https://youtu.be/g7D1U2aRAUA
मंगलवार, 17 मई 2022
हनुमानजी का दिव्य ध्यान / श्री एकमुखि हनुमत्कवचं / स्वर : आशीष टी.
सोमवार, 16 मई 2022
श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् / आदि शंकराचार्य विरचित / स्वर : सूर्य गायत्री
https://youtu.be/8nmQwQiz1j8
न-म-शि-वा-य की स्तुति करता है।
शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र के रचयिता आदि गुरु शंकराचार्य हैं,
जो परम शिवभक्त थे। शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र पंचाक्षरी मन्त्र
नमः शिवाय पर आधारित है।
म – जल तत्त्व का
शि – अग्नि तत्त्व का
वा – वायु तत्त्व का और
य – आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है।
॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥
मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥
अर्थ
वे जिनके पास साँपों का राजा उनकी माला के रूप में है, और जिनकी तीन आँखें हैं,
जिनके शरीर पर पवित्र राख मली हुई है और जो महान प्रभु है,
वे जो शाश्वत है, जो पूर्ण पवित्र हैं और चारों दिशाओं को
जो अपने वस्त्रों के रूप में धारण करते हैं,
उस शिव को नमस्कार, जिन्हें शब्दांश “न” द्वारा दर्शाया गया है।
वे जिनकी पूजा मंदाकिनी नदी के जल से होती है और चंदन का लेप लगाया जाता है,
वे जो नंदी के और भूतों-पिशाचों के स्वामी हैं, महान भगवान,
वे जो मंदार और कई अन्य फूलों के साथ पूजे जाते हैं,
उस शिव को प्रणाम, जिन्हें शब्दांश “म” द्वारा दर्शाया गया है।
वे जो शुभ है और जो नए उगते सूरज की तरह है, जिनसे गौरी का चेहरा खिल उठता है,
वे जो दक्ष के यज्ञ के संहारक हैं,
वे जिनका कंठ नीला है, और जिनके प्रतीक के रूप में बैल है,
उस शिव को नमस्कार, जिन्हें शब्दांश “शि” द्वारा दर्शाया गया है।
द्वारा भी पूजित है, और जो ब्रह्मांड का मुकुट हैं,
वे जिनकी चंद्रमा, सूर्य और अग्नि तीन आंखें हों,
उस शिव को नमस्कार, जिन्हें शब्दांश “वा” द्वारा दर्शाया गया है।
वे जो यज्ञ (बलिदान) का अवतार है और जिनकी जटाएँ हैं,
जिनके हाथ में त्रिशूल है और जो शाश्वत हैं,
वे जो दिव्य हैं, जो चमकीला हैं, और चारों दिशाएँ जिनके वस्त्र हैं,
उस शिव को नमस्कार, जिन्हें शब्दांश “य” द्वारा दर्शाया गया है।
जो शिव के समीप इस पंचाक्षर का पाठ करते हैं,
वे शिव के निवास को प्राप्त करेंगे और आनंद लेंगे।
रविवार, 15 मई 2022
तू झूम झूम झूम झूम.../ मुख्य स्वर : आबिदा परवीन एवं नसीबो लाल
https://youtu.be/7D4vNcK6D38
ते मैं हस्दी जावां
तुप्पां दे नल लड़ लड़ के मैं
लवियां अपड़ियां छांवा
दुख भी अपणें सुख भी अपणें
मैं ते बस ये जांणां
सब नू समझ के की करना ए
दिल नू ए समझावां
तू झूम झूम झूम झूम
तू झूम झूम झूम … झूम
मस्त हो के गावां
दुनिया राज़ी कर के कमले
फिर भी चैन नई औंणां
सारी खुशियाँ मिल जावंड़ ते
पिच्छे की रह जांड़ां
सारी खुशियाँ मिल जावंंड़ ते
पिचछे की रह जांड़ां
तेरे बस में कुछ वी नयी ए
दिल नू ऐ समझावां
तू झूम झूम झूम
हो तू झूम झूम झूम … झूम
तू झूम झूम झूम झूम
तू झूम झूम झूम … झूम
तू झूम झूम झूम … झूम
तू….. तू झूम
मैं उत्ते अपनी औकात तों
ऐ दुनिया मेरी फिकर नई
मैं समझ गई हर बात नू
की करणां ए उचियां शाना नू
की हथ लाणां अस्माना नू
मैं हस्दे हस्दे है जीणां
मैं निकल गई गुमांना तों
मैं ते मेरे वर्गी आक्खी
खुद तो रौशन माना
दुनिया राज़ी कर वी लई ए
फिर वी चैन नई आंणा
जो है तेरा लब जावेगा
कर के कोई बहाना
तेरे बस में कुछ वी नयी ए
दिल नू ए समझावां
तू झूम झूम झूम
हो तू झूम झूम झूम … झूम
तू झूम झूम झूम … झूम
तू झूम झूम झूम झूम
तू झूम झूम झूम … झूम
तू….. तू झूम
मैं .. दीवानी
मैं ……. दीवानी
मैं दीवानी कुछ ना जांणा
मैं मस्तानी कुछ ना जांणा
मैं मस्तानी कुछ ना … जांणा
मैं राज़ी अपनी ज़ात ते
तू झूम झूम झूम … झूम
वो अपनी खूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ ना नाज़ करे
हो तू झूम झूम झूम … झूम
शुक्रवार, 13 मई 2022
टुट जानी टूणक दी तार पता नी किस वेले.../ गायन : बीरेंदर ढिल्लों एवं शमशेर लहरी
https://youtu.be/1DSHoWBzRnQ
टुट जानी टूणक दी ……
टुट जानी टूणक दी तार पता नी किस वेले
ऐथे कंगला भावे राणा नाल नी जाणा धेला
ऐथे कंगला भावे राणा नाल नी जाणा धेला
पै जाणी चंदरी मार पता नी किस वेले
टुट जानी टूणक दी तार पता नी किस वेले …….
