गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो.../ विंध्यवासिनी स्तोत्र / स्वर : आचार्य कश्यप

 https://youtu.be/abrEyCLsajU 

जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो...

दैत्य संहारन वेद उधारन दुष्टन को तुमहीँ खलती हो। खड्ग त्रिशूल लिये धनुबान औ सिंह चढ़े रण मेँ लड़ती हो॥ दासके साथ सहाय सदा सो दया करि आन फते करती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥१॥


आदि की ज्योति गणेश की मातु कलेश सदा जन के हरती हो। जब – जब दैत्यन युद्ध भयो तहँ शोणित खप्पर लै भरती हो॥ की कहुँ देवन गाँछ कियो तहँ धाय त्रिशूल सदा धरती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥२॥


सेवक से अपराध परो कछु आपन चित्त मेँ ना धरती हो। दास के काज सँभारि नितै जन जान दया को मया करती हो॥ शत्रु के प्राण संहारन को जग तारन को तुम सिन्धु सती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥३॥


की तो गई बलि संग पताल कि तो पुनि ज्योति अकाशगती हो। कि धौँ काम परो हिँगलाजहिँ मेँ, कै सिन्धु के विन्दु मेँ जा छिपती हो॥ चुग्गुल चोर लबारन को बटमारन को तुमहीँ दलती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥४॥


बान सिरान कि सिँह हेरान कि ध्यान धरे प्रभु को जपती हो। की कहुँ सेवक कष्ट परो तहँ अष्टभुजा बल दे लड़ती हो॥ सिँह चढ़े सिर छत्र विराजत लाल ध्वजा रण मेँ फिरती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥५॥


देवि, तुम्हारि करौँ विनती इतना तुम काज करौ सुमती हो। ब्रह्मा, विष्णु, महेश कि हौँ रथ हाँक सदा जग मेँ फिरती हो॥ चण्डहि मुण्डहि जाय बधो तब जाय के शत्रु निपात गती हो। मोहि पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥६॥


मारि दियो महिषासुर को हरि केहरि को तुमहिँ पलती हो। मधु – कैटभ दैत्य विध्वंस कियो नर देवन पति के ईशपती हो॥ दुष्टन मारि आनन्द कियो निज दासन के दुःख को हरती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥७॥


साधु समाधि लगावत हैँ तिनके तन को तू तुरत तरती हो। जो जन ध्यान धरै तुमरो तिनकी प्रभुता चित्त दै करती हो॥ तेरो प्रताप तिहूँ पुर मेँ तुलसी जन की मनसा भरती हो। मोहिँ पुकारत देर भई जगदम्ब विलम्ब कहाँ करती हो॥८॥

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

वाक्'देवी हे कलामयी हे सुबुद्धि सुकामिनी .../ रचना : शिव कुमार झा टिल्लू / गायन : माधवी मधुकर झा

 https://youtu.be/ovpj3P1kndA  

सरस्वती वन्दना / शिव कुमार झा टिल्लू 
 वाक्'देवी हे कलामयी हे सुबुद्धि सुकामिनी 
 ज्ञान रूपे सुधि अनूपे हे सरस्वती नामिनी !
बसू अधर'मे  भाव'घर'मे शुद्ध ह्रदय सँवारि दे 
ज्ञान गंगा भरि दिय' माँ विद्या भरि भरि  शारदे 
 करू इजोरे सभ डगरि'मे  घेरि रहलै जामिनी ...!
पाणि वीणा पाणि पुस्तक हंस वाहिनी वागीशे 
राग लय सुर निर्झरी बहबू हे माँ हमरो दिशे 
माय देखियौ द्वंद्व एहिमन करू शमन हरि-वामिनी.. !
छल  प्रपञ्च''सँ दूर रहि रहि किछु करी जग'ले सदा 
जे देलौं माँ ज्ञान सुधि बुधि बाँटि' दी ओ सर्वदा 
फूटय नै शिव'के अधर'सँ  दोख कुबुद्धि के दामिनी ...! 

