र श्री केवल कुमार ने 
इस आरती को संगीतबद्ध  किया है जो, सभी भक्त जनों को दीपावली-पूजन 
हेतु सस्नेह भेंट की जा रही है। आरती को स्वर, सुश्री प्राची चंद्रा एवं सखियों 
ने दिया है। एतदर्थ, मैं इन सबका आभारी हूँ। 
माँ लक्ष्मी एवं भगवान गणेश की आप सब पर अशेष कृपा बरसे।
दीपावली की असंख्य शुभकामनायें। -अरुण मिश्र .


  

                         *आरती* 

आरति   श्री  लक्ष्मी-गणेश   की | 
धन-वर्षणि की,शमन-क्लेश की ||
             
             दीपावलि     में     संग     विराजें |
             कमलासन - मूषक     पर    राजें |
             शुभ  अरु  लाभ,   बाजने    बाजें |
           
ऋद्धि-सिद्धि-दायक -  अशेष  की || 

    
             मुक्त - हस्त    माँ,   द्रव्य    लुटावें |
             एकदन्त,    दुःख      दूर    भगावें |  
             सुर-नर-मुनि सब जेहि जस  गावें |
             

बंदउं,  सोइ  महिमा विशेष  की ||


             विष्णु-प्रिया, सुखदायिनि  माता |
             गणपति,  विमल  बुद्धि  के  दाता |
             श्री-समृद्धि,  धन-धान्य    प्रदाता |

मृदुल  हास  की, रुचिर  वेश की ||
माँ लक्ष्मी, गणपति  गणेश  की ||

                                 * 


                                                                       -अरुण मिश्र  

(पूर्वप्रकाशित)


शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

विजय दशमी की शुभकामनायें

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राम परम प्रभु तुम्हें नमन है… 

(भावानुवाद)

-अरुण मिश्र 

करें देव-जन आ कर वन्दन,   
सूर्य-वंश  के  हो तुम नन्दन । 
भाल तुम्हारे, शोभित  चन्दन,   
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥१॥

विश्वामित्र-यज्ञ   के   कारक,   
शिला-अहिल्या   के उद्धारक ।
महादेव    के     धनुर्विदारक,    
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥२॥

पिता-वचन  हित  आज्ञाकारी,  
तप-वन  के  तुम  बने विहारी । 
हे!  निज-कर सुन्दर धनु-धारी,  
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥३॥
  
मृग को मुक्त किया निज सायक,  
हे !  जटायु   के   मोक्ष-प्रदायक ।
बींधा   बालि   कीश-कुल-नायक,   
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥४॥

वानर-जन से संगति-सम्मति,  
बाँधा  पुल  से  महा-सरित्पति । 
दशकंधर का  किया  वंश-क्षति, 
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥५॥
   
दीन  देव-जन   को   कर  हर्षित,  
कपि-जन की इच्छा हित वर्षित ।
स्वजन-शोक  को  करते कर्षित,  
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥६॥

कर  अरि-हीन  राज्य का रक्षण,  
प्रजा  जनों  के  भय का भक्षण । 
करते  अस्त   मोह   के  लक्षण,   
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥७॥

अखिल भूमि का भार लिया हर,  
ले  निज धाम  गए  सब नागर । 
जगत  हेतु   हे ! श्रेष्ठ  दिवाकर,  
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥८॥ 
                          *                                 
भव-भय  उसको  नहीं सताये,  
जो  हो कर  एकाग्र-चित्त  नर। 
रघुवर के  इस उत्तम अष्टक  
का,   करता है  पाठ  निरन्तर ॥
                          ***   

(इति श्री परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द विरचित श्री  रामाष्टक  का भावानुवाद सम्पूर्ण)   

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

सागर की ये फेनिल लहरें ....

 सागर तट, पुरी 













सागर की ये फेनिल लहरें .... 

सागर की ये फेनिल लहरें 
मुझे देख कर कितनी खुश हैं। 
पैरों तक दौड़ी आती हैं; 
कुछ मीठे स्वर में गाती हैं। 

हाल पूँछतीं 
कहो सखा 
तुम कहाँ खो गए थे इतने दिन ?
दुनिया के किन जंजालों में ? 
बहुत दिनों के बाद मिले हो।

क्या ये मुझ को नहीं पता है ,
जितनी हलचल मेरे उर में , 
उतनी ही तेरे भी मन में ?

आओ बैठो ,
बहुत-बहुत बातें करते हैं। 
बहुत दिनों के बाद मिले हो।।
                 *
- अरुण मिश्र 
१७. ०९. २०१७ , रविवार , प्रातः 
पुरी सागर तट। 

(सभी  मित्रों को समर्पित )