कितने करदैं दावे,
की भरोसा है इस दम दा आवे जा ना आवे,
की भरोसा है इस दम दा आवे जा ना आवे,
आ खङनै दुशमन वार पता नी किस वेले ,
टुट जानी टूणक दी तार पता नी किस वेले …….
एही साथी बचदे लहरी टुटदे जदों सहारे,
एही साथी बचदे लहरी टुटदे जदों सहारे,
रूह पिंजरेयों होउ फरार पता नी किस वेले,
टुट जानी टूणक दी तार पता नी किस वेले …….
छड जाना है संसार पता नी किस वेले
टुट जानी टूणक दी ……
टुट जानी टूणक दी तार पता नई किस वेले
गुरुवार, 12 मई 2022
श्री जानकीस्तोत्रं
श्री जानकीस्तोत्रं
नीलनीरज-दलायतेक्षणां लक्ष्मणाग्रज-भुजावलम्बिनीम्।
शुद्धिमिद्धदहने प्रदित्सतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।
रामपाद-विनिवेशितेक्षणामङ्ग-कान्तिपरिभूत-हाटकाम्।
ताटकारि-परुषोक्ति-विक्लवां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
कुन्तलाकुल-कपोलमाननं, राहुवक्त्रग-सुधाकरद्युतिम्।
वाससा पिदधतीं हियाकुलां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
कायवाङ्मनसगं यदि व्यधां स्वप्नजागृतिषु राघवेतरम्।
तद्दहाङ्गमिति पावकं यतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
इन्द्ररुद्र-धनदाम्बुपालकै: सद्विमान-गणमास्थितैर्दिवि।
पुष्पवर्ष-मनुसंस्तुताङ्घ्रिकां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
संचयैर्दिविषदां विमानगैर्विस्मयाकुल-मनोऽभिवीक्षिताम्।
तेजसा पिदधतीं सदा दिशो भावये मनसि रामवल्लभाम्।।
।।इति जानकीस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।
हिंदी अर्थ
नील कमल-दल के सदृश जिनके नेत्र हैं, जिन्हें श्रीराम की भुजा का ही अवलंबन है, जो प्रज्वलित अग्नि में अपनी पवित्रता की परीक्षा देना चाहती हैं, उन रामप्रिया श्रीसीता माता का मैं ध्यान करता हूं।
जिनके नेत्र श्रीरामजी के चरणों की ओर निश्चल रूप से लगे हुए हैं, जिन्होंने अपनी अङ्गकान्ति से सुवर्ण को मात कर दिया है तथा ताटका के वैरी श्रीरामजी के द्वारा दुष्टों के प्रति कहे गए कटु वचनों से जो घबराई हुई हैं, उन श्रीरामजी की प्रेयसी श्री सीता मां की मैं मन में भावना करता हूं।
जो लज्जा से हतप्रभ हुईं अपने उस मुख को, जिनके कपोल उनके बिथुरे हुए बालों से उसी प्रकार आवृत हैं, जैसे चन्द्रमा राहु द्वारा ग्रसे जाने पर अंधकार से आवृत हो जाता है, वस्त्र से ढंक रही हैं, उन राम-पत्नी सीताजी का मैं मन में ध्यान करता हूं।
जो मन-ही-मन यह कहती हुई कि यदि मैंने श्रीरघुनाथ के अतिरिक्त किसी और को अपने शरीर, वाणी अथवा मन में कभी स्थान दिया हो तो हे अग्ने! मेरे शरीर को जला दो अग्नि में प्रवेश कर गईं, उन रामजी की प्राणप्रिय सीताजी का मैं मन में ध्यान करता हूं।
उत्तम विमानों में बैठे हुए इन्द्र, रुद्र, कुबेर और वरुण द्वारा पुष्पवृष्टि के अनंतर जिनके चरणों की भली-भांति स्तुति की गई है, उन श्रीराम की प्यारी पत्नी श्रीसीता माता की मैं मन में भावना करता हूं।
