शनिवार, 23 अप्रैल 2022

"शनि शान्ति स्तोत्र" / दशरथकृत / स्वर : राजीव कौशिक

https://youtu.be/qO6l9ZOBX8M  


"शनि शान्ति स्तोत्र", शनि शान्ति के लिए शनि देव की प्रार्थना। इस स्तोत्र की रचना महाराज दशरथ ने की थी इसका वर्णन
पद्म पुराण में मिलता है।

शनि स्तोत्र 

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:।
।१
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते 
।२
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते 
।३
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने 
।४
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च 
।५
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते 
।६
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: 
।७
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् 
।८
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: 
।९
प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: 
।१०

अर्थ

जिनके शरीर का रंग भगवान् शंकर के समान कृष्ण तथा नीला है उन शनि देव को मेरा नमस्कार है, इस जगत् के लिए कालाग्नि एवं कृतान्त रुप शनैश्चर को पुनः पुनः नमस्कार है। जिनका शरीर कंकाल जैसा मांस-हीन तथा जिनकी दाढ़ी-मूंछ और जटा बढ़ी हुई है, उन शनिदेव को नमस्कार है, जिनके बड़े-बड़े नेत्र, पीठ में सटा हुआ पेट तथा भयानक आकार वाले शनि देव को नमस्कार है। जिनके शरीर दीर्घ है, जिनके रोएं बहुत मोटे हैं, जो लम्बे-चौड़े किन्तु जर्जर शरीर वाले हैं तथा जिनकी दाढ़ें कालरुप हैं, उन शनिदेव को बार-बार नमस्कार है। हे शनि देव ! आपके नेत्र कोटर के समान गहरे हैं, आपकी ओर देखना कठिन है, आप  रौद्र,  भीषण और विकराल हैं, आपको नमस्कार है। सूर्यनन्दन, भास्कर-पुत्र, अभय देने वाले देवता, वलीमूख आप सब कुछ भक्षण करने वाले हैं, ऐसे शनिदेव को प्रणाम है। आपकी दृष्टि अधोमुखी है आप संवर्तक, मन्दगति से चलने वाले तथा जिसका प्रतीक तलवार के समान है, ऐसे शनिदेव को पुनः-पुनः नमस्कार है। आपने तपस्या से अपनी देह को दग्ध कर लिया है, आप सदा योगाभ्यास में तत्पर, भूख से आतुर और अतृप्त रहते हैं। आपको सर्वदा सर्वदा नमस्कार है। जिसके नेत्र ही ज्ञान है, काश्यपनन्दन सूर्यपुत्र शनिदेव आपको नमस्कार है। आप सन्तुष्ट होने पर राज्य दे देते हैं और रुष्ट होने पर उसे तत्क्षण क्षीण लेते हैं वैसे शनिदेव को नमस्कार। देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग- ये सब आपकी दृष्टि पड़ने पर समूल नष्ट हो जाते ऐसे शनिदेव को प्रणाम। आप मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं वर पाने के योग्य हूं और आपकी शरण में आया हूं।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

प्रभु रामचंद्र के दूता.../ गायन : सूर्य गायत्री

 https://youtu.be/x2UQE-g4y18 

प्रभु रामचंद्र के दूता, हनुमंता आञ्जनेया। 
हे ! पवनपुत्र हनुमंता, बलभीमा आञ्जनेया। 
जय हो ! जय हो ! जय हो ! आञ्जनेया।।

रविवार, 17 अप्रैल 2022

नमामि भक्त वत्सलं / श्री रामचरितमानस / श्री गोस्वामी तुलसी दास कृत / स्वर : माधवी मधुकर झा

 https://youtu.be/5UPOdL5GudI  

नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥ भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥१॥ भावार्थ हे भक्त वत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देने वाले आपके चरण कमलों को मैं भजता हूँ॥१॥ निकाम श्याम सुंदरं। भवांबुनाथ मंदरं॥ प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥२॥ भावार्थ आप नितान्त सुंदर श्याम, संसार (आवागमन) रूपी समुद्र को मथने के लिए मंदराचल रूप, फूले हुए कमल के समान नेत्रों वाले और मद आदि दोषों से छुड़ाने वाले हैं॥२॥ प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं॥ निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥३॥ भावार्थ हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओं का पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय (बुद्धि के परे अथवा असीम) है। आप तरकस और धनुष-बाण धारण करने वाले तीनों लोकों के स्वामी,॥३॥ दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं॥ मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥४॥ भावार्थ सूर्यवंश के भूषण, महादेवजी के धनुष को तोड़ने वाले, मुनिराजों और संतों को आनंद देने वाले तथा देवताओं के शत्रु असुरों के समूह का नाश करने वाले हैं॥४॥ मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं॥ विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥५॥ भावार्थ आप कामदेव के शत्रु महादेवजी के द्वारा वंदित, ब्रह्मा आदि देवताओं से सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह और समस्त दोषों को नष्ट करने वाले हैं॥५॥ नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं॥ भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं॥६॥ भावार्थ हे लक्ष्मीपते! हे सुखों की खान और सत्पुरुषों की एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ! हे शचीपति (इन्द्र) के प्रिय छोटे भाई (वामनजी)! स्वरूपा-शक्ति श्री सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित आपको मैं भजता हूँ॥६॥ त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः॥ पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥७॥ भावार्थ जो मनुष्य मत्सर (डाह) रहित होकर आपके चरण कमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क (अनेक प्रकार के संदेह) रूपी तरंगों से पूर्ण संसार रूपी समुद्र में नहीं गिरते (आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ते)॥७॥ विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा॥ निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांतिते गतिं स्वकं॥८॥ भावार्थ जो एकान्तवासी पुरुष मुक्ति के लिए, इन्द्रियादि का निग्रह करके (उन्हें विषयों से हटाकर) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गति को (अपने स्वरूप को) प्राप्त होते हैं॥८॥ तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥ जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥९॥ भावार्थ उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत् से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणों से सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूप में स्थित) हैं॥९॥ भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं॥ स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥१०॥ भावार्थ (तथा) जो भावप्रिय, कुयोगियों (विषयी पुरुषों) के लिए अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तों के लिए कल्पवृक्ष (अर्थात्‌ उनकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले), सम (पक्षपातरहित) और सदा सुखपूर्वक सेवन करने योग्य हैं, मैं निरंतर भजता हूँ॥१०॥ अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं॥ प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥११॥ भावार्थ हे अनुपम सुंदर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझ पर प्रसन्न होइए, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे अपने चरण कमलों की भक्ति दीजिए॥११॥ पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं॥ व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥१२॥ भावार्थ जो मनुष्य इस स्तुति को आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परम पद को प्राप्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं॥१२॥

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

हनुमत तांडव स्तोत्र / लोकेश्वराख्य भट्ट कृत / स्वर : स्नेहवर्धन शुक्ला

 https://youtu.be/Pxl6PbbHkek 

वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम् ।
रक्ताङ्गरागशोभाढ्यं शोणापुच्छं कपीश्वरम्॥
भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, 
दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम् ।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, 
समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम् ॥१॥
सुशङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं 
वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽ-
धिनाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः ॥२॥
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, 
भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ ।
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, 
विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम् ॥३॥
सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, 
कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम् ।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः 
कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः॥४॥
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, 
फणीशमातृगर्वहृद्दृशास्यवासनाशकृत् ।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, 
सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम् ॥५॥
नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं 
गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम् ।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलंकदाहकं सुनायकं 
विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम् ॥६॥
रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं 
दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम् ।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् 
सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम् ॥७॥
नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता महा-
सहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः ।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां 
निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम् ॥८॥
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः
कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः ।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा
न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह ॥९॥
नेत्राङ्गनन्दधरणीवत्सरेऽनङ्गवासरे ।
लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमत्ताण्डवं कृतम् ॥१०॥

