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बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

सन्नाटा और कोलाहल

 सन्नाटा और कोलाहल

 - अरुण मिश्र



सन्नाटा होता है,
आयोजन से पहले।
और बाद में
फिर होता, विराट सन्नाटा।
कोलाहल तो बस,
आयोजन तक है सीमित।।

 
यही प्रकृति है।
यही नियति है।
यही सृष्टि है।
सारे जग-प्रपंच के पीछे,
विधि का शायद यही प्रयोजन।
सन्नाटों के अन्तराल में,
कुछ कोलाहल का आयोजन।।


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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

फिर क्यूँ सन्नाटा.......

पिछली एक पोस्ट में तीन पदों की कुछ छोटी-छोटी
तुकांत रचनाएँ, पदवार क्रमशः ३, ५, ३ के शब्द-विधान
में प्रस्तुत की थीं। उसी क्रम में कुछ और त्रिपदियाँ प्रस्तुत हैं ।        


फिर क्यूँ सन्नाटा.......

- अरुण मिश्र

कैसी अनहोनी हुई।
मौत के थे हाथ लम्बे;
जि़न्दगी बौनी हुई।।


फिर क्यूँ सन्नाटा ?
सन्नाटे का विषम जाल तो,
ध्वनियों ने काटा।।


निर्मित जिनसे चीर।
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर;
करते हमें अधीर।।


चुप धरती, आकाश।
प्रकृति चीन्हती मन का त्रास,
होती साथ उदास।।


तेरा मन है।
रूप, रंग, रस, गन्ध लुटाता,
खिला सुमन है।।

               *