शनिवार, 18 जुलाई 2026

भरि नगरी मे शोर.../ मैथिल लोक गीत / रचना : रवीन्द्र नाथ ठाकुर / गायन : सुमन कल्याणपुर

https://youtu.be/zLRkBPfDH4w


भरि नगरी मे शोर 
बउआ मामी तोहर गोर 
मामा चाँद सन !

नानी-नाना दूनो तोहर 
खाली गाल बजाबय
बाबी तोहर गंगा तन छौ
बाबा बनल हिमालय 
अरे !
मौसा तोहर चोर 
मौसी मुंहक बड्डजोर 
मैया पान सन !

थैया-थैया चलू कन्हैया 
थैया-थैया ता-ता थैया
थैया-थैया चलू कन्हैया
जहिना भोर बसाय 
धरती मैया सब दुःख हरनि
खसबले कोनो बाय
बउआ मोती सन इ लोर
बीछत खाली आंचल मोर
अपने प्रान सन !

अपना कुल के लाल कमल 
त काकिक सूगा-मैना
एहि दुखिया के हंसी-खुसी
आ बापक नइ हय खिलौना
कहु बाबू
तो आसि के चकमक भोर 
हंसिबे खोलिके दूनू ठोर 
कूटल धान सन !

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

हनुमद्भुजंग स्तोत्रम्.../

https://youtu.be/RsdiYVHWr4Y  


प्रसन्नांगरागं प्रभाकांचनांगं
जगद्भीतशौर्यं तुषाराद्रिधैर्यम् ।
तृणीभूतहेतिं रणोद्यद्विभूतिं
भजे वायुपुत्रं पवित्राप्तमित्रम् ॥ १ ॥

भजे पावनं भावना नित्यवासं
भजे बालभानु प्रभा चारुभासम् ।
भजे चंद्रिका कुंद मंदार हासं
भजे संततं रामभूपाल दासम् ॥ २ ॥

भजे लक्ष्मणप्राणरक्षातिदक्षं
भजे तोषितानेक गीर्वाणपक्षम् ।
भजे घोर संग्राम सीमाहताक्षं
भजे रामनामाति संप्राप्तरक्षम् ॥ ३ ॥

कृताभीलनाधक्षितक्षिप्तपादं
घनक्रांत भृंगं कटिस्थोरु जंघम् ।
वियद्व्याप्तकेशं भुजाश्लेषिताश्मं
जयश्री समेतं भजे रामदूतम् ॥ ४ ॥

चलद्वालघातं भ्रमच्चक्रवालं
कठोराट्टहासं प्रभिन्नाब्जजांडम् ।
महासिंहनादा द्विशीर्णत्रिलोकं
भजे चांजनेयं प्रभुं वज्रकायम् ॥ ५ ॥

रणे भीषणे मेघनादे सनादे
सरोषे समारोपणामित्र मुख्ये ।
खगानां घनानां सुराणां च मार्गे
नटंतं समंतं हनूमंतमीडे ॥ ६ ॥

घनद्रत्न जंभारि दंभोलि भारं
घनद्दंत निर्धूत कालोग्रदंतम् ।
पदाघात भीताब्धि भूतादिवासं
रणक्षोणिदक्षं भजे पिंगलाक्षम् ॥ ७ ॥

महाग्राहपीडां महोत्पातपीडां
महारोगपीडां महातीव्रपीडाम् ।
हरत्यस्तु ते पादपद्मानुरक्तो
नमस्ते कपिश्रेष्ठ रामप्रियाय ॥ ८ ॥

जराभारतो भूरि पीडां शरीरे
निराधारणारूढ गाढ प्रतापी ।
भवत्पादभक्तिं भवद्भक्तिरक्तिं
कुरु श्रीहनूमत्प्रभो मे दयालो ॥ ९ ॥

महायोगिनो ब्रह्मरुद्रादयो वा
न जानंति तत्त्वं निजं राघवस्य ।
कथं ज्ञायते मादृशे नित्यमेव
प्रसीद प्रभो वानरेंद्रो नमस्ते ॥ १० ॥

नमस्ते महासत्त्ववाहाय तुभ्यं
नमस्ते महावज्रदेहाय तुभ्यम् ।
नमस्ते परीभूत सूर्याय तुभ्यं
नमस्ते कृतामर्त्य कार्याय तुभ्यम् ॥ ११ ॥

नमस्ते सदा ब्रह्मचर्याय तुभ्यं
नमस्ते सदा वायुपुत्राय तुभ्यम् ।
नमस्ते सदा पिंगलाक्षाय तुभ्यं
नमस्ते सदा रामभक्ताय तुभ्यम् ॥ १२ ॥

हनूमद्भुजंगप्रयातं प्रभाते
प्रदोषेऽपि वा चार्धरात्रेऽपि मर्त्यः ।
पठन्नश्नतोऽपि प्रमुक्तोघजालो
सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रयाति ॥ १३ ॥

इति श्रीमदांजनेय भुजंगप्रयात स्तोत्रम् ।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

देवन के पति इन्द्र तारा के पति चन्द्र.../ महाराज स्वाति तिरुनाल कृति / भाषा : अवधी / गायन : श्रीवाल्सन जे. मेनन

https://youtu.be/QMHUq_Sp3DA  


पल्लवी

देवन के पति इन्द्र तारा के पति चन्द्र 
विद्या के पति गणेश दुःख भार हारी

चरणम्  १

रागपति कन्नड़ भजन के पति वीणा
ऋतुपति है वसंत रतिपति सुखकारी

चरणम्  २

मुनिजन पति व्यास पक्षीपति हंस 
नरपति राम अवधविहारी

चरणम्  ३

गिरिपति हिमाचल भूतों के पति महेश्वर 
तीन लोक पति श्री पद्मनाभ गिरिधारी

बुधवार, 15 जुलाई 2026

श्री राधिका आज आनन्द में डोले.../ रचना : संत श्रीभट्ट देवाचार्य जी महाराज / गायन : आनन्द भैय्या जी, वृन्दावन

https://youtu.be/XFW3Tdjj29U  


(दोहा)
सांवर ससि संग लसि प्रिया, भरी सरस रस छंद।
डोलत हैं श्री राधिका, अति ही आज आनंद।।

राधिका आज आनन्द में डोले॥
सांवर चंद गोविन्द के रस भरी दूसरी कोकिला मधुर स्वर बोले।।


पहर तन नील पट कनक हारावली हाथ ले आरसी रूप को तोले॥


कहत श्रीभट्ट व्रजनारिन नागर बनी कृष्ण के शील की ग्रन्थिका खोले॥

नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं.../ रचना : डाॅ रूरू कुमार महापात्रा / गायन : अभिलिप्सा पंडा

https://youtu.be/8NagbHO9LvY  


नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
गृणामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

आनन्दकन्दं सुचन्दस्यान्दं
पूर्णारविन्दं सदैव वन्द्यम्
आनन्दकन्दं सुचन्दस्यान्दं
पूर्णारविन्दं सदैव वन्द्यम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
मुखारविन्दं पदारविन्दं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

अशेषतोषं सुहासवासं
मधुप्रकाशं विषविनाशम्
अशेषतोषं सुहासवासं
मधुप्रकाशं विषविनाशम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
श्रीशं सुरेशं जगत्-ईशमीशं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

सदावसन्तं हृदयहसन्तं
श्रीयालसन्तं शुभं स्मरन्तम्
सदावसन्तं हृदयहसन्तं
श्रीयालसन्तं शुभं स्मरन्तम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
संसारसारं करुणावतारं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

मनोभिरामं निकामकामं
स्वयंप्रमाणं पूर्णपुराणम्
मनोभिरामं निकामकामं
स्वयंप्रमाणं पूर्णपुराणम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नारायणं च प्रणोमि नोमि
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

