गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

तुम एक बार प्रिय आ जाओ.../ रचना एवं स्वर : माया गोविन्द (१९४०-२०२२)

https://youtu.be/t7NWereIXsk?si=igN7IHKsXbyvRyXX

तुम एक बार प्रिय आ जाओ,
तो आँचल भर सुहाग  ओढ़ूँ।।

काजल आँजूं 
पायल बांधूं 
दृग में झांकूं 
दर्पण तोडूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...

आशायें अलख जगाती हैं
बीमार कल्पना के द्वारे
अधरों ने बंद किवाड़ किए 
नैना जीते, बिना हारे
कोलाहल के बाजारों में
वंदन के छंद बिके सारे
ननदी जैसी नटखट संथ्या 
भर-भर सिंदूर ताने  मारे
तुम मेरा सम्बोधन वर लो
मैं टूटा चन्दन तन जोड़ूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...

कलियां चटकें, डाली लचके 
माली विहंसे, भौंरे झूमे
भौरों के पंख पराग पगे
माली कलियां तोड़े चूमे
एक रसिक और एक व्यापारी
एक लूटे एक बेचे  रितु में
सम्मान सहित मुरझा जाती
मैं खिलती अगर किसी वन में
तुम पवन बनो मुझको छू दो
मैं जूठी पंखुरियां  तोड़ूं ।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

ज़िस्म ये रूह है, मिटटी है, ख़ला है, क्या है ? / ग़ज़ल : अरुण मिश्र / संगीत एवं स्वर : केवल कुमार

 https://youtu.be/LezXhC6AMKs?feature=shared


Gazal by Arun Mishra, Lucknow.
Composed and sung by Kewal Kumar.

ज़िस्म ये रूह है, मिटटी है, ख़ला है, क्या है ?
रूह है, आग है, पानी है, हवा है, क्या है ?

आँखें इसरार करें, लब पे मुसल्सल इनक़ार
कोई आदत है, जिद है, के अदा है, क्या है?

कभी डसती, कभी लहराती, कभी छा जाती
कोई नागिन है, ज़ुल्फ़ है, कि घटा है, क्या है?

साँस की बंसरी को रोज़ नए सुर देता
कोई फ़नकार है, शायर है, ख़ुदा है, क्या है ?

हुस्न को इश्क़ के रखते हो, मुक़ाबिल जो 'अरुन'
है ये ख़ुद्दारी, ज़ुनूं है, कि अना है, क्या है?

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

*हे ! राम-राम, हे ! राम चन्द्र.../ कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/7Qxp38Kjyc4?si=JjvbOddE8G1TfkgS


 जय  राम,  राम,  जय  रामचन्द्र।
 शोषित- जन- मन-विश्राम,चन्द्र।
 दशरथ -  हृत्व्योम - बिहारी    हे!
 रघुकुल  के  चिर-अभिराम चन्द्र।।

               शुचि, जीवन-मूल्यों के  मापक।
               हे पूर्ण-पुरुष! अग-जग-व्यापक।
               यश-वाहक,   संस्कृति-संवाहक।
               मर्यादाओं       के       संस्थापक।।

    हे!   दीन - हीन   के   मन  के   बल।
    मुनि-हृदय-मीन, तव-भक्ति सुजल।
    हे!    चिर-नवीन- शुभ-आस-रश्मि।
    हे!  आर्त - दुखी- जन    के    संबल।।

               भारत-भुवि  के   गौरव   ललाम।
               हे! संत- सरल- चित- परमधाम।
               निष्काम !  करो  लीला- सकाम।
               हे!  राम,  राम,   जय   राम-राम।।

                                         *

*विजय दशमी की शुभकामनायें*

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

अवलम्ब / कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/CMyjLBVII_s?si=1AqGd7s8FJuM39cb

जीवन संगिनी को समर्पित कर रहा हूँ, जो दो दिन पहले हम सब को छोड़ गईं। 

-अरुण मिश्र. 

