भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय बनारस की कचौड़ी गली से एक क्रांतिकारी को रात तब पकड़ लिया जब वह अपनी प्रेयसी के साथ था। उसे पकड़ कर वे बनारस के पास एक शहर है मिर्जापुर, वहाँ ले गए। वहाँ से फिर उसे सजा देकर काला पानी (रंगून) भेज दिया। जहाँ से वह कभी न लौट सके!
यहाँ कचौड़ी गली में उसकी प्रेयसी तड़प उठी। उसने उसके विरह में घर बार त्याग दिया और संन्यासिन की तरह विचरने लगी। जब थोड़ा उसे देह और आत्मा की सच्चाई का कुछ भान हुआ तो उसने अपनी विरह पीड़ा को निर्गुण भजन में लोकगीत की प्रख्यात कजरी शैली में लिपिबद्ध किया है। इसे मशहूर ठुमरी गायिका गौहर जान ने बड़े दिल से गाया है।
मिर्जापुर कैले गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमू
एही मिर्जापुर से उड़ेले जहजिया, सैंया चल गइले रंगून हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमू
पनवा से पातर भइल तोर धनिया, देहिया गलेला जइसे नून हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमू
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