सोमवार, 13 जुलाई 2026

अता मुझे ये नेमत कर दे या अल्लाह.../ अरुण मिश्र

स्वर्गीय क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल 
'दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह...' 
की तर्ज पर, संगीतकार श्री केवल कुमार जी 
के अनुरोध पर कहे गए कुछ शेर' :

-अरुण मिश्र 

अता मुझे ये नेमत कर दे या अल्लाह 
रहमत की एक नज़र तो कर दे या अल्लाह 

मत दे मुझको माल-ओ-ज़र मत दे
अपने दर का चाकर कर दे या अल्लाह 

किसी दुखी के दुःख को थोड़ा बाँट सकूँ
इतने भर का लायक कर दे या अल्लाह 

नूर से तेरे है ये सारा जग जग-मग
मेरा दिल भी रोशन कर दे या अल्लाह 

भले छीन ले मुझसे मेरी हर दौलत 
पर अपना दीवाना कर दे या अल्लाह

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

वातापि गणपतिं भजेऽहं.../ सन्त मुथुस्वामी दीक्षितर् कृति / भाषा : संस्कृत / गायन : सूर्य गायत्री

https://youtu.be/XDcPvMFmtE8  

वातापि गणपतिं भजेऽहं
वारणाश्यं वरप्रदं श्री ।

भूतादि संसेवित चरणं
भूत भौतिक प्रपंच भरणम् ।
वीतरागिणं विनुत योगिनं
विश्वकारणं विघ्नवारणम् ।

पुरा कुंभ संभव मुनिवर
प्रपूजितं त्रिकोण मध्यगतं
मुरारि प्रमुखाद्युपासितं
मूलाधार क्षेत्रस्थितम् ।

परादि चत्वारि वागात्मकं
प्रणव स्वरूप वक्रतुंडं
निरंतरं निखिल चंद्रखंडं
निजवामकर विद्रुतेक्षुखंडम् ।

करांबुज पाश बीजापूरं
कलुषविदूरं भूताकारं
हरादि गुरुगुह तोषित बिंबं
हंसध्वनि भूषित हेरंबम् ।

"वातापि गणपतिं भजेहं" कर्नाटक संगीत की सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध स्तुतियों में से एक है।
 इसे महान संगीतकार मुथुस्वामी दीक्षितर ने संस्कृत भाषा और हंसध्वनि राग में रचा था।
इस स्तुति में भगवान गणेश (वातापी गणपति) की स्तुति की जाती है।

गीत का मुख्य भाव और अर्थ :

'वातापी' उस स्थान का नाम है जहाँ के यह गणपति हैं (वर्तमान में कर्नाटक का बदामी)।

इस कीर्तन की शुरुआती पंक्तियाँ हैं : 

वातापि गणपतिं भजेऽहं वारणाश्यं वरप्रदं श्री।
भूतादि संसेवित चरणं भूत भौतिक प्रपञ्च भरणं।

इसका अर्थ है: "मैं वातापी (बदामी) में स्थित भगवान गणपति की पूजा (भजन) करता हूँ, जो हाथी के मुख वाले (वारणाश्य) और वरदान देने वाले (वरप्रद) हैं। जिनके चरणों की सेवा भूत-प्रेत आदि करते हैं और जो सम्पूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं।

गुडिय नोडिरण्णा देहद.../ भाषा : कन्नड़ / रचना : सन्त शिशुनाल शरीफ / स्वर : कुमारी अनन्या भट कडाटोका एवं कुमारी सहाना हेगडे होन्नावर

https://youtu.be/6LB-uhHoCAk  


गुडिय नोडिरण्णा देहद
गुडिय नोडिरण्णा
गुडिय नोडिरदु
पॊडविगॆ ऒडॆयनु
अडगिकॊंडु कडुबॆडगिनॊळिरुतिह ।।

मूरु मूलिय कल्लु अदनु
एरि कूतु डॊळ्ळु,
धीर निर्गुणन सार सगुणदलि
तोरि अडगि ता ब्यारागिरुतिह ।।

आरु मूरु कट्टि मेलकॆ
एरिदवनॆ घट्टि,
भेरि कहळि शंख भारिसुनाददि
मीरिदानंद तोरि हॊळॆयुतिह ।।

सागुतिहवु दिवस सेविसि
तेगि हॊळिगि पायस,
योगिराज शिशुनाळधीश तानागि
परत्पर ब्रह्मरूपनिह गुडिय नोडिरण्णा ।।

गीत का हिन्दी में अर्थ

इस गीत का मूल भाव यह है कि हमें भौतिक शरीर को केवल मांस-मज्जा का ढांचा नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे ईश्वर का मंदिर मानना चाहिए
इसका विस्तृत अर्थ निम्नलिखित है :  

• शरीर ही मंदिर है : कवि कहते हैं कि इस नश्वर भौतिक शरीर को देखो。 यह कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमात्मा का निवास स्थान—एक जीवंत मंदिर (देहद गुडी) है।

• अहंकार और ज्ञान : गीत में शरीर के भीतर छिपी ईश्वरीय चेतना को देखने का आह्वान किया गयान है。आंतरिक ऊर्जा (योग और प्राणायाम के माध्यम से) को जागृत करने की बात कही गई है। 

• परब्रह्म का वास : संत शिशुनाल शरीफ बताते हैं कि हमारे भीतर ही वह परब्रह्म (सर्वोच्च शक्ति) विद्यमान है。जब साधक अपने अंतर्मन में झांकता है, तब उसे इस बात का ज्ञान होता है कि यह शरीर ही ईश्वर का मंदिर है और आत्मा ही परमात्मा का रूप है।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

हंझूआं दा भाड़ा.../ भाषा : पंजाबी / कवि : शिव कुमार बटालवी / गायन : महेन्द्र कपूर

https://youtu.be/P9rm7PcbnQY  

तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा,
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


भट्ठी वालीए चम्बे दीए डालीए
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


हो ग्या कुवेला मैनूं
ढल गईआं छावां नी
बेलिआं 'चों मुड़ गईआं
मझ्झियां ते गावां नी
पायआ चिड़ियां ने चीक-चेहाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


छेती छेती करीं
मैं ते जाना बड़ी दूर नी
जिथे मेरे हाणियां दा
टुर ग्या पूर नी
योस पिंड दा सुणींदै राह माड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


मेरी वारी पत्त्यां दी
पंड सिल्ल्हिी हो गई
मिट्टी दी कड़ाही तेरी
काहनूं पिल्ली हो गई
तेरे सेक नूं कीह वज्ज्या दुगाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


लप्प कु ए चुंग मेरी
मैनूं पहलां टोर नी
कच्चे कच्चे रक्ख ना नी
रोढ़ थोढ़े होर नी
करां मिन्नतां मुका दे नी पुआड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


सौं गईआं हवावां रो रो
कर विरलाप नी
तार्यां नूं चढ़ ग्या
मट्ठा मट्ठा ताप नी
जंञ साहवां दी दा रुस्स ग्या लाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।

बुधवार, 8 जुलाई 2026

क्या है जो क़र्ज़-ए-शहर-ए-जाँ आज अदा हो या न हो.../ शायर : पीरज़ादा क़ासिम

https://youtu.be/WSUn45v_fGo  


क्या है जो क़र्ज़-ए-शहर-ए-जाँ आज अदा हो या न हो
आग लगी हो या नहीं ख़ून बहा हो या न हो

मेरी तो किश्त-ए-जाँ में आज ज़ख़्म ही ज़ख़्म खिल उठे
अब मुझे क्या कि सहन में फूल खिला हो या न हो

