शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष.../ नज़्म / चाँद मुबारक / अरुण मिश्र

https://youtu.be/f3vOwfc_4rE   

तिरसठ बरस पहले,
पन्द्रह अगस्त की शब,
थी रात आधी बाक़ी,
आधी ग़ुज़र चुकी थी।
या शाम से सहर की-
मुश्क़िल तवील दूरी,
तय हो चुकी थी आधी।
ख़त्म हो रहा सफ़र था-
राहों में तीरग़ी के-
औ’, रोशनी की जानिब।।


पन्द्रह अगस्त की शब,
दिल्ली के आसमाँ में,
उस ख़ुशनुमां फ़िज़ाँ में,
इक अजीब चाँद चमका,
रंगीन चाँद चमका।।


थे तीन रंग उसमें-
वो चाँद था तिरंगा।
वे तरह-तरह के रंग थे,
रंग क्या थे वे तरंग थे,
हम हिन्दियों के मन में -
उमगे हुये उमंग थे।
कु़र्बानियों का रंग भी,
अम्नो-अमन का रंग भी,
था मुहब्बतों का रंग भी,
ख़ुशहालियों का रंग भी,
औ’, बुढ़िया के चर्खे़ के-
उस पहिये का निशां भी-
बूढ़े से लेके बच्चे तक-
जिसको जानते हैं।।


पन्द्रह अगस्त की शब,
जब रायसीना के इन-
नन्हीं पहाड़ियों पर-
यह चाँद उगा देखा-
ऊँचे हिमालया ने,
कुछ और हुआ ऊँचा।
गंगों-जमन की छाती-
कुछ और हुई चौड़ी।
औ’, हिन्द महासागर-
में ज्वार उमड़ आया।
बंगाल की खाड़ी से-
सागर तलक अरब के-
ख़ुशियों की लहर फैली,
हर गाँव-शहर फैली।।


पन्द्रह अगस्त की शब,
जब राष्ट्रपति भवन में-
यह चाँद चढ़ा ऊपर,
चढ़ता ही गया ऊपर,
सूरज उतार लाया,
सूरज कि , जिसकी शोहरत-
थी, डूबता नहीं है,
वह डूब गया आधा-
इस चाँद की चमक से।।


पन्द्रह अगस्त की शब,
इस चाँद को निहारा,
जब लाल क़िले ने तो-
ख़ुशियों से झूम उट्ठीं-
बेज़ान दीवारें भी।
पहलू में जामा मस्जिद-
की ऊँची मीनारें भी-
देने लगीं दुआयें।
आने लगी सदायें-
हर ज़र्रे से ग़ोशे से-
ये चाँद मुबारक हो।
इस देश की क़िस्मत का-
ये चाँद मुबारक हो।
इस हिन्द की ताक़त का-
ये चाँद मुबारक हो।
हिन्दोस्ताँ की अज़मत का-
चाँद मुबारक हो।।


रोजे़ की मुश्क़िलों के-
थी बाद, ईद आयी।
क़ुर्बानियाँ शहीदों की-
थीं ये रंग लायीं।
अब फ़र्ज़ है, हमारा-
इसकी करें हिफ़ाज़त,
ता’, ये रहे सलामत-
औ’, कह सकें हमेशा-
हर साल-गिरह पर हम-
ये, एक दूसरे से-
कि, चाँद मुबारक हो-
ये तीन रंग वाला,
हिन्दोस्ताँ की अज़मत का-
चाँद मुबारक हो।
ये चाँद सलामत हो,
ये चाँद मुबारक हो।।

(एक पुरानी पूर्व प्रकाशित नज़्म)

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

वन्दे मातरम् .../ रचना : बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय / स्वर : माधवी मधुकर झा

https://youtu.be/Mt_McULqya4   

वन्दे मातरम्
मैं वंदना करता हूँ माँ की।
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
जल से भरपूर, फलों से लदी, चंदन की शीतल हवा से ठंडी।
शस्य श्यामलां मातरं।
हरी-भरी फसलों वाली मातृभूमि।

शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्

चाँदनी से नहाई, पुलकित रातें।
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
फूलों से लदे पेड़ों की शोभा से सजी।
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्।
मधुर मुस्कान वाली, मधुर वाणी वाली।
सुखदां वरदां मातरम्।।
सुख देने वाली, वरदान देने वाली माँ।
वन्दे मातरम्
मैं वंदना करता हूँ माँ की।

सप्त कोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले
सात करोड़ कंठों से गूंजती।
निसप्त कोटि भुजैर्धृउत खरकरवाले
सत्तर करोड़ बाहुओं से बल पाती।
के बोले मा तुमी अबले
कौन कहता है कि तुम निर्बल हो, माँ?
बहुबल धारिणीं नमामि तारिणीम्
असीम बल की धारिणी, उद्धार करने वाली को प्रणाम।
रिपुदलवारिणीं मातरम्
शत्रु दल को नष्ट करने वाली माँ।
वन्दे मातरम्
मैं वंदना करता हूँ माँ की।

तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि हृदि तुमि मर्म
तुम ही ज्ञान हो, तुम ही धर्म हो, 
तुम ही हृदय हो, तुम ही जीवन का मर्म हो।
त्वं हि प्राणाः शरीरे
तुम ही प्राण हो शरीर के।
बाहुते तुमि मा शक्ति,
बाहु में तुम हो शक्ति।
हृदये तुमि मा भक्ति,
हृदय में तुम हो भक्ति।
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे मन्दिरे
तेरी ही प्रतिमा हम मंदिर-मंदिर में गढ़ते हैं।
वन्दे मातरम्
मैं वंदना करता हूँ माँ की।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
तुम ही हो दुर्गा, दसों अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली।
कमला कमलदल विहारिणी
तुम ही हो लक्ष्मी, कमल के दल में विहार करने वाली।
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
तुम ही हो सरस्वती, विद्या देने वाली, मैं तुम्हें प्रणाम
करता हूँ।

नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
निर्मल, अद्वितीय कमल जैसी, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
सुजलां सुफलां मातरम्
जल से भरपूर, फलों से लदी माँ।
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
श्यामल, सरल, मधुर मुस्कान से सजी।
धरणीं भरणीं मातरम्
धरती का भार सँभालने वाली माँ।
वन्दे मातरम्
मैं वंदना करता हूँ माँ की

रविवार, 3 अगस्त 2025

पार्वतीवल्लभ अष्टकम.../ स्वर : दीपश्री एवं दिव्यश्री

https://youtu.be/BMq1Azeshzg   

नमो भूतनाथं नमो देवदेवं 
नमः कालकालं नमो दिव्यतेजः। (दिव्यतेजम्) 
नमः कामभस्मं नमश्शान्तशीलं 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ १॥ 


सदा तीर्थसिद्धं सदा भक्तरक्षं 
सदा शैवपूज्यं सदा शुभ्रभस्मम् । 
सदा ध्यानयुक्तं सदा ज्ञानतल्पं 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ २॥ 


श्मशाने शयानं महास्थानवासं (श्मशानं भयानं) 
शरीरं गजानं सदा चर्मवेष्टम् । 
पिशाचादिनाथं पशूनां प्रतिष्ठं (पिशाचं निशोचं पशूनां)
 भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ३॥ 


फणीनागकण्ठे भुजङ्गाद्यनेकं (फणीनागकण्ठं, भुजङ्गाङ्गभूषं) 
गले रुण्डमालं महावीर शूरम् । 
कटिव्याघ्रचर्मं चिताभस्मलेपं 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ४॥ 


शिरश्शुद्धगङ्गा शिवावामभागं 
बृहद्दीर्घकेशं सदा मां त्रिनेत्रम् । (वियद्दीर्घकेशं, बृहद्दिव्यकेशं सहोमं) 
फणीनागकर्णं सदा भालचन्द्रं (बालचन्द्रं) 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ५॥ 


करे शूलधारं महाकष्टनाशं 
सुरेशं परेशं महेशं जनेशम् । (वरेशं महेशं) 
धनेशस्तुतेशं ध्वजेशं गिरीशं (धने चारु ईशं, धनेशस्य मित्रं) 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ६॥ 


