बुधवार, 12 अगस्त 2026

श्रीविनायकाष्टकम्.../ श्रीनारायणगुरुविरचितं / गायन : सितारा कृष्ण कुमार एवं मिथुन

https://youtu.be/a8qr-tVdY8o  


नमद्देववृन्दं लसद्वेदकन्दं
शिरःश्रीमदिन्दुं श्रितश्रीमुकुन्दम् ।
बृहच्चारुतुन्दं स्तुतश्रीसनन्दं
जटाहीन्द्रकुन्दं भजेऽभीष्टसन्दम् ॥ १॥

किलद्देवगोत्रं कनद्धेमगात्रं
सदानन्दमात्रं महाभक्तमित्रम् ।
शरच्चन्द्रवक्त्रं त्रयीपूतपात्रं।
समस्तार्त्तिदात्रं भजे शक्तिपुत्रम् ॥ २॥

गलद्दानमालं चलद्भोगिमालं
गलाम्भोदकालं सदा दानशीलम् ।
सुरारातिकालं महेशात्मबालं
लसत्पुण्ड्रभालं भजे लोकमूलम् ॥ ३॥

उरस्तारहारं शरच्चन्द्रहीरं
सुरश्रीविचारं हृतार्त्तारिभारम् ।
कटे दानपूरं जटाभोगिपूरं
कलाबिन्दुतारं भजे शैववीरम् ॥ ४॥

करारूढमोक्षं विपद्भङ्गदक्षं
चलत्सारसाक्षं पराशक्तिपक्षम् ।
श्रितामर्त्यवृक्षं सुरारिद्रुतक्षं
परानन्दपक्षं भजे श्रीशिवाक्षम् ॥ ५॥

सदाशं सुरेशं सदा पातुमीशं
निदानोद्भवं शाङ्करप्रेमकोशम् ।
धृतश्रीनिशेशं लसद्दन्तकोशं
चलच्छूलपाशं भजे कृत्तपाशम् ॥ ६॥

ततानेकसन्तं सदा दानवन्तं
बुधश्रीकरन्तं गजास्यं विभान्तम् ।
करात्मीयदन्तं त्रिलोककैकवृन्तं
सुमन्दं परन्तं भजेऽहं भवन्तम् ॥ ७॥

शिवप्रेमपिण्डं परं स्वर्णवर्णं
लसद्दन्तखण्डं सदानन्दपूर्णम् ।
विवर्णप्रभास्यं धृतस्वर्णभाण्डं
चलच्चारुशुण्डं भजे दन्तितुण्डम् ॥ ८॥

इति श्रीनारायणगुरुविरचितं श्रीविनायकाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

अर्थ

नमद्देववृन्दं लसद्वेदकन्दं शिरःश्रीमदिन्दुं श्रितश्रीमुकुन्दम् ।
बृहच्चारुतुन्दं स्तुतश्रीसनन्दं जटाहीन्द्रकुन्दं भजेऽभीष्टसन्दम् ॥

अर्थ:जिन्हें देवताओं का संपूर्ण समूह निरंतर नमन करता है, जो सभी वेदों के प्रकाशमान मूल (जड़) हैं, जिनके मस्तक पर अत्यंत सुंदर चंद्रमा सुशोभित है, जो भगवान श्रीविष्णु(मुकुंद) के परम आश्रय हैं। जिनका उदर (पेट) अत्यंत विशाल और मनोहर है, जिनकी स्तुति महर्षि सनंद करते हैं, जिनकी जटाओं में सर्पों के राजा (शेषनाग) चमेली (कुंद) के पुष्प के समान लिपटे हुए हैं, उन सभी अभीष्ट (मनोवांछित) फलों को देने वाले भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक २

किलद्देवगोत्रं कनद्धेमगात्रं सदानन्दमात्रं महाभक्तमित्रम् ।
शरच्चन्द्रवक्त्रं त्रयीपूतपात्रं समस्तार्त्तिदात्रं भजे शक्तिपुत्रम् ॥

