शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

मेरा तो क्या ख़ुशी में रहूँ या मलाल में.../ शायर : नज़ीर मोहम्मद आरज़ू जयपुरी / गायन : हीरा देवी मिश्रा

https://youtu.be/toxvr57T1U0. 

मेरा तो क्या ख़ुशी में रहूँ या मलाल में
तुम ख़ुश रहो जहाँ भी रहो जिस ख़याल में


हूँ महव मैं तो ऐसा किसी के ख़याल में
कुछ इम्तियाज़ ही नहीं हिज्र-ओ-विसाल में


तेरे ख़याल ही की बदौलत है ज़िंदगी
तू है तो इक जहान है मेरे ख़याल में


हाइल अगर हज़ार हों पर्दे तो कुछ नहीं
तुम हो मिरी निगाह में दिल में ख़याल में


होता रहे करम जो यूँही ऐ ख़याल-ए-यार
लग़्ज़िश न हो कभी मिरे पाए-ए-ख़्याल में


है तू तो हर घड़ी मिरी आँखों के सामने
आता हूँ मैं भी क्या कभी तेरे ख़याल में


शेर-ओ-सुख़न की 'आरज़ू' अब दाद क्या मिले
ज़ौक़-ए-सुख़न ही जब नहीं अहल-ए-कमाल में

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे.../ शायर : बहज़ाद लखनवी / गायन : निर्मला देवी

https://youtu.be/0LPDgc9Q8yI 


दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे

ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे

मैं ढूँढ रहा हूँ मिरी वो शम्अ कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की
काबा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे

'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे

बुधवार, 19 अगस्त 2026

देखो माई ये बड़भागी मोर.../ रचना : भक्त सूरदास / गायन : मुदिता एवं रुचिरा जमरिया

https://youtu.be/hr0MyKc616U  


देखो माई ये बड़भागी मोर।
जिनकी पंख को मुकुट बनत है, शिर धरें नंदकिशोर॥१॥

ये बडभागी नंद यशोदा, पुन्य किये झकझोर।
वृंदावन हम क्यों न भई रज लागत पग की कोर॥२॥

ब्रह्मदिक सनकादिक नारद, ठाढ़े हैं कर जोर।
सूरदास संतन को सरबस देखियत माखन चोर॥३॥

सोमवार, 17 अगस्त 2026

उमड़ घुमड़ घन सावन आये.../ रचना : महाप्राण सूर्य कान्त त्रिपाठी 'निराला' / गायन : डाॅ शरद मणि त्रिपाठी

https://youtu.be/_plJmt8KJI0  


उमड़-घुमड़-घन
सावन आये।
मन-मन के
मनभावन आये ।

मोर शोर करते हैं वन में,
नाच रहे हैं फिर निर्जन में,
दादुर की रट भी छन-छन में,
विपुल-बलाक की धावन आये ।

बूंदों की रिमझिम फुहार है,
पवन-अवनि, फिर-फिर बुहार है,
खगकुल की पुलकित गुहार है,
पुर के पाहुन पावन आये।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आँसू किसी का देख के बीमार मर गया.../ शायर : क़मर जलालवी / गायन : ग़ुलशन आरा सईद

https://youtu.be/NgjefMWpdfI?si=sOBtvYMsTVRk8PAW


आँसू किसी का देख कि बीमार मर गया
जाम-ए-हयात एक ही क़तरे में भर गया

छोड़ो वफ़ा का नाम वफ़ादार मर गया
तुम जिस हवा में हो वो ज़माना गुज़र गया

सय्याद देख ली कशिश-ए-मौसम-ए-बहार 
उड़ उड़ के बाग़ में मिरा एक एक पर गया

देखा न तुम ने आँख उठा कर भी बज़्म में
आँसू तो मैं न था जो नज़र से उतर गया

वक़्त आ गया है यार के वा'दे का ऐ 'क़मर'
देखो वो आसमान सितारों से भर गया

बुधवार, 12 अगस्त 2026

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण, कामप्रजाळण नाच करे.../ छंद - दुर्मिला / कवि : श्री दुला भाया काग बापू / गायन : मुक्ति दान गढ़वी

https://youtu.be/UYVG4sj_z0w  


गुजरात के चारण कवि
पद्म श्री दुला भाया काग बापू 
की कलम से रचित यह शिव स्तुति है।