उदानं सुदासं सुकैलासवासं (उदासं) 
धरा निर्धरं संस्थितं ह्यादिदेवम् । (धरानिर्झरे) 
अजं हेमकल्पद्रुमं कल्पसेव्यं 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ७॥ 


मुनीनां वरेण्यं गुणं रूपवर्णं 
द्विजानं पठन्तं शिवं वेदशास्त्रम् । (द्विजा सम्पठन्तं, द्विजैः स्तूयमानं, वेदशात्रैः) 
अहो दीनवत्सं कृपालुं शिवं तं (शिवं हि) 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ८॥ 


सदा भावनाथं सदा सेव्यमानं 
सदा भक्तिदेवं सदा पूज्यमानम् । 
मया तीर्थवासं सदा सेव्यमेकं (महातीर्थवासम्) 
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ९॥ 


इति पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकं सम्पूर्णम् ।

जय सुगन्धिनी त्रिपुर सुन्दरी.../ स्वर : देवराज मुथुस्वामी

https://youtu.be/xZ0SDdckpG0  


जय सुगन्धिनी
त्रिपुर सुन्दरी 
जय महेश्वरी
जय जनप्रिये

जय सुनादिनी
जगत पराम्बिके 
महिषमर्दिनी 
देवि माश्रये 

शरणम् ईश्वरी देवी
शरणम् ईश्वरी
शरणम् ईश्वरी देवी
शरणम् ईश्वरी

आदि पराशक्ति
अम्ब बालिके
हरि मनोहरी
हर भूषणी

अयि सुभाषिणी 
आदि नायकी 
जय महालक्ष्मी
देवि माश्रये
(शरणम् ईश्वरी देवी..)

शशिकलाधरी 
शारदाम्बिके
सर्वरूपिणी
हँसवाहिनी 

ब्रह्मवर्धिनी 
पुस्तकधारिणी 
जय सरस्वती
देवि माश्रये
(शरणम् ईश्वरी देवी...)

जय जनप्रियम् 
ज्योति निर्मलम्
जय शिवप्रियम् 
सुन्दराननम्

जति सुलोचनी
सिंहवाहिनी 
जय महाशक्ति
देवि माश्रये
(शरणम् ईश्वरी देवी...)

शनिवार, 2 अगस्त 2025

शिवोऽहम् शिवोऽहम्.../ आदि शंकराचार्य कृत/ स्वर : शुभांगी जोशी

https://youtu.be/K3eASJiYVVo   

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं 
पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। 
पूर्णस्य पूर्णमादाय 
पूर्णमेवावशिष्यते॥


 मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम्
 न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर्न तेजॊ न वायु: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥1॥


मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं
मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं
मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।


न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: 
न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ  न चोपस्थपायू 
चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥2॥


मैं न प्राण हूं,  न ही पंच वायु हूं
मैं न सात धातु हूं,
और न ही पांच कोश हूं
मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्सर्जन की इन्द्रियां हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।


न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ 
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥3॥


न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह
न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।


न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् 
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदार् न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता 
चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥4॥


मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं
मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ
न मैं भोजन(भोगने की वस्तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।


न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म:
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥5॥


न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव
मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था
मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।


अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ
 विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
सदा मे समत्त्वं न मुक्तिर्न बंध:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥


मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं
मैं चैतन्य के रूप में सब जगह व्याप्त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं,
न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

 
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागँसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायूः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

मंगलवार, 29 जुलाई 2025

हरे रामा रिमझिम बरसे पनिया झूले राधा रनिया.../ गायन : मैथिली ठाकुर

https://youtu.be/czYP11w9Ruw  


की हरे रामा रिमझिम बरसे पनिया
झूले राधा रानिया रे हारी

घिर आये घुमड़ घनकारे,
परे रिमझिम बून्द फुहारे।
हरे रामा चमक रही दामिनिया
की झूले...

गर सोहे मोतियन माला,
अंग अंग में भूषण निराला।
अरे रामा कमर पड़ी करधनिया
की झूले...

उ झूले सुमन हिंडोला,
बिन दाम लेत मनमोला।
हरे रामा मंद मंद मुस्कनिया
की झूले...