नए साल को सोच रहा हूँ -अरुण मिश्र गए साल को देख रहा हूँ। नए साल को सोच रहा हूँ।।
गए साल में क्या था ऐसा, नए साल जो नहीं रहेगा ? केवल साल बदल जाने से, जीवन में क्या कुछ बदलेगा?? मेरे घर के ठीक बगल में, मेरी मेड रहा करती है। जैसे गुज़र-बसर मैं करता, वह भी गुज़र-बसर करती है।। पिछले कर्ज़े लाख चुकाए, फिर भी कुछ उधार बाकी है। मेरी पेंशन नहीं मिली तो, उसकी भी पगार बाकी है।। नए साल का जश्न मगर फिर, नए साल को होना ही है। बच्चे कुछ पल तो हँस-गा लें, जीवन हँसना-रोना ही है।। शाम सजा कर कुछ गुब्बारे, और बजा कर गीत सुहाने। बैठे सब अलाव को घेरे, नए साल का जश्न मनाने।।
पूड़ी - सब्ज़ी बनवाई है, बस इतना उपक्रम, काफ़ी है। चहक रहे हैं, नाच रहे हैं, बच्चों ने पाई टॉफ़ी है ।।
यही जश्न बिलियन डॉलर का, जो यह दुनिया मना रही है। नए साल की मृग-मरीचिका, सबको सपने दिखा रही है।। मैं भी कुछ सपने-उम्मीदें, पाल रहा हूँ, पोस रहा हूँ।। *
-अरुण मिश्र धीरे - धीरे वो मेरे एहसास पे छाने लगे। ख़्वाबों में बसने लगे, ख़्यालों को महकाने लगे।। उनकी सब बेबाकियाँ जब हमको रास आने लगीं। तब अचानक एक दिन, वो हमसे शरमाने लगे।। जिनकी आमद के लिए थे मुद्दतों से मुन्तज़िर। उनका आना तो हुआ पर, आते ही जाने लगे।। देखने लायक वो मन्ज़र था, जुदाई की घड़ी। अश्क अपने पोंछ कर, हमको ही समझाने लगे।। बहकी-बहकी गुफ्तगू थी जब तलक पहलू में थे। हमसे भी ज्यादा 'अरुन', वो ख़ुद ही दीवाने लगे।। *
ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ? -अरुण मिश्र ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ? नूर है, आग है, पानी है, हवा है, क्या है ? साँस की बंसरी को रोज़ नये सुर देता; कोई फ़नकार है, शायर है, ख़ुदा है, क्या है ? कभी डसती, कभी लहराती, कभी छा जाती; कोई नागिन है, ज़ुल्फ़ है कि, घटा है, क्या है? आँखें इस्रार करें, लब पे मुसल्सल इन्कार; कोई आदत है कि, ज़िद है कि, अदा है,क्या है? इश्क़ को हुस्न के रखते हो मुक़ाबिल जो, 'अरुन '; है ये ख़ुद्दारी, जुनूँ है कि, अना है, क्या है ? *
कालचक्र है सतत परिभ्रमित, बदल-बदल ऋतुओं के चोले। कभी शुष्क है, कभी आर्द्र है; आतप-शीत रंग बहु घोले।। जीर्ण-पत्र सब झरे द्रुमों से, शिशिर-गलित, हेमन्त-विदारित। फिर वसंत ने ली अँगड़ाई, फिर से आम्र, मंजरी-भारित।। पत्रोत्कंठित एक-एक तरु, विटप-विटप नव-पल्लव-भूषित। मन्मथ-दुन्दुभि सुन वसंत की, प्रकृति, सृजन-आतुर मन-हर्षित।। नवल हरित पत्रों की चूड़ी, बाँह-बाँह भर पहने डाली। मेंहदी रची हथेली, पल्लव; है वसंत की छटा निराली।। कोयल की मीठी तानें हैं; विहगों के मनहर हैं कलरव। हृदयों में उल्लास भर रहा, है वसंत, जीवन का उत्सव।। * (वर्ष २०१३ में पूर्वप्रकाशित )
वॉव ! ग्रेट ! फोर्टीन्थ सेप्टेम्बर ! -अरुण मिश्र कोल्कता की हिंदी मइय्या। मुम्बई वाले हिंदी भइय्या। चेन्नै वाली हिंदी अम्मा। नाचे हिंदी छम्मा-छम्मा।। हिंदी दिवस मनायें छक कर। वॉव ! ग्रेट ! फोर्टीन्थ सेप्टेम्बर।। दुनिया भर की हुई दुलारी। शोर-शराबा है सरकारी। हिंदी एक रोज़ की रानी। दुहराती हर साल कहानी।। हिंदी दिवस मनायें छक कर। वॉव ! ग्रेट ! फोर्टीन्थ सेप्टेम्बर।। पैसे वाले, नेता, अफ़सर। झाड़ रहे हिंदी पर लेक्चर। हिंदी के भविष्य को लेकर, चिंतित सारे व्हाइट कॉलर।। हिंदी दिवस मनायें छक कर। वॉव ! ग्रेट ! फोर्टीन्थ सेप्टेम्बर।। बाबा लोग गए स्कूल। हॉर्स राइडिंग, स्विमिंग पूल। ललुआ, बुधुआ शाला जाते। डर्टी, डैम फूल कहलाते।। हिंदी दिवस मनायें छक कर। वॉव ! ग्रेट ! फोर्टीन्थ सेप्टेम्बर।। गाने बजा-बजा बाज़ारू। ख़ुश हैं सारे ब्रो बीमारू। हमने भी की फ़र्ज़-अदाई। कुछ मन की पीड़ा छलकायी।।