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

श्रीभद्राचलराममङ्गलम् / श्रीभद्रगिरिरामदासविरचितं / रक्षिता रामजी, अव्यक्ता भट्ट, प्रकृति रघुनाथ एवं श्रीरंजनी बालाजी की प्रस्तुति

https://youtu.be/bunD6Pl65gA

रामचन्द्राय मङ्गलम्
चार नन्हीं बालिकाओं क्रमशः रक्षिता रामजी, अव्यक्ता भट्ट,
प्रकृति रघुनाथ एवं श्रीरंजनी बालाजी की प्रस्तुति।
स्वामी श्री भद्राचलं राम दास विरचित
राग : कुरिंजी

भद्राचलराममङ्गलम्
रामचन्द्राय जनकराजजा मनोहराय
मामकाभीष्टदाय महित मङ्गलम् ॥१॥पल्लवि॥
कोसलेशाय मन्दहासदासपोषणाय
वासवादिविनुतसद्वराय मङ्गलम् ॥२॥
चारुकुंकुमोपेतचन्दनादिचर्चिताय
हारकटकशोभिताय भूरिमङ्गलम् ॥३॥
ललितरत्नकुण्डलाय तुलसीवनमालिकाय
जलजसदृशदेहाय चारुमङ्गलम् ॥४॥
देवकीसुपुत्राय देवदेवोत्तमाय
भावजातगुरुवराय भव्यमङ्गलम् ॥५॥
पुण्डरीकाक्षाय पूर्णचन्द्राननाय
अण्डजातवाहनाय अतुलमङ्गलम् ॥६॥
विमलरूपाय विविधवेदान्तवेद्याय
सुमुखचित्तकामिताय शुभदमङ्गलम् ॥७॥
रामदासाय मृदुलहृदयकमलवासाय
स्वामि भद्रगिरिवराय सर्वमङ्गलम् ॥८॥
॥ इति श्रीभद्रगिरिरामदासविरचितं श्रीभद्राचलराममङ्गलम् ॥

रविवार, 10 अप्रैल 2022

राम प्रतिपल राम हैं.../ कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/NBdpNp1bu6E
राम प्रतिपल राम हैं...
-अरुण मिश्र 
(मेरे कविता संग्रह 'अंजलि भर भाव के प्रसून' से साभार।)

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

अगर अन्तर्दृष्टि सुन्दर .../ कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/-XRfEyG4HFw
अगर अन्तर्दृष्टि सुन्दर...
-अरुण मिश्र 

अगर    अंतर्दृष्टि    सुन्दर। 
सृष्टि सुन्दर, सृष्टि सुन्दर।।
                                        हरिण का लावण्य अपना,
                                        ऊँट   का   सौंदर्य   अपना। 
                                        वृक्ष की अपनी हरित छवि,
                                        ठूँठ   का    सौंदर्य   अपना।।
इस    जगत   में    वस्तुएँ -
होती   नहीं   सुंदर-असुंदर।।
                                        सृजन की घड़ियाँ मधुर हैं -
                                        कठिन    पीड़ाएँ     सुलातीं। 
                                        नाश-लीलाएँ     सदा     ही -
                                        नव -सृजन-आशा जगातीं।।
सुःख-दुःख का घोल समरस -
बह  रहा   जीवन   सुनिर्झर।।
                                        ग्राह्य क्या है, त्याज्य क्या है?
                                        यह    विवेकाधीन    प्रतिक्षण। 
                                        सर्वथा    जो       हो     असुंदर,
                                        है   न   ऐसा   एक   भी   कण।
ब्रह्म   के   आलोक   से   है -
दीप्त, प्रति परमाणु भास्वर।। 
                                        शोक   क्या,   आनंद   क्या  है ?
                                        क्या    बुरा,    क्या    है    भला ?
                                        दृश्य-पट,    क्षण-क्षण   बदलते,
                                        प्रकृति      है,      चिर - चंचला।। 
आँकती  जो  दृष्टि  उस पर -
प्रिय-अप्रिय  का  भेद  निर्भर।।

(मेरे कविता संग्रह 'अंजलि भर भाव के प्रसून' से साभार)