अर्थ:जिन्हें देवताओं का संपूर्ण समूह निरंतर नमन करता है, जो सभी वेदों के प्रकाशमान मूल (जड़) हैं, जिनके मस्तक पर अत्यंत सुंदर चंद्रमा सुशोभित है, जो भगवान श्रीविष्णु(मुकुंद) के परम आश्रय हैं। जिनका उदर (पेट) अत्यंत विशाल और मनोहर है, जिनकी स्तुति महर्षि सनंद करते हैं, जिनकी जटाओं में सर्पों के राजा (शेषनाग) चमेली (कुंद) के पुष्प के समान लिपटे हुए हैं, उन सभी अभीष्ट (मनोवांछित) फलों को देने वाले भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।
अर्थ:जो देवताओं के कुल (वंश) कीरक्षाकरने वाले और उनका पालन करने वाले हैं, जिनका शरीर चमकते हुए शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जो सदैव आनंद स्वरूप हैं और अपने महान भक्तों के परम मित्र हैं। जिनका मुख शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान अत्यंत सौम्य है, जो तीनों वेदों (त्रयी) के पवित्र पात्र हैं, और जो अपने भक्तों की समस्त दुखों एवं पीड़ाओं का नाश करने वाले हैं, उनमाता पार्वती(शक्ति) के पुत्र भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।
अर्थ:जिनके गंडस्थल (कनपटी) से निरंतर मदजल की धारा बहती रहती है, जिनके गले में चंचल सर्पों की माला सुशोभित है, जिनका कंठ जल से भरे हुए काले बादल के समान सुंदर है, और जो सदैव दान देने के स्वभाव वाले हैं। जो देवताओं के शत्रुओं (असुरों) के लिए साक्षात् काल (मृत्यु) हैं, जो भगवानशिव(महेश) के आत्मज (पुत्र) हैं, जिनके भाल (मस्तक) पर सुंदर तिलक दमक रहा है, उन संपूर्ण लोकों के मूल कारण भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।
अर्थ:जिनके वक्षस्थल (छाती) पर तारों और शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान चमकते हुए अत्यंत सुंदर हीरों का हार सुशोभित है, जो देवताओं कीसमृद्धिऔर जगत के कल्याण का विचार करते हैं, और जो दुखों तथा शत्रुओं के भारी बोझ को हरने वाले हैं। जिनके गंडस्थलों से मदजल की धारा बहती है, जिनकी जटाओं में सर्प भरे हुए हैं, जो कला, बिन्दु और ॐकार (तार) के साक्षात् स्वरूप हैं, उन भगवान शिव के परम वीर पुत्र विनायक को मैं भजता हूँ।
अर्थ:जिनके हाथों में मोक्ष अत्यंत सुलभता से रखा हुआ है, जो बड़ी से बड़ी विपत्तियों (संकटों) को नष्ट करने में अत्यंत कुशल (दक्ष) हैं, जिनके नेत्र कमल के समान चंचल और सुंदर हैं, जो पराशक्ति (माता जगदंबा) के सदैव पक्ष में रहते हैं। जो अपने आश्रित भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान फल देने वाले हैं, जो देवताओं के शत्रुओं को बहुत शीघ्र नष्ट कर देते हैं, जो परमानंद के पक्षधर हैं और जो भगवान शिव की आँखों के तारे (अत्यंत प्रिय) हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।
श्लोक ६
सदाशं सुरेशं सदा पातुमीशं निदानोद्भवं शाङ्करप्रेमकोशम् । धृतश्रीनिशेशं लसद्दन्तकोशं चलच्छूलपाशं भजे कृत्तपाशम् ॥ अर्थ:जो सभी की आशाओं को पूर्ण करने वाले हैं, देवताओं के स्वामी (सुरेश) हैं, जो सदैव सबकीरक्षाकरने में समर्थ ईश्वर हैं, जो सभी कारणों के मूल उद्भव हैं, और जो भगवान शंकर के विशुद्ध प्रेम के खजाने (कोश) हैं। जिन्होंने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया हुआ है, जिनके दाँत (गजदंत) अत्यंत सुशोभित हैं, जिनके हाथों में त्रिशूल और पाश लहरा रहे हैं, तथा जो मोह और अज्ञान रूपी बंधनों (पाश) को काट देते हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।
अर्थ:जो अनेक संतों और सज्जनों के रक्षक हैं, जो सदैव दान देने में अग्रणी हैं, जो बुद्धिमानों को समृद्धि (श्री) और ज्ञान प्रदान करते हैं, जिनका हाथी (गज) के समान मुख अत्यंत शोभायमान है। जिन्होंने अपने हाथ में अपना ही टूटा हुआ दाँत (एकदंत) धारण किया है, जो इन तीनों लोकों के एकमात्र आधार (वृंत) हैं, जो स्वभाव से अत्यंत सौम्य (सुमन्द) हैं और जो परम सत्ता (परन्त) हैं, उन आप भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।
अर्थ:जो भगवान शिव और माता पार्वती के अथाह प्रेम के साक्षात् स्वरूप (पिण्ड) हैं, जिनका वर्ण (रंग) शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जिनका टूटा हुआ दाँत दमक रहा है, और जो सदैव आनंद से परिपूर्ण रहते हैं। जिनका मुख अद्भुत प्रभा (कांति) से चमक रहा है, जिन्होंने अपने हाथ में स्वर्ण का कलश (मोदक का पात्र) धारण किया हुआ है, और जिनकी अत्यंत सुंदर सूंड हिल रही है, उन गजमुख भगवान विनायक को मैं निरंतर भजता हूँ।
*प्रस्तुत है श्री हित चौरासी का प्रथम पद — "जोई-जोई प्यारौ करै"। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की दिव्य रसपूर्ण वाणी का मंगलाचरण स्वरूप प्रथम पद है। इस पद में श्रीजी और प्रियतम के मधुर, निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। भक्त और भगवान के मध्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का यह पद श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय की माधुर्य-रस परम्परा का अनुपम रत्न है।*
*इस पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु बताते हैं कि जो कुछ प्रियतम को प्रिय है वही भक्त को भी प्रिय है। भक्त का मन, प्राण, प्रेम और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल युगल सरकार में समर्पित हो जाता है। "मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय" तथा "अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे" जैसी पंक्तियाँ दिव्य प्रेम की चरम अवस्था का दर्शन कराती हैं। अंतिम चरण में श्री राधा-कृष्ण की साँवल-गौर युगल छवि को जल की तरंगों से भी अधिक अभिन्न बताया गया है।*
नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्। उद्धर्त्तुकामो सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥ अर्थ : नृत्य (ताण्डव) की समाप्ति पर नटराज भगवान शिव ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की पूर्ति के लिए चौदह (नौ + पाँच) बार डमरू बजाया। इस प्रकार इन चौदह शिवसूत्रों का यह जाल (वर्णमाला) प्रकट हुआ।
डिमिक-डिमिक डमरू कर बाजे... स्वर : पण्डित छन्नूलाल मिश्र
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे, प्रेम मगन नाचे भोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥
सिंघी नाद बजावत गावत, सिंघी नाद बजावत गावत, लटक रही बगली झोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे, प्रेम मगन नाचे भोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥
नाग फणन सो करत आरती, नाग फणन सो करत आरती, देव देव गति अनमोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे, प्रेम मगन नाचे भोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥
भालचंद्र सिर गंगा लहरे, भालचंद्र सिर गंगा लहरे, हाथ लिए भंग की गोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे, प्रेम मगन नाचे भोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे, प्रेम मगन नाचे भोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे, प्रेम मगन नाचे भोला, भोला, डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