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं.../ क़तील शिफ़ाई / गायन : विदुषी शोभा गुर्टू

https://youtu.be/S9q1jgG0qI0  


गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

शम्अ' जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

बच निकलते हैं अगर आतिश-ए-सय्याल से हम
शोला-ए-आरिज़-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं

ख़ुद-नुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं

रब्त-ए-बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन
आश्ना जब तिरे पैग़ाम से जल जाते हैं

जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं

अर्धनारीनटेश्वर स्तोत्र / आदि शंकराचार्य कृत / गायन : कौशिकी चक्रवर्ती / संदीप नारायण

https://youtu.be/8fyGJvG-WhE 


अथ अर्धनारीनटेश्वर स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित

चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय ।
धम्मिल्लकायै च जटाधराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।१।।

आधे शरीर में चम्पापुष्पों-सी गोरी पार्वतीजी हैं और आधे शरीर में कर्पूर के समान गोरे भगवान शंकरजी सुशोभित हो रहे हैं । भगवान शंकर जटा धारण किये हैं और पार्वतीजी के सुन्दर केशपाश सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

कस्तूरिकाकुंकुमचर्चितायै चितारज:पुंजविचर्चिताय ।
कृतस्मरायै विकृतस्मराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।२।।

पार्वतीजी के शरीर में कस्तूरी और कुंकुम का लेप लगा है और भगवान शंकर के शरीर में चिता-भस्म का पुंज लगा है । पार्वतीजी कामदेव को जिलाने वाली हैं और भगवान शंकर उसे नष्ट करने वाले हैं, ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

चलत्क्वणत्कंकणनूपुरायै पादाब्जराजत्फणीनूपुराय ।
हेमांगदायै भुजगांगदाय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।३।।

भगवती पार्वती के हाथों में कंकण और पैरों में नूपुरों की ध्वनि हो रही है तथा भगवान शंकर के हाथों और पैरों में सर्पों के फुफकार की ध्वनि हो रही है । पार्वतीजी की भुजाओं में बाजूबन्द सुशोभित हो रहे हैं और भगवान शंकर की भुजाओं में सर्प सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

विशालनीलोत्पललोचनायै विकासिपंकेरुहलोचनाय ।
समेक्षणायै विषमेक्षणाय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।४।।

पार्वतीजी के नेत्र प्रफुल्लित नीले कमल के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर के नेत्र विकसित कमल के समान हैं । पार्वतीजी के दो सुन्दर नेत्र हैं और भगवान शंकर के (सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि) तीन नेत्र हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

मन्दारमालाकलितालकायै कपालमालांकितकन्धराय ।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।५।।

पार्वतीजी के केशपाशों में मन्दार-पुष्पों की माला सुशोभित है और भगवान शंकर के गले में मुण्डों की माला सुशोभित हो रही है । पार्वतीजी के वस्त्र अति दिव्य हैं और भगवान शंकर दिगम्बर रूप में सुशोभित हो रहे हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

अम्भोधरश्यामलकुन्तलायै तडित्प्रभाताम्रजटाधराय ।
निरीश्वरायै निखिलेश्वराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।६।।

पार्वतीजी के केश जल से भरे काले मेघ के समान सुन्दर हैं और भगवान शंकर की जटा विद्युत्प्रभा के समान कुछ लालिमा लिए हुए चमकती दीखती है । पार्वतीजी परम स्वतन्त्र हैं अर्थात् उनसे बढ़कर कोई नहीं है और भगवान शंकर सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

प्रपंचसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै समस्तसंहारकताण्डवाय ।
जगज्जनन्यैजगदेकपित्रे नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।७।।

भगवती पार्वती लास्य नृत्य करती हैं और उससे जगत की रचना होती है और भगवान शंकर का नृत्य सृष्टिप्रपंच का संहारक है । पार्वतीजी संसार की माता और भगवान शंकर संसार के एकमात्र पिता हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

प्रदीप्तरत्नोज्ज्वलकुण्डलायै स्फुरन्महापन्नगभूषणाय ।
शिवान्वितायै च शिवान्विताय नम: शिवायै च नम: शिवाय।।८।।

पार्वतीजी प्रदीप्त रत्नों के उज्जवल कुण्डल धारण किए हुई हैं और भगवान शंकर फूत्कार करते हुए महान सर्पों का आभूषण धारण किए हैं । भगवती पार्वतीजी भगवान शंकर की और भगवान शंकर भगवती पार्वती की शक्ति से समन्वित हैं । ऐसी पार्वतीजी और भगवान शंकर को प्रणाम है ।।