अर्थ:जो देवताओं के कुल (वंश) कीरक्षाकरने वाले और उनका पालन करने वाले हैं, जिनका शरीर चमकते हुए शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जो सदैव आनंद स्वरूप हैं और अपने महान भक्तों के परम मित्र हैं। जिनका मुख शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान अत्यंत सौम्य है, जो तीनों वेदों (त्रयी) के पवित्र पात्र हैं, और जो अपने भक्तों की समस्त दुखों एवं पीड़ाओं का नाश करने वाले हैं, उनमाता पार्वती(शक्ति) के पुत्र भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ३

गलद्दानमालं चलद्भोगिमालं गलाम्भोदकालं सदा दानशीलम् ।
सुरारातिकालं महेशात्मबालं लसत्पुण्ड्रभालं भजे लोकमूलम् ॥

अर्थ:जिनके गंडस्थल (कनपटी) से निरंतर मदजल की धारा बहती रहती है, जिनके गले में चंचल सर्पों की माला सुशोभित है, जिनका कंठ जल से भरे हुए काले बादल के समान सुंदर है, और जो सदैव दान देने के स्वभाव वाले हैं। जो देवताओं के शत्रुओं (असुरों) के लिए साक्षात् काल (मृत्यु) हैं, जो भगवानशिव(महेश) के आत्मज (पुत्र) हैं, जिनके भाल (मस्तक) पर सुंदर तिलक दमक रहा है, उन संपूर्ण लोकों के मूल कारण भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ४

उरस्तारहारं शरच्चन्द्रहीरं सुरश्रीविचारं हृतार्त्तारिभारम् ।
कटे दानपूरं जटाभोगिपूरं कलाबिन्दुतारं भजे शैववीरम् ॥

अर्थ:जिनके वक्षस्थल (छाती) पर तारों और शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान चमकते हुए अत्यंत सुंदर हीरों का हार सुशोभित है, जो देवताओं कीसमृद्धिऔर जगत के कल्याण का विचार करते हैं, और जो दुखों तथा शत्रुओं के भारी बोझ को हरने वाले हैं। जिनके गंडस्थलों से मदजल की धारा बहती है, जिनकी जटाओं में सर्प भरे हुए हैं, जो कला, बिन्दु और ॐकार (तार) के साक्षात् स्वरूप हैं, उन भगवान शिव के परम वीर पुत्र विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ५

करारूढमोक्षं विपद्भङ्गदक्षं चलत्सारसाक्षं पराशक्तिपक्षम् ।
श्रितामर्त्यवृक्षं सुरारिद्रुतक्षं परानन्दपक्षं भजे श्रीशिवाक्षम् ॥

अर्थ:जिनके हाथों में मोक्ष अत्यंत सुलभता से रखा हुआ है, जो बड़ी से बड़ी विपत्तियों (संकटों) को नष्ट करने में अत्यंत कुशल (दक्ष) हैं, जिनके नेत्र कमल के समान चंचल और सुंदर हैं, जो पराशक्ति (माता जगदंबा) के सदैव पक्ष में रहते हैं। जो अपने आश्रित भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान फल देने वाले हैं, जो देवताओं के शत्रुओं को बहुत शीघ्र नष्ट कर देते हैं, जो परमानंद के पक्षधर हैं और जो भगवान शिव की आँखों के तारे (अत्यंत प्रिय) हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ६

सदाशं सुरेशं सदा पातुमीशं निदानोद्भवं शाङ्करप्रेमकोशम् ।
धृतश्रीनिशेशं लसद्दन्तकोशं चलच्छूलपाशं भजे कृत्तपाशम् ॥
अर्थ:जो सभी की आशाओं को पूर्ण करने वाले हैं, देवताओं के स्वामी (सुरेश) हैं, जो सदैव सबकीरक्षाकरने में समर्थ ईश्वर हैं, जो सभी कारणों के मूल उद्भव हैं, और जो भगवान शंकर के विशुद्ध प्रेम के खजाने (कोश) हैं। जिन्होंने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया हुआ है, जिनके दाँत (गजदंत) अत्यंत सुशोभित हैं, जिनके हाथों में त्रिशूल और पाश लहरा रहे हैं, तथा जो मोह और अज्ञान रूपी बंधनों (पाश) को काट देते हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ७

ततानेकसन्तं सदा दानवन्तं बुधश्रीकरन्तं गजास्यं विभान्तम् ।
करात्मीयदन्तं त्रिलोककैकवृन्तं सुमन्दं परन्तं भजेऽहं भवन्तम् ॥

