मंगलवार, 28 जून 2011

शुष्क मन-मरुथल तरल करती हुई...


अवलम्ब...

- अरुण मिश्र.

    शुष्क मन-मरुथल, तरल करती हुई | 
   अमृत   बरसाती,  गरल   हरती  हुई |
   कौन तुम? नैराश्य, तंद्रा, क्लैव्य  हर,
    कठिन जीवन-पथ, सरल करती हुई ||
*
("अवलम्ब"  शीर्षक  की  यह  पूरी कविता,  'रश्मि-रेख'  में ०८,अक्टूबर,२०१०  को पूर्व प्रकाशित है|)  





  




सहयात्रा के चालीसवें वसंत पर विशेष.....


जीवन-यात्रा में साथ-साथ मात्र चालीस वर्ष.....






तुम मिलीं तो...

-अरुण मिश्र

तुम मिलीं तो मुझे हर ख़ुशी  मिल गई।
ख़ुशबुयें,  ताज़ग़ी,  ज़िन्दगी  मिल गई।
जब भी  मन को  अँधेरों ने   घेरा कभी,
तुम हँसी, औ’  मुझे  रोशनी  मिल गई ।।


तुम मिलीं तो  ज़मीं से फ़लक की तरह।
आँख की  पुतलियों से  पलक की तरह।
मन-गगन पे  घिरे  नेह-घन  में   चपल,
कौंधती बिजलियों की  झलक की तरह।।

बन के  जूही-कली,  मन के  डाली  लसीं।
रूह  में  तुम  मिरे,  बन  के  ख़ुशबू  बसीं।
मुझको जिस जाल में तुमने उलझा लिया,
सोन-मछरी,  उसी  जाल  में  तुम  फँसीं।।

तुम   सुनहरी  सुबह,   चाँदनी  रात  हो।
मेरे   एहसास   हो,   मेरे    जज़्बात  हो।
ख़ूबसूरत    तसव्वुर,  हँसीं  ख़्वाब   तुम,
ज़िन्दगी  को   बहारों  की   सौग़ात  हो।।

तुम   मिलीं   तो   अनोखे   नज़ारे  हुये।
चाँद - सूरज - सितारे ,    हमारे     हुये।
तुम  सिमट कर  मेरी  बस मेरी  हो गई,
हम   बिखर  कर  तुम्हारे - तुम्हारे हुये।।
                         *                                      

शुक्रवार, 24 जून 2011

मुझ पर मेरे मालिक की नज़र ...

( टिप्पणी : आडिओ क्लिप में, स्वर एवं संगीत रचना 
उस्ताद जमील रामपुरी की है| रिकार्डिंग वर्ष २००३ की है| )
           
-अरुण मिश्र. 

मुझ पर  मेरे मालिक की नज़र  क्यों नहीं होगी? 
जब  रात  कटेगी   तो,  सहर   क्यों  नहीं  होगी??

उन  सीप सी आँखों  में,  अभी  बन्द है  जो बूँद । 
जब  आँख  से टपकेगी,  गुहर  क्यों  नहीं होगी??

मैं कितना भी ख़ामोश जलूँ,शम्आ की मानिंद। 
पर   मेरे   पतिंगे   को   ख़बर   क्यूँ   नहीं होगी??

किस दौर से  गुज़रा नहीं , इन्सान  ‘अरुन जी’। 
इस दौर में, फिर  अपनी बसर, क्यूँ  नहीं होगी??
                                 *

शनिवार, 18 जून 2011

न जाने किन ज़मीनों से...


न जाने  किन  ज़मीनों से...

-अरुण मिश्र

न  जाने  किन ज़मीनों  से,  मैं  बीजों  को  उठाता हूँ।
जिन्हें  फ़िर  बो के  बंजर में,  नई फ़सलें  उगाता हूँ ॥


कभी  पलकों  के  पानी  से, कभी  ख़ूँ  से  कलेजे  के।
मैं  अक़्सर सींचता,  ग़ज़लों के  जो बिरवे लगाता हूँ॥


नरम, नाज़ुक  ग़ुलाबों  से,   हमारे   शेर’  खिलते  हैं।
ग़ज़ल कहता, सुख़न के या कि, ग़ुलदस्ते सजाता हूँ॥



कटे यूँ वक़्ते-तनहाई  कि, नक़्श उसका तसव्वुर में।
बनाता   हूँ,  मिटाता   हूँ;   मिटाता   हूँ,   बनाता  हूँ॥



अग़रचे   देर   हो   जाये,   तो   दीवाना   कहाँ   जाये।
मुक़र्रर है  शिकायत,  देर से  क्यूँ   घर को  आता हूँ॥


भले हो  तन  ज़मीं पे,  मन  सदा  उलझा सितारों में।
कुलाबें   यूँ,   ज़मीनो-आस्मां   की   मैं   मिलाता  हूँ॥


मैं  भूखा  प्यार का  हूँ,  और हूँ   प्यासा तसल्ली का।
लिपट जाता हूँ  बरबस, ग़र कोई  ग़मख़्वार पाता हूँ॥


बला की भी  बलायें  लेता  हूँ,  आती  तो  है  मुझ  पे।
गले  पड़ने को  कहती  है,  तो  पलकों  पे  बिठाता हूँ॥


मैं  उस मग़रूर बुत के दर पे, क्यूँ   सिज़दारवां होऊँ।
'अरुन'  इज्ज़त से जीता हूँ, मजूरी  कर के खाता हूँ॥
                                  *   


शुक्रवार, 10 जून 2011

भू गर्भ जल दिवस पर विशेष...















