ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 8 नवंबर 2017

ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ?



ज़िस्म ये रूह है, मिट्टी है, ख़ला है, क्या है ?

-अरुण मिश्र  

ज़िस्म  ये  रूह  है,  मिट्टी  है,  ख़ला  है,  क्या है ?
नूर   है,  आग   है,   पानी  है,  हवा  है,   क्या है ?

साँस   की   बंसरी   को    रोज़    नये  सुर   देता;
कोई  फ़नकार  है,  शायर  है,  ख़ुदा  है,  क्या है ?

कभी  डसती,  कभी  लहराती,  कभी  छा जाती;
कोई  नागिन है,  ज़ुल्फ़  है  कि,  घटा है,  क्या है?

आँखें   इस्रार   करें,   लब  पे  मुसल्सल   इन्कार;
कोई आदत है  कि,  ज़िद है  कि, अदा है,क्या है?

इश्क़ को हुस्न के रखते हो मुक़ाबिल जो, 'अरुन ';
है  ये  ख़ुद्दारी,  जुनूँ   है  कि,  अना  है,   क्या  है ?
                                        *

शनिवार, 11 जुलाई 2015

लॉन में शाम को गुनगुनाते हुए ......

 
 

जब भी बारिश में ....


-अरुण मिश्र. 



जब भी बारिश में, भीगता है तन। 
तेरी  यादों   में,   डूबता   है   मन॥

बिजलियाँ  हैं  कि,  ये  अदायें  हैं?
रूप  तेरा   नया  कि,   है   सावन??

ऐसा  लगता   है, पास   बैठे    हो।
बादलों की,  किये  हुये  चिलमन॥
  
नम   हवायें   हैं,  आँख   है   मेरी।
तर  दिशायें  हैं,  है  तिरा  दामन॥

अक्स  तेरा,  घुला  फिज़ाओं  में।
आज मौसम है,  हो गया  दरपन॥

बूँदें गिरती  हैं,  बज  रही  पायल। 
बर्क लहरायी,  है   हिली  करधन

मेघ गरजे,  तो  और भी  लिपटीं।
तेरी यादों  ने, धर  लिया  है  तन॥

सूँघता   फिरता   हूँ,  हवाओं   में। 
मैं   वही,   खुश्बू-ए-गुलाब-बदन॥
  
या तो दीवाना, हो गया हूँ 'अरुन'।
या तो फिर,  है नहीं गया बचपन॥
                             *
(पूर्वप्रकाशित)

शनिवार, 27 जून 2015

LAWN MEN SHAAM KO GUNGUNATEY HUYE.......

लॉन में शाम को गुनगुनाते हुये .....





तिरे भी पास ऐसा तो कोई जादू नहीं होगा....

-अरुण मिश्र



भले  ज़ाहिर   सहारे  को    कोई    बाज़ू  नहीं  होगा 
मगर   उस  पर  यकीं  तो  बेसहारा  तू   नहीं  होगा 

निकलते रोज़ हैं शम्श-ओ-क़मर फिर डूब जाने को 
पै  तेरे  हुस्न  पर   ये   फ़लसफ़ा   लागू  नहीं  होगा 

नहीं ज़ल्वानशीं देखा था उस को बज़्म में  जब तक 
गुमाँ  ये  था  कभी  दिल  अपना  बेक़ाबू  नहीं होगा 

न   तेरी  याद   भी   आये   हमें   गर  तू   नहीं  चाहे 
तिरे   भी   पास   ऐसा   तो   कोई   जादू  नहीं  होगा

'अरुन'  तू  दूर  होता  है  तो  अक्सर  सोचता  हूँ  मैं 
हमीं  रह  जायगें  तनहा  जो   तनहा  तू  नहीं  होगा

                                                                *




 

सोमवार, 22 जून 2015

कौन है मेरा दुश्मन, हारता हूँ मैं किस से ?



16.04.95
कौन है मेरा दुश्मन ?

-अरुण मिश्र

भीतर    है    अंधकार,   बाहर    है    रोशनी।
हैं  कितने निर्धन,  जो  ख़ुद को  कहते धनी।।


हंस  मर  रहे   भूखे,  उल्लुओं  की  पौ बारह।
लक्ष्मी मैया  की  भी,  सुरसती से  क्या ठनी।।


कौन है  मेरा  दुश्मन,  हारता हूँ  मैं  किस से ?
क्या  नहीं है  सच,  मेरी  ख़ुद से  है  दुश्मनी।।


लाख  जतन कर डाले,  ज़िन्दगी सँवर जाये।
बात  पर  बनी  न  कुछ,  उल्टे  जां पर  बनी।।


कलियाँ किरनों के संग, दिन भर तो हैं खेलीं।
सिमट रहीं हैं  किरनें, कलियाँ सब अनमनी।।


यार को भी था जाना,चौदहवीं की ही शब को।
वर्ना  देखता  कितनी,  चाँद  तुझ में  रोशनी।।


रूप  की   किसी   गंगा   से,  ज़रूर  गुज़री है।
है   हवा  रसीली   ये,   कितनी  ख़ुशबू  सनी।।


बदलियां थिरकती  हैं, झूम-झूम  रस  झरतीं।
बिजलियों  ने  पहनाई,   चाँदी  की  करधनी।।


वक़्त का कसैलापन,  कुछ तो  बेअसर होगा।
प्यार की  ‘अरुन’  थोड़ी,  डालो  तो   चाशनी।।


                                            *