बुधवार, 20 मई 2015

कस्मै देवाय.....

कस्मै देवाय

काव्य संग्रह  (सद्यः प्रकाशित) 
(Poems by Arun Mishra)

ISBN :  978-93-83111-61-9

अरुण  मिश्र

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान , नई  दिल्ली
मूल्य :  २००/=




 



 

रविवार, 10 मई 2015

मातृ दिवस पर विशेष .......

मातृ दिवस पर विशेष .......




                   माँ ! 
-अरुण मिश्र. 

सर्व  प्रथम  तेरी   ही   गोदी-
में,  मैंने   माँ !  आँखें  खोली।
मेरे   कानों   में  गूँजी    माँ !
सब  से  पहले   तेरी   बोली।।

 
          तेरे  आँचल  में  छुप,  पहली-
          क्षुधा  मिटाने  को   रोया  हूँ।
          तेरे   चुम्बन   से   जागा  हूँ ;
          तेरी   थपकी  से   सोया   हूँ।।

 
माँ !  मैं  तेरा  रक्त-माँस हूँ,
तेरा  सब से अधिक  सगा हूँ।
इस दुनिया में  सब से  पहले,
माँ !  मैं  तेरे  गले  लगा    हूँ।।

 
          तेरी   आँखों    से    ही    मैंने,
          दुनिया  को  पहले   पहचाना।
          तुझ   से  रिश्ते-नाते  समझे;
          चन्दा  मामा  तक को  जाना।।

 
माँ  कहना  भी  तुझ से सीखा;
भाषा  सीखी  तुतला   कर   है।
मेरा  कंठ,  तुम्हारी प्रतिध्वनि;
मेरी   वाणी,    तेरा    स्वर   है।।

 
          गिर-गिर कर, उठना सीखा है;
          तेरे  बल  पर,   खड़ा  हुआ   हूँ।
          तुझ से ही  जीवन-रस  ले कर,
          माँ !  मैं   इतना  बड़ा  हुआ हूँ।।

 
तू  भी,  यूँ  निहाल है  मुझ से,
मानो   कोई   मिला   ज़ख़ीरा।
मैं   चाहे   जैसा   भी   हूँ   माँ!
तेरे   लिये,   सदा   हूँ     हीरा।।

 
          माँ !  तू   प्राणों  में   बसती  है;
          साँसों    में    करती   है    फेरा।
          आज,  भले  ही  वृद्ध हो  चला,
          पर,  फिर भी माँ ! शिशु हूँ तेरा।


                                  *
गत वर्ष मातृ दिवस पर पूर्वप्रकाशित 

मंगलवार, 5 मई 2015

ज्येष्ठ के प्रथम बड़ा मंगल पर विशेष.....

ज्येष्ठ के प्रथम बड़ा मंगल पर विशेष 

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है आसरा हनुमान जी---
 
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जैसे दुख  श्री जानकी जी का  हरा  हनुमान जी।
दुख   हमारे  भी  हरो]  है  आसरा  हनुमान जी।।

देह   कुंदन]  भाल   चंदन]  केसरी  नंदन  प्रभो।
ध्यान इस छवि का सदा हमने धरा हनुमान जी।।

लॉघ  सागर]  ले  उड़े]  संजीवनी  परबत सहज।
क्रोध]  कौतुक में  दिया लंका जरा  हनुमान जी।।

मुद्रिका दी]  वन  उजारा  और  अक्षय को हना।
शक्ति का  आभास पा]  रावन डरा  हनुमान जी।।

राम के तुम काम आये] काम क्या तुमको कठिन। 
कौन   संकट]  ना   तेरे   टारे  टरा  हनुमान जी।।

चरणकमलों में तिरे निसिदिन ^अरुण* का मन रमे।
हो  हृदय  में  भक्ति का  सागर भरा   हनुमान जी।।

                                *
(पूर्वप्रकाशित)