‘अर्सा-ए-शौक़ में नहीं फ़ुर्सत-ए-पेश-ओ-पस का वहम
ज़ख़्म-तलब रहेंगे हम ज़ख़्म मिला हो या न हो

हम ने तो माजरा-ए-ग़म बर-सर-ए-‘आम कह दिया
अश्क बहे हों या नहीं शोर उठा हो या न हो

उस को तो ताज़ा-कारी-ओ-ज़ख़्म-गरी का शौक़ है
ज़ख़्म दबे हों या नहीं दर्द थमा हो या न हो

महरम-ए-राज़ है हवा फ़ाश है सारा माजरा
उस ने कहा हो या नहीं हम ने सुना हो या न हो

उस के तो है नसीब में शब-नज़री-ओ-जाँ-कनी
भड़के है ख़ुद चराग़-ए-शौक़ तेज़ हवा हो या न हो

हम तो फ़रेब-कारी-ए-शब को बयान कर गए
अब ये नसीब-ए-शहर है जाग उठा हो या न हो

उस की गली से आज तो गुज़रे थे सर-ब-दस्त हम
उस ने ब-यक निगाह-ए-शौक़ देख लिया हो या न हो

पीरज़ादा क़ासिम रज़ा सिद्दीकी

जन्म 8 फरवरी 1943), एक पाकिस्तानी विद्वान, 
लेखक, कवि, वैज्ञानिक और शिक्षाविद् हैं। 
उन्होंने कई विश्वविद्यालयों के कुलपति के रूप में 
कार्य किया है।

रविवार, 5 जुलाई 2026

नारायण ते नमो नमो.../ सन्त श्री अन्नमाचार्य कृति / भाषा : संस्कृत / गायन : भावप्रिया

https://youtu.be/GAXzvofZt7E  


नारायण ते नमो नमो 
भव नारद सन्नुत नमो नमो ।।

मुरहर नगधर मुकुंद माधव
गरुडगमन पंकजनाभ
परमपुरुष भव-बंध विमोचन 
नर मृग शरीर नमो नमो ।।

जलधि शयन रविचंद्रविलोचन
जलरुह भवनुत चरणयुग
बलिबंधन गोपीजन वल्लभ
नळिनोदर ते नमो नमो ।।

आदिदेव सकलागम पूजित
यादव कुल मोहन रूप
वेदोद्धर श्रीवॆंकटनायक
नादप्रिय ते नमो नमो ।।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

मा रा ब-ग़मज़: कुश्त-ओ-क़ज़ा रा बहानः साख़्त.../ मिर्ज़ा मुहम्मद हुसैन 'क़तील' (1757-1818) / गायन : इक़बाल बानो

https://youtu.be/MxVfvYvWGVA?si=Miz_kIhZW99NsQt6


मा रा ब-ग़मज़: कुश्त-ओ-क़ज़ा रा बहानः साख़्त
ख़ुद सू-ए-मा न-दीद-ओ-हया रा बहानः साख़्त

उस ने मुझे ग़मज़े से मार डाला और क़ज़ा का बहाना बनाया
उस ने मेरी तरफ नहीं देखा और हया का बहाना बनाया

दस्ते ब-दोश-ए-ग़ैर निहाद अज़ रह-ए-करम
मा रा चू दीद लग़्ज़िश-ए-पा रा बहानः साख़्त

उस ने मोहब्बत से दूसरे के कंधे पर हाथ रखा
लेकिन जब उसने मुझे देखा तो लड़खड़ाने का बहाना बनाया

रफ़्तम ब-मस्जिदे पय-ए-नज़्ज़ार:-ए-रुख़श
दस्ते बरू कशीद व दुआ' रा बहानः साख़्त

मैं उसके चेहरे के दीदार के लिए मस्जिद गया
उस ने अपने चेहरे पर हाथ रख लिया और दुआ का बहाना बनाया

आमद बरून-ए-ख़ानः चूँ आवाज़-ए-मा शनीद
बख़्शीदन-ए-निवाल: गदा रा बहानः साख़्त

जब उसने मेरी आवाज़ सुनी घर से बाहर आ गया
इस बार उसने फ़क़ीर को खाना देने का बहाना बनाया

ख़ून-ए-'क़तील'-ए-बे-सर-ओ-पा रा ब-पा-ए-ख़्वेश
मालीद आँ निगार व हिना रा बहानः साख़्त

उस ने बे-सर-ओ-सामान 'क़तील' के ख़ून को
अपने क़दमों में मल लिया और हिना का बहाना बनाया

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

कंडु धन्यनादॆ गुरुगळ – कण्णारॆ ना.../ भाषा : कन्नड़ / श्री मोहन दासारु कृति / गायन : विभा हेगडे

https://youtu.be/2PrGnfxUTvI?si=pLymM5ue2hJYXh0T


कंडु धन्यनादॆ गुरुगळ – कण्णारॆ ना
कंडु धन्यनादॆ ई गुरुगळ   ।। प ।।

तुंगातटदि बंदु निंत
पंगु बधिराद्यंग हीनर
अंगगैसि सलहुवा – नर
सिंगनंघ्रि भजकरिवर      ।।१।।

गुरुवर सुगुणेंद्ररिंद
परिपरियलि सेवॆगॊळुत
वरमंत्रालयपुरदि मॆरॆव
परिमळाख्य ग्रंथकर्तर      ।।२।।

सो‍हं ऎन्नदॆ हरिय दा
सोहं ऎन्नलु ऒलिदु विजय
मोहन विठ्ठलन्न परम
स्नेहदिंद तोरुववर         ।।३।।

Meaning (Stanza by Stanza)

Pallavi (Refrain) :

Kandu dhanyanade gurugala kannaare naa kandu dhanyanade

I am deeply blessed and fulfilled to have seen you with my own eyes, my revered Guru.

Stanza 1 :

Tungaatathadi bandu ninta pangu badhiraadyanga heenara
Angagaisi salahuvaa - nara singananghri bhajkarivara

Standing on the banks of the Tungabhadra River, you bless and heal those who are physically challenged, blind, deaf, and helpless. You are the supreme protector for those who worship the lotus feet of Lord Narasimha. 

Stanza 2 :

Guruvara Sugunendrarinda paripariyali sevegolutha
Vara Mantralayapuradi mereva Parimalaakhya granthakarthara

Serving the esteemed Guru in various ways, you reside in the blessed town of Mantralaya. You are the author of the great scriptures known as Parimala. 

Stanza 3 :

Soham ennade hariya da soham ennalu olidu Vijaya
Mohana Vittalanna parama...

Although we do not realize our true divine nature, when we surrender and chant "Soham" (I am He/that divine soul), Lord Vijaya Mohana Vittala is pleased.

मंगलवार, 30 जून 2026

हूव तरुवर मनॆगॆ हुल्ल तरुव.../ भाषा : कन्नड़ / सन्त पुरन्दर दास कृति / गायन : श्रीमती जयवन्ती देवी

https://youtu.be/LU8i4EQMoUE 


हूव तरुवर मनॆगॆ हुल्ल तरुव
अव रमण इवगिल्लगरुव ।।प।।

English Translation :

He goes to the houses of those who bring flowers and those who bring grass.
Oh, the consort of Lakshmi (Lord Krishna), He has absolutely no ego or pride!

ऒंदु दळ श्रीतुळसि बिंदु गंगोदकवु
इंदिरा रमणगॆ अर्पितवॆनुत
ऒंदे मनसिनलि सिंधुशयनॆनुत
ऎंदॆंदिगू वासिपनु मंदिरदॊळगॆ ।।१।।

English Translation :

If one offers just a single Tulsi leaf and a drop of holy Ganga water to the Lord of Indira (Lakshmi), and sincerely calls Him the one who reclines on the ocean (Lord Vishnu/Mukunda) with a single-minded devotion, He will forever reside in the devotee's heart.