जल से जीवन प्रवहमान है...

-अरुण मिश्र 

जल में,
जल जाने का 
कोई बोध नहीं है ;
और न कोई जलने का भय |
जल तो 
जलने का समुचित उपचार;
सुनिश्चय |

जल, हर मल प्रक्षालित करता,
जल,  शुचिता  का  उपादान  है | 
जल, जीवन-रचना का  कारक,
जल  से  जीवन  प्रवहमान  है ||
                   *

रविवार, 5 जून 2011

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष...














पर्यावरण वन्दना


-अरुण मिश्र


वन्दना   करिये   धरा  की;
धरा    के    पर्यावरण  की।।

झर    रहे    निर्झर   सुरीले,
और नदियॉ बहें कल-कल।
ताल, पोखर,  झील, सागर,
हर तरफ  है,  नीर  निर्मल।।


चर-अचर जिसमें सुरक्षित,
स्नेहमय उस आवरण की।।


मन्द,  मन्थर  पवन शीतल;
ऑधियों  का  तीव्रतर  स्वर।
सर्वव्यापी    वायु    पर   ही,
   प्राणियों  की   सॉस  निर्भर।।


जीव-जग-जीवनप्रदायिनि-
प्रकृति के, शुभ आचरण की।।


अन्न  के   भण्डार   दे   भर,
भूमि  उर्वर,  शस्य-श्यामल।
भूख    सबकी    मेटने   को-
वृक्ष,  फलते  हैं  मधुर फल।।


मॉ     धरा    की   गोद    के,
इस मोदमय वातावरण की।।
                       *

गुरुवार, 2 जून 2011

प्रिय पुत्र अंकुर के शुभ-विवाह की वर्ष-गाँठ पर ...


( टिप्पणी :  प्रिय पुत्र अंकुर के शुभ-विवाह के अवसर पर वर्ष २००६ में लिखी 
  इस रचना को स्वर दिया है सुश्री पद्मा गिडवानी जी ने एवं संगीत से सजाया है 
 श्री केवल कुमार ने |  इतने सुन्दर प्रस्तुतीकरण के लिए,  मैं उन दोनों का 
 आभारी हूँ| - अरुण मिश्र. ) 

दुलहा सुघर अंकुर कुवँर...



-अरुण मिश्र  
 

  


 दुलहा   सुघर   अंकुर  कुवँर,   दुलहिन    बनीं   रुचिरा  ऋचा।   

कंदर्प-धनु  पर   पुष्प-शर ,  पुनि  आजु  यहु  मन्दिर  खिंचा।। 
सब  भ्रात-भगिनि, सखी-सखा,  मन  मुदित   मंगल गावहीं। 
पितु-मातु   हर्षित ,  नात-बॉत   समेत   अति  सुख   पावहीं।।
             
             पितु  अरुण मिश्र  प्रसन्न-चित्,  मन मगन  मातु शकुन्तला। 
            प्रिय भगिनि तरु-श्री, फिरति उमगति मनहुँ चपला की कला।। 
            सुन्दर  सुअवसर जानि  अति, सब  स्वजन-परिजन हरषहीं। 
            पुरखन   सहित,   कुलदेवता   संग,    देव    आशिष   बरसहीं।। 

 दादा    सुपंडित    द्वारिका  जी   मिश्र,  हिय   हुलसत  फिरैं। 
दादी    सुमातु   प्रियम्वदा,   बहु    द्रव्य    न्यौछावर   करैं।। 
काका   अमर,  काकी   सहित,  श्वेताभिषेक,  समृद्धि   संग। 
मन   मुदित   ताऊ    केशरी,   सबके   उरहिं  उछरै  उमंग।। 

             संध्या, उषा , प्रतिमा  बुआ,  मौसी  सुमन,  शशि  औ  किरन। 
            चारुल,    हिना,    तृप्ति,    तृषा ,    सोनाक्षी    बहिनें     मगन।। 
            कश्यप,  कुणाल, मृणाल, अंकुश, सुयश, कौशिक  सजि  रहे। 
            अंकित,  ऋषभ,   सब  भ्रात   नाचहिं,  ढोल-ताशे   बजि   रहे।। 

फूफा    उपाध्या    औ     तिवारी,    दूबे   अरु   ओझा   भले। 
मौसा  मिसिर,  पाण्डे,  त्रिपाठी, सजि  बरातिन्ह  महुँ चले।। 
नाना    श्री    ईश्वर शरण ,   आनन्द    मामा    सजि-संवर। 
मामी  औ   नानी   साजि  वर,  ब्याहन  चलीं   अंकुर कुवँर।। 
             
                    सबै सराहति भाग्य निज,  पुण्य सुअवसरु आजु। 
                   विघ्न-हरन, करिवर-वदन, करहु पूर्ण सब काजु।।
                                                            *