शुक्रवार, 5 जून 2026

पर्यावरण वन्दना.../ कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/pc4LKrM5qH4  

वन्दना करिये धरा की;
धरा के पर्यावरण की।।

झर रहे निर्झर सुरीले,
और नदियाँ बहें कल-कल।
ताल, पोखर, झील, सागर,
हर तरफ है, नीर निर्मल।।

चर-अचर जिसमें सुरक्षित,
स्नेहमय उस आवरण की।।

मन्द, मन्थर पवन शाीतल;
आँधियों का तीव्रतर स्वर।
सर्वव्यापी वायु पर ही,
प्राणियों की साँस निर्भर।।

जीव-जग-जीवनप्रदायिनि-
प्रकृति के, शुभ आचरण की।।

अन्न के भण्डार दे भर,
भूमि उर्वर, शस्य-श्यामल।
भूख सबकी मेटने को-
वृक्ष, फलते हैं मधुर फल।।

माँ धरा की गोद के,
इस मोदमय वातावरण की।।
                   *
(काव्य-संग्रह 'कस्मै देवाय' से साभार)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें