https://youtu.be/4khE2AKeAGI
*प्रस्तुत है श्री हित चौरासी का प्रथम पद — "जोई-जोई प्यारौ करै"। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की दिव्य रसपूर्ण वाणी का मंगलाचरण स्वरूप प्रथम पद है। इस पद में श्रीजी और प्रियतम के मधुर, निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। भक्त और भगवान के मध्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का यह पद श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय की माधुर्य-रस परम्परा का अनुपम रत्न है।*
*इस पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु बताते हैं कि जो कुछ प्रियतम को प्रिय है वही भक्त को भी प्रिय है। भक्त का मन, प्राण, प्रेम और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल युगल सरकार में समर्पित हो जाता है। "मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय" तथा "अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे" जैसी पंक्तियाँ दिव्य प्रेम की चरम अवस्था का दर्शन कराती हैं। अंतिम चरण में श्री राधा-कृष्ण की साँवल-गौर युगल छवि को जल की तरंगों से भी अधिक अभिन्न बताया गया है।*
*श्री हित चौरासी – पद १*
जोई-जोई प्यारौ करै,
सोई मोहि भावै॥
भावै मोहि जोई,
सोई-सोई करैं प्यारे॥
मोकों तौ भावती ठौर,
प्यारे के नैंनन में॥
प्यारौ भयौ चाहै,
मेरे नैंनन के तारे॥
मेरे तन मन प्राण हूँ ते,
प्रीतम प्रिय॥
अपने कोटिक प्राण,
प्रीतम मोसों हारे॥
जै श्री हित हरिवंश,
हंस-हंसिनी साँवल-गौर॥
कहौ कौन करै,
जल-तरंगनि न्यारे॥