शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

हनुमद्भुजंग स्तोत्रम्.../

https://youtu.be/RsdiYVHWr4Y  


प्रसन्नांगरागं प्रभाकांचनांगं
जगद्भीतशौर्यं तुषाराद्रिधैर्यम् ।
तृणीभूतहेतिं रणोद्यद्विभूतिं
भजे वायुपुत्रं पवित्राप्तमित्रम् ॥ १ ॥

भजे पावनं भावना नित्यवासं
भजे बालभानु प्रभा चारुभासम् ।
भजे चंद्रिका कुंद मंदार हासं
भजे संततं रामभूपाल दासम् ॥ २ ॥

भजे लक्ष्मणप्राणरक्षातिदक्षं
भजे तोषितानेक गीर्वाणपक्षम् ।
भजे घोर संग्राम सीमाहताक्षं
भजे रामनामाति संप्राप्तरक्षम् ॥ ३ ॥

कृताभीलनाधक्षितक्षिप्तपादं
घनक्रांत भृंगं कटिस्थोरु जंघम् ।
वियद्व्याप्तकेशं भुजाश्लेषिताश्मं
जयश्री समेतं भजे रामदूतम् ॥ ४ ॥

चलद्वालघातं भ्रमच्चक्रवालं
कठोराट्टहासं प्रभिन्नाब्जजांडम् ।
महासिंहनादा द्विशीर्णत्रिलोकं
भजे चांजनेयं प्रभुं वज्रकायम् ॥ ५ ॥

रणे भीषणे मेघनादे सनादे
सरोषे समारोपणामित्र मुख्ये ।
खगानां घनानां सुराणां च मार्गे
नटंतं समंतं हनूमंतमीडे ॥ ६ ॥

घनद्रत्न जंभारि दंभोलि भारं
घनद्दंत निर्धूत कालोग्रदंतम् ।
पदाघात भीताब्धि भूतादिवासं
रणक्षोणिदक्षं भजे पिंगलाक्षम् ॥ ७ ॥

महाग्राहपीडां महोत्पातपीडां
महारोगपीडां महातीव्रपीडाम् ।
हरत्यस्तु ते पादपद्मानुरक्तो
नमस्ते कपिश्रेष्ठ रामप्रियाय ॥ ८ ॥

जराभारतो भूरि पीडां शरीरे
निराधारणारूढ गाढ प्रतापी ।
भवत्पादभक्तिं भवद्भक्तिरक्तिं
कुरु श्रीहनूमत्प्रभो मे दयालो ॥ ९ ॥

महायोगिनो ब्रह्मरुद्रादयो वा
न जानंति तत्त्वं निजं राघवस्य ।
कथं ज्ञायते मादृशे नित्यमेव
प्रसीद प्रभो वानरेंद्रो नमस्ते ॥ १० ॥

नमस्ते महासत्त्ववाहाय तुभ्यं
नमस्ते महावज्रदेहाय तुभ्यम् ।
नमस्ते परीभूत सूर्याय तुभ्यं
नमस्ते कृतामर्त्य कार्याय तुभ्यम् ॥ ११ ॥

नमस्ते सदा ब्रह्मचर्याय तुभ्यं
नमस्ते सदा वायुपुत्राय तुभ्यम् ।
नमस्ते सदा पिंगलाक्षाय तुभ्यं
नमस्ते सदा रामभक्ताय तुभ्यम् ॥ १२ ॥

हनूमद्भुजंगप्रयातं प्रभाते
प्रदोषेऽपि वा चार्धरात्रेऽपि मर्त्यः ।
पठन्नश्नतोऽपि प्रमुक्तोघजालो
सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रयाति ॥ १३ ॥

इति श्रीमदांजनेय भुजंगप्रयात स्तोत्रम् ।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

