शनिवार, 7 मई 2022

आमाय डुबाइलि रे आमाय भासाइलि रे.../ बांग्ला बाउल गीत / स्वर : प्रांजल बिस्वास

 https://youtu.be/_nX7MlnnEHU 


Young Pranjal, fron Nadia, is popular for his Baul songs. 
Poet : Zasim Uddin

Amay Bhashaili Re Lyrics In Bengali

আমায় ডুবাইলিরে আমায় ভাসাইলিরে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কুল নাইরে
কুল নাই সীমা নাই অথই দরীয়ায় পানি
দিবসে নীশিথে ডাকে দিয়া হাত ছানিরে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কুল নাইরে
আমায় ডুবাইলিরে আমায় ভাসাইলিরে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কুল নাইরে

পানসা জলে সাই ভাসায়েসাগরেরও বানে,
পানসা জলে সাই ভাসায়েসাগরেরও বানে
আমি জীবনের ভেলা ভাসাইলাম
জীবনের ভেলা ভাসাইলাম কেউনা তা জানে রে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কুল নাইরে
আমায় ডুবাইলি রে আমায় ভাসাইলি রে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কূল নাইরে

আসমান চাহে দরিয়া পানে,
দরিয়া আসমান পানে (x2)
আরে লক্ষ বছর পার হইলো
লক্ষ বছর পার হইলো কেউ না তা জানে রে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কুল নাইরে

আমায় ভাসাইলি রে আমায় ডুবাইলি রে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কূল নাইরে (x2)
কুল নাই কিনার নাই নাইকো দরীয়ার পাড়ি,
কুল নাই কিনার নাই নাইকো দরীয়ার পাড়ি
আরে সাবধানে চালাইয়ো মাঝি,
আরে সাবধানে চালাইয়ো মাঝি
আমার ভাঙা তরী রে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কূল নাইরে,
আমায় ভাসাইলি রে আমায় ডুবাইলি রে
অকুল দরীয়ায় বুঝি কূল নাইরে


आमाय डुबाइलि रे आमाय भासाइलि रे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
आमाय डुबाइलिरे आमाय भासाइलिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
आमाय डुबाइलिरे आमाय भासाइलिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
कुलनाइ सीमा नाइ अथइ दरीयाय पानि
दिबसे नीशिथे डाके दिया हात छानिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
आमाय डुबाइलिरे आमाय भासाइलिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
पानसा जले साइ भासाये, सागरेरओ बाने
आमि जीबनेर भेला भासाइलाम..
जीबनेर भेला भासाइलाम केउनाताजानेरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
आमाय डुबाइलिरे आमाय भासाइलिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
आसमान चाहे दरिया पाने, दरिया आसमान पाने
आसमान चाहे दरिया पाने, दरिया आसमान पाने
आरे लक्ष बछर पार हइलो
लक्ष बछर पार हइलो केउनाताजानेरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
आमाय डुबाइलिरे आमाय भासाइलिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
कुलनाइ सीमा नाइ अथइ दरीयाय पानि
दिबसे नीशिथे डाके दिया हात छानिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
आमाय डुबाइलिरे आमाय भासाइलिरे
अकुल दरीयाय बुझि कुल नाइरे…
कुल नाइ…सीमा नाइ…नाइरे..कुल नाइ…सीमा नाइ…

मंगलवार, 3 मई 2022

श्रीपरशुरामस्तोत्रं / श्रीमद वासुदेवानंदसरस्वती विरचितं

https://youtu.be/T-k9I9Lstsw



"अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: ।
 इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।"

अर्थ : चार वेद मौखिक हैं अर्थात पूर्ण ज्ञान हैं एवं 
पीठपर धनुष्य-बाण हैं अर्थात शौर्य है । अर्थात यहां 
ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज, दोनों हैं। जो कोई इनका 
विरोध करेगा, उसे शाप देकर अथवा बाणसे 
परशुराम पराजित करेंगे, ऐसी उनकी विशेषता है।
श्रीपरशुरामस्तोत्रं
कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेनुकात्मजम | जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम ||१|| नमामि भार्गवं रामं रेणुकाचित्तनंदनम | मोचिताम्बार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनं ||२|| भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम | गतवर्गप्रियं शूरं जमदग्निसुतं मतम ||३|| वशीकृतमहादेवं दृप्तभूपकुलान्तकम | तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम ||४|| परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनुः | रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम ||५|| शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञामंडितं रणपण्डितं | रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररंजनं ||६|| मार्गणाशोषिताब्ध्यंशं पावनं चिरजीवनं | य एतानि जपेद्रामनामानि स कृती भवेत ||७|| इति श्रीमद वासुदेवानंदसरस्वती विरचितं श्रीपरशुरामस्तोत्रं संपूर्णम

