मंगलवार, 3 नवंबर 2026

श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् / लोकेश्वराख्यभट्ट कृत / गायन : श्रुति, कल्पिता एवं गीता उपासनी

https://youtu.be/D7CylZDLdyg  

।। श्री हनुमत्ताण्डव स्तोत्रम् हिन्दी अर्थ सहित।।


ध्यान


वन्दे सिन्दूरवर्णाभं लोहिताम्बरभूषितम्।
रक्ताङ्गरागशोभाढयं शोणापुच्छं कपीश्वरम्।।

अर्थ

मैं उस हनुमान जी की पूजा करता हूँ जिनका रंग 
सिंदूर जैसा है, जिन्होंने लाल वस्त्र पहना हुआ है, 
जिनके शरीर पर लाल रंग की आभा है, और जिनकी
पूंछ भी लाल है। वे वानरों के राजा हैं।

स्तोत्र

भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरञ्जनं, 
दिनेशरूपभक्षकं, समस्तभक्तरक्षकम्।
सुकण्ठकार्यसाधकं, विपक्षपक्षबाधकं, 
समुद्रपारगामिनं, नमामि सिद्धकामिनम्।।

अर्थ

मैं पवनपुत्र हनुमान जी की वंदना करता हूँ, जो 
भक्तों के हृदय को आनंदित करते हैं, जिन्होंने 
सूर्य को निगल लिया था, जो सभी भक्तों की 
रक्षा करते हैं। वे कठिन कार्यों को आसानी से 
सिद्ध करते हैं, शत्रुओं को परास्त करते हैं, और 
समुद्र पार करने वाले हैं। मैं उन सिद्धियों की 
इच्छा रखने वाले हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ।

सुश‌ङ्कितं सुकण्ठभुक्तवान् हि यो हितं 
वचस्त्वमाशु धैर्य्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निशम्य वानराऽधिनाथ 
आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः।।

अर्थ

जो भी उचित और हितकारी शब्द बोलते हैं, वे 
धैर्यपूर्वक उनका पालन करते हैं। जब वानरराज 
हनुमान जी ने यह सुना, तो वे तुरंत शांत हो गए 
और प्रभु श्रीराम के दूत के रूप में कार्य करते हुए 
सबके लिए शरणदाता बन गए।

सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, 
भुजद्वयेन सोदरीं निजांसयुग्ममास्थितौ।
कृतौ हि कोसलाधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, 
विदहजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोत्वरम्।।

अर्थ-

हनुमान जी, जिनकी लंबी बाहें और चमकदार 
आँखें हैं, जिनकी पूंछ सुंदर है और जिन्होंने श्रीराम 
और लक्ष्मण को अपने कंधों पर धारण किया हुआ है, 
कोसल के राजा श्रीराम के सेवक और वानरराज 
सुग्रीव के निकट रहते हैं। वे हमें शिव का आशीर्वाद 
प्रदान करें।

सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, 
कपीश नाथसेवकं, समस्तनीतिमार्गगम्।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलम्बबाहुभूषितः 
कपीन्द्रसख्यमाकरोत्, स्वकार्यसाधकः प्रभुः।।

अर्थ

रामचंद्र जी ने हनुमान जी को देखा, जो सुशब्द 
शास्त्रों के पारंगत हैं और वानरराज के सेवक हैं। 
वे नीति के मार्ग को जानते हैं और हमेशा अपने 
कार्य को सिद्ध करते हैं। उन्होंने लक्ष्मण के प्रति 
अपनी भुजाओं से स्नेह और मित्रता का प्रदर्शन 
किया और अपने कार्य को सफल बनाया।

प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीशमातृगर्वहृदृशास्यवासनाशकृत्।
विभीषणेन सख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, 
सुकण्ठकार्यसाधकं, नमामि यातुधतकम्।।

अर्थ

जो प्रचंड वेग वाले हैं, जिन्होंने पर्वतों के गर्व को 
नष्ट किया, और नागों के गर्व को हराया। विभीषण 
के मित्र बनने वाले और विदेह की बेटी सीता के 
दुख को हरने वाले हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

नमामि पुष्पमौलिनं, सुवर्णवर्णधारिणं 
गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलान्वितम्।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलंकदाहकं सुनायकं 
विपक्षपक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशकम्।।

अर्थ

मैं पुष्पमाला से सुशोभित, सुवर्णवर्ण धारण करने 
वाले, गदा और किरीट-कुंडलों से अलंकृत हनुमान 
जी को प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने अपनी पूंछ से 
लंका को जलाया और राक्षसों के पूरे कुल का नाश 
किया।