देवन के पति इन्द्र तारा के पति चन्द्र.../ महाराज स्वाति तिरुनाल कृति / भाषा : अवधी / गायन : श्रीवाल्सन जे. मेनन

https://youtu.be/QMHUq_Sp3DA  


पल्लवी

देवन के पति इन्द्र तारा के पति चन्द्र 
विद्या के पति गणेश दुःख भार हारी

चरणम्  १

रागपति कन्नड़ भजन के पति वीणा
ऋतुपति है वसंत रतिपति सुखकारी

चरणम्  २

मुनिजन पति व्यास पक्षीपति हंस 
नरपति राम अवधविहारी

चरणम्  ३

गिरिपति हिमाचल भूतों के पति महेश्वर 
तीन लोक पति श्री पद्मनाभ गिरिधारी

बुधवार, 15 जुलाई 2026

श्री राधिका आज आनन्द में डोले.../ रचना : संत श्रीभट्ट देवाचार्य जी महाराज / गायन : आनन्द भैय्या जी, वृन्दावन

https://youtu.be/XFW3Tdjj29U  


(दोहा)
सांवर ससि संग लसि प्रिया, भरी सरस रस छंद।
डोलत हैं श्री राधिका, अति ही आज आनंद।।

राधिका आज आनन्द में डोले॥
सांवर चंद गोविन्द के रस भरी दूसरी कोकिला मधुर स्वर बोले।।


पहर तन नील पट कनक हारावली हाथ ले आरसी रूप को तोले॥


कहत श्रीभट्ट व्रजनारिन नागर बनी कृष्ण के शील की ग्रन्थिका खोले॥

नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं.../ रचना : डाॅ रूरू कुमार महापात्रा / गायन : अभिलिप्सा पंडा

https://youtu.be/8NagbHO9LvY  


नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
गृणामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

आनन्दकन्दं सुचन्दस्यान्दं
पूर्णारविन्दं सदैव वन्द्यम्
आनन्दकन्दं सुचन्दस्यान्दं
पूर्णारविन्दं सदैव वन्द्यम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
मुखारविन्दं पदारविन्दं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

अशेषतोषं सुहासवासं
मधुप्रकाशं विषविनाशम्
अशेषतोषं सुहासवासं
मधुप्रकाशं विषविनाशम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
श्रीशं सुरेशं जगत्-ईशमीशं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

सदावसन्तं हृदयहसन्तं
श्रीयालसन्तं शुभं स्मरन्तम्
सदावसन्तं हृदयहसन्तं
श्रीयालसन्तं शुभं स्मरन्तम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
संसारसारं करुणावतारं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

मनोभिरामं निकामकामं
स्वयंप्रमाणं पूर्णपुराणम्
मनोभिरामं निकामकामं
स्वयंप्रमाणं पूर्णपुराणम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नारायणं च प्रणोमि नोमि
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

सोमवार, 13 जुलाई 2026

अता मुझे ये नेमत कर दे या अल्लाह.../ अरुण मिश्र

स्वर्गीय क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल 
'दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह...' 
की तर्ज पर, संगीतकार श्री केवल कुमार जी 
के अनुरोध पर कहे गए कुछ शेर' :

-अरुण मिश्र 

अता मुझे ये नेमत कर दे या अल्लाह 
रहमत की एक नज़र तो कर दे या अल्लाह 

मत दे मुझको माल-ओ-ज़र मत दे
अपने दर का चाकर कर दे या अल्लाह 

किसी दुखी के दुःख को थोड़ा बाँट सकूँ
इतने भर का लायक कर दे या अल्लाह 

नूर से तेरे है ये सारा जग जग-मग
मेरा दिल भी रोशन कर दे या अल्लाह 

भले छीन ले मुझसे मेरी हर दौलत 
पर अपना दीवाना कर दे या अल्लाह

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

वातापि गणपतिं भजेऽहं.../ सन्त मुथुस्वामी दीक्षितर् कृति / भाषा : संस्कृत / गायन : सूर्य गायत्री

https://youtu.be/XDcPvMFmtE8  

वातापि गणपतिं भजेऽहं
वारणाश्यं वरप्रदं श्री ।

भूतादि संसेवित चरणं
भूत भौतिक प्रपंच भरणम् ।
वीतरागिणं विनुत योगिनं
विश्वकारणं विघ्नवारणम् ।

