https://youtu.be/HLaVF2NZn0g
rashmi rekh
बुधवार, 8 अप्रैल 2026
नवरत्नमालिका / आदि शंकराचार्य विरचित / स्वर : माधवी मधुकर झा
हारनूपुरकिरीटकुण्डलविभूषितावयवशोभिनीं
गन्धसारघनसारचारुनवनागवल्लिरसवासिनीं
स्मेरचारुमुखमण्डलां विमलगण्डलम्बिमणिमण्डलां
भूरिभारधरकुण्डलीन्द्रमणिबद्धभूवलयपीठिकां
कुण्डलत्रिविधकोणमण्डलविहारषड्दलसमुल्लस-
वारणाननमयूरवाहमुखदाहवारणपयोधरां
पद्मकान्तिपदपाणिपल्लवपयोधराननसरोरुहां
आगमप्रणवपीठिकाममलवर्णमङ्गलशरीरिणीं
कालिकातिमिरकुन्तलान्तघनभृङ्गमङ्गलविराजिनीं
रविवार, 22 मार्च 2026
मत जा, मत जा, जोगी.../ मीराबाई / गायन : संध्या राव
https://youtu.be/uAWn21bTc5c?si=1QRGh7K4LkOKuMW9
मत जा, मत जा, जोगी,
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
प्रेम भक्ति को पंथ ही न्यारो,
हम को गैल(रास्ता) बता जा जोगी
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
अगर चंदन की चिता बनाऊँ,
अपने हाथ जला जा जोगी, जोगी
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
जल जल भयी भस्म की ढेरी,
अपने अंग लगा जा जोगी
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
मीरा कहे प्रभि गिरधर नगर,
ज्योत से ज्योत मिला जा जोगी
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
शुक्रवार, 6 मार्च 2026
जीवन के ७६वें वर्ष में प्रवेश...
ईश्वर की कृपा, पूर्वजों के आशीर्वाद, परिवार के स्नेह तथा मित्रों की शुभेच्छाओं के सम्बल पर मैं इस चैत्र कृष्ण चतुर्थी, विक्रम संवत २०८२, आंग्ल दिनांक ०६ मार्च, २०२६ को जीवन के ७५ वर्ष पूर्ण कर रहा हूँ।
सभी का स्नेह-आशीर्वाद अपेक्षित है।🙏
रश्मि-रेख के 5,33,809 पेज व्यूज के लिए कृपापूर्वक ब्लॉग तक पधारे अतिथियों का आभार।
-अरुण मिश्र
🌹🌹🙏🙏
बुधवार, 4 मार्च 2026
गुरुवार, 4 दिसंबर 2025
शाह-ए-शमशाद-क़दाँ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ.../ शायर : हाफ़िज़ शीराज़ी / गायन : इक़बाल बानो
https://youtu.be/-lSpsh88Qqk
शाह-ए-शमशाद-क़दाँ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ
कि ब-मिज़्गाँ शिकनद क़ल्ब-ए-हमः-सफ़-शिकना
कि ब-मिज़्गाँ शिकनद क़ल्ब-ए-हमः-सफ़-शिकना
मिष्ठ भाषियों का जो अधिपति शमशादों का जो सिरताज
हृदय तोड़ देता पलकों से रथियों के सिरमौरों का
मस्त ब-गुज़श्त-ओ-नज़र बर मन-ए-दरवेश अन्दाख़्त
गुफ़्त कि ऐ चश्म-ओ-चराग़-ए-हमः-शीरीं-सुख़नाँ
मस्ती से चलते जब उसकी इस फ़क़ीर पर नज़र पड़ी
ऐ मिष्ठबोलों के दृगतारे मुझको यूँ सम्बोधा गया
ता के अज़ सीम-ओ-ज़रत कीसः तिही ख़्वाहद-बूद
पंद-ए-मा ब-शिनो-ओ-बरख़ुर ज़े हमः सीम-तनाँ
कब तक और रहोगे वंचित स्वर्ग-रजत के वैभव से
मेरा सेवक बन कर चख तू फल जो उजले तन का है
गुफ़्त 'हाफ़िज़' मन-ओ-तू महरम-ए-ईं-राज़ न-एम
अज़ मय-ए-ला'ल हिकायत कुन-ओ-सीमीं-ज़क़नाँ
इस पर बोली हवा कि ‘हाफ़िज़’ हम तुम क्या जानें यह राज़
यह तो अमृतभाषियों से या लोहित मदिरा से पूछो
बुधवार, 12 नवंबर 2025
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो.../ शायर : जौन एलिया / गायन : तौसीफ़ अख़्तर
https://youtu.be/LdwC_b8LC_k
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो
मैं तुम्हारे ही दम से ज़िंदा हूँ
मर ही जाऊँ जो तुम से फ़ुर्सत हो
तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और उतनी ही बे-मुरव्वत हो
तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
या'नी ऐसा है जैसे फ़ुर्क़त हो
तुम हो अंगड़ाई रंग-ओ-निकहत की
कैसे अंगड़ाई से शिकायत हो
किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मिरी ज़िंदगी की आदत हो
किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो
दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मिरी आख़री मोहब्बत हो
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