कविश्री काग बापू का नाम गुजरात के 
लोक साहित्य में बड़े गौरव और सम्मान 
के साथ लिया  जाता है।


भभके गण भूत भयंकर भुतळ, नाथ अधंखर ते नखते,
भणके तळ अंबर बाधाय भंखर , गाजत जंगर पांह गते ;
डमरुय डडंकर बाह जटंकर , शंकर ते कईलास सरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे, (१)


हडडं खडडं ब्रह्मांड हले, दडडं दडदा कर डाक बजे,
जळळं दंग ज्वाल कराल जरे , सचरं थडडं गण साज सजे ;
कडके धरणी कडडं , हडडं मुख नाथ ग्रजंत हरे ,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(२)


हदताळ मृदंग हुहूकट,हाकट धाकट धीकट नाद धरं,
द्रहद्राह दिदीकट वीकट दोक्ट,कट्ट फरंगट फेर फरं ;
धधडे नग धोम धधा कर धीकट,धेंकट घोर कृताळ धरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(३)


नट तांडवरो भट देव घटां नट उलट गूलट धार अजं,
चहँ थाक दुदूवट दूवट खेंखट,गेंगट भू कईलास ग्रजं ;
तत तान त्रिपुरारि त्रेकट त्रुकट, भूलट धुहर ठेक भरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(४)


सहणाई छेंछ अपार छटा,चहुथ नगारांय चोब रडे,
करताल थपाट झपाट कटाकट, ढोल धमाकट मेर धडे ;
उमया संग नाट गणं सरवेश्वर,ईश्वर 'थईततां,' उचरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(५)


पहरी गंगधार भेंकार भुजंगाय , भार अढारिंय वृक्ष भजे,
गडताळ अपार उठे पडघा,गढ सागर त्रीण ब्रह्मांड ग्रजे,
हदभार पगांय हिमाचळ हालत,हालत नृत्य हजार हरे ,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(६)


बह अंग परां धर खाख अडंबर डंबर सुर नभं दवळा,
डहके डहकं डहकं डमरु बह,डूहक डूहक थे बनळा ;
हदपाळ कराळ विताळरी हाकल, पाव उपाडत ताळ परे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(७)


ब्रह्मादिक देख सतं भ्रमना भर,सुर तेत्रीशांय पाव सबे,
खडडं कर हास्य ब्रह्मांड खडेडत,अंग उमा अरधंग अबे ;
जग जावण आवण जोर नचावण, आवत *काग* तणे उपरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(८)

श्रीविनायकाष्टकम्.../ श्रीनारायणगुरुविरचितं / गायन : सितारा कृष्ण कुमार एवं मिथुन

https://youtu.be/a8qr-tVdY8o  


नमद्देववृन्दं लसद्वेदकन्दं
शिरःश्रीमदिन्दुं श्रितश्रीमुकुन्दम् ।
बृहच्चारुतुन्दं स्तुतश्रीसनन्दं
जटाहीन्द्रकुन्दं भजेऽभीष्टसन्दम् ॥ १॥

किलद्देवगोत्रं कनद्धेमगात्रं
सदानन्दमात्रं महाभक्तमित्रम् ।
शरच्चन्द्रवक्त्रं त्रयीपूतपात्रं।
समस्तार्त्तिदात्रं भजे शक्तिपुत्रम् ॥ २॥

गलद्दानमालं चलद्भोगिमालं
गलाम्भोदकालं सदा दानशीलम् ।
सुरारातिकालं महेशात्मबालं
लसत्पुण्ड्रभालं भजे लोकमूलम् ॥ ३॥

उरस्तारहारं शरच्चन्द्रहीरं
सुरश्रीविचारं हृतार्त्तारिभारम् ।
कटे दानपूरं जटाभोगिपूरं
कलाबिन्दुतारं भजे शैववीरम् ॥ ४॥

करारूढमोक्षं विपद्भङ्गदक्षं
चलत्सारसाक्षं पराशक्तिपक्षम् ।
श्रितामर्त्यवृक्षं सुरारिद्रुतक्षं
परानन्दपक्षं भजे श्रीशिवाक्षम् ॥ ५॥