परिपरिय पुष्पगळ परमात्मगर्पिसि
परिपूर्ण तानॆंदु पूजॆयनु माडि
सरसिजाक्षनु तन्न सकल स्वातंत्र्यदलि
सरि भाग्य कॊडुव तन्नरमनॆय ऒळगॆ ।।२।।
पांडवर मनॆयल्लि कुदुरॆगळ ता तॊळॆदु
पुंडरीकाक्षनु हुल्लनु तिनिसि
अंडज वाहन पुरंदर विठ्ठल
तॊंडरिगॆ तॊंडनागि संचरिसुतिहनु ।।३।।

Charana 2 & 3 ( English Translation)

The remaining verses, as documented in source, describe how the Lord accepts various flower offerings with grace and rewards devotees with a place in his abode. The song concludes by highlighting Krishna's role as a humble servant to his true followers, citing his actions for the Pandavas.

सोमवार, 29 जून 2026

मथुरा नगर की डगर मे चल्यो जात पायो है हरि हीरा.../ स्वर : अ.सौ. भामिनी बागरोदी शर्मा (कोटा)

https://youtu.be/bZnDjlEevoE 


मथुरा नगर की डगर मे चल्यो जात पायो है हरि हीरा ।।
सुन री भटु लटु भयो डोलत, गोकुल गाम को अहीरा ।।१।।

बन ते जु आवत बेनु बजावत, बंसीबट यमुना के तीरा ।।
"परमानंद" दास को ठाकुर, हँस दीनो मुख बीरा ।।२।।

शुक्रवार, 26 जून 2026

पीलियोटॊत्त कार्कून्तलुं कॆट्टि.../ भाषा : मलयालम / गायन : श्रीरेखा

https://youtu.be/4bRpRGz3tRc 

पीलियोटॊत्त कार्कून्तलुं कॆट्टि...

रचना : सुरेश रविवर्मा
भाषा : मलयालम
गायन : श्रीरेखा

पीलियोटॊत्त कार्कून्तलुं कॆट्टि
फालदेशे तिलकमतुं तॊट्टु
बालचन्द्रसमानमुखप्रभ – काणाकेणं

आरणिमलर् पालय्क्कमोतिरं
बालकर्क्किणङ्ङुन्न पुलिनखं
चेलोटायव चार्त्तीट्टु काणणं – भगवाने

नीलक्कार्मुकिल्वर्ण्ण ! जनार्द्दन
बालगोविन्द ! वासुदेव ! कृष्ण
मालकट्टणे माधव ! गोविन्द – वासुदेव

कय्यिल् नल्ल मुरळि चॆऱुकोलुं
मॆय्यऴकार्न्न पीतांबरप्पट्टुं
कॆट्टि नन्नायुटुत्तुटन् काणणं – वासुदेव

भक्तनाय कुचेलन्नु वेण्टव-
यॊक्कॆयुं भवानल्लो कॊटुत्ततुं
मुक्ति नल्कणे माधव गोविन्द! – वासुदेव


Peeliyodotha karkoonthalum ketti...lyrics and meaning

"Peeliyodotha Karkoonthalum" is a popular Malayalam devotional bhajan dedicated to Lord Krishna. It is a visual prayer that describes the enchanting appearance and divine qualities of the Lord. 

Lyrics (Transliterated)

Peeliyodotha kaarkoonthalum ketti
Phala deshe thilakamathum thottu
Balachandra samana mukha prabha
Kaanaakenam 

Aarani malar palakka mothiram
Baalakarkkinangunna pulinakham
Cheloraayava chernnittuk
Kaananam bhagavaane 

Neelakkaarmukil varna janaarthana
Baalagovinda vaasudeva krishna
Maalakattane maadhava govinda
(Vaasudeva...) 

Kaiyyinu nalla murali cherukolum
Manja vasthravum maayoora pichavum
Cheliyananinjanthike
Kaananam (Vaasudeva...)

Bhakthanaaya kuchelannu vendava
Yokkeyum bhavaanallo koduthathum
Mukthi nalkane maadhava govinda
(Vaasudeva...) 

Meaning and Devotional Context

The song visually paints the iconic, beautiful form of Lord Krishna and pleads for His blessings and liberation (Moksha).

*Physical Appearance:* It describes Krishna tying His dark, curly hair with a peacock feather (peeliyodotha). He wears a holy mark (thilakam) on His forehead and has a radiant face that shines like a crescent moon. 

*Adornments:* It mentions Him wearing specific traditional ornaments like the aarani malar, palakka mothiram (a traditional Kerala necklace/pendant), and a tiger claw pendant typically worn by children.

*Divine Instruments & Attire:* The song visually seeks His form holding a flute (murali), draped in yellow silk garments (peethambaram), and adorned with peacock feathers.

*Prayer for Grace:* The devotee praises Krishna as the One with a dark, rain-cloud complexion and prays to Him to remove all sorrows and grant liberation, just as He showered immense blessings on His devotee, Kuchela.

गुरुवार, 25 जून 2026

सदा ऎन्न हृदयदल्लि, वास माडो श्री हरी.../ संत विजय विठल दासार कृति / गायन : रंजनी हेब्बार

https://youtu.be/qqDLqpa-FAA  


सायंकाले वनान्ते कुसुमित समये सैकते चन्द्रिकायाम्
त्रैलोक्याकर्शणांगम् सुरवरगणिक मोहनापांगमूर्तिम् ।
सेव्यम् श्रृगांरभावै: नवरसभरितै: गोपकन्या सहस्रै:
वन्दे अहम् रासकेली रतम् अतिसुभगम् वष्य गोपालकृष्णम्।।

सदा ऎन्न हृदयदल्लि, वास माडो श्री हरी

नाद मूर्ति निन्न पाद, मोददिंद भजिसुवॆनो

ङ्ञानवॆंबो नवरत्नद मंटपद मध्यदल्लि
वेणुगान लोलन कुळ्ळिरिसि ध्यानदिंद भजिसुवेनो

भक्तिरसवॆंबो मुत्तु माणिक्यदा हरिवाणदी
मुक्तनागबेकु ऎंदुमुत्तिन आरति ऎत्तुवेनो

निन्न नानु बिडुवनल्ल ऎन्न नीनु बिडलु सल्ल
घन महिम विजय विठल निन्न भकुतर केळो सॊल्ल

*Sada Yenna Hrudaya Dalli*
*Composer : Saint Vijaya Vittala Dasar*

Pallavi
sadaa enna hrudayadalli vaasamaado shri hari

Oh Lord of Lakshmi, Sri Hari, kindly reside in my heart forever

Anupallavi

Naadhamurthi ninna paada modhadhinda bhajisuve

Oh Lord of Music, with great enthusiasm and happiness I worship your divine lotus feet

Charanam – 1
jnaana vembo navaratna mantapada madhyadalli
gaana lolana kullirisi dhyaanadinda bhajisuve

I shall seat Lord Hari, who is the admirer of music, in the grand hall of wisdom decorated with nine precious gems and shall worship the Lord through meditation.

Charanam – 2
bhakthi rasavembo muddu maanikyada harivaanadi
muktanaaga beku endu muttina aarathi yetthuve

I shall worship through performing the aarathi with the lamp made of pearls, kept in the plate of devotion made of gold decked with pearls and jewels, through which I wish to become liberated.

Charanam – 3
ninna naanu biduvanalla yenna neenu bidalu palli
pannaga shayana vijaya vithala kelo ninna bhaktara solla

I would not leave you and will neither allow you to leave me. Oh Lord the one who recline on a serpent, Oh Vijaya Vittala, kindly hear the plea of your devotees.

