गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

प्रातः - स्मरण स्तोत्रम् / आदिशंकराचार्य विरचित

https://youtu.be/DpHdEZCFk28. 



प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुर्दात्मत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम्।
यत्स्वप्नजागरसुषुपतिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥

भोर में मुझे उस वास्तविकता की याद आती है जो आत्मा है, जो हृदय में चमक रही है, अस्तित्व-चेतना-खुशी, परमहंससंन्यासियों (संतों) का लक्ष्य, चौथा; जो स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति की अवस्थाओं को सदैव जानता है, वह ब्रह्म जो अंशहीन है, मैं तत्वों का समूह नहीं हूं।

प्रातर्भाजामि मनसा वाचसामगम्यं
वाचो विभान्ति निखिला यदनुगृहेन।
यन्नेतिनेतिवचनैर्निग्मा अवोचं_
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुग्रग्र्यम् ॥२॥

भोर में मैं उसकी स्तुति गाता हूं जो मन और वाणी से अप्राप्य है, लेकिन जिसकी कृपा से सभी शब्द चमकते हैं। जिसे शास्त्र 'यह नहीं', 'यह नहीं' शब्दों के माध्यम से घोषित करते हैं - वे कहते हैं कि देवताओं का भगवान अजन्मा और अपरिवर्तनीय है।


प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्णं
पूर्णं सनातनपदं उत्तमाख्यम्।
यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूरतौ
रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै ॥३॥

भोर में मैं उसे नमस्कार करता हूं जिसे सर्वोच्च आत्मा कहा जाता है जो अंधेरे से परे है, सूर्य के रंग का प्राचीन लक्ष्य है जो पूर्णांक है - वह, अवशिष्ट रूप (यानी संपूर्ण) जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड रस्सी में सांप की तरह प्रकट होता है।

फलश्रुति

श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम्।
प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥

यह पुण्यकारी श्लोकों का त्रिक, तीन शब्दों का आभूषण - जो भोर में पढ़ता है, वह परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

नवरत्नमालिका / आदि शंकराचार्य विरचित / स्वर : माधवी मधुकर झा

https://youtu.be/HLaVF2NZn0g  

हारनूपुरकिरीटकुण्डलविभूषितावयवशोभिनीं 
कारणेशवरमौलिकोटिपरिकल्प्यमानपदपीठिकाम् । 
काल काल फणिपाश बाण धनुर‌ङ्कुशाम् अरुण मेखलाम् 
फालभूतिलकलोचनां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥१॥


गन्धसारघनसारचारुनवनागवल्लिरसवासिनीं 
सान्ध्यरागमधुराधराभरणसुन्दराननशुचिस्मिताम् । 
मन्थरायतविलोचनाममलबालचन्द्रकृतशेखरीं 
इन्दिरारमणसोदरीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥२।।


स्मेरचारुमुखमण्डलां विमलगण्डलम्बिमणिमण्डलां 
हारदामपरिशोभमानकुचभारभीरुतनुमध्यमाम् । 
वीरगर्वहरनूपुरां विविधकारणेशवरपीठिकां 
मारवैरिसहचारिणीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥३॥


भूरिभारधरकुण्डलीन्द्रमणिबद्धभूवलयपीठिकां 
वारिराशिमणिमेखलावलयवह्निमण्डलशरीरिणीम् ।
वारिसारवहकुण्डलां गगनशेखरीं च परमात्मिकां 
चारुचन्द्ररविलोचनां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥४॥


कुण्डलत्रिविधकोणमण्डलविहारषड्दलसमुल्लस- 
त्पुण्डरीकमुखभेदिनीं तरुणचण्डभानुतडिदुज्ज्वलाम् । 
मण्डलेन्दुपरिवाहितामृततरङ्गिणीमरुणरूपिणीं 
मण्डलान्तमणिदीपिकां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥५॥


वारणाननमयूरवाहमुखदाहवारणपयोधरां 
चारणादिसुरसुन्दरीचिकुरशेखरीकृतपदाम्बुजाम् । 
कारणाधिपतिपञ्चकप्रकृतिकारणप्रथममातृकां 
वारणान्तमुखपारणां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥६॥


