काजल आँजूं पायल बांधूं दृग में झांकूं दर्पण तोडूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
आशायें अलख जगाती हैं बीमार कल्पना के द्वारे अधरों ने बंद किवाड़ किए नैना जीते, बिना हारे कोलाहल के बाजारों में वंदन के छंद बिके सारे ननदी जैसी नटखट संथ्या भर-भर सिंदूर ताने मारे तुम मेरा सम्बोधन वर लो मैं टूटा चन्दन तन जोड़ूं।। तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
कलियां चटकें, डाली लचके माली विहंसे, भौंरे झूमे भौरों के पंख पराग पगे माली कलियां तोड़े चूमे एक रसिक और एक व्यापारी एक लूटे एक बेचे रितु में सम्मान सहित मुरझा जाती मैं खिलती अगर किसी वन में तुम पवन बनो मुझको छू दो मैं जूठी पंखुरियां तोड़ूं ।। तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय । धम्मिल्लकायै च जटाधराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।१।।
आधे शरीर में चम्पापुष्पों-सी गोरी पार्वतीजी हैं और आधे शरीर में कर्पूर के समान गोरे भगवान शंकरजी सुशोभित हो रहे हैं । भगवान शंकर जटा धारण किये हैं और पार्वतीजी के सुन्दर केशपाश सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
कस्तूरिकाकुंकुमचर्चितायै चितारज:पुंजविचर्चिताय । कृतस्मरायै विकृतस्मराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।२।।
पार्वतीजी के शरीर में कस्तूरी और कुंकुम का लेप लगा है और भगवान शंकर के शरीर में चिता-भस्म का पुंज लगा है । पार्वतीजी कामदेव को जिलाने वाली हैं और भगवान शंकर उसे नष्ट करने वाले हैं, ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
चलत्क्वणत्कंकणनूपुरायै पादाब्जराजत्फणीनूपुराय । हेमांगदायै भुजगांगदाय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।३।।
भगवती पार्वती के हाथों में कंकण और पैरों में नूपुरों की ध्वनि हो रही है तथा भगवान शंकर के हाथों और पैरों में सर्पों के फुफकार की ध्वनि हो रही है । पार्वतीजी की भुजाओं में बाजूबन्द सुशोभित हो रहे हैं और भगवान शंकर की भुजाओं में सर्प सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
विशालनीलोत्पललोचनायै विकासिपंकेरुहलोचनाय । समेक्षणायै विषमेक्षणाय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।४।।
पार्वतीजी के नेत्र प्रफुल्लित नीले कमल के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर के नेत्र विकसित कमल के समान हैं । पार्वतीजी के दो सुन्दर नेत्र हैं और भगवान शंकर के (सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि) तीन नेत्र हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
मन्दारमालाकलितालकायै कपालमालांकितकन्धराय । दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।५।।
पार्वतीजी के केशपाशों में मन्दार-पुष्पों की माला सुशोभित है और भगवान शंकर के गले में मुण्डों की माला सुशोभित हो रही है । पार्वतीजी के वस्त्र अति दिव्य हैं और भगवान शंकर दिगम्बर रूप में सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
अम्भोधरश्यामलकुन्तलायै तडित्प्रभाताम्रजटाधराय । निरीश्वरायै निखिलेश्वराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।६।।
पार्वतीजी के केश जल से भरे काले मेघ के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर की जटा विद्युत्प्रभा के समान कुछ लालिमा लिए हुए चमकती दीखती है । पार्वतीजी परम स्वतन्त्र हैं अर्थात् उनसे बढ़कर कोई नहीं है और भगवान शंकर सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
प्रपंचसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै समस्तसंहारकताण्डवाय । जगज्जनन्यैजगदेकपित्रे नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।७।।
भगवती पार्वती लास्य नृत्य करती हैं और उससे जगत की रचना होती है और भगवान शंकर का नृत्य सृष्टिप्रपंच का संहारक है । पार्वतीजी संसार की माता और भगवान शंकर संसार के एकमात्र पिता हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
प्रदीप्तरत्नोज्ज्वलकुण्डलायै स्फुरन्महापन्नगभूषणाय । शिवान्वितायै च शिवान्विताय नम: शिवायै च नम: शिवाय।।८।।
पार्वतीजी प्रदीप्त रत्नों के उज्जवल कुण्डल धारण किए हुई हैं और भगवान शंकर फूत्कार करते हुए महान सर्पों का आभूषण धारण किए हैं । भगवती पार्वतीजी भगवान शंकर की और भगवान शंकर भगवती पार्वती की शक्ति से समन्वित हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।
स्तुति का फल
एतत् पठेदष्टकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी । प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकालं भूयात् सदा तस्य समस्तसिद्धि:।।
आठ श्लोकों का यह स्तोत्र अभीष्ट सिद्धि करने वाला हैं । जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, वह समस्त संसार में सम्मानित होता है और दीर्घजीवी बनता है, वह अनन्त काल के लिए सौभाग्य व समस्त सिद्धियों को प्राप्त करता है।
*विशमक्कारा* तमिल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है बहुत अधिक शरारती, नटखट या उपद्रवी। *कन्नन* : तमिल में भगवान श्रीकृष्ण का नाम (कृष्ण) है। यह प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत का एक लोकप्रिय पद/गीत है जिसे ऊथुक्काडू वेंकट सुब्ब अय्यर ने रचा है। इस गीत में बचपन में भगवान कृष्ण द्वारा की जाने वाली विभिन्न शरारतों और लीलाओं का वर्णन किया गया है।
अनुपल्लवी : हास्य गीत गाती, तरह-तरह से नृत्य करती, नंदगोपाल के पुत्र कृष्ण, हर आधे घंटे में एक नाटक करते।
चरणम १. वह नीले बादल के समान होगा—और यदि वह गाए, तो वह आकर हमारे हृदय में बस जाएगा। और जब वह अपनी बांसुरी बजाते हुए और झूठी प्रेम-प्रसंग की बातें करते हुए गोपियों से पूछेगा, “हे, मुझे थोड़ा सा मक्खन दो।”
चरणम् २. वह पीछे से उनकी चोटी खींचेगा और मीठी-मीठी बातें करेगा और धीरे-धीरे उनकी चोटी खोलेगा। और यदि वे पूछें, “आपने मेरी चोटी क्यों खींची?”, तो वह कहेगा, “मेरे मन ने इसे और सुंदर आँखें पाने के लिए खींचा।”
चरणम् ३. वह पड़ोस के घर की लड़की को बुलाएगा और उससे मुकारी राग गाने को कहेगा और उसे बेवजह परेशान करेगा। और मान लीजिए वह कहे, “मुझे नहीं पता, क्या यह मुकारी राग है, मुझे नहीं पता”, तो वह दया का नाटक करते हुए उसे चुटकी काटेगा। और जब वह बेकाबू होकर रोने लगेगी, तो वह कहेगा, “यह मुकारी राग है।”
चरणम् ४. उन्होंने कहा था कि “मक्खन का पात्र बंद नहीं किया जाना चाहिए। शहर के सभी मक्खन के पात्र बंद नहीं किए जाने चाहिए।”