इसका अर्थ है: "मैं वातापी (बदामी) में स्थित भगवान गणपति की पूजा (भजन) करता हूँ, जो हाथी के मुख वाले (वारणाश्य) और वरदान देने वाले (वरप्रद) हैं। जिनके चरणों की सेवा भूत-प्रेत आदि करते हैं और जो सम्पूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं।
इस गीत का मूल भाव यह है कि हमें भौतिक शरीर को केवल मांस-मज्जा का ढांचा नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे ईश्वर का मंदिर मानना चाहिए
इसका विस्तृत अर्थ निम्नलिखित है :
• शरीर ही मंदिर है : कवि कहते हैं कि इस नश्वर भौतिक शरीर को देखो。 यह कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमात्मा का निवास स्थान—एक जीवंत मंदिर (देहद गुडी) है।
• अहंकार और ज्ञान : गीत में शरीर के भीतर छिपी ईश्वरीय चेतना को देखने का आह्वान किया गयान है。आंतरिक ऊर्जा (योग और प्राणायाम के माध्यम से) को जागृत करने की बात कही गई है।
• परब्रह्म का वास : संत शिशुनाल शरीफ बताते हैं कि हमारे भीतर ही वह परब्रह्म (सर्वोच्च शक्ति) विद्यमान है。जब साधक अपने अंतर्मन में झांकता है, तब उसे इस बात का ज्ञान होता है कि यह शरीर ही ईश्वर का मंदिर है और आत्मा ही परमात्मा का रूप है।
मेरी वारी पत्त्यां दी पंड सिल्ल्हिी हो गई मिट्टी दी कड़ाही तेरी काहनूं पिल्ली हो गई तेरे सेक नूं कीह वज्ज्या दुगाड़ा नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे भट्ठी वालीए।