शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

वातापि गणपतिं भजेऽहं.../ सन्त मुथुस्वामी दीक्षितर् कृति / भाषा : संस्कृत / गायन : सूर्य गायत्री

https://youtu.be/XDcPvMFmtE8  

वातापि गणपतिं भजेऽहं
वारणाश्यं वरप्रदं श्री ।

भूतादि संसेवित चरणं
भूत भौतिक प्रपंच भरणम् ।
वीतरागिणं विनुत योगिनं
विश्वकारणं विघ्नवारणम् ।

पुरा कुंभ संभव मुनिवर
प्रपूजितं त्रिकोण मध्यगतं
मुरारि प्रमुखाद्युपासितं
मूलाधार क्षेत्रस्थितम् ।

परादि चत्वारि वागात्मकं
प्रणव स्वरूप वक्रतुंडं
निरंतरं निखिल चंद्रखंडं
निजवामकर विद्रुतेक्षुखंडम् ।

करांबुज पाश बीजापूरं
कलुषविदूरं भूताकारं
हरादि गुरुगुह तोषित बिंबं
हंसध्वनि भूषित हेरंबम् ।

"वातापि गणपतिं भजेहं" कर्नाटक संगीत की सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध स्तुतियों में से एक है।
 इसे महान संगीतकार मुथुस्वामी दीक्षितर ने संस्कृत भाषा और हंसध्वनि राग में रचा था।
इस स्तुति में भगवान गणेश (वातापी गणपति) की स्तुति की जाती है।

गीत का मुख्य भाव और अर्थ :

'वातापी' उस स्थान का नाम है जहाँ के यह गणपति हैं (वर्तमान में कर्नाटक का बदामी)।

इस कीर्तन की शुरुआती पंक्तियाँ हैं : 

वातापि गणपतिं भजेऽहं वारणाश्यं वरप्रदं श्री।
भूतादि संसेवित चरणं भूत भौतिक प्रपञ्च भरणं।

इसका अर्थ है: "मैं वातापी (बदामी) में स्थित भगवान गणपति की पूजा (भजन) करता हूँ, जो हाथी के मुख वाले (वारणाश्य) और वरदान देने वाले (वरप्रद) हैं। जिनके चरणों की सेवा भूत-प्रेत आदि करते हैं और जो सम्पूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं।

गुडिय नोडिरण्णा देहद.../ भाषा : कन्नड़ / रचना : सन्त शिशुनाल शरीफ / स्वर : कुमारी अनन्या भट कडाटोका एवं कुमारी सहाना हेगडे होन्नावर

https://youtu.be/6LB-uhHoCAk  


गुडिय नोडिरण्णा देहद
गुडिय नोडिरण्णा
गुडिय नोडिरदु
पॊडविगॆ ऒडॆयनु
अडगिकॊंडु कडुबॆडगिनॊळिरुतिह ।।

मूरु मूलिय कल्लु अदनु
एरि कूतु डॊळ्ळु,
धीर निर्गुणन सार सगुणदलि
तोरि अडगि ता ब्यारागिरुतिह ।।

आरु मूरु कट्टि मेलकॆ
एरिदवनॆ घट्टि,
भेरि कहळि शंख भारिसुनाददि
मीरिदानंद तोरि हॊळॆयुतिह ।।

सागुतिहवु दिवस सेविसि
तेगि हॊळिगि पायस,
योगिराज शिशुनाळधीश तानागि
परत्पर ब्रह्मरूपनिह गुडिय नोडिरण्णा ।।

गीत का हिन्दी में अर्थ

इस गीत का मूल भाव यह है कि हमें भौतिक शरीर को केवल मांस-मज्जा का ढांचा नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे ईश्वर का मंदिर मानना चाहिए
इसका विस्तृत अर्थ निम्नलिखित है :  

• शरीर ही मंदिर है : कवि कहते हैं कि इस नश्वर भौतिक शरीर को देखो。 यह कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमात्मा का निवास स्थान—एक जीवंत मंदिर (देहद गुडी) है।

• अहंकार और ज्ञान : गीत में शरीर के भीतर छिपी ईश्वरीय चेतना को देखने का आह्वान किया गयान है。आंतरिक ऊर्जा (योग और प्राणायाम के माध्यम से) को जागृत करने की बात कही गई है। 