अग्नि-शुद्धि के समय विमानों में बैठे हुए देवगण विस्मयाविष्ट चित्त से जिनकी ओर देख रहे थे और जो अपने तेज से दसों दिशाओं को आच्छादित कर रही थीं, उन रामवल्लभा श्री सीता मां का मैं ध्यान करता हूं।
बुधवार, 11 मई 2022
कुर्वन्तु नो मङ्गलम्.../ रचना : श्री राजराजेश्वर तीर्थ (१४ वीं शताब्दी) / स्वर : वृंदा आचार्य
https://youtu.be/jSSLgs0fY4U
राग : मोहन
ताल : आदि
लक्ष्मीर्यस्य परिग्रहः कमलभूः सूनुर्गरुत्मान् रथः पौत्रश्चन्द्रविभूषणः सुरगुरुः शेषश्च शय्यासनः । ब्रह्माण्डं वरमन्दिरं सुरगणा यस्य प्रभोः सेवकाः स त्रैलोक्यकुटुम्बपालनपरः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥ १॥ ब्रह्मा वायुगिरीशशेषगरुडा देवेन्द्रकामौ गुरुश्- चन्द्रार्कौ वरुणानलौ मनुयमौ वित्तेशविघ्नेश्वरौ । नासत्यौ निरृतिर्मरुद्गणयुताः पर्जन्यमित्रादयः सस्त्रीकाः सुरपुङ्गवाः प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ २॥
विश्वामित्रपराशरौर्वभृगवोऽगस्त्यः पुलस्त्यः क्रतुः श्रीमानत्रिमरीचिकौत्सपुलहाः शक्तिर्वसिष्ठोऽङ्गिराः । माण्डवयो जमदग्निगौतमभरद्वाजादयस्तापसाः श्रीमद्विश्णुपदाब्जभक्तिनिरताः कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ ३॥
मान्धाता नहुषोऽम्बरीषसगरौ राजा पृथुर्हैहयः श्रीमान् धर्मसुतो नलो दशरथो रामो ययातिर्यदुः । इक्ष्वाकुश्च विभीशणश्च भरतश्चोत्तानपादध्रुवा- वित्याद्या भुवि भूभुजः प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ ४॥
श्रीमेरुर्हिमवाँश्च मन्दरगिरिः कैलासशैलस्तथा माहेन्द्रो मलयश्च विन्ध्यनिषधौ सिंहस्तथा रैवतः । सह्याद्रिर्वरगन्धमादनगिरिर्मैनाकगोमन्तका- वित्याद्या भुवि भूभृतः प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ ५॥
गङ्गा सिन्धुसरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा कृष्णा भीमरथी च फल्गुसरयूः श्रीगण्डकी गोमती । कावेरीकपिलाप्रयागविनतावेत्रावतीत्यादयो नद्यः श्रीहरिपादपङ्कजभवाः (प्रतिदिनं) कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ ६॥
वेदाश्चोपनिषद्गणाश्च विविधाः साङ्गा पुराणान्विता वेदान्ता अपि मन्त्र-तन्त्रसहितास्तर्कस्मृतीनां गणाः । काव्यालङ्कृतिनीतिनाटकगणाः शब्दाश्च नानाविधाः श्रीविष्णोर्गुणराशिकीर्तनकराः (प्रतिदिनं) कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ ७॥
आदित्यादिनवग्रहाः शुभकरा मेषादयो राशयो नक्षत्राणि सयोगकाश्च तिथयस्तद्देवतस्तद्गणाः । मासाब्दा ऋतवस्तथैव दिवसाः सन्ध्यास्तथा रात्रयाः सर्वे स्थावरजङ्गमाः प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ ८॥
इत्येतद्वरमङ्गलाष्टकमिदं श्रीराजराजेश्वरे- णाऽऽखातं जगतामभीष्टफलदं सर्वाशुभध्वंसनम् । माङ्गल्यादिशुभक्रियासु सततं सन्ध्यासु वा याः पठेद्- धर्मार्थादिसमस्तवाञ्छितफलं प्राप्नोत्यसौ मानवाः ॥ ९॥ इति श्रीराजराजेश्वरयतिविरचितं सर्वमङ्गलाष्टकं सम्पूर्णम् ।
मंगलवार, 10 मई 2022
मारुती मारुती, मारुती जय मारुती.../ कुलदीप एम. पई की प्रस्तुति
https://youtu.be/_2hkru8I0mM
रामदूत मारुती, मारुती जय मारुती।।