रघूत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं 
दिनेशवंशभूषणस्य मुद्रीकाप्रदर्शकम्।
विदेहजातिशोकतापहारिणम् प्रहारिणम् 
सुसूक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम्।।

अर्थ

जो रघुकुल के श्रेष्ठ राम के सेवक हैं, लक्ष्मण के 
प्रिय हैं, जिन्होंने श्रीराम की अंगूठी सीता जी को 
सौंपी, और विदेह की बेटी सीता के शोक को हरने 
वाले हैं, ऐसे हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

नभस्वदात्मजेन भास्वता त्वया कृता 
महासाहा यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूत्स्वकृत्यतः।
सुकण्ठ आप तारकां रघूत्तमो विदेहजां 
निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम्।।

अर्थ

पवनपुत्र हनुमान जी ने अपनी महान शक्ति से 
श्रीराम और सीता जी के कार्यों को सिद्ध किया। 
उन्होंने वालि का नाश किया और रावण को भी 
परास्त किया।

फल श्रुति

इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पठेत्सुचेतसा नरः 
कपीशनाथसेवको भुनक्तिसर्वसम्पदः।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभाजनस्सदा 
न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्त्विह।।

अर्थ

जो भी इस हनुमान तांडव स्तोत्र को प्रतिदिन 
ध्यानपूर्वक पढ़ता है, उसे वानरराज हनुमान की 
कृपा प्राप्त होती है। वह सभी संपत्तियों का भोग 
करता है, और उसे कभी भी शत्रुओं से भय नहीं 
होता।

।। इति श्री हनुमान तांडव स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

सोमवार, 2 नवंबर 2026

ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ.../ शायर : सदा अम्बालवी / गायन : डाॅ. राधिका चोपड़ा

https://youtu.be/GfEfplHXJ2s

ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ
तू तो ख़ुद ही इक ग़ज़ल है तुझे क्या ग़ज़ल सुनाएँ


तुझे एक बार देखा तो ये दिल ने दी दु'आएँ
तुझे बार-बार देखें तुझे देखते ही जाएँ


ये सियाही क्या उतारे छवी रूप की तुम्हारे
चलो इन्द्र से धनुष के सभी रंग माँग लाएँ


तिरे लब खुलें सनम जब तो कली को लाज आए
उड़े ज़ुल्फ़ जब हवा में तो घटाएँ सर झुकाएँ


तू सँवार ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ ये दो नैन रख के आगे
कि मजाल क्या हमारी तुझे आइना दिखाएँ


मिरे बोल बे-नवा हैं तिरे साज़ बे-सदा हैं
चलो सुर में सुर मिला के नई बंदिशें बनाएँ

रविवार, 1 नवंबर 2026

श्री लक्ष्मी सुक्तम्.../ (श्री सूक्त) / ऋग्वेद

https://youtu.be/M8u5uoySFJA?si=37vwJ4LgKZdxe8hY

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८॥

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥

फलश्रुति : श्लोक २४

पद्मप्रिये पद्मिनि पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥

शब्दार्थ और हिंदी भावार्थ

पद्मप्रिये : जिन्हें कमल का फूल अत्यंत प्रिय है। 

पद्मिनि : जो कमल के समान कोमल और सुंदर हैं (या जो कमल धारण करती हैं)। 

पद्महस्ते : जिनके हाथों में कमल का पुष्प सुशोभित है। 

पद्मालये : जिनका निवास स्थान कमल का फूल है। 

पद्मदलायताक्षि : जिनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों के समान विशाल और सुंदर हैं। 

विश्वप्रिये : जो समस्त संसार को प्रिय हैं (पूरे विश्व की चहेती हैं)। 

विष्णुमनोऽनुकूले : जो भगवान श्री विष्णु के मन के अनुकूल चलने वाली उनकी प्रिय भार्या हैं। 

त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व : हे देवी! आप अपने उन दिव्य चरण-कमलों को मेरे हृदय और मेरे गृह में स्थापित करें (मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें)। 

सरल अर्थ

हे कमल को प्रेम करने वाली, कमल के समान सुंदर, हाथों में कमल धारण करने वाली, कमल में निवास करने वाली और कमल की पंखुड़ियों जैसे विशाल नेत्रों वाली माता महालक्ष्मी! आप पूरे संसार की प्रिय हैं और भगवान विष्णु के मन को आनंद देने वाली हैं। हे माँ, आप अपने पावन चरण-कमलों को सदैव के लिए मेरे हृदय और मेरे घर में स्थापित कर दीजिए।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

