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शनिवार, 20 जुलाई 2013

रहने दो म्यां हियां पर दीनो-धरम की बातें.....


रहने दो म्यां हियां पर दीनो-धरम की बातें...

-अरुण मिश्र.

रहने दो म्यां  हियां पर,  दीनो-धरम की  बातें।    
दैरो-हरम  में  जँचतीं,   दैरो-हरम   की   बातें॥

उसके  ख़याल को   हैं,  दिल को हमारे  यकसां।  

ज़ोरो-सितम  की  बातें,  मेह्रो-करम  की  बातें॥

जो कुछ है सब उसी का, यां कुछ नहीं किसी का।  

इसके  अलावा जो भी,  सब  हैं  भरम  की  बातें॥

टुक  मेरे  पास  बैठो, तुम भी  'अरुन' से  सीखो।  

हसरत की, दर्दो-ग़म की,दिल के मरम की बातें॥
                                           *

रविवार, 16 जून 2013

दुआ दो ‘मीर’ को........

दुआ दो  ‘मीर’  को........

-अरुण मिश्र
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दुआ दो  ‘मीर’  को,  टुक चैन से  ज़न्नत में  वो सोवे। 
‘अरुन’ तुम यां रखो क़ायम वही अन्दाज़े-दर्द-आगीं।।
  
छलकतीं  रात-दिन  जो दर्द से,  अल्ला के आलम में। 
सुला के  ख़्वाहिशें  कितनी,  ये आँखें  रात भर जागीं।।
  
बहुत  ग़म हैं  ज़माने में,  तो  थोड़ी  सी  खुशी  भी  है। 
मिलन  के  एक  पल   में,   सैकड़ों  तन्हाइयां   भागीं।।

हैं  मीठी,  तल्खि़यों,  दुशवारियों  में,   राहते-ज़ां  सी। 
न   जाने   कैसी   शीरीनी  में,   ये   बातें  तिरी,  पागीं।।
  
न  जाओ  श्याम ! रो-रो   गोपियां,  पइयां परन लागीं। 
तो झरने सी झरन लागी हैं,उनकी चश्मे-अश्क-आगीं।।
                                                *


सोमवार, 3 जून 2013

मगर उससा मिला कोई नहीं.....




मगर उससा मिला कोई नहीं.....

-अरुण मिश्र.

बारहा   ढूँढा,   मगर   उससा  मिला  कोई   नहीं। 
है  ‘अरुन’  सा  एक  ही,  याँ   दूसरा  कोई  नहीं।। 

तू  क़रम की  ओट में,  मुझ पर  क़हर ढाता रहा। 
यूँ   कि   तू  मेरा   ख़ुदा ;  तेरा  ख़ुदा   कोई  नहीं??
  
ज़र्रे - ज़र्रे   में   नुमाया   नूर    से,  गाफि़ल  रहा। 
ज़ुस्तज़ू   उसकी रही,  जिसका  पता  कोई  नहीं।।
  
हमसे   पहले  भी    हुये,  फ़रहादो-कै़सो-रोमियो। 
फिर भी लगता हमको, हमसा आशना कोई नहीं।।
                                              * 
  

रविवार, 19 मई 2013

प्यार के ग़फ़लत में जिसके...

प्यार के ग़फ़लत में जिसके....

-अरुण मिश्र 

प्यार के ग़फ़लत में  जिसके,  है गुज़ारी  ज़िन्दगी        
रंज  उसकोमैंने  ही,  उसकी  बिगाड़ी  ज़िन्दगी।।
  
चहचहों से जिसकेमुझको घर सदा गुलशन लगा। 
उसको ये ग़मपिंजरे मेंउसने गुज़ारी  ज़िन्दगी।।
  
प्यार में क्या खोया-पायाइसका भी होगा हिसाब। 
यूँ  कभी  सोचा  था ,   प्यारी-प्यारी  ज़िन्दगी।।
  