रविवार, 1 मई 2022

मङ्गलस्तोत्रं / महर्षि व्यास कृत / स्वर : आशीष टी.

https://youtu.be/b2ujZeQ6Ugw
मङ्गलस्तोत्रम्
गणाधिपो भानु-शशी-धरासुतो बुधो गुरुर्भार्गवसूर्यनन्दनाः।
राहुश्च केतुश्च परं नवग्रहाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥१॥

उपेन्द्र इन्द्रो वरुणो हुताशनस्त्रिविक्रमो भानुसखश्चतुर्भुजः।
गन्धर्व-यक्षोरग-सिद्ध-चारणाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥२॥

नलो दधीचिः सगरः पुरूरवा शाकुन्तलेयो भरतो धनञ्जयः।
रामत्रयं वैन्यबली युधिष्ठिरः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥३॥

मनु-र्मरीचि-र्भृगु-दक्ष-नारदाः पाराशरो व्यास-वसिष्ठ-भार्गवाः।
वाल्मीकि-कुम्भोद्भव-गर्ग-गौतमाः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥४॥

रम्भाशची सत्यवती च देवकी गौरी च लक्ष्मीश्च दितिश्च रुक्मिणी।
कूर्मो गजेन्द्रः सचराऽचरा धरा कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥५॥

गङ्गा च क्षिप्रा यमुना सरस्वती गोदावरी नेत्रवती च नर्मदा।
सा चन्द्रभागा वरुणा त्वसी नदी कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥६॥

तुङ्ग-प्रभासो गुरुचक्रपुष्करं गया विमुक्ता बदरी वटेश्वरः।
केदार-पम्पासरसश्च नैमिषं कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥७॥

शङ्खश्च दूर्वासित-पत्र-चामरं मणि प्रदीपो वररत्नकाञ्चनम् ।
सम्पूर्णकुम्भः सुहृतो हुताशनः कुर्वन्तु वः पूर्णमनोरथं सदा ॥८॥

प्रयाणकाले यदि वा सुमङ्गले प्रभातकाले च नृपाभिषेचने।
धर्मार्थकामाय जयाय भाषित व्यासेन कुर्यात्तु मनोरथं हि तत् ॥९॥

इति व्यासकृतं मङ्गलस्तोत्रं समाप्तम्

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

गंगा, यमुना, सिंधु, कावेरी.../ भारत का नदी-गीत

https://youtu.be/7wmCGm8k2eU 

"गङ्गे  यमुने चैव गोदावरि सरस्वति
 नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु
॥"
-ब्रह्मवैवर्तपुराण-ब्रह्मखण्ड अध्याय २६, श्लोक ६६ 
अर्थ : हे गंगे, यमुने, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदे, सिंधु तथा  कावेरी, 
आप सब नदियां मेरे स्नानके जलमें आएं (आकर इसे पवित्र करें)।

गंगा, यमुना, सरस्वती,
सिंधु, कावेरी, नर्मदा,
जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु।
जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु।।

गंगा, यमुना, सिंधु, कावेरी, 
नर्मदा, गोदावरी, श्री सरस्वती।  
अलकनंदा, जान्ह्वी, ब्रह्मपुत्र, गोमती,
तुंगभद्रा, स्वर्णरेखा, मयूराक्षी, पार्वती।। 
गंगा, यमुना...
गंगा, यमुना...
गंगा, यमुना...
गंगा, यमुना...

भागीरथी, कविनी, शरावती,
साबरमती, अमरावती, ताप्ती। 
मन्दाकिनी, सरयू, नेत्रवाती 
कुण्डली, महानदी, पम्पा, बेतवती 

सोन वैतरणी ....
..............
..............

