मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

दारिद्रय दहन स्तोत्रम् / महर्षि वशिष्ठ कृत

https://youtu.be/K6vkzhuLkM0   

Daridraya Dahana Shiva Stotram was Composed by
Rishi Vasistha, one of the oldest and most revered
Vedic Rishis.

Brahma Rishi Vasistha is one of the Saptarishi (7 Sages).
By chanting this Daridraya Dahana Stotram at dawn,
noon and dusk, one can enjoy the pleasures of heaven
and gets all types of wealth.

विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय । कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ १॥
जो विश्व के स्वामी हैं,
जो नरकरूपी संसारसागर से उद्धार करने वाले हैं,
जो कानों से श्रवण करने में अमृत के समान नाम वाले हैं,
जो अपने भाल पर चन्द्रमा को आभूषणरूप में धारण करने वाले हैं,
जो कर्पूर की कांति के समान धवल वर्ण वाले जटाधारी हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय । गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ २॥
जो माता गौरी के अत्यंत प्रिय हैं,
जो रजनीश्वर(चन्द्रमा) की कला को धारण करने वाले हैं,
जो काल के भी अन्तक (यम) रूप हैं,
जो नागराज को कंकणरूप में धारण करने वाले हैं,
जो अपने मस्तक पर गंगा को धारण करने वाले हैं,
जो गजराज का विमर्दन करने वाले हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 
भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय । ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ३॥जो भक्तिप्रिय, संसाररूपी रोग एवं भय का नाश करने वाले हैं,
जो संहार के समय उग्ररूपधारी हैं,
जो दुर्गम भवसागर से पार कराने वाले हैं,
जो ज्योतिस्वरूप, अपने गुण और नाम के अनुसार सुन्दर नृत्य करने वाले हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 
चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय । मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ४॥
जो बाघ के चर्म को धारण करने वाले हैं,
जो चिताभस्म को लगाने वाले हैं,
जो भाल में तीसरा नेत्र धारण करने वाले हैं,
जो मणियों के कुण्डल से सुशोभित हैं,
जो अपने चरणों में नूपुर धारण करने वाले जटाधारी हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 
पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय । आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ५॥
जो पांच मुख वाले नागराज रूपी आभूषण से सुसज्जित हैं,
जो सुवर्ण के समान किरणवाले हैं,
जो आनंदभूमि (काशी) को वर प्रदान करने वाले हैं,
जो सृष्टि के संहार के लिए तमोगुनाविष्ट होने वाले हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 
भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय । नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ६॥जो सूर्य को अत्यंत प्रिय हैं,
जो भवसागर से उद्धार करने वाले हैं,
जो काल के लिए भी महाकालस्वरूप, और जिनकी कमलासन (ब्रम्हा) पूजा करते हैं,
जो तीन नेत्रों को धारण करने वाले हैं,
जो शुभ लक्षणों से युक्त हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 
रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय । पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ७॥जो राम को अत्यंत प्रिय, रघुनाथजी को वर देने वाले हैं,
जो सर्पों के अतिप्रिय हैं,
जो भवसागररूपी नरक से तारने वाले हैं,
जो पुण्यवालों में अत्यंत पुण्य वाले हैं,
जिनकी समस्त देवतापूजा करते हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय । मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय ॥ ८॥

जो मुक्तजनों के स्वामीस्वरूप हैं,
जो चारों पुरुषार्थों का फल देने वाले हैं,
जिन्हें गीत प्रिय हैं और नंदी जिनका वाहन है,
गजचर्म को वस्त्ररूप में धारण करने वाले हैं, महेश्वर हैं,
दारिद्र्य रुपी दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमन है। 

।। इति श्रीवशिष्ठरचितं दारिद्रयुदुखदहन शिवस्तोत्रम् संपूर्णम् ।।

सोमवार, 6 दिसंबर 2021

जयशंभुनाथ दिगंबरम् .../ रचना एवं स्वर - पं. मृत्युंजय हिरेमठजी

 https://youtu.be/na_yf7qagIM 


|| शिव स्त्रोत्र ||

जयशंभुनाथ दिगंबरम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
भवतारणम् भयहारणम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।