हँसने-रोने  के   हुनर  ने,   है  इसे,  आसां  किया। 
रोये जो अक्सरतो हॅस कर भी गुज़ारी  ज़िन्दगी।।
  
तल्खि़यां ,  मज्बूरियां ,  नाकामियां ,  लाचारियां। 
जाने कितने वज़्न हैं , जिनसे  है  भारी  ज़िन्दगी।।
  
जान भी प्यारी है ’,  जीना भी है मुश्किल मियाँ         
ख़ूब,   ये   मीठी   कटारी   है    दुधारी,   ज़िन्दगी।।
  
जो  बचे  इस साल,  सूखा - जलजला - सैलाब  से। 
वहशतो- दहशत  ने  ग़ारत  की,  हमारी  ज़िन्दगी।।
  
आस्ताने - कैफ़ो - मस्ती,  यूँ  तो आलम में  हज़ार। 
पर फिराती दर-बदर, क़िस्मत  की मारी  ज़िन्दगी।।
  
बीतते सावन के  बादल भी,    कुछ  लाये  ख़बर। 
आस  कोई तो   मिरे मन में,   जगा  री ! ज़िन्दगी।।
  
आओ साथी  बाँट लें,  आपस में  हर ग़म--ख़ुशी। 
थोड़ा हँस  लें साथ कि,  ख़ुश  हो  बिचारी ज़िन्दगी।।
  
जानो-तन जब तक फँसे हैं,  दामे-दुनिया में ‘अरुन 
क्या गिलाकिस जाल में फँस कर गुज़ारी ज़िन्दगी।। 
                                    * 

                   

रविवार, 10 मार्च 2013

गंग की धारा जटा में औ’ ज़बीं पे है हिलाल.......

भगवान शिव समस्त लोक का कल्याण करें 
 महाशिवरात्रि पर विशेष 


गंग की धारा जटा में औ’ ज़बीं पे है हिलाल.......

- अरुण मिश्र.


गंग   की   धारा  जटा   में,   औ’  ज़बीं  पे   है  हिलाल। 
कंठ   नीला   है  ज़हर   से,   है   गले   सर्पों  की  माल।।

तन   भभूती    हैं    रमाये,   हाथ   में   डमरू,   त्रिशूल। 
देख   ये   भोले  की   छवि,   हैं   पार्वती माता  निहाल।।

है     बदन    काफूर   सा,    दरक़ार   है    कब   पैरहन।
खाल  ओढ़े   फ़ील  का,   औ’  शेर  की  बाँधे   हैं  छाल।।

रात-दिन खि़दमत में हैं,सब भूतो-जि़न्न,प्रेतो-पिशाच।
भक्त  को   तेरे   छुयें,   इनमें   भला   किसकी  मज़ाल।।

जो     तिरे   नज़दीक,    उससे   दूर   भागे   हर   बला।
पास  फटकेगी   तो   नन्दी,    सींग   से   देगा   उछाल।।

गंग   के   औ’  चन्द्र   के,   ठंढक  का   ही   है   आसरा। 
आँख   से  ग़र  तीसरे,   निकले  कहीं  विकराल ज्वाल।।

बान   फूलों   के   चला   के,   काम  ने   तोड़ी   समाधि।
जल  गया  ज़ुर्रत पे  अपनी,  जग में ज़ाहिर सारा हाल।।

भस्म    हो  जाये   न   दुनिया,   ताप   से,   संताप   से।
बर्फ के मस्क़न   हिमालय,   तू सदा   शिव को सॅभाल।।
                                                  *





रविवार, 30 सितंबर 2012

आप मेरे हुज़ूर भी रहिये.....




ग़ज़ल

आप मेरे हुज़ूर भी रहिये.....

-अरुण मिश्र.