आशियाने की बात करते हो.../ शायर : जावेद क़ुरैशी / गायन : प्रियंका बर्वे

https://youtu.be/toK3KLzVjD8?si=sxY_4xA8arhrgrH_


आशियाने की बात करते हो
दिल जलाने की बात करते हो

सारी दुनिया के रंज-ओ-ग़म दे कर
मुस्कुराने की बात करते हो

हम को अपनी ख़बर नहीं यारो
तुम ज़माने की बात करते हो

ज़िक्र मेरा सुना तो चिढ़ के कहा
किस दिवाने की बात करते हो

हादसा था गुज़र गया होगा
किस के जाने की बात करते हो

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

तुम एक बार प्रिय आ जाओ.../ रचना एवं स्वर : माया गोविन्द (१९४०-२०२२)

https://youtu.be/t7NWereIXsk?si=igN7IHKsXbyvRyXX

तुम एक बार प्रिय आ जाओ,
तो आँचल भर सुहाग  ओढ़ूँ।।

काजल आँजूं 
पायल बांधूं 
दृग में झांकूं 
दर्पण तोडूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...

आशायें अलख जगाती हैं
बीमार कल्पना के द्वारे
अधरों ने बंद किवाड़ किए 
नैना जीते, बिना हारे
कोलाहल के बाजारों में
वंदन के छंद बिके सारे
ननदी जैसी नटखट संथ्या 
भर-भर सिंदूर ताने  मारे
तुम मेरा सम्बोधन वर लो
मैं टूटा चन्दन तन जोड़ूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...

कलियां चटकें, डाली लचके 
माली विहंसे, भौंरे झूमे
भौरों के पंख पराग पगे
माली कलियां तोड़े चूमे
एक रसिक और एक व्यापारी
एक लूटे एक बेचे  रितु में
सम्मान सहित मुरझा जाती
मैं खिलती अगर किसी वन में
तुम पवन बनो मुझको छू दो
मैं जूठी पंखुरियां  तोड़ूं ।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

ज़िस्म ये रूह है, मिटटी है, ख़ला है, क्या है ? / ग़ज़ल : अरुण मिश्र / संगीत एवं स्वर : केवल कुमार

 https://youtu.be/LezXhC6AMKs?feature=shared


Gazal by Arun Mishra, Lucknow.
Composed and sung by Kewal Kumar.

ज़िस्म ये रूह है, मिटटी है, ख़ला है, क्या है ?
रूह है, आग है, पानी है, हवा है, क्या है ?

आँखें इसरार करें, लब पे मुसल्सल इनक़ार
कोई आदत है, जिद है, के अदा है, क्या है?

कभी डसती, कभी लहराती, कभी छा जाती
कोई नागिन है, ज़ुल्फ़ है, कि घटा है, क्या है?

साँस की बंसरी को रोज़ नए सुर देता
कोई फ़नकार है, शायर है, ख़ुदा है, क्या है ?

हुस्न को इश्क़ के रखते हो, मुक़ाबिल जो 'अरुन'
है ये ख़ुद्दारी, ज़ुनूं है, कि अना है, क्या है?

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

*हे ! राम-राम, हे ! राम चन्द्र.../ कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/7Qxp38Kjyc4?si=JjvbOddE8G1TfkgS


 जय  राम,  राम,  जय  रामचन्द्र।
 शोषित- जन- मन-विश्राम,चन्द्र।
 दशरथ -  हृत्व्योम - बिहारी    हे!
 रघुकुल  के  चिर-अभिराम चन्द्र।।

               शुचि, जीवन-मूल्यों के  मापक।
               हे पूर्ण-पुरुष! अग-जग-व्यापक।
               यश-वाहक,   संस्कृति-संवाहक।
               मर्यादाओं       के       संस्थापक।।

    हे!   दीन - हीन   के   मन  के   बल।
    मुनि-हृदय-मीन, तव-भक्ति सुजल।
    हे!    चिर-नवीन- शुभ-आस-रश्मि।
    हे!  आर्त - दुखी- जन    के    संबल।।

               भारत-भुवि  के   गौरव   ललाम।
               हे! संत- सरल- चित- परमधाम।
               निष्काम !  करो  लीला- सकाम।
               हे!  राम,  राम,   जय   राम-राम।।

                                         *

*विजय दशमी की शुभकामनायें*