मृगछाल अंग शुशोभितम् करमाल दंड बिराजितं ।।
यमकाल पासबिमोचकम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
जय शंभुनाथ दिगंबरम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
भवतारणम् भयहारणम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।

गलरुण्डमाल कपालब्याल तनभस्म शोभित सुंदरम् ।।
तवशक्ति अंग शुशोभितम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
जय शंभुनाथ दिगंबरम् । करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
भवतारणं भयहारणम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।

हे दक्षयज्ञ विनाशकम् हे कामदाहन कारणम्।।
श्री गणेशस्कंद नमस्कृतम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
जय शंभुनाथ दिगंबरम् । करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
भवतारणम् भयहारणम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।

हे आशुतोष शशांकशेखर चंद्रमौलि मृत्युंजयम् ।।
तवपादकमल नमाम्यहम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
जय शंभुनाथ दिगंबरम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।
भवतारणम् भयहारणम् करुणाकरं जगदीश्वरम् ।।

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

चल मन तुम काशी.../ महाराजा स्वाति तिरुनाल / गायन : रंजनी एवं गायत्री

 https://youtu.be/ClwbhSX-JnQ

चल मन तुम काशी...
स्वाति तिरुनाल भजन
राग : सिन्धु भैरवी
ताल :रूपक

महाराजा स्वाति तिरुनाल (१८१३-१८४६)

श्री स्वाति तिरुनाल बालराम वर्मा (16 अप्रैल, 1813 – 27 दिसम्बर 1846) त्रावणकोर 
के महाराजा थे। योग्य शासक होने के साथ-साथ वे संगीतज्ञ भी थे। उन्होने भारत की 
दोनों शास्त्रीय संगीत शैलियों - हिन्दुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत को बढ़ावा दिया, 
यद्यपि वे स्व्यं कर्नातक संगीत के ज्ञाता थे। उन्होने ४०० से अधिक संगीत रचनाएँ की। वे मलयालमसंस्कृतहिन्दीमराठीतेलुगुकन्नडबांग्लातमिलओडिया और अंग्रेजी 
सहित कई भाषाओं में धाराप्रवाह बोल सकते थे।
श्री स्वाति तिरुनाल बालराम वर्मा ने ही तिरुअनन्तपुरम की खगोलीय वेधशाला
सरकारी प्रेस, त्रिवेन्द्रम जनता पुस्तकालय, पौर्वात्य पाण्डुलिपि संग्रहालय 
(Oriental Manuscript Library) आदि का आरम्भ किया। महाराजा सन् १८४३ से 
रॉयल एशियाटिक सोसायटी के सम्मानित सदस्य भी थे।
महाराजा ने दक्षिण भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी में पद्य-रचना की जिनकी गणना 
आधुनिक हिन्दी की आरम्भिक रचनाओं में है।

RANJANI AND GAYATRI
Ranjani (Born May 13, 1973) and Gayatri (Born May10,1976) are 
two sisters who perform as a Carnatic vocal and violin duo. They 
have also appeared as soloists, accompanists, composers, and 
educators of Indian Classical Music. 
Their work includes studio recordings; television, radio, and 
festival appearances; live concerts; and lecture demonstrations.

Ranjani and Gayatri sing on the presiding God of Kashi or Varansi,
Shri Vishwanath, as they take a serene boat ride through the sacred 
waters of the Ganga. An intimate scenic setting for this soul lifting 
andwell loved Bhajan by Swati Thirunal in Raga Sindhubhairvi. 
The Ganga and Kashi are inexhaustible source of inspiration and 
divine vibes for all pilgrims and musicians.