आप     मेरे     हुज़ूर    भी    रहिये।
बा-अदब,   बा-शऊर    भी   रहिये।।

कुछ अज़ब सी हैं ख़्वाहिशें उसकी।       
पास  भी  रहिये,   दूर   भी   रहिये।।

जाम   नज़रों  के,  पीजिये  हरदम।
और   फिर,    बेसुरूर   भी   रहिये।।

मिस्ले-काजल भी रहिये आँखों में।
हो  के  आँखों  का  नूर,  भी  रहिये।।

आप    बेशक़    गुनाह   भी   कीजे।
ज़ाहिरा     बेकुसूर      भी     रहिये।।
                               *

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मंगलवार, 5 जुलाई 2011

अच्छी ग़ज़लें कहते हैं ...


अच्छी ग़ज़लें कहते हैं ...   

-अरुण मिश्र.

यारों  मेरे मुहल्ले में, इक  शख्स  ‘अरुन जी’  रहते हैं। 
हमें इल्म क्या , लोग कहें पर , अच्छी ग़ज़लें कहते हैं।।
  
बहकी - बहकी  बातें   करते , चहके - चहके  लहज़े  में। 
रात  को  शायद  रोते   होंगे , दिन  भर  हॅसते  रहते हैं।।
  
बातों  का  तो   सूत   कातते , सपनों  के   धागे   बुनते। 
खिले-खिले  से  दिखते , लेकिन  खोये - खोये  रहते हैं।।
  
सारा आलम अपना समझें,ख़ुद की सुध-बुध से गाफ़िल। 
ग़ैरों  के  ग़म  में  अक्सर ही ,  ऑख   भिगोये   रहते हैं।।
  
बोली-बानी   सब  कबीर   सी , मस्ती  पीर-फ़कीरों सी। 
मीर   से  दीवाने  लगते  हैं , हॅस कर  हर दुख  सहते हैं।।
                                        *

शुक्रवार, 24 जून 2011

मुझ पर मेरे मालिक की नज़र ...

( टिप्पणी : आडिओ क्लिप में, स्वर एवं संगीत रचना 
उस्ताद जमील रामपुरी की है| रिकार्डिंग वर्ष २००३ की है| )
           
-अरुण मिश्र. 

मुझ पर  मेरे मालिक की नज़र  क्यों नहीं होगी? 
जब  रात  कटेगी   तो,  सहर   क्यों  नहीं  होगी??

उन  सीप सी आँखों  में,  अभी  बन्द है  जो बूँद । 
जब  आँख  से टपकेगी,  गुहर  क्यों  नहीं होगी??

मैं कितना भी ख़ामोश जलूँ,शम्आ की मानिंद। 
पर   मेरे   पतिंगे   को   ख़बर   क्यूँ   नहीं होगी??

किस दौर से  गुज़रा नहीं , इन्सान  ‘अरुन जी’। 
इस दौर में, फिर  अपनी बसर, क्यूँ  नहीं होगी??
                                 *

रविवार, 10 अप्रैल 2011

दर्दे-दिल से जो घबराइए...


ग़ज़ल 
-अरुण मिश्र.

( टिप्पणी : आडिओ क्लिप में, इस ग़ज़ल को स्वर दिया है शकील मियां ने
एवं संगीत रचना उस्ताद जमील रामपुरी की है| रिकार्डिंग वर्ष २००३ की है| )

दर्दे-दिल से जो घबराइये।  
जाइये तो कहाँ जाइये।।
 
कोई साया घना खोजिये।  
या इधर मेरे पास आइये।।
 
आशिक़ी में ये तहज़ीब है।  
मुस्करा कर जहर खाइये।।
 
कुछ न आते , न जाते बने।  
यूँ कहे वो कि, आ-जाइये।।
 
है ग़मे-इश्क़ का क्या इलाज।  
पालिये , और पछताइये।।
 
कुछ दवायें न कामआयेंगी।  
अब दुआओं पे दिल लाइये।।
 
बस के आँखों में जी न भरे।  
तो दिलों में उतर जाइये।।
 
है ‘अरुन’ ये ग़ज़ल प्यार की।  
नाज़ुकी से इसे गाइये।।  
*