बुधवार, 20 मई 2026

कोई चौदहवीं-रात का चाँद बन कर.../ शायर : अख़्तर आज़ाद / गायन : जगजीत सिंह

https://youtu.be/IAKOa0McuaI?si=CrtGFMfIH7bXwu9J


कोई चौदहवीं-रात का चाँद बन कर तुम्हारे तसव्वुर में आया तो होगा
किसी से तो की होगी तुम ने मोहब्बत किसी को गले से लगाया तो होगा

लबों से मोहब्बत का जादू जगा के भरी बज़्म में सब से नज़रें बचा के
निगाहों के रस्ते से दिल में समा के किसी ने तुम्हें भी चुराया तो होगा

तुम्हारे ख़यालों की अँगनाइयों में मिरी याद के फूल महके तो होंगे
कभी अपनी आँखों के काजल से तुम ने मिरा नाम लिख कर मिटाया तो होगा

कभी आइने से निगाहें मिला कर जो ली होगी भरपूर अंगड़ाई तू ने
तो घबरा के ख़ुद तेरी अंगड़ाइयों ने तिरे हुस्न को गुदगुदाया तो होगा

निगाहों में शम-ए-तमन्ना जला कर तकी होंगी तुम ने भी राहें किसी की
किसी ने तो वा'दा किया होगा तुम से किसी ने तो तुम को रुलाया तो होगा

जुदा हो गया होगा जब कोई तुम से दिया होगा जब तुम को धोका किसी ने
हमारी वफ़ा याद आई तो होगी हमें अपने नज़दीक पाया तो होगा

सोमवार, 18 मई 2026

नवनीतचोरा नमो नमो.../ अन्नमाचार्य कृति / गायन : सिन्धु रागेश्वरी एवं सिवानन्द यसस्वी

https://youtu.be/TVQxun4tFBg?si=eRXl-QF9mdjOEA-N


Navaneetha Chora Namo Namo is a beautiful Carnatic composition written by the 15th-century saint-poet Talapaka Annamacharya. Dedicated to Lord Krishna, the song praises his various incarnations and divine attributes. 

पल्लवी

नवनीतचोरा नमो नमो
 नव महिमार्णव नमो नमो

चरणम् १

हरि नारायण केशव अच्युत कृष्ण नरसिम्हा वामन नमो नमो
मुराहर पद्मनाभ मुकुंद गोविंद नारायण नारायण नमो नमो

चरणम् २

निगम गोचार विष्णु नीरजाक्ष वासुदेव नागधर नंदगोप नमो नमो
त्रिगुणातीत देव त्रिविक्रम द्वारका नगराधि नायक नमो नमो

चरणम् ३

वैकुंठ रुक्मिणी वल्लभ चक्रधर नकेश वंदिता नमो नमो
श्रीकर गुणनिधि श्री वेंकटेश्वर नकाजनुता नमो नमो


Brief Meaning

The song translates to: "Salutations to the stealer of butter, salutations to the ocean of new and divine glories." The stanzas worship Lord Krishna in all his forms, including as Hari, Narayana, and Venkateshwara, as well as the protector of his devotees and the Lord of Dwaraka.

बुधवार, 6 मई 2026

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा.../ शायरा : परवीन शाकिर

https://youtu.be/LQ_o30t-Y3c?si=69mLwwupWSezPEcd

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा


हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा
क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा


वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है
एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा


वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए
मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा


आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी
तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगा


मुझ को तहज़ीब के बर्ज़ख़ का बनाया वारिस
जुर्म ये भी मिरे अज्दाद के सर जाएगा

शनिवार, 2 मई 2026

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी.../ शायरा : परवीन शाकिर

https://youtu.be/alsvzGEttAM 

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी


बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
चाँद भी 'ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी


सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता
एक दफ़'अ तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी


दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लें
शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी


उस को न पा सके थे जब दिल का 'अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी


मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दु'आ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी


उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं
उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी


गाह क़रीब-ए-शाह-रग गाह बईद-ए-वहम-ओ-ख़्वाब
उस की रफ़ाक़तों में रात हिज्र भी था विसाल भी


उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी


शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

ऐसा लगता है जिन्दगी तुम हो.../ शायर : बशीर बद्र / गायन : काव्या लिमये

https://youtu.be/nUcSdta05Q


ऐसा लगता है जिन्दगी तुम हो
अजनबी कैसे अजनबी तुम हो

अब कोई आरज़ू नहीं बाक़ी
जुस्तजू मेरी आख़री तुम हो

(आरज़ू = इच्छा), (जुस्तजू = तलाश, खोज)

मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँ
आसमानों की चांदनी तुम हो

दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें
किस ज़माने के आदमी तुम हो

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

प्रातः - स्मरण स्तोत्रम् / आदिशंकराचार्य विरचित

https://youtu.be/DpHdEZCFk28. 



