भन विद्यापति सुन हे महेस। निरधन जानि के हरहु कलेस॥
अर्थ
हे शिव। मैं भवसागर से किस प्रकार पार उतर सकूँगा। मैं पुष्प चुनूँगा, बेल-पत्र और नैवेद्यों के द्वारा सनातन शिव की, उनकी अभिन्न शक्तिरूपा पार्वती के साथ पूजा करूँगा। हे शिव! आप बैल पर आरूढ़ होकर श्मशान भूमि में घूमते फिरते हो; आप भंग के नशे में उन्मत्त रहते हैं, इसलिए मुझ आराधक की पीड़ा तक से अनवगत हैं। हे प्रभो! मैंने अपने जीवन में न तो तुम्हारे नाम का ही स्मरण किया है और न ही कठिन तप ही किया है। इसके अतिरिक्त न ही मैंने दूसरों की हित-साधना के लिए अपनी किंचित-मात्र भी सुख-सुविधा की अर्पणा की है अर्थात् मुझसे प्रतिदिन का दान भी देते नहीं बन पड़ा है। मेरे जीवन की तीनों अवस्थाएँ-बालापन, यौवन तथा वृद्धपन इस जप-तप-दान की पुण्य-त्रयी के बिना ही व्यतीत हुआ है। विद्यापति कहते हैं कि हे महेश! मेरी प्रार्थना सुनिए। आप मुझे नितांत अकिंचन जान कर ही मेरे क्लेशों का हरण कीजिए।
प्रस्तुत है श्री हित चौरासी का प्रथम पद — "जोई-जोई प्यारौ करै"। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की दिव्य रसपूर्ण वाणी का मंगलाचरण स्वरूप प्रथम पद है। इस पद में श्रीजी और प्रियतम के मधुर, निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। भक्त और भगवान के मध्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का यह पद श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय की माधुर्य-रस परम्परा का अनुपम रत्न है।
इस पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु बताते हैं कि जो कुछ प्रियतम को प्रिय है वही भक्त को भी प्रिय है। भक्त का मन, प्राण, प्रेम और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल युगल सरकार में समर्पित हो जाता है। "मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय" तथा "अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे" जैसी पंक्तियाँ दिव्य प्रेम की चरम अवस्था का दर्शन कराती हैं। अंतिम चरण में श्री राधा-कृष्ण की साँवल-गौर युगल छवि को जल की तरंगों से भी अधिक अभिन्न बताया गया है।
कोई गाता मैं सो जाता, कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता
संसृति के विस्तृत सागर पर, सपनो की नौका के अंदर सुख दुख की लहरो पर उठ गिर, बहता जाता, मैं सो जाता कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता
आँखो मे भरकर प्यार अमर, आशीष हथेली मे भर कर कोई मेरा सर गोदी मे रख, सहलाता, मैं सो जाता कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता
मेरे जीवन का खारा जल, मेरे जीवन का हालाहल मेरे मेरे जीवन का खारा जल, मेरे जीवन का हालाहल कोई अपने स्वर मे मधुमयकर बरसाता, मे सो जाता कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता मैं सो जाता
परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि । रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् । सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥
हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते । अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