मंगलवार, 23 जून 2026

जॊ जो जो जो जो साधुवंत.../ लोरी / भाषा : कन्नड़ / सन्त पुरन्दर दास कृति / गायन : बाम्बे जय श्री

https://youtu.be/kUvYeK189jU  


जॊ जो जो जो जो साधुवंत...

सन्त पुरन्दर दास कृति
गायन : बाम्बे जय श्री

जॊ जो जो जो जो साधुवंत
जो जॊ जो जो जो भाग्यवंत
जो जो जो जो गुणवंत
जो जो जो जो लक्ष्मीकांत

भक्तवत्सल भवहरने जो जो तप्तिवास प्रिय कृष्णने जो जो
मुक्ति दायक मुरहरने जो जो चित्तजनय्य परवस्तुवे जो जो
करुणाकर करि वरदने जो जो सुरनर मुनि वंदितने जो जो
गरुड वाहन नागधरने जो जो खर दूषण संहारने जो जो

सोमवार, 22 जून 2026

कन्ननिदम् एदुत्तु.../ संगीतकार : अंबुजम् कृष्ण / भाषा: तमिल / गायन : सितारा कृष्ण कुमार (सिथु मनी)

https://youtu.be/E0x027psWlU  

Text and meaning of the song

This is a song set in the 'heroine-heroine' vein. In it, the heroine (Radha/Gopi) sends her friend (played by a parrot in the song) to convey her heart-melting love to Kannan (Krishna)

Below is a summary of the main meaning of the lyrics:


• Pallavi:


Meaning: "Tell Kannan, parrot, about this deep love I, a virgin, have for Kannan." 


• Anupallavi:


Meaning: "Let him understand that I am losing my sleep and physical strength at the thought of him, and my mind is melting.


*कन्ननिदम् एदुत्तु*
*रागम् : रागमालिका*
*तालम्: आदि*
*संगीतकार: अंबुजम् कृष्ण*
*भाषा: तमिल*
*गायन : सितारा कृष्ण कुमार (सिथु मनी)*


*पल्लवी*


कन्ननिदम् एदुत्तु शोल्लादि किलिये कन्नी नान अवनमेल कोंडा कडलाई


*अनुपल्लवी*


उनुरक्कम् विट्टु अवनै निनैन्दु उल्लम् मेझुगै ऐ उरुगुगिरेन एनरु


चरणम् १


एन्ननि निदम् नान कन्निर पोझिंडुम एन्नै निनैक्कडा करणम् केल किलिये (कन्नी नान)


चरणम् २


अम्बुजअक्सा अन अंबु केटका वेम्बिये वादुरल विरेनदु शेल्वे एनरु

रविवार, 21 जून 2026

राम की जल समाधि' - महान गीतकार भारत भूषण के स्वर में...

https://youtu.be/3VGNls6nzmc


कविता की पृष्ठभूमि--

   भगवान श्री राम के अवतार लेने का  प्रयोजन पूर्ण होने पर, ब्रह्मा जी ने कहा आप जैसे चाहें वैसे विष्णु-लोक में आएँ। केवल योगमाया सीतादेवी आपको यथार्थ रूप को पहचानती हैं। ब्रह्मा जी की बात सुनकर वे सरयू नदी में प्रवेश कर, अपने वैष्णव तेज रूप में  समा गए थे। उस समय अप्सराओं ने नृत्य किया , गंधर्वों ने गान किया, देवताओं ने पुष्पवर्षा की। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के उत्तर काण्ड के ११० वें सर्ग में इसका वर्णन है। 

    भारत भूषण जी ने एक कवि सम्मलेन में कहा था कि वे सरयू-तट पर बैठे थे, उन्हें रामायण का उपरोक्त प्रसंग याद आया। वे वहाँ दिव्य  भावों में खो गये। कैसे राम को सीता का स्मरण ने विचलित किया होगा। विशाल राज्य,सारा सुख तुच्छ लगा होगा। सीता का बिछोह असहनीय हो गया होगा। कैसे जल में प्रवेश किया होगा। पानी पहले घुटनों तक, फिर नाभि से होता हुआ छाती तक आया होगा। राम कैसे सरयू में आगे बढे होंगे। माँ सीता और उनकी सखियों ने कैसे उनका स्वागत किया होगा। इस तरह उनकी यह कविता बन गयी। 

   आप यह कालजयी रचना पढ़ें, सुनें और महसूस करें। शब्द और स्वर, एक दिव्य अनुभूति दे जाते हैं। 

राम की जल समाधि

पश्चिम में ढलका सूर्य 
उठा वंशज सरयू की रेती से 
हारा-हारा रीता-रीता 
निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम 
निःशब्द अधर, पर रोम-रोम 
था टेर रहा सीता-सीता 

किसलिए रहे अब ये शरीर 
ये अनाथ मन किसलिए रहे 
धरती को मैं किसलिए सहूँ 
धरती मुझको किसलिए सहे

तू कहाँ खो गई वैदेही 
वैदेही तू खो गई कहाँ 
मुरझे राजीव नयन बोले 
काँपी सरयू, सरयू काँपी 

देवत्व हुआ लो पूर्णकाम 
नीली माटी निष्काम हुई 
इस स्नेहहीन देह के लिए 
अब साँस-साँस संग्राम हुई 

ये राजमुकुट ये सिंहासन 
ये दिग्विजयी वैभव अपार 
ये प्रिया-हीन जीवन मेरा 
सामने नदी की अगम धार

माँग रे भिखारी-लोक माँग 
कुछ और माँग अंतिम बेला 
आदर्शों के जल-महल बना 
फिर राम मिले न मिले तुझको 
फिर ऐसी शाम ढले न ढले 

ओ खंडित प्रणयबंध मेरे 
किस ठौर कहाँ तुझको जोड़ूँ 
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य 
बोलूँ भी तो किससे बोलूँ 
सिमटे अब ये लीला सिमटे 
भीतर-भीतर गूँजा भर था 
छप से पानी में पॉंव पड़ा 
चरणों से लिपट गई सरयू 

फिर लहरों पर वाटिका खिली 
रतिमुख सखियाँ नतमुख सीता 
सम्मोहित मेघबरन बरसे 
पानी घुटनों-घुटनों आया 
आया घुटनों-घुटनों पानी 

फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा 
लहरों-लहरों धारा-धारा 
व्याकुलता फिर पारा-पारा 

फिर एक हिरन -सी किरण देह 
दौड़ती चली आगे-आगे 
नयनों में जैसे बाण सधा 
दो पाँव उड़े जल में आगे 

पानी लो नाभि-नाभि आया 
आया लो नाभि-नाभि पानी 
जल में तम, तम में जल बहता  
ठहरो बस, और नहीं, कहता 
जल में कोई जीवित दहता 

फिर एक तपस्विनी शांत-सौम्य 
धक्-धक् लपटों -सी निर्विकार 
सशरीर सत्य-सी सन्मुख थी 

उन्माद नीर चीरने लगा 
पानी छाती-छाती आया 
आया छाती-छाती पानी 

भीतर लहरें, बाहर लहरें 
आगे जल था, पीछे जल था 
केवल जल था, वक्ष स्थल था 
वक्ष-स्थल तक केवल जल था 

जल पर तिरता था नीलकमल 
बिखरा -बिखरा-सा नीलकमल 
कुछ और-और-सा नीलकमल 

फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर 
धरती से नभ तक जगर-मगर 
दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे 
जैसे सूरज के हस्ताक्षर 

