बुधवार, 10 अगस्त 2022

खवाओ एकखान फाँ (पान) / बांग्ला गीत / गायन : ज़ाहिद (बांग्ला देश)

https://youtu.be/onM9ihWF-YY

(कृपया इस लिंक से यूट्यूब पर देखें।)


Song : Paan Singer : Jahid Lyric, Tune : Prince Rubel

Young singer Jahid, is an internet sensation in Bangladesh, 
who grew awareness in the beaches of Cox’s Bazar, Chittagong.


कोरस (द्वितीय):
खवाओ एकखान फाँ, हुनैमु बौला गान
गान फुनैया भोरी लाईमु अमी तुमर प्राण
खवाओ एकखान फाँ, हुनैमु बौला गान

Bridge:
Faan-er shathe dio zorda, thakle dio ektu aada

Laagbo ne gheran (III)  

फान-एर शठे दियो ज़ोरदा, थकले दिओ एकतु अदा
लागबो ने घेरान (III)
सहगान:
खवाओ एकखान फाँ, हुनैमु बौला गान
गान फुनैया भोरी लाईमु अमी तुमर प्राण
छंद 1:
फान-एर गोंडे मोन अनोंडे, गोलाट ऐबो शूर
मोजर मोजर होता होइमु, अनोंडो फैबा भोरफुर
फान-एर गोंडे मोन अनोंडे, गोलाट ऐबो शूर
मोजर मोजर होता होइमु, अनोंडो फैबा भोरफुर
हकीमपुरी, शोपनोपुरी, बरिशाल-एर कांचा शुपारी (द्वितीय)
आरो दियो राजशाही-आर बांग्ला फैन

Chorus:
Khawao ekkhan faan, hunaimu Baula gaan
Gaan funaiya bhori laimu ami tumar praan
Verse 2:
Shodor ghat-er Maheshkhali-r faan-o ami khaisi
Moza faiya, gola saira, ami bohut gaan gaisi
Shodor ghat-er Maheshkhali-r faan-o ami khaisi
Moza faiya, gola saira, ami bohut gaan gaisi
Sylhet Bondor faan-er goli, teen faane-te ekta khili (II)
Haaradin sabaile-o furaina bhaizaan
Chorus (II):
Khawao ekkhan faan, hunaimu Baula gaan
Gaan funaiya bhori laimu, ami tumar praan
Bridge:
Faan-er shathe dio zorda, thakle dio ektu aada
Laagbo ne gheran (III)

Chorus:
Khawao ekkhan faan, hunaimu Baula gaan
Gaan funaiya bhori laimu, ami tumar praan (III)

सहगान:
खवाओ एकखान फाँ, हुनैमु बौला गान
गान फुनैया भोरी लाईमु अमी तुमर प्राण
पद 2:
शोडोर घाट-एर महेशखली-र फान-ओ अमी खासी
मोज़ा फ़ैया, गोला सायरा, अमी बोहुत गान गाइसी
शोडोर घाट-एर महेशखली-र फान-ओ अमी खासी
मोज़ा फ़ैया, गोला सायरा, अमी बोहुत गान गाइसी
सिलहट बोंडोर फान-एर गोली, तीन फाने-ते एकता खिलाड़ी (द्वितीय)
हरादीन सबाइले-ओ फुरैना भाईजान
कोरस (द्वितीय):
खवाओ एकखान फाँ, हुनैमु बौला गान
गान फुनैया भोरी लाईमू, अमी तुमर प्राण:
पुल:
फान-एर शठे दियो ज़ोरदा, थकले दिओ एकतु अदा
लागबो ने घेरान (III)
सहगान:
खवाओ एकखान फाँ, हुनैमु बौला गान
गान फुनैया भोरी लाईमू, अमी तुमार प्राण (III)

मंगलवार, 9 अगस्त 2022

राधा-कृष्णा प्राण मोरा जुगलकिशोर.../ बांग्ला कीर्तन / रचना : नरोत्तम दास ठाकुर / स्वर : अनुराधा राधा माधव

 https://youtu.be/THDnuRZpssw  

राधा-कृष्णा प्राण मोरा जुगलकिशोर...

रचना : नरोत्तम दास ठाकुर

बांग्ला कीर्तन

स्वर : अनुराधा राधा माधव (रूसी कृष्ण भक्त)


राधा-कृष्णा प्राण मोरा जुगलकिशोर

जीवने मरणे गति आरो नही मोरा (१)


कालीन्दीर कूले केलि कदम्बेर वना

रत्न-बेदीर उपर बोसबो दु-जना (२)

 

श्यामा-गौरी-अंगे दिबो चन्दनेर गन्ध

चामर ढुलाबो कबे हेरि मुख-चन्द्र (३)

 

गाठिया मलातीर माला दीबो दोहार गले

अधरे तुलिया दीबो कर्पूर-तम्बूले (४)

 

ललिता-विशाखा-आदि जता सखी-वृन्द

आज्ञाय कोरिबो सेवा चरणारविन्द (५)

 

श्री-कृष्ण-चैतन्य-प्रभुर दासेर अनुदास 

सेवा अभिलाषा कोरे  नरोत्तम-दास (६)

 

भावार्थ 

युगल (दोनों) किशोर, राधा और कृष्ण मेरे प्राण हैं। जीवन और मरण 

में भी उनके सिवाय मेरी और कोई गति (शरण) नहीं है।  (१)

यमुना के तीर कदम्ब-वन में, उन दोनों को मैं रत्नों की बेदी पर 

बिठाऊँगी। (२) 

मैं उनके श्यामल और गौर अंगों पर चन्दन का सुगन्धित लेप लगाऊँगी 

और चवँर ढुलाऊँगी। ओह ! कब मैं उनके मुख-चन्द्र निरखूँगी ?  (३)