सदाशं सुरेशं सदा पातुमीशं
निदानोद्भवं शाङ्करप्रेमकोशम् ।
धृतश्रीनिशेशं लसद्दन्तकोशं
चलच्छूलपाशं भजे कृत्तपाशम् ॥ ६॥

ततानेकसन्तं सदा दानवन्तं
बुधश्रीकरन्तं गजास्यं विभान्तम् ।
करात्मीयदन्तं त्रिलोककैकवृन्तं
सुमन्दं परन्तं भजेऽहं भवन्तम् ॥ ७॥

शिवप्रेमपिण्डं परं स्वर्णवर्णं
लसद्दन्तखण्डं सदानन्दपूर्णम् ।
विवर्णप्रभास्यं धृतस्वर्णभाण्डं
चलच्चारुशुण्डं भजे दन्तितुण्डम् ॥ ८॥

इति श्रीनारायणगुरुविरचितं श्रीविनायकाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

अर्थ

नमद्देववृन्दं लसद्वेदकन्दं शिरःश्रीमदिन्दुं श्रितश्रीमुकुन्दम् ।
बृहच्चारुतुन्दं स्तुतश्रीसनन्दं जटाहीन्द्रकुन्दं भजेऽभीष्टसन्दम् ॥

अर्थ:जिन्हें देवताओं का संपूर्ण समूह निरंतर नमन करता है, जो सभी वेदों के प्रकाशमान मूल (जड़) हैं, जिनके मस्तक पर अत्यंत सुंदर चंद्रमा सुशोभित है, जो भगवान श्रीविष्णु(मुकुंद) के परम आश्रय हैं। जिनका उदर (पेट) अत्यंत विशाल और मनोहर है, जिनकी स्तुति महर्षि सनंद करते हैं, जिनकी जटाओं में सर्पों के राजा (शेषनाग) चमेली (कुंद) के पुष्प के समान लिपटे हुए हैं, उन सभी अभीष्ट (मनोवांछित) फलों को देने वाले भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक २

किलद्देवगोत्रं कनद्धेमगात्रं सदानन्दमात्रं महाभक्तमित्रम् ।
शरच्चन्द्रवक्त्रं त्रयीपूतपात्रं समस्तार्त्तिदात्रं भजे शक्तिपुत्रम् ॥

अर्थ:जो देवताओं के कुल (वंश) कीरक्षाकरने वाले और उनका पालन करने वाले हैं, जिनका शरीर चमकते हुए शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जो सदैव आनंद स्वरूप हैं और अपने महान भक्तों के परम मित्र हैं। जिनका मुख शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान अत्यंत सौम्य है, जो तीनों वेदों (त्रयी) के पवित्र पात्र हैं, और जो अपने भक्तों की समस्त दुखों एवं पीड़ाओं का नाश करने वाले हैं, उनमाता पार्वती(शक्ति) के पुत्र भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ३

गलद्दानमालं चलद्भोगिमालं गलाम्भोदकालं सदा दानशीलम् ।
सुरारातिकालं महेशात्मबालं लसत्पुण्ड्रभालं भजे लोकमूलम् ॥

अर्थ:जिनके गंडस्थल (कनपटी) से निरंतर मदजल की धारा बहती रहती है, जिनके गले में चंचल सर्पों की माला सुशोभित है, जिनका कंठ जल से भरे हुए काले बादल के समान सुंदर है, और जो सदैव दान देने के स्वभाव वाले हैं। जो देवताओं के शत्रुओं (असुरों) के लिए साक्षात् काल (मृत्यु) हैं, जो भगवानशिव(महेश) के आत्मज (पुत्र) हैं, जिनके भाल (मस्तक) पर सुंदर तिलक दमक रहा है, उन संपूर्ण लोकों के मूल कारण भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ४

उरस्तारहारं शरच्चन्द्रहीरं सुरश्रीविचारं हृतार्त्तारिभारम् ।
कटे दानपूरं जटाभोगिपूरं कलाबिन्दुतारं भजे शैववीरम् ॥