बाँहों के चन्दन घेरे से 
दीपित जयमाल उठी ऊपर 
सर्वस्व सौंपता शीश झुका 
लो शून्य राम, लो राम लहर 

फिर लहर-लहर लहरें-लहरें 
सरयू-सरयू सरयू-सरयू 
लहरें -लहरें लहरें-लहरें 
केवल तम ही तम
तम ही तम 

जल ही जल 
जल ही जल केवल 
हे राम-राम 
हे राम-राम 
हे राम-राम 
हे राम-राम

अज़ दैर-ए-मुग़ाँ आयम बे-गर्दिश-ए-सहबा मस्त.../ अल्लामा इक़बाल / गायन : मुंशी रज़ीउद्दीन

 https://youtu.be/-R3OxAAlOx8


अज़ दैर-ए-मुग़ाँ आयम बे-गर्दिश-ए-सहबा मस्त
दर मंज़िल-ए-ला बूदम अज़ बादः-ए-इल्ला मस्त

मैं पीर-ए-मुग़ाँ के दैर (मय-ख़ाने) से शराब पिए बिना ही ब-हालत-ए-मस्ती आ रहा हूँ, मैं ‘ला’ (कोई नहीं) की मंज़िल में ‘इल्ला’ (इस के सिवाय) की शराब से मस्त रहा।

दानम कि निगाह-ए-ऊ ज़र्फ़-ए-हमः कस बीनद
कर्दस्त मरा साक़ी अज़ 'इश्वः-ओ-ईमा मस्त

मुझे मालूम है कि उसकी निगाह हर एक का ज़र्फ़ देख लेती है, चुनाँचे साक़ी ने मुझे अपने नाज़-ओ-अदा ही से मस्त कर दिया है।

वक़्तस्त कि ब-गुशायम मय-ख़ानः-ए-रूमी बाज़
पीरान-ए-हरम दीदम दर सेहन-ए-कलीसा मस्त

अब वक़्त आ गया है कि मैं मौलाना रूम का मय-ख़ाना फिर से खोल दूँ, मैंने पीरान-ए-हरम को कलीसा के सहन में मस्त देखा है।

ईं कार-ए-हकीमे नीस्त दामान-ए-कलीमे गीर
सद बंदः-ए-साहिल मस्त यक बंदः-ए-दरिया मस्त

यह काम समझदार लोगों का नहीं है, तुम तो हज़रत मूसा के दामन को पकड़ लो, साहिल पर मस्त रहने वाले सौ आदमी भी समुंदर में डूबकर मस्त होने वाले एक व्यक्ति के बराबर नहीं होते।

दिल रा ब-चमन बुर्दम अज़ बाद-ए-चमन अफ़सुर्द
मीरद ब-ख़याबाँ-हा ईं लालः-ए-सहरा मस्त

मैं अपने दिल को चमन में ले गया, वह खिलने के बजाए उल्टा बाग़ की हवा से अफ़्सुर्दा हो गया, सहरा में मस्त रहने वाला यह लाला (मेरा दिल) फुलवारियों में मुरझा के रह जाता है।

अज़ हर्फ़-ए-दिल आवेज़िश असरार-ए-हरम पैदा
दी काफ़िरके दीदम दर वादी-ए-बतहा मस्त

उसकी दिल-आवेज़ आवाज़ से हरम के असरार ज़ाहिर हो रहे थे, कल मैं ने बतहा की वादी में एक काफ़िर को बे-ख़ुदी के आलम में ये कहते हुए देखा:

सीनास्त कि फ़ारान अस्त या-रब चे मक़ाम अस्त ईं
हर ज़र्रः-ए-ख़ाक-ए-मन चश्मेस्त तमाशा मस्त

यह वादी-ए-सीना है या फ़ारान की वादी, या रब यह कौन सी जगह है, कि मेरी ख़ाक-ए-बदन का हर ज़र्रा आँख बन कर मस्त-ए-तमाशा है।

शनिवार, 20 जून 2026

अन्नपूर्णे विशालाक्षी.../ मुथुस्वामी दीक्षितार कृति / गायन : मीरा राम मोहन

https://youtu.be/ei0kt6QkaZk?si=FSNBlyvJRzwmYeox


*संगीत रचना : मुथुस्वामी दीक्षितार*
*गायन : मीरा राम मोहन*
*भाषा: संस्कृत*


*पल्लवी*

अन्नपूर्णे विशालाक्षी (रक्षा)
अखिला भुवन साक्षी कटाक्षी

*अनुपल्लवी*

उन्नत गर्त्ता तीरा विहारिणी
ओंकारिणी दुरितादि निवारिणी

*मध्यकालम्*

पन्नगभरण रजनी पुराणी
परमेश्वर विश्वेश्वर भास्वरी (अन्नपूर्णे)

*चरणम्*

पायसअन्नपुरिता माणिक्य
पात्र हेमादर्वी विधृतकरे कायाजादि रक्षणा
निपुणतारे
कंचनमय भूषणा अंबरधारे

*मध्यकालम्*

तोयाजासनादि सेवितापारे तुम्बुरु नारदादि नुता वारे
त्रयातिता मोक्षप्रदा चतुरे त्रिपदा शोभिता गुरुगुहासादरे

*अर्थ: (टी.के. गोविंदा राव की पुस्तक से)*

हे अन्नपूर्णा देवी, विशालाक्षी - विशाल नेत्रों वाली, कृपया मेरी रक्षा करें। आप संसार में घटित होने वाली सभी घटनाओं की साक्षी हैं ("अखिलभुवनसाक्षी")। कृपया मुझे अपनी दृष्टि से अनुग्रहित करें ("कटाक्षी")। वह प्रसिद्ध ("उन्नत") गर्त्ततिरा-कुझिक्कराई ("गर्त-तिरा-विहारिणी") में निवास करती हैं। वह ओंकार ("ओंकारिणी") के रूप में हैं। वह दुखों ("दुरितादि") को दूर करती हैं ("निवारिणी")। वह भगवान शिव की संगिनी ("रजनी") हैं, जो स्वयं को सर्पों ("पन्नग") से सुशोभित करते हैं ("आभरण")। वह प्राचीन ("पुरानी") हैं। वह भगवान परमेश्वर ("विश्वेश्वर") की ज्योति ("भास्वरी") हैं। वह एक हाथ में रत्नजड़ित पात्र (मणिक्य पात्र) मीठे चावल-पायसन से भरा हुआ (पुरिता) और दूसरे हाथ में सोने का चम्मच (दर्वी) धारण किए हुए हैं। वह कामदेव और अन्य लोगों की रक्षा करने में निपुण हैं। वह अलंकृत सोने के आभूषणों और सुनहरे रेशम से सुशोभित हैं। ब्रह्मा और तुम्बुरु एवं नारद जैसे प्रख्यात ऋषियों द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वह धर्म-अर्थ-काम से परे मोक्ष प्रदान करने में कुशल हैं।वह गुरुगुहा ("त्रिपदा सोभिता") ("गुरुगुहा-सदारे") की प्रिय मां हैं।


गुरुवार, 18 जून 2026

अम्बा स्तवम् / ब्रह्मर्षि सदाशिवन कृत

https://youtu.be/O_0PVXI4RJ0?si=Z7MhM4zarVmYwku1


वन्देऽहन्तेऽनन्ते सुपदर -
विन्दे विन्दे शन्ते निजसुख -
कन्देऽमन्दे स्पन्दे शुभकरि
बहुदयहृदययुते ।
मायेऽमेये लीये पुरहर -
जायेऽजेये ज्ञेये ननु भव -
दीये ध्येयेऽभ्येये निरुपम -
पदि हृदि मृदितमृते ॥१॥