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

शारदा भुजङ्ग प्रयात अष्टकम् .../ श्री आदि शंकराचार्य कृत / स्वर : जया विद्यासागर


 https://youtu.be/vBUBWcINA0w 
शारदा भुजङ्ग प्रयात अष्टकम्
सुवक्षोजकुम्भां सुधापूर्णकुम्भां
प्रसादावलम्बां प्रपुण्यावलम्बाम् ।
सदास्येन्दुबिम्बां सदानोष्ठबिम्बां
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ १ ॥
कटाक्षे दयार्द्रां करे ज्ञानमुद्रां
कलाभिर्विनिद्रां कलापैः सुभद्राम् ।
पुरस्त्रीं विनिद्रां पुरस्तुङ्गभद्रां
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ २ ॥
ललामाङ्कफालां लसद्गानलोलां
स्वभक्तैकपालां यशःश्रीकपोलाम् ।
करे त्वक्षमालां कनत्पत्रलोलां
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ ३ ॥
सुसीमन्तवेणीं दृशा निर्जितैणीं
रमत्कीरवाणीं नमद्वज्रपाणीम् ।
सुधामन्थरास्यां मुदा चिन्त्यवेणीं
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ ४ ॥
सुशान्तां सुदेहां दृगन्ते कचान्तां
लसत्सल्लताङ्गीमनन्तामचिन्त्याम् ।
स्मरेत्तापसैः सर्गपूर्वस्थितां तां
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ ५ ॥
कुरङ्गे तुरङ्गे मृगेन्द्रे खगेन्द्रे
मराले मदेभे महोक्षेऽधिरूढाम् ।
महत्यां नवम्यां सदा सामरूपां
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ ६ ॥
ज्वलत्कान्तिवह्निं जगन्मोहनाङ्गीं
भजे मानसाम्भोज सुभ्रान्तभृङ्गीम् ।
निजस्तोत्रसङ्गीतनृत्यप्रभाङ्गीं
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ ७ ॥
भवाम्भोजनेत्राजसम्पूज्यमानां
लसन्मन्दहासप्रभावक्त्रचिह्नाम् ।
चलच्चञ्चलाचारुताटङ्ककर्णां
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ ८ ॥
इति श्री शारदा भुजङ्ग प्रयाताष्टकम् ।

सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

रामुडुद्भविंचिनाडु रघु कुलंबुन.../ तेलगू / श्री प्रयाग रंगदासु कृति / गायन : प्रिंस राम वर्मा

 https://youtu.be/w8rUGjUts9c 

भगवान राम का जन्म रघुकुल में हुआ था। चैत्र शुद्ध नवमी को सरस कर्क  लग्न में। 
LYRICS ROMAN SCRIPT 

p) rAmuDudbhavinchinADu - raghu kulambuna SrI ||rAmuDu
tAmasulanu dunimi divija sthOmambuna
kshEmamukai kOmali kousalyaku SrI ||rAmuDu

1) tanaru chaitra Suddha navami punarvasambuna
sarasa karkATaka lagnamarayaga suravarulella
vini kuriyimpa virula vAna ||rAmuDu

2) daSaradhunDu bhUsurulaku dhanamosangagA
visara malaya mArutamu - diSalellanu viSadamulou
vasumati durbharamu bApa ||rAmuDu

3) kaluvalanu mincu kanula kAnti velgagA
paluvarusA ANimutya kalamuloyana
kaLalolukaga kilakilamani navvuchu SrI ||rAmuDu

4) dharanu guDimeLLanka puramunarasi brOvagA
karuNatO SrI rangadAsu moraliDaganu
karuNinchiyu varamivvanu sthiruDai SrI ||rAmuDu

LYRICS DEVNAGRI SCRIPT 

रामुडुद्भविंचिनाडु रघु कुलंबुन श्री ||रामुडु||
तामसुलनु दुनिमि दिविज स्थोमंबुन
क्षेममुकै कोमलि कौसल्यकु श्री || रामुडु||
1) तनरु चैत्र शुद्ध नवमि पुनर्वसंबुन
सरस कर्काटक लग्न मरयग सुरवरुलॆल्ल
विनि कुरियिंप वीरुल वान ||रामुडु ||
2) दशरधुंडु भूसुरुलकु धनमॊसंग
विसर मलय मारुतमु - दशलॆल्लनु विशदमुलौ
वसुमति दुर्भरमु बाप ||रामुडु ||
3) कलुवलनु मिंचि कनुल कांति वॆल्गगा
पलुवरुसा कलमुलॊयन
कळलॊलुकग किलकिलमनि नव्वुचु श्री ||रामुडु ||
4) धरनु गुडिमॆळ्ळंक पुरमुनरपि ब्रोवगा
करुणतो श्री रंग दासु मॊरलिडगनु
करुणिंचियु वरमिव्वनु स्थिरुडै श्री ||रामुडु ||