अर्थ:जिनके वक्षस्थल (छाती) पर तारों और शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान चमकते हुए अत्यंत सुंदर हीरों का हार सुशोभित है, जो देवताओं कीसमृद्धिऔर जगत के कल्याण का विचार करते हैं, और जो दुखों तथा शत्रुओं के भारी बोझ को हरने वाले हैं। जिनके गंडस्थलों से मदजल की धारा बहती है, जिनकी जटाओं में सर्प भरे हुए हैं, जो कला, बिन्दु और ॐकार (तार) के साक्षात् स्वरूप हैं, उन भगवान शिव के परम वीर पुत्र विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ५

करारूढमोक्षं विपद्भङ्गदक्षं चलत्सारसाक्षं पराशक्तिपक्षम् ।
श्रितामर्त्यवृक्षं सुरारिद्रुतक्षं परानन्दपक्षं भजे श्रीशिवाक्षम् ॥

अर्थ:जिनके हाथों में मोक्ष अत्यंत सुलभता से रखा हुआ है, जो बड़ी से बड़ी विपत्तियों (संकटों) को नष्ट करने में अत्यंत कुशल (दक्ष) हैं, जिनके नेत्र कमल के समान चंचल और सुंदर हैं, जो पराशक्ति (माता जगदंबा) के सदैव पक्ष में रहते हैं। जो अपने आश्रित भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान फल देने वाले हैं, जो देवताओं के शत्रुओं को बहुत शीघ्र नष्ट कर देते हैं, जो परमानंद के पक्षधर हैं और जो भगवान शिव की आँखों के तारे (अत्यंत प्रिय) हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ६

सदाशं सुरेशं सदा पातुमीशं निदानोद्भवं शाङ्करप्रेमकोशम् ।
धृतश्रीनिशेशं लसद्दन्तकोशं चलच्छूलपाशं भजे कृत्तपाशम् ॥
अर्थ:जो सभी की आशाओं को पूर्ण करने वाले हैं, देवताओं के स्वामी (सुरेश) हैं, जो सदैव सबकीरक्षाकरने में समर्थ ईश्वर हैं, जो सभी कारणों के मूल उद्भव हैं, और जो भगवान शंकर के विशुद्ध प्रेम के खजाने (कोश) हैं। जिन्होंने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया हुआ है, जिनके दाँत (गजदंत) अत्यंत सुशोभित हैं, जिनके हाथों में त्रिशूल और पाश लहरा रहे हैं, तथा जो मोह और अज्ञान रूपी बंधनों (पाश) को काट देते हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ७

ततानेकसन्तं सदा दानवन्तं बुधश्रीकरन्तं गजास्यं विभान्तम् ।
करात्मीयदन्तं त्रिलोककैकवृन्तं सुमन्दं परन्तं भजेऽहं भवन्तम् ॥

अर्थ:जो अनेक संतों और सज्जनों के रक्षक हैं, जो सदैव दान देने में अग्रणी हैं, जो बुद्धिमानों को समृद्धि (श्री) और ज्ञान प्रदान करते हैं, जिनका हाथी (गज) के समान मुख अत्यंत शोभायमान है। जिन्होंने अपने हाथ में अपना ही टूटा हुआ दाँत (एकदंत) धारण किया है, जो इन तीनों लोकों के एकमात्र आधार (वृंत) हैं, जो स्वभाव से अत्यंत सौम्य (सुमन्द) हैं और जो परम सत्ता (परन्त) हैं, उन आप भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ८

शिवप्रेमपिण्डं परं स्वर्णवर्णं लसद्दन्तखण्डं सदानन्दपूर्णम् ।
विवर्णप्रभास्यं धृतस्वर्णभाण्डं चलच्चारुशुण्डं भजे दन्तितुण्डम् ॥

अर्थ:जो भगवान शिव और माता पार्वती के अथाह प्रेम के साक्षात् स्वरूप (पिण्ड) हैं, जिनका वर्ण (रंग) शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जिनका टूटा हुआ दाँत दमक रहा है, और जो सदैव आनंद से परिपूर्ण रहते हैं। जिनका मुख अद्भुत प्रभा (कांति) से चमक रहा है, जिन्होंने अपने हाथ में स्वर्ण का कलश (मोदक का पात्र) धारण किया हुआ है, और जिनकी अत्यंत सुंदर सूंड हिल रही है, उन गजमुख भगवान विनायक को मैं निरंतर भजता हूँ।