हिंदी दिवस मनायें छक कर। वॉव ! ग्रेट ! फोर्टीन्थ सेप्टेम्बर।। *
न हूँ मैं अहंकार, मन, चित्त, बुद्धि ; न हूँ कर्ण-जिह्वा, न हूँ नेत्र-नासा। न हूँ व्योम-भूमि, न हूँ तेज-वायु ; चिदानन्द का रूप, शिव हूँ, मैं शिव हूँ ।। न मैं प्राणसंज्ञा, न हूँ पंच-वायु ; न हूँ सप्तधातु, न हूँ पंचकोश। न मुख-कर-चरण हूँ , न गुह्यांग कोई ; चिदानन्द का रूप, शिव हूँ , मैं शिव हूँ ।। मुझे राग ना द्वेष, ना लोभ-मोह ; न मद कोई मुझ में, न मात्सर्य का भाव। नहीं धर्म, ना अर्थ, ना काम-मोक्ष ; चिदानन्द का रूप, शिव हूँ , मैं शिव हूँ ।। नहीं हूँ मैं सुख-दुख, नहीं पुण्य या पाप ; नहीं वेद, ना यज्ञ, ना मन्त्र-तीर्थ। नहीं हूँ मैं भोजन, न हूँ भोज्य-भोक्ता ; चिदानन्द का रूप, शिव हूँ , मैं शिव हूँ ।। नहीं मृत्युभय मुझ को, ना जातिभेद ; न माता-पिता मेरे, ना जन्म कोई। न बन्धु, न मित्र, न गुरु कोई, ना शिष्य; चिदानन्द का रूप, शिव हूँ, मैं शिव हूँ ।। निराकार हूँ रूप मैं, निर्विकल्प ; सकल - सृष्टि - सर्वत्र - सर्वांग- व्यापी। सदा मुझ में सम भाव, बन्धन ना मुक्ति ; चिदानन्द का रूप, शिव हूँ , मैं शिव हूँ ।। *
यूँ हवाओं में, घुल गई होली। रंग बरसे तो, धुल गई होली। सारे आलम में, मस्तियाँ बिखरीं। इक पिटारी सी,खुल गई होली।। बेल-बूटों सी, है कढ़ी होली। फ्रेम में मन के, है मढ़ी होली। रंग का इक तिलिस्म है, हर-सू। सर पे जादू सी, है चढ़ी होली।। सीढ़ी दर सीढ़ी है, उतरी होली। आके अब लान में, पसरी होली। संग हवा के, गुलाल बन के उड़ी। रंग में भीगी तो, निखरी होली।। हाथ यूँ ही, हिला रही होली। खेल मुझको, खिला रही होली। कितनी मुश्क़िल से, पहुँचा आंगन तक। शायद छत पे, बुला रही होली।। देखो हौले से, आ रही होली। मेरे जी को, लुभा रही होली। उम्र तक को, धकेल कर पीछे। कानों में होली, गा रही, होली।। मीठी यादें, जगा रही होली। चैन मन का, भगा रही होली। रंग की बारिशों, न थम जाना। आग दिल में, लगा रही होली।। ख़ुश्क है ’औ कभी पुरनम होली। कभी शोला, कभी शबनम होली। रंग है, रस है, रूप है, कि महक। एक मौसम है, कि सरगम होली।। प्यासी आँखों का, ख़्वाब है होली। चप्पा- चप्पा, गुलाब है होली। लब पे आने से, झिझकता जो सवाल। उसका, मीठा जवाब है होली।। फूली सरसों, संवर रही होली। आम बौरे, निखर रही होली। कोयलें कूकीं, पपीहे पागल। रस के झरने सी झर रही होली।। यूँ मज़े में, शुमार है होली। ज़ोश , मस्ती, ख़ुमार, है होली। इस बरस, कैश जो किया सो किया। बाकी तुम पर, उधार है होली।।
सन्नाटा होता है, आयोजन से पहले। और बाद में फिर होता, विराट सन्नाटा। कोलाहल तो बस, आयोजन तक है सीमित।। यही प्रकृति है। यही नियति है। यही सृष्टि है। सारे जग-प्रपंच के पीछे, विधि का शायद यही प्रयोजन। सन्नाटों के अन्तराल में, कुछ कोलाहल का आयोजन।।