शनिवार, 8 अगस्त 2026

डिमिक-डिमिक डमरू कर बाजे.../ स्वर : पण्डित छन्नूलाल मिश्र

https://youtu.be/fd6AGwXSmMY 


ऊँ नम: पार्वतीपतये हर-हर महादेव !


नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्त्तुकामो सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥
 
अर्थ : नृत्य (ताण्डव) की समाप्ति पर नटराज भगवान शिव ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की पूर्ति के लिए चौदह (नौ + पाँच) बार डमरू बजाया। इस प्रकार इन चौदह शिवसूत्रों का यह जाल (वर्णमाला) प्रकट हुआ। 


डिमिक-डिमिक डमरू कर बाजे...
स्वर : पण्डित छन्नूलाल मिश्र


डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥


सिंघी नाद बजावत गावत,
सिंघी नाद बजावत गावत,
लटक रही बगली झोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥


नाग फणन सो करत आरती,
नाग फणन सो करत आरती,
देव देव गति अनमोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥



भालचंद्र सिर गंगा लहरे,
भालचंद्र सिर गंगा लहरे,
हाथ लिए भंग की गोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥



डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे बुंदिया बरसन लागे ना.../ मैथिल कजरी लोक गीत

https://youtu.be/JevTe_AhECM  

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..
बुंदिया बरसन लागी न....!!

दादुर-मोर-पपीहा गाबय, 
जिया उमताबे न.... !
हाय हो रामा.! जिया उमताबे न..!!

विरह के आगि कुहुकी कुहुकाबय 
बैरी कोयलिया ना...!

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..!

पिऊ के पाती लिखल हम कत-विधि, 
तैय्यो न पिघलथि ना..!
हाय हो रामा..! तैय्यो न पिघलथि ना..!!

कंत हमर हियहंत भेल छथि, 
दरदो न जाने ना..!

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..!

बुधवार, 5 अगस्त 2026

शिव हो उतरब पार कवन विधि.../ रचना : महाकवि विद्यापति / गायन : चन्दन तिवारी

https://youtu.be/0U48LrrBLzE 


सिव हो उतरब पार कओन बिधि।

लोढब कुसुम तोरब बेल पात।
पुजब सदासिब गौरिक सात॥

बसहा चढ़ल सिव फिरहूँ मसान।
भँगिया जरठ दरदो नहिं जान॥

जप-तप नहिं कैलहुँ नित दान।
बित गेला तिन पन करईत आन॥

भन विद्यापति सुन हे महेस।
निरधन जानि के हरहु कलेस॥

अर्थ

हे शिव। मैं भवसागर से किस प्रकार पार उतर सकूँगा। मैं पुष्प चुनूँगा, बेल-पत्र और नैवेद्यों के द्वारा सनातन शिव की, उनकी अभिन्न शक्तिरूपा पार्वती के साथ पूजा करूँगा। हे शिव! आप बैल पर आरूढ़ होकर श्मशान भूमि में घूमते फिरते हो; आप भंग के नशे में उन्मत्त रहते हैं, इसलिए मुझ आराधक की पीड़ा तक से अनवगत हैं। हे प्रभो! मैंने अपने जीवन में न तो तुम्हारे नाम का ही स्मरण किया है और न ही कठिन तप ही किया है। इसके अतिरिक्त न ही मैंने दूसरों की हित-साधना के लिए अपनी किंचित-मात्र भी सुख-सुविधा की अर्पणा की है अर्थात् मुझसे प्रतिदिन का दान भी देते नहीं बन पड़ा है। मेरे जीवन की तीनों अवस्थाएँ-बालापन, यौवन तथा वृद्धपन इस जप-तप-दान की पुण्य-त्रयी के बिना ही व्यतीत हुआ है। विद्यापति कहते हैं कि हे महेश! मेरी प्रार्थना सुनिए। आप मुझे नितांत अकिंचन जान कर ही मेरे क्लेशों का हरण कीजिए।

जोई-जोई प्यारौ करै, सोई मोहि भावै.../ श्री हित चौरासी – पद १

https://youtu.be/4khE2AKeAGI  


प्रस्तुत है श्री हित चौरासी का प्रथम पद — "जोई-जोई प्यारौ करै"। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की दिव्य रसपूर्ण वाणी का मंगलाचरण स्वरूप प्रथम पद है। इस पद में श्रीजी और प्रियतम के मधुर, निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। भक्त और भगवान के मध्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का यह पद श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय की माधुर्य-रस परम्परा का अनुपम रत्न है।

इस पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु बताते हैं कि जो कुछ प्रियतम को प्रिय है वही भक्त को भी प्रिय है। भक्त का मन, प्राण, प्रेम और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल युगल सरकार में समर्पित हो जाता है। "मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय" तथा "अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे" जैसी पंक्तियाँ दिव्य प्रेम की चरम अवस्था का दर्शन कराती हैं। अंतिम चरण में श्री राधा-कृष्ण की साँवल-गौर युगल छवि को जल की तरंगों से भी अधिक अभिन्न बताया गया है।

श्री हित चौरासी – पद १

जोई-जोई प्यारौ करै,
सोई मोहि भावै॥

भावै मोहि जोई,
सोई-सोई करैं प्यारे॥

मोकों तौ भावती ठौर,
प्यारे के नैंनन में॥

प्यारौ भयौ चाहै,
मेरे नैंनन के तारे॥

मेरे तन मन प्राण हूँ ते,
प्रीतम प्रिय॥

अपने कोटिक प्राण,
प्रीतम मोसों हारे॥

जै श्री हित हरिवंश,
हंस-हंसिनी साँवल-गौर॥

कहौ कौन करै,
जल-तरंगनि न्यारे॥

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

कोई गाता मैं सो जाता.../ रचना : हरिवंश राय बच्चन / गायक : येसुदास

https://youtu.be/uuYZ39Unars  


संगीत : जय देव
फिल्म : आलाप (1977)

कोई गाता मैं सो जाता, कोई गाता मैं सो जाता
कोई गाता

संसृति के विस्तृत सागर पर, सपनो की नौका के अंदर
सुख दुख की लहरो पर उठ गिर, बहता जाता, मैं सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता

आँखो मे भरकर प्यार अमर, आशीष हथेली मे भर कर
कोई मेरा सर गोदी मे रख, सहलाता, मैं सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता

मेरे जीवन का खारा जल, मेरे जीवन का हालाहल
मेरे मेरे जीवन का खारा जल, मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर मे मधुमयकर बरसाता, मे सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता मैं सो जाता

मैं सो जाता मैं सो जाता, कोई गाता मैं सो जाता

सोमवार, 3 अगस्त 2026

वेढा वेढा रे पंढरी.../ शब्द - संत तुकाराम / गायक - विश्वजीत बोरवणकर

https://youtu.be/o8vEdhKHMms 


वेढा वेढा रे पंढरी। मोर्चे लावा भीमातीरी ।।१।।
चला चला संतजन। करू देवासी भांडण।।२।।
लुटा लुटा पंढरपूर। धरा रखुमाईचा वर ।।।।
तुका म्हणे चला चला। घाव निशाणी घातका ।।४।।

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

आपकी याद आती रही रात भर.../ शायर : मखदूम मोहिउद्दीन / गायन : छाया गांगुली

https://youtu.be/IHS8QBdGPlU  



आप की याद आती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर

रात भर दर्द की शम्अ जलती रही
ग़म की लौ थरथराती रही रात भर

बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा
याद बन बन के आती रही रात भर

याद के चाँद दिल में उतरते रहे
चाँदनी जगमगाती रही रात भर

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज़ आती रही रात भर