पुरा कुंभ संभव मुनिवर
प्रपूजितं त्रिकोण मध्यगतं
मुरारि प्रमुखाद्युपासितं
मूलाधार क्षेत्रस्थितम् ।

परादि चत्वारि वागात्मकं
प्रणव स्वरूप वक्रतुंडं
निरंतरं निखिल चंद्रखंडं
निजवामकर विद्रुतेक्षुखंडम् ।

करांबुज पाश बीजापूरं
कलुषविदूरं भूताकारं
हरादि गुरुगुह तोषित बिंबं
हंसध्वनि भूषित हेरंबम् ।

"वातापि गणपतिं भजेहं" कर्नाटक संगीत की सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध स्तुतियों में से एक है।
 इसे महान संगीतकार मुथुस्वामी दीक्षितर ने संस्कृत भाषा और हंसध्वनि राग में रचा था।
इस स्तुति में भगवान गणेश (वातापी गणपति) की स्तुति की जाती है।

गीत का मुख्य भाव और अर्थ :

'वातापी' उस स्थान का नाम है जहाँ के यह गणपति हैं (वर्तमान में कर्नाटक का बदामी)।

इस कीर्तन की शुरुआती पंक्तियाँ हैं : 

वातापि गणपतिं भजेऽहं वारणाश्यं वरप्रदं श्री।
भूतादि संसेवित चरणं भूत भौतिक प्रपञ्च भरणं।

इसका अर्थ है: "मैं वातापी (बदामी) में स्थित भगवान गणपति की पूजा (भजन) करता हूँ, जो हाथी के मुख वाले (वारणाश्य) और वरदान देने वाले (वरप्रद) हैं। जिनके चरणों की सेवा भूत-प्रेत आदि करते हैं और जो सम्पूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं।

गुडिय नोडिरण्णा देहद.../ भाषा : कन्नड़ / रचना : सन्त शिशुनाल शरीफ / स्वर : कुमारी अनन्या भट कडाटोका एवं कुमारी सहाना हेगडे होन्नावर

https://youtu.be/6LB-uhHoCAk  


गुडिय नोडिरण्णा देहद
गुडिय नोडिरण्णा
गुडिय नोडिरदु
पॊडविगॆ ऒडॆयनु
अडगिकॊंडु कडुबॆडगिनॊळिरुतिह ।।

मूरु मूलिय कल्लु अदनु
एरि कूतु डॊळ्ळु,
धीर निर्गुणन सार सगुणदलि
तोरि अडगि ता ब्यारागिरुतिह ।।

आरु मूरु कट्टि मेलकॆ
एरिदवनॆ घट्टि,
भेरि कहळि शंख भारिसुनाददि
मीरिदानंद तोरि हॊळॆयुतिह ।।

सागुतिहवु दिवस सेविसि
तेगि हॊळिगि पायस,
योगिराज शिशुनाळधीश तानागि
परत्पर ब्रह्मरूपनिह गुडिय नोडिरण्णा ।।

गीत का हिन्दी में अर्थ

इस गीत का मूल भाव यह है कि हमें भौतिक शरीर को केवल मांस-मज्जा का ढांचा नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे ईश्वर का मंदिर मानना चाहिए
इसका विस्तृत अर्थ निम्नलिखित है :  

• शरीर ही मंदिर है : कवि कहते हैं कि इस नश्वर भौतिक शरीर को देखो。 यह कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमात्मा का निवास स्थान—एक जीवंत मंदिर (देहद गुडी) है।

• अहंकार और ज्ञान : गीत में शरीर के भीतर छिपी ईश्वरीय चेतना को देखने का आह्वान किया गयान है。आंतरिक ऊर्जा (योग और प्राणायाम के माध्यम से) को जागृत करने की बात कही गई है। 

• परब्रह्म का वास : संत शिशुनाल शरीफ बताते हैं कि हमारे भीतर ही वह परब्रह्म (सर्वोच्च शक्ति) विद्यमान है。जब साधक अपने अंतर्मन में झांकता है, तब उसे इस बात का ज्ञान होता है कि यह शरीर ही ईश्वर का मंदिर है और आत्मा ही परमात्मा का रूप है।