प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुर्दात्मत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम्।
यत्स्वप्नजागरसुषुपतिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥

भोर में मुझे उस वास्तविकता की याद आती है जो आत्मा है, जो हृदय में चमक रही है, अस्तित्व-चेतना-खुशी, परमहंससंन्यासियों (संतों) का लक्ष्य, चौथा; जो स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति की अवस्थाओं को सदैव जानता है, वह ब्रह्म जो अंशहीन है, मैं तत्वों का समूह नहीं हूं।

प्रातर्भाजामि मनसा वाचसामगम्यं
वाचो विभान्ति निखिला यदनुगृहेन।
यन्नेतिनेतिवचनैर्निग्मा अवोचं_
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुग्रग्र्यम् ॥२॥

भोर में मैं उसकी स्तुति गाता हूं जो मन और वाणी से अप्राप्य है, लेकिन जिसकी कृपा से सभी शब्द चमकते हैं। जिसे शास्त्र 'यह नहीं', 'यह नहीं' शब्दों के माध्यम से घोषित करते हैं - वे कहते हैं कि देवताओं का भगवान अजन्मा और अपरिवर्तनीय है।


प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्णं
पूर्णं सनातनपदं उत्तमाख्यम्।
यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूरतौ
रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै ॥३॥

भोर में मैं उसे नमस्कार करता हूं जिसे सर्वोच्च आत्मा कहा जाता है जो अंधेरे से परे है, सूर्य के रंग का प्राचीन लक्ष्य है जो पूर्णांक है - वह, अवशिष्ट रूप (यानी संपूर्ण) जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड रस्सी में सांप की तरह प्रकट होता है।

फलश्रुति

श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम्।
प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥

यह पुण्यकारी श्लोकों का त्रिक, तीन शब्दों का आभूषण - जो भोर में पढ़ता है, वह परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

नवरत्नमालिका / आदि शंकराचार्य विरचित / स्वर : माधवी मधुकर झा

https://youtu.be/HLaVF2NZn0g  

हारनूपुरकिरीटकुण्डलविभूषितावयवशोभिनीं 
कारणेशवरमौलिकोटिपरिकल्प्यमानपदपीठिकाम् । 
काल काल फणिपाश बाण धनुर‌ङ्कुशाम् अरुण मेखलाम् 
फालभूतिलकलोचनां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥१॥


गन्धसारघनसारचारुनवनागवल्लिरसवासिनीं 
सान्ध्यरागमधुराधराभरणसुन्दराननशुचिस्मिताम् । 
मन्थरायतविलोचनाममलबालचन्द्रकृतशेखरीं 
इन्दिरारमणसोदरीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥२।।


स्मेरचारुमुखमण्डलां विमलगण्डलम्बिमणिमण्डलां 
हारदामपरिशोभमानकुचभारभीरुतनुमध्यमाम् । 
वीरगर्वहरनूपुरां विविधकारणेशवरपीठिकां 
मारवैरिसहचारिणीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥३॥


भूरिभारधरकुण्डलीन्द्रमणिबद्धभूवलयपीठिकां 
वारिराशिमणिमेखलावलयवह्निमण्डलशरीरिणीम् ।
वारिसारवहकुण्डलां गगनशेखरीं च परमात्मिकां 
चारुचन्द्ररविलोचनां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥४॥


कुण्डलत्रिविधकोणमण्डलविहारषड्दलसमुल्लस- 
त्पुण्डरीकमुखभेदिनीं तरुणचण्डभानुतडिदुज्ज्वलाम् । 
मण्डलेन्दुपरिवाहितामृततरङ्गिणीमरुणरूपिणीं 
मण्डलान्तमणिदीपिकां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥५॥


वारणाननमयूरवाहमुखदाहवारणपयोधरां 
चारणादिसुरसुन्दरीचिकुरशेखरीकृतपदाम्बुजाम् । 
कारणाधिपतिपञ्चकप्रकृतिकारणप्रथममातृकां 
वारणान्तमुखपारणां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥६॥


पद्मकान्तिपदपाणिपल्लवपयोधराननसरोरुहां 
पद्मरागमणिमेखलावलयनीविशोभितनितम्बिनीम् । 
पद्मसम्भवसदाशिवान्तमयपञ्चरत्नपदपीठिकां 
पद्मिनीं प्रणवरूपिणीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥७॥


आगमप्रणवपीठिकाममलवर्णमङ्गलशरीरिणीं 
आगमावयवशोभिनीमखिलवेदसारकृतशेखरीम् । 
मूलमन्त्रमुखमण्डलां मुदितनादबिन्दुनवयौवनां 
मातृकां त्रिपुरसुन्दरीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥८॥


कालिकातिमिरकुन्तलान्तघनभृङ्गमङ्गलविराजिनीं 
चूलिकाशिखरमालिकावलयमल्लिकासुरभिसौरभाम् । 
वालिकामधुरगण्डमण्डलमनोहराननसरोरुहां 
कालिकामखिलनायिकां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥९॥