विश्वेश्वर दर्शन कर चल मन तुम काशी 
विश्वेश्वर दर्शन जब कीन्हो बहु प्रेम सहित 
काटे करुणानिधान जनन-मरण फांसी 
भस्म अंग, भुज त्रिशूल, उर में लसे नागमाला 
गिरिजा अर्धांग धरे, त्रिभुवन जिन दासी  
पद्मनाभ कमलनयन त्रिनयन शम्भु महेश 
भज ले इन दो स्वरूप रहिये अविनाशी 

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर महाकवि निराला की संभवतः अप्रकाशित कविता.../ गायन : संगीता श्रीवास्तव

 https://youtu.be/0msB-zl38XQ

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती ०३ दिसम्बर (जन्म : ०३ दिसम्बर १८८४) पर विशेष 

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर महाकवि निराला की संभवतः अप्रकाशित कविता...

[बंधु ! इस बार पटना से जो गट्ठर मेरे साथ आया है, उसकी पोटली नंबर-2 में एक बहुमूल्य पत्र 
निरालाजी की कविता के साथ मुझे मिला है । पत्र पिताजी को संबोधित है, जून 1942 का है । 
उन दिनों पिताजी 'आरती' नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन अपने स्वत्वाधिकार 
के 'आरती मन्दिर प्रेस, पटना से कर रहे थे । यह महत्वपूर्ण रचना भी निरालाजी ने पिताजी के 
पास प्रकाशन के लिए भेजी थी, मुझे मालूम नहीं कि यह पत्रिका में छपी या नहीं, क्योंकि जैसा 
पिताजी से सुना था, सन ४२ के विश्व-युद्ध के दौरान ही 'आरती' का प्रकाशन अवरुद्ध हो गया था। 
मुझे यह भी नहीं मालूम कि देशरत्न पर लिखी उनकी यह कविता कहीं, किसी और ग्रन्थ में 
संकलित हुई या नहीं....! अगर नहीं हुई, तो निःसंदेह यह अत्यंत महत्त्व का दस्तावेज़ है ।
मुझे आश्चर्य इस बात का है कि पिताजी जैसे असंग्रही व्यक्ति के पुराने गट्ठर में और खानाबदोशी 
की हालत में निरंतर घिसटते हुए यह पत्र आज भी 73 वर्षों बाद बचा कैसे रह गया...? संभवतः, 
मेरे सौभाग्य से ! मूल और टंकित प्रति के साथ आज इसे लोकार्पित कर धन्य हो रहा हूँ । 
--आनन्दवर्धन ओझा]

मुक्ताकाश..ब्लॉग, रविवार, 18 जनवरी 2015


C/o Pandit Ramlalji garg,
karwi, Banda (U.P.)
15.6.'42.
प्रिय मुक्तजी,
क्षमा करें । मैं यथासमय आपको कुछ भेज नहीं सका । यह रचना देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसादजी पर है । 
भेज रहा हूँ । स्वीकृति भेजें । आप अच्छी तरह होंगे । मेरी 'आरती' इस पते पर भेजें--
श्रीरामकृष्ण मिशन लाइब्रेरी,
गूंगे नव्वाब का बाग़,
अमीनाबाद, लखनऊ ।
उत्तर ऊपर के पते पर । नमस्कार ।
आपका--
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

[पत्र के पृष्ठ-भाग पर कविता]

देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के प्रति...

उगे प्रथम अनुपम जीवन के
सुमन-सदृश पल्लव-कृश जन के ।
गंध-भार वन-हार ह्रदय के,
सार सुकृत बिहार के नय के ।
भारत के चिरव्रत कर्मी हे !
जन-गण-तन-मन-धन-धर्मी हे !
सृति से संस्कृति के पावनतम,
तरी मुक्ति की तरी मनोरम ।
तरणि वन्य अरणि के, तरुण के
अरुण, दिव्य कल्पतरु वरुण के ।
सम्बल दुर्बल के, दल के बल,
नति की प्रतिमा के नयनोत्पल ।
मरण के चरण चारण ! अविरत
जीवन से, मन से मैं हूँ नत ।।

--'निराला'