अर्थ:जो अनेक संतों और सज्जनों के रक्षक हैं, जो सदैव दान देने में अग्रणी हैं, जो बुद्धिमानों को समृद्धि (श्री) और ज्ञान प्रदान करते हैं, जिनका हाथी (गज) के समान मुख अत्यंत शोभायमान है। जिन्होंने अपने हाथ में अपना ही टूटा हुआ दाँत (एकदंत) धारण किया है, जो इन तीनों लोकों के एकमात्र आधार (वृंत) हैं, जो स्वभाव से अत्यंत सौम्य (सुमन्द) हैं और जो परम सत्ता (परन्त) हैं, उन आप भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ८

शिवप्रेमपिण्डं परं स्वर्णवर्णं लसद्दन्तखण्डं सदानन्दपूर्णम् ।
विवर्णप्रभास्यं धृतस्वर्णभाण्डं चलच्चारुशुण्डं भजे दन्तितुण्डम् ॥

अर्थ:जो भगवान शिव और माता पार्वती के अथाह प्रेम के साक्षात् स्वरूप (पिण्ड) हैं, जिनका वर्ण (रंग) शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जिनका टूटा हुआ दाँत दमक रहा है, और जो सदैव आनंद से परिपूर्ण रहते हैं। जिनका मुख अद्भुत प्रभा (कांति) से चमक रहा है, जिन्होंने अपने हाथ में स्वर्ण का कलश (मोदक का पात्र) धारण किया हुआ है, और जिनकी अत्यंत सुंदर सूंड हिल रही है, उन गजमुख भगवान विनायक को मैं निरंतर भजता हूँ।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे.../ शायर : कलीम चाँदपुरी / गायन : ग़ुलाम अली

https://youtu.be/AvZRXU4eSmk  


मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे
ये ज़हर मेरे लहू में उतर गया कैसे

कुछ उसके दिल में लगावट ज़रूर थी वरना
वो मेरा हाथ दबाकर गुज़र गया कैसे

ज़रूर उसकी  तवज्जो की रहबरी होगी
नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे

जिसे भुलाये कई साल हो गये 'कलीम'
मैं आज उसकी गली से गुज़र गया कैसे

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा.../ शायर : अहमद नदीम क़ासमी / गायन : गुलाम अली

https://youtu.be/jNj-QE4Zb7c  


कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा

अब तिरे शहर में आऊँगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊँगा

तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वर्ना सोचा था कि जब चाहूँगा मर जाऊँगा

ज़िंदगी शम्अ' की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुब्ह तो कर जाऊँगा

रविवार, 9 अगस्त 2026

जोई-जोई प्यारौ करै, सोई मोहि भावै.../ श्री हित चौरासी – पद १

https://youtu.be/4khE2AKeAGI  

*प्रस्तुत है श्री हित चौरासी का प्रथम पद — "जोई-जोई प्यारौ करै"। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की दिव्य रसपूर्ण वाणी का मंगलाचरण स्वरूप प्रथम पद है। इस पद में श्रीजी और प्रियतम के मधुर, निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। भक्त और भगवान के मध्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का यह पद श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय की माधुर्य-रस परम्परा का अनुपम रत्न है।*

*इस पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु बताते हैं कि जो कुछ प्रियतम को प्रिय है वही भक्त को भी प्रिय है। भक्त का मन, प्राण, प्रेम और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल युगल सरकार में समर्पित हो जाता है। "मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय" तथा "अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे" जैसी पंक्तियाँ दिव्य प्रेम की चरम अवस्था का दर्शन कराती हैं। अंतिम चरण में श्री राधा-कृष्ण की साँवल-गौर युगल छवि को जल की तरंगों से भी अधिक अभिन्न बताया गया है।*

*श्री हित चौरासी – पद १*

जोई-जोई प्यारौ करै,
सोई मोहि भावै॥

भावै मोहि जोई,
सोई-सोई करैं प्यारे॥

मोकों तौ भावती ठौर,
प्यारे के नैंनन में॥

प्यारौ भयौ चाहै,
मेरे नैंनन के तारे॥

मेरे तन मन प्राण हूँ ते,
प्रीतम प्रिय॥

अपने कोटिक प्राण,
प्रीतम मोसों हारे॥

जै श्री हित हरिवंश,
हंस-हंसिनी साँवल-गौर॥

कहौ कौन करै,
जल-तरंगनि न्यारे॥

शनिवार, 8 अगस्त 2026

डिमिक-डिमिक डमरू कर बाजे.../ स्वर : पण्डित छन्नूलाल मिश्र

https://youtu.be/fd6AGwXSmMY 


ऊँ नम: पार्वतीपतये हर-हर महादेव !


नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्त्तुकामो सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥
 
अर्थ : नृत्य (ताण्डव) की समाप्ति पर नटराज भगवान शिव ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की पूर्ति के लिए चौदह (नौ + पाँच) बार डमरू बजाया। इस प्रकार इन चौदह शिवसूत्रों का यह जाल (वर्णमाला) प्रकट हुआ। 


डिमिक-डिमिक डमरू कर बाजे...
स्वर : पण्डित छन्नूलाल मिश्र


डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥


सिंघी नाद बजावत गावत,
सिंघी नाद बजावत गावत,
लटक रही बगली झोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥


नाग फणन सो करत आरती,
नाग फणन सो करत आरती,
देव देव गति अनमोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥



भालचंद्र सिर गंगा लहरे,
भालचंद्र सिर गंगा लहरे,
हाथ लिए भंग की गोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥



डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे बुंदिया बरसन लागे ना.../ मैथिल कजरी लोक गीत

https://youtu.be/JevTe_AhECM  

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..
बुंदिया बरसन लागी न....!!

दादुर-मोर-पपीहा गाबय, 
जिया उमताबे न.... !
हाय हो रामा.! जिया उमताबे न..!!

विरह के आगि कुहुकी कुहुकाबय 
बैरी कोयलिया ना...!

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..!

पिऊ के पाती लिखल हम कत-विधि, 
तैय्यो न पिघलथि ना..!
हाय हो रामा..! तैय्यो न पिघलथि ना..!!

कंत हमर हियहंत भेल छथि, 
दरदो न जाने ना..!

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..!

बुधवार, 5 अगस्त 2026

शिव हो उतरब पार कवन विधि.../ रचना : महाकवि विद्यापति / गायन : चन्दन तिवारी

https://youtu.be/0U48LrrBLzE 


सिव हो उतरब पार कओन बिधि।

लोढब कुसुम तोरब बेल पात।
पुजब सदासिब गौरिक सात॥

बसहा चढ़ल सिव फिरहूँ मसान।
भँगिया जरठ दरदो नहिं जान॥

जप-तप नहिं कैलहुँ नित दान।
बित गेला तिन पन करईत आन॥

भन विद्यापति सुन हे महेस।
निरधन जानि के हरहु कलेस॥

अर्थ

हे शिव। मैं भवसागर से किस प्रकार पार उतर सकूँगा। मैं पुष्प चुनूँगा, बेल-पत्र और नैवेद्यों के द्वारा सनातन शिव की, उनकी अभिन्न शक्तिरूपा पार्वती के साथ पूजा करूँगा। हे शिव! आप बैल पर आरूढ़ होकर श्मशान भूमि में घूमते फिरते हो; आप भंग के नशे में उन्मत्त रहते हैं, इसलिए मुझ आराधक की पीड़ा तक से अनवगत हैं। हे प्रभो! मैंने अपने जीवन में न तो तुम्हारे नाम का ही स्मरण किया है और न ही कठिन तप ही किया है। इसके अतिरिक्त न ही मैंने दूसरों की हित-साधना के लिए अपनी किंचित-मात्र भी सुख-सुविधा की अर्पणा की है अर्थात् मुझसे प्रतिदिन का दान भी देते नहीं बन पड़ा है। मेरे जीवन की तीनों अवस्थाएँ-बालापन, यौवन तथा वृद्धपन इस जप-तप-दान की पुण्य-त्रयी के बिना ही व्यतीत हुआ है। विद्यापति कहते हैं कि हे महेश! मेरी प्रार्थना सुनिए। आप मुझे नितांत अकिंचन जान कर ही मेरे क्लेशों का हरण कीजिए।