LYRICS TELGU SCRIPT 

రాముడుద్భవించినాడు రఘు కులంబున శ్రీ  ||రాముడు||
తామసులను దునిమి దివిజ స్థోమంబున
క్షేమముకై కోమలి కౌసల్యకు శ్రీ || రాముడు||
1) తనరు చైత్ర శుద్ధ నవమి పునర్వసంబున
సరస కర్కాటక లగ్న మరయగ సురవరులెల్ల
విని కురియింప విరుల వాన ||రాముడు ||
2) దశరధుండు భూసురులకు ధనమొసంగ
విసర మలయ మారుతము - దశలెల్లను విశదములౌ
వసుమతి దుర్భరము బాప  ||రాముడు ||
3) కలువలను మించి కనుల కాంతి వెల్గగా
పలువరుసా కలములొయన
కళలొలుకగ కిలకిలమని నవ్వుచు శ్రీ ||రాముడు ||
4) ధరను గుడిమెళ్ళంక పురమునరపి బ్రోవగా
కరుణతో శ్రీ రంగ దాసు మొరలిడగను
కరుణించియు వరమివ్వను స్థిరుడై శ్రీ ||రాముడు ||

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

ब्रह्मज्ञानावली माला / श्री आदि शंकराचार्य / स्वर : जया विद्यासागर

https://youtu.be/lI-yryZGl9A

श्री आदि शंकराचार्य द्वारा रचित ब्रह्म ज्ञानावली माला 

श्री एस.एन .शास्त्री द्वारा अनुवादित
ब्रह्मा ज्ञानावली माला श्री आदि शंकराचार्य द्वारा उन्नत साधकों को दिया गया 
एक अनमोल उपहार है। श्री आदि शंकराचार्य उस व्यक्ति की विशेषताओं का 
वर्णन करते हैं जिसने यह जान लिया है कि वह ब्रह्म है। मुक्ति के आकांक्षी को 
उसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए इनका ध्यान करने की सलाह दी जाती है।

ब्रह्मज्ञानावलीमाला
सक्रत् श्रवणमत्रेण ब्रह्मज्ञानं यतो भवेत् 
ब्रह्मज्ञानावली सर्वेषाम् मोक्षसिद्धये ॥१
ब्रह्म ज्ञानावली माला नामक कार्य, जिसे सुनने मात्र से ही 
एक बार ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, सभी को मुक्ति प्राप्त 
असन्गोऽहम् असन्गोऽहम् असन्गोऽहम्
पुनः पुनः सच्चिदानन्दउपोऽहम् अहमेवहम्  ॥२
अव्ययः मैं अनासक्त हूँ, अनासक्त हूँ, किसी भी प्रकार के मोह से 
सदैव मुक्त हूँ; मैं अस्तित्व-चेतना-आनन्द के स्वभाव का हूँ। 
मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और सदैव अपरिवर्तनीय।
नित्यशुद्धविमुक्तोऽहं निराकारोऽहं अव्ययः
भूमानंदस्वरूपोऽहम् अहमेवहम् अव्ययः 
 ॥३
मैं शाश्वत हूं, मैं शुद्ध हूं (माया के नियंत्रण से मुक्त)। मैं सदैव मुक्त हूँ। 
मैं निराकार, अविनाशी और परिवर्तनहीन हूं। मैं अनंत आनंद स्वरूप 
हूं। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
नित्योऽहम् निरावाद्योऽहम् निराकारोऽहम् अच्युतः
परमानन्दरूपोऽहम् अहमेवहमव्ययः 
 ॥४
मैं शाश्वत हूँ, मैं दोष रहित हूँ, मैं निराकार हूँ, मैं अविनाशी और अपरिवर्तनीय 
हूँ। मैं परम आनंद स्वरूप हूं। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
शुद्धचैतन्यरूपोऽहम् आत्मारामोऽहम् एव च
​​अखण्डानन्दरूपोऽहम् अहमेवहम्व्ययः 
 ॥५
मैं शुद्ध चैतन्य हूँ, मैं अपने स्वरूप में ही रमण करता हूँ। मैं अविभाज्य (एकाग्र) 
आनंद स्वरूप हूं। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
प्रत्यक्षचैतन्यरूपोऽहम् सन्तोऽहम् प्रकृतिः परः
शाश्वतानन्दरूपोऽहम् अहमेवहमव्ययः  
 ॥६
मैं वास करने वाली चेतना हूँ, मैं शांत (सभी उत्तेजनाओं से मुक्त) हूँ, मैं प्रकृति 
(माया) से परे हूँ, मैं शाश्वत आनंद की प्रकृति वाला हूँ, मैं ही हूँ अत्यंत स्वंय, 
अविनाशी और परिवर्तनहीन।
तत्त्वतातिः परतम मध्यातिः परः शिवः
मायातिः परमज्योतिः अहमेवहमव्ययः 
 ॥७
मैं सर्वोच्च आत्मा हूं, सभी श्रेणियों (जैसे कि प्रकृति, महत्, अहंकार, आदि) से 
परे, मैं सर्वोच्च शुभ हूं, बीच में सभी से परे। मैं माया से परे हूं. मैं परम प्रकाश हूँ. 
नानारूपव्यातितोऽहं सिदकारोऽहं अच्युतः
सुखरूपस्वरूपोऽहं अहमेवहमव्ययः  ॥८
मैं सभी विभिन्न रूपों से परे हूं। मैं शुद्ध चैतन्य स्वभाव का हूं। मैं कभी भी 
गिरावट के अधीन नहीं हूं. मैं आनंद स्वभाव का हूं. मैं ही आत्मा हूँ, 
अविनाशी और परिवर्तनहीन।
मायातत्कार्यदेहादि मम नास्तयेव सर्वदा
स्वप्रकाशाकारउपोऽहम् अहमेवहम्व्ययः  ॥९