• परब्रह्म का वास : संत शिशुनाल शरीफ बताते हैं कि हमारे भीतर ही वह परब्रह्म (सर्वोच्च शक्ति) विद्यमान है。जब साधक अपने अंतर्मन में झांकता है, तब उसे इस बात का ज्ञान होता है कि यह शरीर ही ईश्वर का मंदिर है और आत्मा ही परमात्मा का रूप है।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

हंझूआं दा भाड़ा.../ भाषा : पंजाबी / कवि : शिव कुमार बटालवी / गायन : महेन्द्र कपूर

https://youtu.be/P9rm7PcbnQY  

तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा,
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


भट्ठी वालीए चम्बे दीए डालीए
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


हो ग्या कुवेला मैनूं
ढल गईआं छावां नी
बेलिआं 'चों मुड़ गईआं
मझ्झियां ते गावां नी
पायआ चिड़ियां ने चीक-चेहाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


छेती छेती करीं
मैं ते जाना बड़ी दूर नी
जिथे मेरे हाणियां दा
टुर ग्या पूर नी
योस पिंड दा सुणींदै राह माड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


मेरी वारी पत्त्यां दी
पंड सिल्ल्हिी हो गई
मिट्टी दी कड़ाही तेरी
काहनूं पिल्ली हो गई
तेरे सेक नूं कीह वज्ज्या दुगाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


लप्प कु ए चुंग मेरी
मैनूं पहलां टोर नी
कच्चे कच्चे रक्ख ना नी
रोढ़ थोढ़े होर नी
करां मिन्नतां मुका दे नी पुआड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


सौं गईआं हवावां रो रो
कर विरलाप नी
तार्यां नूं चढ़ ग्या
मट्ठा मट्ठा ताप नी
जंञ साहवां दी दा रुस्स ग्या लाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।

बुधवार, 8 जुलाई 2026

क्या है जो क़र्ज़-ए-शहर-ए-जाँ आज अदा हो या न हो.../ शायर : पीरज़ादा क़ासिम

https://youtu.be/WSUn45v_fGo  


क्या है जो क़र्ज़-ए-शहर-ए-जाँ आज अदा हो या न हो
आग लगी हो या नहीं ख़ून बहा हो या न हो

मेरी तो किश्त-ए-जाँ में आज ज़ख़्म ही ज़ख़्म खिल उठे
अब मुझे क्या कि सहन में फूल खिला हो या न हो

‘अर्सा-ए-शौक़ में नहीं फ़ुर्सत-ए-पेश-ओ-पस का वहम
ज़ख़्म-तलब रहेंगे हम ज़ख़्म मिला हो या न हो

हम ने तो माजरा-ए-ग़म बर-सर-ए-‘आम कह दिया
अश्क बहे हों या नहीं शोर उठा हो या न हो

उस को तो ताज़ा-कारी-ओ-ज़ख़्म-गरी का शौक़ है
ज़ख़्म दबे हों या नहीं दर्द थमा हो या न हो

महरम-ए-राज़ है हवा फ़ाश है सारा माजरा
उस ने कहा हो या नहीं हम ने सुना हो या न हो

उस के तो है नसीब में शब-नज़री-ओ-जाँ-कनी
भड़के है ख़ुद चराग़-ए-शौक़ तेज़ हवा हो या न हो

हम तो फ़रेब-कारी-ए-शब को बयान कर गए
अब ये नसीब-ए-शहर है जाग उठा हो या न हो

उस की गली से आज तो गुज़रे थे सर-ब-दस्त हम
उस ने ब-यक निगाह-ए-शौक़ देख लिया हो या न हो

पीरज़ादा क़ासिम रज़ा सिद्दीकी

जन्म 8 फरवरी 1943), एक पाकिस्तानी विद्वान, 
लेखक, कवि, वैज्ञानिक और शिक्षाविद् हैं। 
उन्होंने कई विश्वविद्यालयों के कुलपति के रूप में 
कार्य किया है।

रविवार, 5 जुलाई 2026

नारायण ते नमो नमो.../ सन्त श्री अन्नमाचार्य कृति / भाषा : संस्कृत / गायन : भावप्रिया

https://youtu.be/GAXzvofZt7E  


नारायण ते नमो नमो 
भव नारद सन्नुत नमो नमो ।।

मुरहर नगधर मुकुंद माधव
गरुडगमन पंकजनाभ
परमपुरुष भव-बंध विमोचन 
नर मृग शरीर नमो नमो ।।

जलधि शयन रविचंद्रविलोचन
जलरुह भवनुत चरणयुग
बलिबंधन गोपीजन वल्लभ
नळिनोदर ते नमो नमो ।।