'Rivers of India' is a tribute to the timeless spirit of India
that accords a revered place to precious water resources.
Conceived and created by IITM Distinguished Alumnus
Kanniks Kannikeswaran, this music video is produced by
the International Center for Clean Water, IIT Madras to
promote awareness about the need for conserving and
protecting water resources. It is released on Earth Day 2021.
CREDITS Bombay Jayashri Kaushiki Chakraborty Rishith Desikan Amrit Ramnath Music Composed by Kanniks Kannikeswaran Conceptualization, Script and Lyrics Kanniks Kannikeswaran (Inspired by the names of rivers from all over India and a phrase
from the first millennium Tamil epic Silappathikaram)
Silapadhikaram is one of the five great epics in Tamil literature.
It is the story that is known for its unique plot which covers 
the life of a common man and not a king like other literary 
works. Also the story progresses in all the three major Chola,
Chera and Pandya kingdom in its three parts (called kaandam in tamil).
In the first part - pugaar kaandam, in chapter (kaathai in tamil) 
kanal vari, the conversation between kovalan and madhavi involving 
kaveri is as follows.
“Poovar solai mayilala
purindhu kuilgal isai pada
kamar malai arugu asaiya
nadanthai vazhi kaveri ! " (
नाणंदाई वाडी कावेरी )

"nadanthai vazhi kaveri ! " - phrase means the eternal river Kaveri.

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

संकट मोचन हनुमानाष्टक / श्री गोस्वामी तुलसी दास कृत / प्रस्तुति : अयोध्या दास नीमावत

 https://youtu.be/oi0OkueSjCY

बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारों।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब, छांड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥ को नहिं...
अंगद के संग लेन गए सिय- खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो।
हेरि  थके तट सिन्धु सबे तब, लाय सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥ को नहिं...
रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥ को नहिं...
बान लाग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दिए तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥ को नहिं...
रावन जुद्ध  अजान कियो तब, नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥ को नहिं...
बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबन्हिं पूजि भलि विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो।
जाये सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥ को नहिं...
काज किये बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो ॥ ८ ॥ को नहिं...
॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥ 
इति संकट मोचन हनुमानाष्टक सम्पूर्ण 

रविवार, 24 अप्रैल 2022

श्रीरामरक्षास्तोत्रम् .../ बुधकौशिक ऋषि: / प्रस्तुति : रंजनी-गायत्री

 https://youtu.be/EMeSTcffrEI 

Ranjani and Gayatri chant Sri Rama Raksha Stotram, composed by
Sage Budha Kaushika. It's believed that the chant of these divine
slokas has a powerfully positive impact on mind and body. The slokas
are meant to be chanted in the original traditional metre which is
followed by Ranjani - Gayatri in this rendition.

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥

श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।
अनुष्टुप् छन्द: ।
सीता शक्ति: ।
श्रीमद्‌हनुमान् कीलकम् ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुध कौशिक ऋषि हैं, सीता और 
रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमान जी कीलक 
हैं तथा श्री रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र के जप में 
विनियोग किया जाता हैं |
॥ अथ ध्यानम् ॥ 
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम् ॥

ध्यान धरिए — जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,बद्द पद्मासन की मुद्रा में 
विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल 
दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल 
से मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित 
तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें |
॥ इति ध्यानम् ॥ 
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥

श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला हैं | उसका एक-एक अक्षर 
महापातकों को नष्ट करने वाला है |
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥

नीले कमल के श्याम वर्ण वाले, कमलनेत्र वाले , जटाओं के मुकुट से सुशोभित, 
जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्री राम का स्मरण करके,
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥

जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों 
के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीराम का स्मरण करके,
रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ।  
राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें। 
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

कौशल्या नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण 
की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें। 
जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

मेरी जिह्वा की विधानिधि रक्षा करें, कंठ की भरत-वंदित, कंधों की दिव्यायुध और 
भुजाओं की महादेवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें। 
करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

मेरे हाथों की सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदय की जमदग्नि ऋषि के पुत्र (परशुराम) 
को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (नाम के राक्षस) के वधकर्ता और नाभि की 
जांबवान के आश्रयदाता रक्षा करें। 
सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥

मेरे कमर की सुग्रीव के स्वामी, हडियों की हनुमान के प्रभु और रानों की राक्षस कुल 
का विनाश करने वाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें। 
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

मेरे जानुओं की सेतुकृत, जंघाओं की दशानन वधकर्ता, चरणों की विभीषण को 
ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और सम्पूर्ण शरीर की श्रीराम रक्षा करें। 

           एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत् ।
           स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥

शुभ कार्य करने वाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धा के साथ रामबल से संयुक्त होकर 
इस स्तोत्र का पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील 
हो जाता हैं। 
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेश में घूमते 
रहते हैं, वे राम नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते। 
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से 
लिप्त 
नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है। 
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

जो संसार पर विजय करने वाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर 
लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। 
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥

जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवच का स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञा का 
कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगल की ही प्राप्ति होती हैं। 
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

भगवान् शंकर ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र का आदेश बुध कौशिक ऋषि को 
दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागने पर उसे वैसा ही लिख दिया। 
आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥

जो कल्प वृक्षों के बगीचे के समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियों को 
दूर करने वाले हैं (विराम माने थमा देना, किसको थमा देना/दूर कर देना ? 
सकलापदाम = सकल आपदा = सारी विपत्तियों को)  और जो तीनो लोकों में सुंदर 
(अभिराम + स्+ त्रिलोकानाम) हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं। 
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमल (पुण्डरीक) के समान विशाल नेत्रों 
वाले हैं, मुनियों की तरह वस्त्र एवं काले मृग का चर्म धारण करते हैं। 
 
           फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
           पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं, 
वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें। 
 
           शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
           रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥
ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी 
धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और राक्षसों के कुलों का समूल नाश करने में समर्थ हमारा 
त्राण करें। 
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥

संधान किये धनुष धारण किये, बाण का स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणो से युक्त तूणीर 
लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए मेरे आगे चलें।   
संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्था वाले भगवान् 
राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें। 
रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

भगवान् का कथन है की श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, 
पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम, 
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥

वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम 
आदि नामों का
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करने वाले को निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक 
फल प्राप्त होता हैं। 
रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीराम की उपरोक्त दिव्य 
नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता। 
रामं लक्ष्मण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥

लक्ष्मण जी के पूर्वज , सीताजी के पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणा के सागर, 
गुण-निधान, विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ के पुत्र, 
श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावण 
के शत्रु भगवान् राम की मैं वंदना करता हूँ |
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी की मैं 
वंदना करता हूँ। 
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरत के अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम 
श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए। 
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

मैं एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, 
वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ 
मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ। 
माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम 
मेरे सर्वस्व हैं. उनके सिवा में किसी दुसरे को नहीं जानता। 
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥

जिनके दाईं और लक्ष्मण जी, बाईं और जानकी जी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, 
मैं उन्ही रघुनाथ जी की वंदना करता हूँ। 
लोकाभिरामं रणरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा की 
मूर्ति और करुणा के भण्डार की श्रीराम की शरण में हूँ। 
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय 
एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूत की शरण लेता हूँ। 
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥

मैं कवितामयी डाली पर बैठकर, मधुर अक्षरों वाले ‘राम-राम’ के मधुर नाम को कूजते हुए 
वाल्मीकि रुपी कोयल की वंदना करता हूँ। 
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥

मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर उन भगवान् राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो सभी 
आपदाओं को दूर करने वाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करने वाले हैं। 
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥

‘राम-राम’ का जप करने से मनुष्य के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं | वह समस्त 
सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं | राम-राम की गर्जना से यमदूत सदा 
भयभीत रहते हैं। 
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम् ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं | मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम 
का भजन करता हूँ। सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार 
करता हूँ। श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं। मैं उन शरणागत वत्सल का 
दास हूँ। मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ। हे श्रीराम ! आप मेरा (इस संसार सागर से) 
उद्धार करें। 
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

(शिव पार्वती से बोले –) हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं। मैं सदा 
राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ। 
           ॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥
॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