मेरे लिए शरीर के समान न तो माया है और न ही उसके प्रभाव। मैं उसी स्वभाव 
का और स्वयं प्रकाशमान हूँ। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
गुणत्रयव्यतितोऽहम् ब्रह्मादीनम् च साक्ष्यहम्
अनन्तानन्दरूपोऽहम् अहमेवहम्व्ययः  ॥१०

मैं तीन गुणों-सत्व, रजस और तमस से परे हूँ। मैं ब्रह्मा आदि का भी साक्षी हूँ। 
मैं अनंत आनंद स्वरूप हूं। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
अंतर्यामीस्वरूपोऽहम् कुतस्थः सर्वगोऽस्म्यहं
परमात्मस्वरूपोऽहम् अहमेवहमव्ययः 
 ॥११
मैं आंतरिक नियंत्रक हूं, मैं अपरिवर्तनीय हूं, मैं सर्वव्यापी हूं। मैं स्वयं ही 
सर्वोच्च आत्मा हूं। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
निष्कलोऽहम् निष्क्रियाओऽहम् सर्वात्मा अद्यः सनातनः
अपरोक्षस्वरूपोऽहम् अहमेवहमव्ययः  ॥१२
मैं अंशों से रहित हूँ। मैं क्रियाहीन हूं. मैं सबका आत्मस्वरूप हूँ। मैं ही 
आदिम हूँ. मैं प्राचीन, शाश्वत हूं। मैं प्रत्यक्ष रूप से अंतर्ज्ञानी हूं। मैं ही 
आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
द्वंद्वदिसअक्षीरूपोऽहं अचलोऽहं सनातनः
सर्वअक्षिस्वरूपोऽहं अहमेवअहमव्ययः  ॥१३
मैं सभी विपरीत युग्मों का साक्षी हूं। मैं अचल हूँ. मैं शाश्वत हूं. 
मैं हर चीज़ का गवाह हूँ. मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
प्रज्ञाअनघन एवअहं विज्ञाननाघन एव च
​​अकर्ताहं अभोक्ताहं अहमेवहमव्ययः 
 ॥१४
मैं जागरूकता और चैतन्य का एक समूह हूं। मैं न तो कर्ता हूं और न ही 
अनुभवकर्ता हूं। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
निराधारस्वरूपोऽहम् सर्वाधारोहम् एव च
​​आप्तकामस्वरूपोऽहम् अहमेवहमव्ययः  ॥१५
मैं बिना किसी सहारे के हूँ और मैं ही सबका सहारा हूँ। मेरी कोई इच्छा 
पूरी नहीं है. मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
तपत्रयाविनिर्मुक्तो देहात्रयविलक्षणः 
अवस्थात्रयसाक्ष्यस्मि चाहमेवहमव्ययः  ॥१६
मैं तीन प्रकार के कष्टों से मुक्त हूं- शरीर से उत्पन्न, अन्य प्राणियों से 
और उच्च शक्तियों के कारण होने वाले कष्टों से। मैं स्थूल, सूक्ष्म और 
कारण शरीरों से भिन्न हूँ। मैं जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों 
अवस्थाओं का साक्षी हूँ। मैं ही आत्मा हूँ, अविनाशी और परिवर्तनहीन।
द्रग् द्रस्यौ द्वौ पदारथौ स्त: परस्परविलक्षणौ
द्रग ब्रह्मा द्रस्याम मयेति सर्ववेदअंतदिंदिमः 
 ॥१७
दो चीजें हैं जो एक दूसरे से अलग हैं। वे द्रष्टा और दृश्य हैं। द्रष्टा ब्रह्म है और 
दृश्य माया है। समस्त वेदांत यही उद्घोष करता है।
अहं साक्षी यो विद्यात् विविच्यैवं पुन: पुन: स
एवं मुक्त: सो विद्वान् इति वेदांतदीनदिमा  ॥१८