आदिदेव सकलागम पूजित
यादव कुल मोहन रूप
वेदोद्धर श्रीवॆंकटनायक
नादप्रिय ते नमो नमो ।।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

मा रा ब-ग़मज़: कुश्त-ओ-क़ज़ा रा बहानः साख़्त.../ मिर्ज़ा मुहम्मद हुसैन 'क़तील' (1757-1818) / गायन : इक़बाल बानो

https://youtu.be/MxVfvYvWGVA?si=Miz_kIhZW99NsQt6


मा रा ब-ग़मज़: कुश्त-ओ-क़ज़ा रा बहानः साख़्त
ख़ुद सू-ए-मा न-दीद-ओ-हया रा बहानः साख़्त

उस ने मुझे ग़मज़े से मार डाला और क़ज़ा का बहाना बनाया
उस ने मेरी तरफ नहीं देखा और हया का बहाना बनाया

दस्ते ब-दोश-ए-ग़ैर निहाद अज़ रह-ए-करम
मा रा चू दीद लग़्ज़िश-ए-पा रा बहानः साख़्त

उस ने मोहब्बत से दूसरे के कंधे पर हाथ रखा
लेकिन जब उसने मुझे देखा तो लड़खड़ाने का बहाना बनाया

रफ़्तम ब-मस्जिदे पय-ए-नज़्ज़ार:-ए-रुख़श
दस्ते बरू कशीद व दुआ' रा बहानः साख़्त

मैं उसके चेहरे के दीदार के लिए मस्जिद गया
उस ने अपने चेहरे पर हाथ रख लिया और दुआ का बहाना बनाया

आमद बरून-ए-ख़ानः चूँ आवाज़-ए-मा शनीद
बख़्शीदन-ए-निवाल: गदा रा बहानः साख़्त

जब उसने मेरी आवाज़ सुनी घर से बाहर आ गया
इस बार उसने फ़क़ीर को खाना देने का बहाना बनाया

ख़ून-ए-'क़तील'-ए-बे-सर-ओ-पा रा ब-पा-ए-ख़्वेश
मालीद आँ निगार व हिना रा बहानः साख़्त

उस ने बे-सर-ओ-सामान 'क़तील' के ख़ून को
अपने क़दमों में मल लिया और हिना का बहाना बनाया

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

कंडु धन्यनादॆ गुरुगळ – कण्णारॆ ना.../ भाषा : कन्नड़ / श्री मोहन दासारु कृति / गायन : विभा हेगडे

https://youtu.be/2PrGnfxUTvI?si=pLymM5ue2hJYXh0T


कंडु धन्यनादॆ गुरुगळ – कण्णारॆ ना
कंडु धन्यनादॆ ई गुरुगळ   ।। प ।।

तुंगातटदि बंदु निंत
पंगु बधिराद्यंग हीनर
अंगगैसि सलहुवा – नर
सिंगनंघ्रि भजकरिवर      ।।१।।

गुरुवर सुगुणेंद्ररिंद
परिपरियलि सेवॆगॊळुत
वरमंत्रालयपुरदि मॆरॆव
परिमळाख्य ग्रंथकर्तर      ।।२।।

सो‍हं ऎन्नदॆ हरिय दा
सोहं ऎन्नलु ऒलिदु विजय
मोहन विठ्ठलन्न परम
स्नेहदिंद तोरुववर         ।।३।।

Meaning (Stanza by Stanza)

Pallavi (Refrain) :

Kandu dhanyanade gurugala kannaare naa kandu dhanyanade

I am deeply blessed and fulfilled to have seen you with my own eyes, my revered Guru.

Stanza 1 :

Tungaatathadi bandu ninta pangu badhiraadyanga heenara
Angagaisi salahuvaa - nara singananghri bhajkarivara

Standing on the banks of the Tungabhadra River, you bless and heal those who are physically challenged, blind, deaf, and helpless. You are the supreme protector for those who worship the lotus feet of Lord Narasimha. 

Stanza 2 :

Guruvara Sugunendrarinda paripariyali sevegolutha
Vara Mantralayapuradi mereva Parimalaakhya granthakarthara

Serving the esteemed Guru in various ways, you reside in the blessed town of Mantralaya. You are the author of the great scriptures known as Parimala. 

Stanza 3 :

Soham ennade hariya da soham ennalu olidu Vijaya
Mohana Vittalanna parama...

Although we do not realize our true divine nature, when we surrender and chant "Soham" (I am He/that divine soul), Lord Vijaya Mohana Vittala is pleased.