वृन्दावनी वेणु बाजे.../ अभंग / मराठी भजन / संत भानु दास / नृत्य : साहित्य रामकुमार

 https://youtu.be/ll6OAdPNE_M   

Abhang-Brindavani Venu choreographed
by Smt.Priyadarshini Govind Ji and
performed by Sahitya Ramkumar.
Sahitya Ramkumar
Learning Bharatanatyam under the able guidance of Sangeet 
Nataka Akademi awardee, Guru Sri Pasumarthy Ramalinga Sastry 
for the last 12 years, Sahitya Ramkumar is taking baby steps in the 
performance world. Playing the leading roles in her Guru’s productions 
and giving solos has given Sahitya invaluable experience and learning. 
She is also learning Kuchipudi from her guru who happens to hail 
from the village of Kuchipudi. 
After her arangetram in 2014, Sahitya has been working and creating 
pieces from the repertoire and is fortunate to understand the intricacies 
of the art of choreography from her Guru. Sahitya has completed her 
certificate course in Bharatanatyam with distinction. She is now training 
for diploma. 
In the city, Sahitya likes to perform at Ravindra Bharati, Saptaparni, 
Lamakaan and Shilparamam. She calls for more performance spaces 
with black background, good sound system and lights.
Currently pursuing Chartered Accountancy, Sahitya has also performed 
for Nadaneerajanam, Tirupati. Along with her mother, Sahitya releases 
performance to hit songs on YouTube.  

सन्त भानु दास महाराज 

संत भानुदास का जन्म सन् 1448 ई. के आसपास हुआ। इनके पुत्र का नाम 
चक्रपाणि था। प्रसिद्ध संत एकनाथ इनके पौत्र थे। संत भानुदास ने 94 मराठी 
अभंग रचे। इनकी दो हिंदी रचनाएँ गाथाओं में उपलब्ध हैं। वे कृष्ण को अपना 
भगवान मानते थे इसलिए उन्होंने मथुरा-वृंदावन की यात्राएँ की थीं। इनकी 
भाषा ब्रजभाषा है। 

इनका हिंदी पद निम्नलिखित है- ‘‘जमुना के तट धेनु चरावत राखत है गैयां, 
मोहन मेरो सैयां मोर पत्र सिर छत्र सुहाये गोपी धरत बहियां भानुदास प्रभु भगत 
को बत्सल, करत छत्र छइयां।’’
वृंदावनी वेणु कवणाचा माये वाजे ।
वेणुनादें गोवर्धनु गाजे ॥
पुच्छ पसरूनि मयूर विराजे ।
मज पाहता भासती यादवराजे ॥

तृणचारा चरूं विसरली ।
गाई-व्याघ्र एके ठायीं जाली ।
पक्षीकुळें निवांत राहिलीं ।
वैरभाव समूळ विसरली ॥

वृंदावनी वेणु कवणाचा माये वाजे ।
वेणुनादें गोवर्धनु गाजे ॥

ध्वनी मंजुळ मंजुळ उमटती ।
वांकी रुणझुण रुणझुण वाजती ।
देव विमानीं बैसोनि स्तुती गाती ।
भानुदासा फावली प्रेम-भक्ति ॥

वृंदावनी वेणु कवणाचा माये वाजे ।
वेणुनादें गोवर्धनु गाजे ॥


Meaning of Abhang Vrindavani Venu Raje...

वृंदावनी वेणू वाजे 
वेणू कवणाचा माये ॥धृ॥

The flute (veNu) makes sound (is being played) in the Vrundavana, 
the venu is like a poem

वेणूनादे गोवर्धन गाजे। 
पुच्छ पसरूनी मयूर विराजे। 
मज पाहता भासती यादवराजे ॥१॥

This sound of veNu (venunade) fillls the whole Govardhana mountain. 
Spreading it's tail, the peacock is dancing. It seems to me as 
Yadava Raje (Krishna) is looking at me.

तृणचारा चरू विसरली । 
गाईव्याघ्र एके ठायी झाली । 
पक्षीकुळे निवांत राहिली । 
वैरभाव समूळ विसरली ॥२॥

Forgetting to graze, the cow and tiger come together.
Birds are relaxed. The feeling of enmity is completely vanished.

यमुनाजळ स्थिरस्थिर वाहे । 
रविमंडळ चालता स्तब्ध होये । 
शेष कूर्म वराह चकीत राहे । 
बाळा स्तन देऊ विसरली माये ॥३॥

The water of Yamuna is flowing slowly (almost stopped). 
The ravimanDala (the planets and stars with sun have 
stopped too. Shesha, Kurma, Varaha are mesmerized. 
The mother forgot to feed her child.

