शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश.../ शायर : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ / गायन : इक़बाल बानो

https://youtu.be/d0f-HS93lbs  


न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया
जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया

मिरे चारा-गर को नवेद हो सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो
जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चुका दिया

जो रुके तो कोह-ए-गिराँ थे हम जो चले तो जाँ से गुज़र गए
रह-ए-यार हम ने क़दम क़दम तुझे यादगार बना दिया

सोमवार, 14 अप्रैल 2025

तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तिरे सामने मिरा हाल है.../ मजरूह सुल्तानपुरी / गायन : मोहम्मद रफ़ी

https://youtu.be/nc8wYuZyMdU  

तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तिरे सामने मिरा हाल है
तिरी इक निगाह की बात है मिरी ज़िंदगी का सवाल है


मिरी हर ख़ुशी तिरे दम से है मिरी ज़िंदगी तिरे ग़म से है
तिरे दर्द से रहे बे-ख़बर मिरे दिल की कब ये मजाल है


तिरे हुस्न पर है मिरी नज़र मुझे सुब्ह शाम की क्या ख़बर
मिरी शाम है तिरी जुस्तुजू मेरी सुब्ह तेरा ख़याल है


मिरे दिल जिगर में समा भी जा रहे क्यों नज़र का भी फ़ासला
कि तिरे बग़ैर तो जान-ए-जाँ मुझे ज़िंदगी भी मुहाल है

रविवार, 13 अप्रैल 2025

दुआ.../ शायर : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ / गायन : नय्यरा नूर

https://youtu.be/JR8SuFjkKw0  

आइए हाथ उठाएँ हम भी
हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं


आइए अर्ज़ गुज़ारें कि निगार-ए-हस्ती
ज़हर-ए-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दा भर दे


वो जिन्हें ताब-ए-गिराँ-बारी-ए-अय्याम नहीं
उन की पलकों पे शब ओ रोज़ को हल्का कर दे
जिन की आँखों को रुख़-ए-सुब्ह का यारा भी नहीं
उन की रातों में कोई शम्अ मुनव्वर कर दे
जिन के क़दमों को किसी रह का सहारा भी नहीं
उन की नज़रों पे कोई राह उजागर कर दे


जिन का दीं पैरवी-ए-किज़्ब-ओ-रिया है उन को
हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले जुरअत-ए-तहक़ीक़ मिले
जिन के सर मुंतज़िर-ए-तेग़-ए-जफ़ा हैं उन को
दस्त-ए-क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले


इश्क़ का सिर्र-ए-निहाँ जान-ए-तपाँ है जिस से
आज इक़रार करें और तपिश मिट जाए
हर्फ़-ए-हक़ दिल में खटकता है जो काँटे की तरह
आज इज़हार करें और ख़लिश मिट जाए

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

सब पेच-ओ-ताब-ए-शौक़ के तूफ़ान थम गए.../ शायर : अज़ीज़ हामिद मदनी / गायन : इक़बाल बानो

https://youtu.be/TFXOCmuwFTo   

सब पेच-ओ-ताब-ए-शौक़ के तूफ़ान थम गए
वो ज़ुल्फ़ खुल गई तो हवाओं के ख़म गए

अब जिन के ग़म का तेरा तबस्सुम है पर्दा-दार
आख़िर वो कौन थे कि ब-मिज़गान-ए-नम गए

वहशत सी एक लाला-ए-ख़ूनीं कफ़न से थी
अब के बहार आई तो समझो कि हम गए

ऐसी कोई ख़बर तो नहीं साकिनान-ए-शहर
दरिया मोहब्बतों के जो बहते थे थम गए

मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

तू मन अनमना न कर अपना.../ गीत एवं स्वर : स्वर्गीय भारत भूषण

https://youtu.be/Ar7qK7Fn_F0?si=qFL9Aioh6Kqu0EaO

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा
धरती के काग़ज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी 

रेती पर लिखा नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था 
मलियानिल के बहकाने से, बस एक प्रभात निखरना था 
गूंगे के मनो-भाव जैसे वाणी स्वीकार न कर पाए 
वैसे ही मेरा ह्रदय-कुसुम असमर्पित सूख बिखरना था 
कोई प्यासा मरता जैसे जल के अभाव में विष पी ले 
मेरे जीवन में भी कोई ऐसी मजबूरी रहनी थी

इच्छाओं से उगते बिरवे, सब के सब सफल नहीं होते 
हर कहीं लहर के जूड़े में अरुणारे कमल नहीं होते 
माटी का अंतर नहीं मगर अंतर तो रेखाओं का है 
हर एक दीप के जलने को शीशे के महल नहीं होते 
दर्पण में परछाईं जैसे दीखे तो पर अनछुई रहे 
सारे सुख सौरभ की मुझसे, वैसी ही दूरी रहनी थी
 
शायद मैंने गत जनमों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे 
चातक का स्वर सुनने वाले बादल वापस मोड़े होंगे
ऐसा अपराध हुआ होगा, फिर जिसकी क्षमा नहीं मिलती  
तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे 
अनगिनती क़र्ज़ चुकाने थे, इसलिए ज़िंदगी भर मेरे 
तन को बेचैन भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी

रविवार, 6 अप्रैल 2025

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला.../ शायर : क़तील शिफ़ाई / गायन : इक़बाल बानो

https://youtu.be/KzkZ3922bD8?si=i0XgJGyUoV0eV8dT

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला तू बाँहें डाल के बाँहों में
दिल तोड़ने वाले देख के चल हम भी तो पड़े हैं राहों में


क्या क्या न जफ़ाएँ दिल पे सहीं पर तुम से कोई शिकवा न किया
इस जुर्म को भी शामिल कर लो मेरे मासूम गुनाहों में


जब चाँदनी रातों में तुम ने ख़ुद हम से किया इक़रार-ए-वफ़ा
फिर आज हैं हम क्यों बेगाने तेरी बे-रहम निगाहों में


हम भी हैं वही तुम भी हो वही ये अपनी अपनी क़िस्मत है
तुम खेल रहे हो ख़ुशियों से हम डूब गए हैं आहों में

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

कुछ उनकी ज़फाओं ने लूटा.../ गीत : फराज़ / गायन : नाहीद अख़्तर

https://youtu.be/fbpRtTuYGn4   


कुछ उनकी ज़फाओं ने लूटा कुछ उनकी इनायत मार गई 
हम राज़-ए-मोहब्बत कह न सके चुप रहने की आदत मार गई
 
वो कौन हैं जिन को जीने का पैग़ाम मोहब्बत देती है
हम को तो ज़माने में ऐ दिल, बेदर्द मोहब्बत मार गई 

दिल ने भी बहुत मजबूर किया मिलने को भी लाखों बार मिले
जी भर के उन्हें न देखा न गया आँखों की शराफत मार गई 

दोनों से शिकायत है लेकिन, इल्ज़ाम लगायें हम किस पर 
कुछ दिल ने हमें बरबाद किया और कुछ हमें किस्मत मार गई