मालती पुष्पों की माला गूँथ कर मैं उनके गले में डालूँगी। और उनके 

मुखारविंद में कर्पूर सुवासित ताम्बूल (पान) समर्पित करूँगी।  (४)

ललिता, विशाखा आदि समस्त सखियों की अनुमति से उन दोनों के 

चरण-कमलों की सेवा करूँगी। (५) 

श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के दास का भी दास, नरोत्तम दास को उनके 

चरणों की सेवा की अभिलाषा है।  (६)

सोमवार, 8 अगस्त 2022

जय-जय संकर जय त्रिपुरारि.../ महाकवि विद्यापति रचित / स्वर : अर्पणा मिश्रा

 https://youtu.be/_H8HDDmpOFo

जय संकर जय त्रिपुरारि। 
जय अध पुरुष जयति अध नारि॥ 
आध धवल तनु आधा गोरा। 
आध सहज कुच आध कटोरा॥ 
आध हड़माल आध गजमोति। 
आध चानन सोह आध विभूति॥ 
आध चेतन मति आधा भोरा। 
आध पटोर आध मुँजडोरा॥ 
आध जोग आध भोग बिलासा। 
आध पिधान आध दिग-बासा॥ 
आध चान आध सिंदूर सोभा। 
आध बिरूप आध जग लोभा॥ 
भने कबिरतन विधाता जाने। 
दुइ कए बाँटल एक पराने॥ 

भावार्थ :

हे शंकर, हे त्रिपुरारी, आपकी जय हो! आधे पुरुष की जय हो,
आधी नारी की जय हो! आधी देह धौली है, आधी गोरी है आधा 
स्तन सपाट है, आधा कटोरे की तरह।आधी माला हाड़ों की है, 
आधी माला गजमोतियों की।आधे में चंदन लगा रखा है, आधे 
में भभूत रमा रखी है।आधा होश ठीक है, आधे में दीवानापन है। 
आधा कटि-सूत्र रेशम का है, आधी मूँज की डोरी है।आधे में योग 
है, आधे में भोग-विलास।आधे में परिधान है, आधे में नंगापन।
आधे में चाँद है, आधे में सिंदूर का टीका। आधा रूप बेढंगा है, 
आधा भुवन-मोहन। विद्यापति ने कहा—“विधाता को ही पता 
होगा कि यह क्या है ! उसी ने एक प्राण को इस तरह दो हिस्सों में 
बाँट रखा है।”

रविवार, 7 अगस्त 2022

राधाधरमधुमिलिंद जय-जय.../ नाटक ‘संगीत सौभद्र' से / रचनाकार : बळवंत पांडुरंग किर्लोस्कर (१८४३ - १८८५) / गायिका - श्रीया सोंडूर

 https://youtu.be/o7VA_PTGEwM  

अण्णा साहेब किर्लोस्कर (जन्म: ३१ मई, १८४३ - मृत्यु: २ नवंबर, १८८५) का वास्तविक 
नाम बळवंत पांडुरंग किर्लोस्कर है। इन्होंने नाटकों के कलापक्ष को समृद्ध किया और मराठी 
रंगमंच की आधुनिक तकनीक आंरभ की। लोकमान्य तिलक के शब्दों में इन्होंने अपने नाटकों 
के द्वारा भारतीय संस्कृति का पुनरुद्वार किया।

राधाधरमधुमिलिंद जय-जय ।
रमारमण हरि गोविंद जय-जय ॥ धृ ॥
कालिंदी–तट-पुलिन-लांच्छित
सुरनुपादारविंद जय-जय ॥१II
उद्‌धृतनग मध्वरिंदमानघ ।
सत्यपांडपटकुविंद जयजय II२II
गोपसदनगुर्वलिंदखेलन ।
बलवत्स्तुतिते न निंद जय-जय॥३II

भावार्थ में सहायक शब्दार्थ 

'पुलिंद' के बजाय 'पुलिन' पढ़ें यह समझ में आता है। 'पुलिन' का अर्थ है नदी के किनारे का रेतीला किनारा। 'कालिंदी–तट-पुलिन-लांच्छित' का अर्थ है यमुना के तट पर रेत से लथपथ शरीर।
सुरनुतपादारविंद -जिसके चरण कमलों में देवता नत (नतमस्तक) हैं.
राधाधरमधुमिलिंद का अर्थ है राधा-अधर-मधु-मिलिंद, राधा के अधर का मधु पीने वाला भ्रमर।
'उद्धृतनग' का अर्थ है (गोवर्धन) पर्वतों को उठाने वाला।
मध्वरिंदमानघ - मधु-अरिंदम-अनघ।
अरि = शत्रु। मधु राक्षस का शमन करने वाली और अघ (पाप) से रहित है।
सत्यपंडपटकुविन्द - सत्यप-अण्ड-पट-कुविंद अंडपट = विश्वरूपी कपड़ा (ब्रह्मांड में अंडा)। कुविन्द = बुनकर। सत्य के संरक्षक और विश्वरूपी वस्त्र के बुनकर।
भाव-गीत 'धागा धागा अखंड बीनूं' को आप इसी अर्थ के साथ जानते हैं।
गोपसदनगुर्वलिंदखेलन - गोपसदन-गुरु-अलिन्द-खेलन।
अलिन्द = प्रांगण। गोप-सदन और गुरु के प्रांगण में एक खिलाड़ी।
बलवत्स्तुतिते न निंद = बलवत्स्तुति को कम मत समझो (बलवंत, यह स्तवन स्वयं नाटककार किर्लोस्कर द्वारा किया गया है)।