ध्वनी मंजूळ मंजूळ उमटती। 
वाकी रुणझुण रुणझुण वाजती। 
देव विमानी बैसोनि स्तुति गाती।  
भानुदासा पावली प्रेमभक्ति ॥४॥

The sound produced is nothing but sweet. 
The anklets make sound ruNuzuNu. 
The Gods sitting in Vimana are singing praise.
Bhanudasa is blessed with love and devotion (premabhakti).

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

आहे बाबा करू ने धिया दान हे.../ बिहार का पारम्परिक विवाह गीत / स्वर : माधवी मधुकर झा

 https://youtu.be/3jikk1B3Hn0 

जांघिया चढ़ाए बाबा बैसला मंडप पर बाबा करू ने कन्यादान हे आहे बाबा करू ने धिया दान हे सिसकी सिसकी रोवे मैय्या सुनैना तुहु बेटी हर लै मोरा प्राण हे आहे बाबा करू ने कन्यादान हे जाहि धिया लेहो बाबा नटुआ नचौला हो
सेहो बेटी भेला वीरान हे पर पंकज गहि लाल लली के अग्नि के साक्षी रचाई हे आहे बाबा करू ने धिया दान हे दोनु कुल केरे बाबा नाम धराओल ब्राह्मण वेद पढ़ाओल हे कनैते कनैते बाबा करै कन्यादान सखी सब मंगल गाई हे आहे बाबा करू ने कन्यादान हे

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन.../ संत तुलसीदास / सिवस्री स्कन्द्प्रसाद

 https://youtu.be/g7kFcat7ZCQ

गोपिका जीवन स्मरणं 
गोविन्द गोविन्द 
जानकी कान्त स्मरणं 
जय जय राम राम 
सद्गुरु न्यानानन्दमूर्ति की 
जय.....

"श्री राघवं दशरथात्मजं अप्रमेयं I 
सीतापतिं रघुकुलांवय रत्नदीपं II 
आजानबाहुम् अरविंददळायताक्षं I 
रामं निशाचर विनाशकरं नमामी II" 

I bow down to lord Rama, the son of King Dasharath, 
who is the ultimate one, the glorious scion of Raghu ; 
he who is the spouse of Sita, the bejewelled lamp of 
Raghu's race (Suryavanshi clan), he who has long 
hands and lotus-like eyes; he who is the destroyer of 
the demons and evil forces and the one who restored 
the good! .

श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणं ।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं ।
पटपीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनकसुता वरं ॥२॥

भज दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं ।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥

शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं ।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं ।
मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥

भावार्थ 
हे मन कृपालु श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर। वे संसार के जन्म-मरण रूपी दारुण 
भय को दूर करने वाले हैं।उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान हैं। मुख-हाथ 
और चरण भी लालकमल के सदृश हैं ॥१॥
उनके सौन्दर्य की छ्टा अगणित कामदेवों से बढ़कर है। उनके शरीर का नवीन 
नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर वर्ण है। पीताम्बर मेघरूप शरीर मानो बिजली 
के समान चमक रहा है। ऐसे पावनरूप जानकीपति श्रीरामजी को मैं नमस्कार 
करता हूँ ॥२॥
हे मन दीनों के बन्धु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्यों के वंश का समूल 
नाश करने वाले,आनन्दकन्द कोशल-देशरूपी आकाश में निर्मल चन्द्रमा के समान 
दशरथनन्दन श्रीराम का भजन कर ॥३॥
जिनके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट, कानों में कुण्डल भाल पर तिलक, और प्रत्येक 
अंग मे सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं। जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं। जो 
धनुष-बाण लिये हुए हैं, जिन्होनें संग्राम में खर-दूषण को जीत लिया है ॥४॥
जो शिव, शेष और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभादि 
शत्रुओं का नाश करने वाले हैं,तुलसीदास प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे 
हृदय कमल में सदा निवास करें ॥५॥