पद्मकान्तिपदपाणिपल्लवपयोधराननसरोरुहां 
पद्मरागमणिमेखलावलयनीविशोभितनितम्बिनीम् । 
पद्मसम्भवसदाशिवान्तमयपञ्चरत्नपदपीठिकां 
पद्मिनीं प्रणवरूपिणीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥७॥


आगमप्रणवपीठिकाममलवर्णमङ्गलशरीरिणीं 
आगमावयवशोभिनीमखिलवेदसारकृतशेखरीम् । 
मूलमन्त्रमुखमण्डलां मुदितनादबिन्दुनवयौवनां 
मातृकां त्रिपुरसुन्दरीं मनसि भावयामि परदेवताम् ॥८॥


कालिकातिमिरकुन्तलान्तघनभृङ्गमङ्गलविराजिनीं 
चूलिकाशिखरमालिकावलयमल्लिकासुरभिसौरभाम् । 
वालिकामधुरगण्डमण्डलमनोहराननसरोरुहां 
कालिकामखिलनायिकां मनसि भावयामि परदेवताम् ॥९॥

रविवार, 22 मार्च 2026

मत जा, मत जा, जोगी.../ मीराबाई / गायन : संध्या राव

https://youtu.be/uAWn21bTc5c?si=1QRGh7K4LkOKuMW9

मत जा, मत जा, जोगी, 
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी 

प्रेम भक्ति को पंथ ही न्यारो, 
हम को गैल(रास्ता) बता जा जोगी 
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी 

अगर चंदन की चिता बनाऊँ, 
अपने हाथ जला जा जोगी, जोगी 
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी 

जल जल भयी भस्म की ढेरी, 
अपने अंग लगा जा जोगी 
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी 

मीरा कहे प्रभि गिरधर नगर, 
ज्योत से ज्योत मिला जा जोगी 
पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे,
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी 
मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

जीवन के ७६वें वर्ष में प्रवेश...

ईश्वर की कृपा, पूर्वजों के आशीर्वाद, परिवार के स्नेह तथा मित्रों की शुभेच्छाओं के सम्बल पर मैं इस चैत्र कृष्ण चतुर्थी, विक्रम संवत २०८२, आंग्ल दिनांक ०६ मार्च, २०२६ को जीवन के ७५ वर्ष पूर्ण कर रहा हूँ।

सभी का स्नेह-आशीर्वाद अपेक्षित है।🙏

रश्मि-रेख के 5,33,809 पेज व्यूज के लिए कृपापूर्वक ब्लॉग तक पधारे अतिथियों का आभार। 

-अरुण मिश्र 

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गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

शाह-ए-शमशाद-क़दाँ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ.../ शायर : हाफ़िज़ शीराज़ी / गायन : इक़बाल बानो

https://youtu.be/-lSpsh88Qqk  

शाह-ए-शमशाद-क़दाँ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ
कि ब-मिज़्गाँ शिकनद क़ल्ब-ए-हमः-सफ़-शिकना

मिष्ठ भाषियों का जो अधिपति शमशादों का जो सिरताज
हृदय तोड़ देता पलकों से रथियों के सिरमौरों का

मस्त ब-गुज़श्त-ओ-नज़र बर मन-ए-दरवेश अन्दाख़्त
गुफ़्त कि ऐ चश्म-ओ-चराग़-ए-हमः-शीरीं-सुख़नाँ

मस्ती से चलते जब उसकी इस फ़क़ीर पर नज़र पड़ी
ऐ मिष्ठबोलों के दृगतारे मुझको यूँ सम्बोधा गया

ता के अज़ सीम-ओ-ज़रत कीसः तिही ख़्वाहद-बूद
पंद-ए-मा ब-शिनो-ओ-बरख़ुर ज़े हमः सीम-तनाँ

कब तक और रहोगे वंचित स्वर्ग-रजत के वैभव से
मेरा सेवक बन कर चख तू फल जो उजले तन का है

गुफ़्त 'हाफ़िज़' मन-ओ-तू महरम-ए-ईं-राज़ न-एम
अज़ मय-ए-ला'ल हिकायत कुन-ओ-सीमीं-ज़क़नाँ

इस पर बोली हवा कि ‘हाफ़िज़’ हम तुम क्या जानें यह राज़
यह तो अमृतभाषियों से या लोहित मदिरा से पूछो