रुन्धे हतनतबन्धे मम हृदयन्ते स्मितजितकुन्दे
अमलतररूपेऽपापे दीपे भवकूपे पतितं व्यथितं
देवि समुद्धर करुणाजलराशे सुरुचिरवेषे॥२॥

धीरे वीरे शूरे सदमृत -
धारे तारेऽसारे बत भव -
कारागारे घोरे निपतित -
मव शिशुमतुलबले ।
अम्बालम्बे लम्बोदरपरि -
पाले बाले काले खलुजग -
दीशे धीशेऽनीशे हृदि शिव -
मनुमनुदिनममले ॥३॥

शिष्टहितैषिणि दुष्टविनाशिनि
कष्टविभेदिनि दृष्टिविनोदिनि
सङ्कटकण्टकभिन्दनकुशलकले सकले सबले
श्रद्धाबद्धे न्यस्ताभयहस्ते सुरगणविनुते॥४॥

श्रेष्ठे प्रेष्ठे ज्येष्ठे हिमगिरि -
पुष्टे जुष्टे तिष्ठे: शिवपरि -
निष्ठे स्पष्टे हृष्टे मम हृदि
मुनिजननुतिमुदिते ।
आद्ये वेद्ये वैद्ये त्रिजगति
रामे वामे श्यामे कुरु करु -
णान्ते दान्ते शान्ते भयहर -
भगवति सति शिवदे ॥५॥

बुधवार, 17 जून 2026

दर्द हो दिल में तो दवा कीजे.../ दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए.../ शायर : मिर्ज़ा ग़ालिब / गायन : दीक्षा तूर

https://youtu.be/aDi1Bj98-mY?si=gYq5AqmA63uEnLLM


दर्द हो दिल में तो दवा कीजे
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजे

हमको फ़रियाद करनी आती है
आप सुनते नहीं तो क्या कीजे

रंज उठाने से भी ख़ुशी होगी
पहले दिल दर्द आशना कीजे

मौत आती नहीं कहीं, ग़ालिब
कब तक अफ़सोस जीस्त का कीजे

************

दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फ़लत-शिआरी हाए हाए

तेरे दिल में गर न था आशोब-ए-ग़म का हौसला
तू ने फिर क्यूँ की थी मेरी ग़म-गुसारी हाए हाए

क्यूँ मिरी ग़म-ख़्वार्गी का तुझ को आया था ख़याल
दुश्मनी अपनी थी मेरी दोस्त-दारी हाए हाए

उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बाँधा तो क्या
उम्र को भी तो नहीं है पाएदारी हाए हाए

ज़हर लगती है मुझे आब-ओ-हवा-ए-ज़िंदगी
या'नी तुझ से थी इसे ना-साज़गारी हाए हाए

रविवार, 14 जून 2026

मैं गीत बेचकर घर आया.../ कवि : स्वर्गीय भारत भूषण

https://youtu.be/Y4QBJXGdpRM?si=s_IxrEZuFf21J3ys


मैं गीत बेचकर घर आया, सीमेंट ईंट लोहा लाया 
कवि-मन माया ने भरमाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !

जनमा था आँसू गाने को, खोया झूठी मुसकानों  में 
भीतर का सुख खोजता फिरा , बाहर से सजी दुकानों में 
मैं अश्रु बेचकर घर आया, प्लास्टिक के गुलदस्ते लाया 
अपनी आत्मा को बहकाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना ! 

शब्दों-शब्दों सौंदर्य गढ़ा, नगरों-नगरों नीलाम किया 
संतों की संगत छोड़ किसी, वैश्या के घर विश्राम किया 
मैं प्यार  बेचकर घर आया, चुटकी भर सुविधाएँ लाया 
क्या करना था क्या कर आया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना ! 

सारे दागों को ढके रहा, छंदों की शिल्पित चादर से 
गोरे कागज काले करता, टेढ़े-मेढ़े हस्ताक्षर से 
मैं शर्म बेचकर घर आया, गहरे रंग का चश्मा लाया 
दर्पण पर परदा लटकाया हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !

शुक्रवार, 12 जून 2026

नृसिंह आरती हिंदी में – अर्थ के साथ

https://youtu.be/aw83W-y-0_A?si=0KR35wVa7YNXjbIr

(१)
नमस्ते नरसिंहाय 
    प्रह्लादाह्लाद-दायिने। 
   हिरण्यकशिपोर्वक्षः- 
        शिला-टङ्क-नखालये।।


मैं नृसिंह भगवान्‌ को प्रणाम करता हूँ जो प्रह्लाद महाराज को आनन्द प्रदान करने वाले हैं तथा जिनके नख दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पाषाण सदृश वक्षस्थल के ऊपर छेनी के समान हैं।


(२) 
  इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो 
       यतो यतो यामि ततो नृसिंहः। 
बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो 
नृसिंहमादि शरणं प्रपद्ये॥


नृसिंह भगवान्‌ यहाँ है और वहाँ भी हैं। मैं जहाँ कहीं भी जाता हॅूँ वहाँ नृसिंह भगवान्‌ हैं। वे हृदय में हैं और बाहर भी हैं। मैं नृसिंह भगवान्‌ की शरण लेता हूँ जो समस्त पदार्थों के स्रोत तथा परम आश्रय हैं।


(3) 
तव कर-कमल-वरे नखम्‌ 
अद्‌भुत-श्रृंङ्गम्‌ 
दलित-हिरण्यकशिपु-
तनु-भृंङ्गम्‌ 
केशव धृत-नरहरिरूप 
जय जगदीश हरे॥


हे केशव! हे जगत्पते! हे हरि! आपने नरसिंह का रूप धारण किया है आपकी जय हो। जिस प्रकार कोई अपने नाखूनों से भ्रमर को आसानी से कुचल सकता है उसी प्रकार भ्रमर सदृश दैत्य हिरण्यकशिपु का शरीर आपके सुन्दर कर-कमलों के नुकीले नाखूनों से चीर डाला गया है।

गुरुवार, 11 जून 2026

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल.../ शाह हुसैन फकीर / वडाली बन्धु

https://youtu.be/-qk67qMDuaM  


One of the original renditions of Mann Atkeya Beparwah, immortalized by the legendary Wadali Brothers -

उठ फरीदा सुत्तिया, तू झाड़ू दे मसीत 
तू सुत्ता रब जागदा, तेरी ढाढ़े नाल परीत 

"Awaken Fareed, and go broom the mosque.
You’re asleep while your Lord, whom you so dearly love, is awake."

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

My soul is entangled with the indifferent one
Lord of all things visible and invisible

क़ाज़ी मुल्ला मत्ती दैन्दे
ख़रय सियाने राह दसेंदे
इश्क़ की लागे राह दे नाल

Judges and clerics are full of advice,
The righteous and wise show you the path,
But love itself needs no guidance

नदियों पार रांझन दा थाना
कीते क़ोल ज़रूरी जाना
मिंतां कर्रन मल्लाह दे नाल

Ranjha’s dwelling is across the stream,
Having given my word, I must go
I will beseech the boatman

कहे हुसैन फ़क़ीर साईं दा
दर ते छोलियां अद्दियां में
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

I am a novice, what do I know of committed love?
The separation pulls at my sinews
Says Hussain, Gods faqir, I spread my robe before you
Lord of all things visible and invisible

कहे हुसैन फ़क़ीर नुमांरहा
सच्चे साहिब नू में जाना
औरहक कम अल्लाह दे नाल

Says Hussain, the worthless faqir,
I know the true Lord
In the end I will meet my Creator

𝗧𝗵𝗲 𝗪𝗮𝗱𝗮𝗹𝗶 𝗕𝗿𝗼𝘁𝗵𝗲𝗿𝘀 - Ustad Puranchand Wadali And Late Ustad Pyarelal Wadali, Rendering Soulful Poetry Of Shah Hussain Sufi Poet Of 𝗣𝘂𝗻𝗷𝗮𝗯𝗶 In Their Mystical Style “The Punjabi Sufi Music And Classic Folk Gayaki Of Punjab At Its Very Best, Pure Classicism Of This Kind Rarely Heard These Days.

