रविवार, 30 जुलाई 2017

चन्द कंवल तुलसी पे...


-अरुण मिश्र


कल्पना-तुलसी के दल, तुलसी पे।
भावना-गंगा का जल, तुलसी पे।।

शब्द-अक्षत के संग, समर्पित हैं।
छन्द के, चन्द कंवल, तुलसी पे।।

है ये श्रद्धा, ढली जो, ’शेरों में।
कौन कहता है ग़ज़ल, तुलसी पे।।

सादगी से कहो, जो बात कहो।
लीजिये इसकी नकल, तुलसी पे।।

ज्ञान, वैराग्य, भक्ति औ’ दर्शन।
किस पहेली का,न हल, तुलसी पे।।

बातें, जो हैं कठिन, किताबों में।
वो लगें, कितनी सहल, तुलसी पे।।

यूँ ही हुलसी नहीं थीं, माँ उनकी।
कौन हुलसे न, अमल तुलसी पे।।

राम तो, खुद ही, खिंचे आये हैं।
एक भौंरे से, कमल तुलसी पे।।

पैठिये आप ‘अरुन’, मानस में।
पाइये राम का बल, तुलसी पे।।
                         *
( पूर्वप्रकाशित)

बुधवार, 29 मार्च 2017

अष्टभुजी माँ की पताका लहराती है........




अष्टभुजी माँ की पताका लहराती है.......
-अरुण  मिश्र 

गंगा   के   तीर   एक   ऊँची   पहाड़ी   पर ,
          अष्टभुजी  माँ   की   पताका  लहराती  है |
विन्ध्य-क्षेत्र का है, माँ  सिद्ध-पीठ तेरा  घर ,
          आ के यहाँ भक्तों को सिद्धि मिल जाती है |
जर्जर,   भव-सागर के  ज्वार के  थपेड़ो से ,
          जीवन के  तरनी को  पार  तू  लगाती है |
जो है  बड़भागी,  वही  आता है  शरण तेरे ,
          तेरे चरण  छू कर ही, गंग, बंग जाती है ||
     *                *                *             *
आठ भुजा वाली, हे! अष्टभुजी मैय्या, निज-
          बालक की विनती को करना स्वीकार माँ |
जननी जगत की तुम, पालतीं जगत सारा ,
          तेरी  शरण  आ  के, जग  पाए उद्धार माँ | 
तुम ने  सुनी है सदा  सब की पुकार , आज-
          कैसे  सुनोगी   नहीं    मेरी   पुकार   माँ |
दुष्ट -दल -दलन  हेतु , काफ़ी  है  एक भुजा ,
          शेष सात हाथन ते , भक्तन को  तार माँ ||
                               *  
टिप्पणी :  वर्ष १९९५ में इन  छंदों की रचना माँ  अष्टभुजी देवी, (विन्ध्याचल,उ.प्र.) के चरणों में हुई थी |
(पूर्वप्रकाशित )

मंगलवार, 14 मार्च 2017

यूँ हवाओं में, घुल गई होली......

Wishing You A Very Happy Holi






  होली...
                     
                        -अरुण मिश्र 

   यूँ हवाओं में,  घुल  गई होली।
रंग बरसे तो,  धुल  गई होली।
सारे आलम में, मस्तियाँ बिखरीं।
इक पिटारी सी,खुल गई होली।।    



बेल-बूटों सी,  है  कढ़ी  होली।
फ्रेम में मन के, है  मढ़ी  होली। 
रंग का इक तिलिस्म है, हर-सू।
सर पे जादू सी, है  चढ़ी होली।।

   

सीढ़ी दर सीढ़ी है,  उतरी  होली।
आके अब लान में,  पसरी  होली।
संग हवा के, गुलाल बन के उड़ी।
रंग में भीगी तो,   निखरी  होली।।

   

हाथ   यूँ   ही,   हिला  रही  होली।
खेल   मुझको,    खिला  रही  होली।
कितनी मुश्क़िल से, पहुँचा आंगन तक।
शायद  छत  पे,    बुला  रही  होली।।

