जॊ जो जो जो जो साधुवंत जो जॊ जो जो जो भाग्यवंत जो जो जो जो गुणवंत जो जो जो जो लक्ष्मीकांत
भक्तवत्सल भवहरने जो जो तप्तिवास प्रिय कृष्णने जो जो मुक्ति दायक मुरहरने जो जो चित्तजनय्य परवस्तुवे जो जो करुणाकर करि वरदने जो जो सुरनर मुनि वंदितने जो जो गरुड वाहन नागधरने जो जो खर दूषण संहारने जो जो
This is a song set in the 'heroine-heroine' vein. In it, the heroine (Radha/Gopi) sends her friend (played by a parrot in the song) to convey her heart-melting love to Kannan (Krishna) . Below is a summary of the main meaning of the lyrics:
• Pallavi:
Meaning: "Tell Kannan, parrot, about this deep love I, a virgin, have for Kannan."
• Anupallavi:
Meaning: "Let him understand that I am losing my sleep and physical strength at the thought of him, and my mind is melting.
*कन्ननिदम् एदुत्तु* *रागम् : रागमालिका* *तालम्: आदि* *संगीतकार: अंबुजम् कृष्ण* *भाषा: तमिल* *गायन : सितारा कृष्ण कुमार (सिथु मनी)*
भगवान श्री राम के अवतार लेने का प्रयोजन पूर्ण होने पर, ब्रह्मा जी ने कहा आप जैसे चाहें वैसे विष्णु-लोक में आएँ। केवल योगमाया सीतादेवी आपको यथार्थ रूप को पहचानती हैं। ब्रह्मा जी की बात सुनकर वे सरयू नदी में प्रवेश कर, अपने वैष्णव तेज रूप में समा गए थे। उस समय अप्सराओं ने नृत्य किया , गंधर्वों ने गान किया, देवताओं ने पुष्पवर्षा की। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के उत्तर काण्ड के ११० वें सर्ग में इसका वर्णन है।
भारत भूषण जी ने एक कवि सम्मलेन में कहा था कि वे सरयू-तट पर बैठे थे, उन्हें रामायण का उपरोक्त प्रसंग याद आया। वे वहाँ दिव्य भावों में खो गये। कैसे राम को सीता का स्मरण ने विचलित किया होगा। विशाल राज्य,सारा सुख तुच्छ लगा होगा। सीता का बिछोह असहनीय हो गया होगा। कैसे जल में प्रवेश किया होगा। पानी पहले घुटनों तक, फिर नाभि से होता हुआ छाती तक आया होगा। राम कैसे सरयू में आगे बढे होंगे। माँ सीता और उनकी सखियों ने कैसे उनका स्वागत किया होगा। इस तरह उनकी यह कविता बन गयी।
आप यह कालजयी रचना पढ़ें, सुनें और महसूस करें। शब्द और स्वर, एक दिव्य अनुभूति दे जाते हैं।
राम की जल समाधि
पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से हारा-हारा रीता-रीता निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम निःशब्द अधर, पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता
किसलिए रहे अब ये शरीर ये अनाथ मन किसलिए रहे धरती को मैं किसलिए सहूँ धरती मुझको किसलिए सहे
तू कहाँ खो गई वैदेही वैदेही तू खो गई कहाँ मुरझे राजीव नयन बोले काँपी सरयू, सरयू काँपी
देवत्व हुआ लो पूर्णकाम नीली माटी निष्काम हुई इस स्नेहहीन देह के लिए अब साँस-साँस संग्राम हुई
ये राजमुकुट ये सिंहासन ये दिग्विजयी वैभव अपार ये प्रिया-हीन जीवन मेरा सामने नदी की अगम धार
माँग रे भिखारी-लोक माँग कुछ और माँग अंतिम बेला आदर्शों के जल-महल बना फिर राम मिले न मिले तुझको फिर ऐसी शाम ढले न ढले
ओ खंडित प्रणयबंध मेरे किस ठौर कहाँ तुझको जोड़ूँ कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य बोलूँ भी तो किससे बोलूँ सिमटे अब ये लीला सिमटे भीतर-भीतर गूँजा भर था छप से पानी में पॉंव पड़ा चरणों से लिपट गई सरयू
फिर लहरों पर वाटिका खिली रतिमुख सखियाँ नतमुख सीता सम्मोहित मेघबरन बरसे पानी घुटनों-घुटनों आया आया घुटनों-घुटनों पानी
फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा लहरों-लहरों धारा-धारा व्याकुलता फिर पारा-पारा
फिर एक हिरन -सी किरण देह दौड़ती चली आगे-आगे नयनों में जैसे बाण सधा दो पाँव उड़े जल में आगे
पानी लो नाभि-नाभि आया आया लो नाभि-नाभि पानी जल में तम, तम में जल बहता ठहरो बस, और नहीं, कहता जल में कोई जीवित दहता
फिर एक तपस्विनी शांत-सौम्य धक्-धक् लपटों -सी निर्विकार सशरीर सत्य-सी सन्मुख थी
उन्माद नीर चीरने लगा पानी छाती-छाती आया आया छाती-छाती पानी
भीतर लहरें, बाहर लहरें आगे जल था, पीछे जल था केवल जल था, वक्ष स्थल था वक्ष-स्थल तक केवल जल था
जल पर तिरता था नीलकमल बिखरा -बिखरा-सा नीलकमल कुछ और-और-सा नीलकमल
फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर धरती से नभ तक जगर-मगर दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे जैसे सूरज के हस्ताक्षर
बाँहों के चन्दन घेरे से दीपित जयमाल उठी ऊपर सर्वस्व सौंपता शीश झुका लो शून्य राम, लो राम लहर
फिर लहर-लहर लहरें-लहरें सरयू-सरयू सरयू-सरयू लहरें -लहरें लहरें-लहरें केवल तम ही तम तम ही तम
जल ही जल जल ही जल केवल हे राम-राम हे राम-राम हे राम-राम हे राम-राम
मैं पीर-ए-मुग़ाँ के दैर (मय-ख़ाने) से शराब पिए बिना ही ब-हालत-ए-मस्ती आ रहा हूँ, मैं ‘ला’ (कोई नहीं) की मंज़िल में ‘इल्ला’ (इस के सिवाय) की शराब से मस्त रहा।
यह काम समझदार लोगों का नहीं है, तुम तो हज़रत मूसा के दामन को पकड़ लो, साहिल पर मस्त रहने वाले सौ आदमी भी समुंदर में डूबकर मस्त होने वाले एक व्यक्ति के बराबर नहीं होते।
मैं अपने दिल को चमन में ले गया, वह खिलने के बजाए उल्टा बाग़ की हवा से अफ़्सुर्दा हो गया, सहरा में मस्त रहने वाला यह लाला (मेरा दिल) फुलवारियों में मुरझा के रह जाता है।
अज़ हर्फ़-ए-दिल आवेज़िश असरार-ए-हरम पैदा दी काफ़िरके दीदम दर वादी-ए-बतहा मस्त
उसकी दिल-आवेज़ आवाज़ से हरम के असरार ज़ाहिर हो रहे थे, कल मैं ने बतहा की वादी में एक काफ़िर को बे-ख़ुदी के आलम में ये कहते हुए देखा:
सीनास्त कि फ़ारान अस्त या-रब चे मक़ाम अस्त ईं हर ज़र्रः-ए-ख़ाक-ए-मन चश्मेस्त तमाशा मस्त
यह वादी-ए-सीना है या फ़ारान की वादी, या रब यह कौन सी जगह है, कि मेरी ख़ाक-ए-बदन का हर ज़र्रा आँख बन कर मस्त-ए-तमाशा है।
हे अन्नपूर्णा देवी, विशालाक्षी - विशाल नेत्रों वाली, कृपया मेरी रक्षा करें। आप संसार में घटित होने वाली सभी घटनाओं की साक्षी हैं ("अखिलभुवनसाक्षी")। कृपया मुझे अपनी दृष्टि से अनुग्रहित करें ("कटाक्षी")। वह प्रसिद्ध ("उन्नत") गर्त्ततिरा-कुझिक्कराई ("गर्त-तिरा-विहारिणी") में निवास करती हैं। वह ओंकार ("ओंकारिणी") के रूप में हैं। वह दुखों ("दुरितादि") को दूर करती हैं ("निवारिणी")। वह भगवान शिव की संगिनी ("रजनी") हैं, जो स्वयं को सर्पों ("पन्नग") से सुशोभित करते हैं ("आभरण")। वह प्राचीन ("पुरानी") हैं। वह भगवान परमेश्वर ("विश्वेश्वर") की ज्योति ("भास्वरी") हैं। वह एक हाथ में रत्नजड़ित पात्र (मणिक्य पात्र) मीठे चावल-पायसन से भरा हुआ (पुरिता) और दूसरे हाथ में सोने का चम्मच (दर्वी) धारण किए हुए हैं। वह कामदेव और अन्य लोगों की रक्षा करने में निपुण हैं। वह अलंकृत सोने के आभूषणों और सुनहरे रेशम से सुशोभित हैं। ब्रह्मा और तुम्बुरु एवं नारद जैसे प्रख्यात ऋषियों द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वह धर्म-अर्थ-काम से परे मोक्ष प्रदान करने में कुशल हैं।वह गुरुगुहा ("त्रिपदा सोभिता") ("गुरुगुहा-सदारे") की प्रिय मां हैं।