मंगलवार, 28 जून 2011

शुष्क मन-मरुथल तरल करती हुई...


अवलम्ब...

- अरुण मिश्र.

    शुष्क मन-मरुथल, तरल करती हुई | 
   अमृत   बरसाती,  गरल   हरती  हुई |
   कौन तुम? नैराश्य, तंद्रा, क्लैव्य  हर,
    कठिन जीवन-पथ, सरल करती हुई ||
*
("अवलम्ब"  शीर्षक  की  यह  पूरी कविता,  'रश्मि-रेख'  में ०८,अक्टूबर,२०१०  को पूर्व प्रकाशित है|)  





  




4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी कविता है पूरा पढ़ना चाहेगें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद, प्रिय मुकेश जी|पूरी कविता इसी ब्लॉग पर ०८,अक्टूबर,२०१० की पोस्ट में उपलब्ध है|
    -अरुण मिश्र.

    उत्तर देंहटाएं
  3. विडियो देखी .
    क्या बात है!वाह!
    [रिकॉर्डिंग के समय शायद आसपास कोई फोन पर बात कर रहा है]

    उत्तर देंहटाएं
  4. धन्यवाद प्रिय अल्पना जी|
    (घर पर हुई अनौपचारिक गोष्ठी की बच्चों द्वारा ली गयी क्लिपिंग है|)
    -अरुण मिश्र.

    उत्तर देंहटाएं