    


   देखो हौले से,  आ  रही होली।
मेरे जी को,  लुभा  रही  होली।
उम्र तक को, धकेल कर  पीछे।
कानों में होली, गा रही,  होली।।

          

मीठी यादें,  जगा  रही  होली।
चैन मन का, भगा  रही  होली।
रंग की बारिशों,  न थम जाना।
आग दिल में, लगा  रही होली।।

      

ख़ुश्क  है ’औ कभी  पुरनम होली।
कभी शोला, कभी   शबनम होली।
रंग है, रस है,  रूप है, कि महक।
एक मौसम है,  कि  सरगम होली।।

      

प्यासी  आँखों  का,  ख़्वाब  है होली।
चप्पा- चप्पा,   गुलाब   है    होली।
लब पे आने से,  झिझकता जो सवाल।
उसका,   मीठा   जवाब   है   होली।।

     

फूली सरसों,  संवर  रही  होली।
आम बौरे,    निखर  रही  होली।
कोयलें    कूकीं,  पपीहे  पागल।
रस के झरने  सी झर रही होली।।

        

यूँ  मज़े  में,   शुमार   है   होली।
ज़ोश ,  मस्ती,   ख़ुमार,  है  होली।
इस बरस, कैश  जो किया सो किया।
बाकी   तुम  पर,  उधार  है होली।।

                         *

(पूर्वप्रकाशित )


        

रविवार, 12 मार्च 2017

होरी की भोर में-----





कवित्त

-अरुण मिश्र 

होरी की भोर में, नन्द-किसोर ने, 
लाग्यो है  कीन्ही, बिसेस तयारी।
झोरी   अबीर   की,   कॉधे   धरी, 
अरु  हाथ लई है,  नई पिचकारी।
पातन बीच  लुकाइ के, घात सों, 
गोरी  पे,  रंग  की  धार  जु डारी।
कॉकरि  मारी,  न  गागरि फोरी, 
अचंभित राधा, भिजी कत सारी।।
                    * 

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

झूम उठ्यो सगरो ब्रज मंडल





कवित्त 

-अरुण मिश्र 

झूम  उठ्यो  सगरो  ब्रज  मंडल, 
होरी  कै  धूम - धमाल  भयो  है।
कारे-कन्हैया   पे   दूजो   है  रंग  
चढ़्यो, यहु खूब कमाल भयो है।
राधा  के   रंग  में   स्याम   रंगे, 
अरु राधेहु कै अस हाल  भयो है।
कान्हा  के  हाथ   लगे  न  अबै, 
तबहूँ  कस गाल गुलाल भयो है।।
                    *

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

वसंत पंचमी पर विशेष.....



है वसंत जीवन का उत्सव......

-अरुण मिश्र .

कालचक्र   है   सतत   परिभ्रमित, 
बदल-बदल   ऋतुओं    के    चोले।
कभी   शुष्क   है,   कभी  आर्द्र   है;
आतप-शीत     रंग     बहु    घोले।।

        जीर्ण-पत्र     सब    झरे   द्रुमों   से,
        शिशिर-गलित, हेमन्त-विदारित।
        फिर    वसंत    ने    ली    अँगड़ाई,
        फिर   से   आम्र,    मंजरी-भारित।।

पत्रोत्कंठित       एक-एक      तरु,
विटप-विटप  नव-पल्लव-भूषित।
मन्मथ-दुन्दुभि  सुन   वसंत   की,
प्रकृति,  सृजन-आतुर मन-हर्षित।।

        नवल       हरित  पत्रों    की    चूड़ी,
        बाँह-बाँह     भर      पहने      डाली।
        मेंहदी    रची     हथेली,      पल्लव;
        है    वसंत    की     छटा    निराली।।

कोयल     की    मीठी     तानें     हैं;
विहगों   के    मनहर   हैं    कलरव।
हृदयों    में     उल्लास    भर    रहा,
है     वसंत,   जीवन   का    उत्सव।।
                                     *

(वर्ष २०१३ में पूर्वप्रकाशित )