परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि । रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् । सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥
हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते । अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥
कर कटावरी तुळसीच्या माळा। ऐसे रूप डोळा दावी हरी॥ ठेविले चरण दोन्ही विटेवरी। ऐसे रूप हरी दावी डोळा॥ कटी पितांबर कास मिरवली। दाखवी वहिली ऐसी मूर्ती॥ गरुडपारावरी उभा राहिलासी। आठवे मानसी तेचि रूप॥ झुरोनि पांझरा होऊ पाहे आता। येई पंढरीनाथा भेटावया॥ तुका म्हणे माझी पुरवावी आस। विनंती उदास करू नये॥ अर्थ :
हे हरी, कमरपर हाथ रखे और गले में तुलसीकी माला पहने ऐसा रूप मैं अपनी आँखों से देखूं। और हे हरी, दोनो चरण ईंट पर रखे हुए ऐसा रूप मैं इन आँखों से देखूं। त्वरित, अपनी कमर में पीतांबर पहनी मूर्ती मुझे दिखाओ। गरुडपर खडे हुए आपका रूप मैं मन में याद कर रहा हूँ। आपकी इस मूर्ती को देखने की तीव्र इच्छा की वजह से मैं अब अस्थिपंजर का सा हो गया हूँ। अब तो, हे पंढरीनाथ, मेरी इच्छापूर्ती करो। मेरी विनती को न दुत्कारो।