पद्मिनि : जो कमल के समान कोमल और सुंदर हैं (या जो कमल धारण करती हैं)।
पद्महस्ते : जिनके हाथों में कमल का पुष्प सुशोभित है।
पद्मालये : जिनका निवास स्थान कमल का फूल है।
पद्मदलायताक्षि : जिनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों के समान विशाल और सुंदर हैं।
विश्वप्रिये : जो समस्त संसार को प्रिय हैं (पूरे विश्व की चहेती हैं)।
विष्णुमनोऽनुकूले : जो भगवान श्री विष्णु के मन के अनुकूल चलने वाली उनकी प्रिय भार्या हैं।
त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व : हे देवी! आप अपने उन दिव्य चरण-कमलों को मेरे हृदय और मेरे गृह में स्थापित करें (मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें)।
सरल अर्थ
हे कमल को प्रेम करने वाली, कमल के समान सुंदर, हाथों में कमल धारण करने वाली, कमल में निवास करने वाली और कमल की पंखुड़ियों जैसे विशाल नेत्रों वाली माता महालक्ष्मी! आप पूरे संसार की प्रिय हैं और भगवान विष्णु के मन को आनंद देने वाली हैं। हे माँ, आप अपने पावन चरण-कमलों को सदैव के लिए मेरे हृदय और मेरे घर में स्थापित कर दीजिए।
काजल आँजूं पायल बांधूं दृग में झांकूं दर्पण तोडूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
आशायें अलख जगाती हैं बीमार कल्पना के द्वारे अधरों ने बंद किवाड़ किए नैना जीते, बिना हारे कोलाहल के बाजारों में वंदन के छंद बिके सारे ननदी जैसी नटखट संथ्या भर-भर सिंदूर ताने मारे तुम मेरा सम्बोधन वर लो मैं टूटा चन्दन तन जोड़ूं।। तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
कलियां चटकें, डाली लचके माली विहंसे, भौंरे झूमे भौरों के पंख पराग पगे माली कलियां तोड़े चूमे एक रसिक और एक व्यापारी एक लूटे एक बेचे रितु में सम्मान सहित मुरझा जाती मैं खिलती अगर किसी वन में तुम पवन बनो मुझको छू दो मैं जूठी पंखुरियां तोड़ूं ।। तुम एक बार प्रिय आ जाओ...