- अरुण मिश्र
कभी ख़त्म होगा नहीं ‘अरुन’, ये दिलों का अपने मुआमला।
चाहे हॉ कहो, चाहे ना कहो, या कहो बुरा, या कहो भला।।
कभी रीता-रीता, भरा-भरा, कभी सूखा-सूखा, हरा-हरा।
कई रंग देखें हैं बाग़ ने, कभी गुल खिला, कभी दिल जला।।
कभी कोसों-कोस की दूरियां भी, पलक झपकते सिमट गईं।
कभी बरसों-बरस न हो सका, तय हाथ भर का भी फ़ासला।।*