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

वसदी हरदम मन मेरे विच, सूरत यार प्यारे दी
अपने शाह नू आप रजावां, हाजत नई पसराय दी
काहे हुसैन फकीर नुमान्हा, थीवां खाक दवारे दी

प्रियतम की छवि मेरी आत्मा में निरंतर बसी रहती है।
मैं केवल अपने प्रेम को ही प्रसन्न कर सकता हूँ, मुझे किसी दिखावे की आवश्यकता नहीं है।
निकम्मे फकीर हुसैन कहते हैं, मैं तुम्हारे द्वार की धूल हूँ।

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

क़ाज़ी मुल्ला मत्ती दैन्दे
ख़रय सियाने राह दसेंदे
इश्क़ की लागे राह दे नाल

न्यायाधीश और धर्मगुरु सलाहों से परिपूर्ण हैं,
धर्मी और बुद्धिमान लोग आपको मार्ग दिखाते हैं,
परन्तु प्रेम को स्वयं किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं होती।
मेरी आत्मा उदासीन व्यक्ति से बंधी हुई है

नदियों पार रांझन दा थाना
कीते क़ोल ज़रूरी जाना
मिंतां कर्रन मल्लाह दे नाल

रांझा का घर नदी के उस पार है,
मैंने वचन दे दिया है, मुझे जाना ही होगा,
मैं नाविक से विनती करूँगा।

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

साजन बिन रतन होइयां वड्डियां
रांझा जोगी में जोगियाणी
कमली कर कर सद्दियां
साजन बिन रतन होइयां वड्डियां
में हन अयानी नूह की जाणा
बिरहोन तनावां गड्डियां

मेरे प्रियतम के बिना रातें लंबी लगती हैं,
रांझा एक संत है और मैं उसका अनुयायी हूँ।
उसने मुझे बेसुध कर दिया है।

कहे हुसैन फ़क़ीर सईं दा
डर ते छोलियां अद्दियां में
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मैं तो नौसिखिया हूँ, मुझे सच्चे प्रेम का क्या ज्ञान है?
जुदाई मेरे शरीर को जकड़ लेती है।
हुसैन, अल्लाह के फ़कीर, कहते हैं, मैं आपके सामने अपना वस्त्र बिछाता हूँ,
हे समस्त दृश्य और अदृश्य वस्तुओं के स्वामी।
मेरी आत्मा उदासीन व्यक्ति से बंधी हुई है

कहे हुसैन फ़क़ीर नुमांरहा
सच्चे साहिब नू में जाना
औरहक कम अल्लाह दे नाल

हुसैन, निकम्मे फकीर, कहते हैं,
मैं सच्चे ईश्वर को जानता हूँ।
अंत में मैं अपने सृष्टिकर्ता से मिलूंगा।

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

बुधवार, 10 जून 2026

रघुपति राघव राजाराम.../ श्री लक्ष्माचार्य कृत / स्वर : अरुणा साईराम

https://youtu.be/7V5dQnLtaus 


रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

शुक्रवार, 5 जून 2026

घाट पर ठाड़े श्री मदनगोपाल.../ गायन : मुदिता एवं रुचिता जमरिया

https://youtu.be/WIKkpp2liSU?si=O2Q6KbL6F3BqdqKl


घाट पर ठाड़े श्री मदनगोपाल ।
कौन युक्ति कर भरों री यमुनाजल पर्यो है हमारे ख्याल ।।

घोस बढ़्यो घर सास  रिसैहै चल न सकत एक चाल ।
कहा करुं अब यो नहीं मानत सुंदर नंदको लाल ।।

कछुक संकोच कछु चोप मिलन की परी प्रेम की जाल ।
परमानंद स्वामी चित चोर्यों वेणु बजाय रसाल ।।

कण्डु कण्डु नियन्ना.../ संत पुरंदर दासर कृति / गायन : सुषमा अनिल / भाषा: कन्नड़

https://youtu.be/92RwKoSfukI?si=l1jzfH3Du9jSiuQa


पल्लवी

कण्डु कण्डु नियन्ना कइया बिदुवारे पुंडरीकाक्ष पुरूषोत्तम हरे

चरणम् १

बन्धुगालू एनगिला बदुकिनाली सुखविल्ला निन्देयली नन्देनै निराजाक्ष
तन्दे तैय्यु निने बन्धु बालगावु नी इने एंडेन्डिगु निन्ना नम्बिडेनो कृष्ण

चरणम्  २

केसनवोन्दु युगावगि त्रनकिन्त कादेयि एनिसलआरादा भवाडी नोंदे नानु
सनकादि मुनि वन्द्या वनज संभव जनक फणिशायी प्रह्लादगोलिड श्री कृष्ण

चरणम्  ३

भक्तवत्सलनेम्ब बिरुड़ पोट्टा मेले भक्तअधिनानगिरा बेदावे
मुक्ति दायक निनु होन्नुरु पूर्वसा शाक्त गुरु पुरंदर विट्ठल श्री कृष्ण

English Translation  :

Geetha Naresh May 5, 2024 at 6:45 AM

Meaning: 

O pundarikAksha, purushottama Hare, Ranga will you (Ni enna) leave(biDuvare) my hand(kai) (after having) seen(kanDu) me so far. (will you stop your protection to me now?)

C1: 

O nIrajaksha, I have no(enagilla) relatives(bandhu galu), there is no happiness(sukha) in life(baduku), I am pained(nonde) at the ridicule(ninde) directed towards me. You are my mother(tAyi) and father(tande), you are all that there is as my relatives(bandhu-baLaga), O Krishna, I believe (nambideno) in you at all times(endendigU)

C2: 

A moment(kSaNa) has become an age(yuga - like dwaparayuga), I have been (treated) lower than a blade of grass(by others), I have suffered(nonde) uncountable(eNisalarada) indignities(bhava). O krishna, respected by sages like sanaka, vanaja sambhava janaka, the one resting on a snake, and the one who blessed Prahlada.(don’ leave me…)

C3: 

(Tell me) Once you assume (potta mele) the title of bhaktavatsala(the one who protects his devotees), don’t you have to be under the control(AdhIna) of your devotees? O Krishna, the one who lives in Honnuru (honnuru puravAsa), the almighty(shakta) guru purandaravithala. (don’t leave me…)

पर्यावरण वन्दना.../ कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/pc4LKrM5qH4  

वन्दना करिये धरा की;
धरा के पर्यावरण की।।

झर रहे निर्झर सुरीले,
और नदियाँ बहें कल-कल।
ताल, पोखर, झील, सागर,
हर तरफ है, नीर निर्मल।।

चर-अचर जिसमें सुरक्षित,
स्नेहमय उस आवरण की।।

मन्द, मन्थर पवन शाीतल;
आँधियों का तीव्रतर स्वर।
सर्वव्यापी वायु पर ही,
प्राणियों की साँस निर्भर।।

जीव-जग-जीवनप्रदायिनि-
प्रकृति के, शुभ आचरण की।।

अन्न के भण्डार दे भर,
भूमि उर्वर, शस्य-श्यामल।
भूख सबकी मेटने को-
वृक्ष, फलते हैं मधुर फल।।

माँ धरा की गोद के,
इस मोदमय वातावरण की।।
                   *
(काव्य-संग्रह 'कस्मै देवाय' से साभार)