जो बार-बार चिंतन करने के बाद यह जान लेता है कि वह मात्र साक्षी है, 
वही मुक्त है। वह प्रबुद्ध व्यक्ति है. ऐसा वेदान्त ने घोषित किया है।
घटकुद्यादिकम् सर्वं मृतिकामात्रम् एव च ​​तद्वद्
ब्रह्म जगत् सर्वम् इति वेदान्तदिन्दिमः  ॥१९

बर्तन, दीवार आदि सभी मिट्टी के अलावा और कुछ नहीं हैं। इसी तरह, 
संपूर्ण ब्रह्मांड ब्रह्म के अलावा और कुछ नहीं है। ऐसा वेदान्त ने घोषित किया है।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरा:
अनेन वेद्यं सच्चस्त्रम् इति वेदांतदीनदिमा  ॥२०

ब्रह्म सत्य है, ब्रह्मांड मिथ्या है (इसे वास्तविक या अवास्तविक के रूप में वर्गीकृत 
नहीं किया जा सकता है)। जीव स्वयं ब्रह्म है, भिन्न नहीं। इसे ही सही शास्त्र समझना 
चाहिए। ऐसा वेदान्त ने घोषित किया है।
अंतरज्योतिर्बिहिरज्योतिः प्रत्यक्षज्योतिः परात्परः
ज्योतिर्ज्योतिः स्वयंज्योतिः आत्मज्योतिः शिवोऽस्म्यहम् 
 ॥२१
मैं ही शुभ हूँ, आंतरिक प्रकाश और बाह्य प्रकाश, वास करने वाला प्रकाश, 
सर्वोच्च से भी ऊँचा, सभी प्रकाशों का प्रकाश, स्वयं प्रकाशमान, वह प्रकाश 
जो स्वयं है .
इति श्री आदिशंकरभागवत पादकृ त ब्रह्मज्ञानावली सम्पूर्ण

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024

आज आये श्याम मोहन.../ महाराजा स्वाती तिरुनाल कृति / गायन : के. एस. चित्रा

 https://youtu.be/aToNlVNhE4Q

आज आये श्याम मोहन रास मंडल खेलने 
बाँसुरी की धुन भी लागे तान तन नन तूम तूम 
बाजे ताल मृदंग की धुन ध्रिकीता तक तक तोम तोम  
नाच रही गोरी ता थइय्या थै ता थई तत 
बजे पायल थोम तना न न ना छना न न ना थोम 
तान गावें तकधिम तधिम थिरका तकतोम तथोम धिन्ना 
कितीताका धिन्ना कितातका धिन्ना कितीताका ताकिता थोम 
पद्मनाभ तुम्हारी लीला क्या कहूँ मैं बावरो 
ताप संकट शरण आयो सो हमारो तुम हरो 

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2024

प्रभु तुम अन्तर्यामी.../ गायन : शिवानी वासवानी

 https://youtu.be/6iQLRsx19fw 

प्रभु तुम अन्तर्यामी  
दया करो, दया करो, हे स्वामी 

मन्द मन्द मुसकान मनोहर
मुख पर लट घुंघराली
अचरज क्या जो भई बावरी
देख के छवि मतवाली
बेल प्रीत की जामी
दया करो, दया करो, हे स्वामी

मैं गुणहीन, रिझाऊं कैसे
तुम को हे नटनागर
एक यही विशवास ह्रदय में
तुम हो दया के सागर
तीन लोक के स्वामी
दया करो, दया करो, हे स्वामी