स्तुति का फल

एतत् पठेदष्टकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी ।
प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकालं भूयात् सदा तस्य समस्तसिद्धि:।।

आठ श्लोकों का यह स्तोत्र अभीष्ट सिद्धि करने वाला हैं । जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, वह समस्त संसार में सम्मानित होता है और दीर्घजीवी बनता है, वह अनन्त काल के लिए सौभाग्य व समस्त सिद्धियों को प्राप्त करता है।

।। इति आदिशंकराचार्य विरचित अर्धनारीनटेश्वरस्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

शनिवार, 26 सितंबर 2026

विशमक्कारा कन्नन.../ ऊथुक्काडु वेंकट सुब्बैयर कृति

https://youtu.be/BW9cokdvOGE  


*विशमक्कारा* तमिल भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है बहुत अधिक शरारती, नटखट या उपद्रवी।
*कन्नन* : तमिल में भगवान श्रीकृष्ण का नाम (कृष्ण) है। 
यह प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत का एक लोकप्रिय पद/गीत है जिसे ऊथुक्काडू वेंकट सुब्ब अय्यर ने रचा है। इस गीत में बचपन में भगवान कृष्ण द्वारा की जाने वाली विभिन्न शरारतों और लीलाओं का वर्णन किया गया है।

*विशमक्कारा कन्नन*
*ऊथुक्काडु वेंकट सुब्बैयर कृति*
*अनुवाद : पी.आर.रामचंदर*

पल्लवी 
विशमक्कारा कन्नन, पोलाधा, विशमक्कारा कन्नन 
अनुपल्लवी 
वेदिक्कयै पट्टू पड़ी विधा विधामय आट्टम आदि, 
नाझिक्कोरु लीलै सेय्यूम, नंदगोपाल कृष्णन। 

चरणम् १.
नीला मेघम पोल इरुप्पन-पडिनाले, 
नेन्जिल वंधु कुडियिरुप्पन, 
कोला पुल्लंगुझल ऊधी गोपीकलाई कल्लम आदि, 
कोंजुम पोधु, कोंजम पोला वेन्नई ठाडी येंद्रु अतामुदन,

 चरणम् २.
पिन्नालाई पिन्नादी इझुप्पन-येथो, 
पेसी पेसी जड़ाई कट्टी अझिप्पन, 
येन्नाथुकु पिन्नलाई नी इझुथाई येंद्रल, 
कन्नझागु वेंडी येंदन करुथाई यिझुथथु येनबन 

चरणम् ३.
पकाथु वीतु पेनाई अज़हिप्पन, मुगारी रागम, 
पाडा सोल्ली वम्बुक्किज़प्पन, 
येनक्कु अथु थेरियादेंद्राल- मुगारी रागमा, 
येनाक्कथु थेरियाथु एंड्राल, नेक्कुरुगी किलि विट्टू, 
अवल विक्की, विक्की अजहुम पोथु, 
इथु ​​थानाडी मुगारी येनबन। 

चरणम् ४. 
वेन्नई पनाई मूडा कूडाथु, ओरिलुल्ला, 
वेन्नई पनाई मूडा कूडाथु , 
इवान वन्थु विझुंगिनालुम केतका कूडाथु , 
इवान अम्मा कित्ता सोल्ला कूडाथु, 
सोल्ली विट्टल अट्टहासम थांगा मुदियाथु। 
सुम्मा ओरु पेचुक्कम थिरुडन येंद्रु सोलि विट्टल, 
अम्मा , पट्टी, अथाई अथानायुम थिरुडन येनबान 

*हिन्दी अनुवाद :*

पल्लवी :
शरारती कृष्ण, भयानक, शरारती कृष्ण। 

अनुपल्लवी : 
हास्य गीत गाती, तरह-तरह से नृत्य करती, 
नंदगोपाल के पुत्र कृष्ण, 
हर आधे घंटे में एक नाटक करते।
 
चरणम १. 
वह नीले बादल के समान होगा—और यदि वह गाए, 
तो वह आकर हमारे हृदय में बस जाएगा। 
और जब वह अपनी बांसुरी बजाते हुए और 
झूठी प्रेम-प्रसंग की बातें करते हुए गोपियों से पूछेगा, 
“हे, मुझे थोड़ा सा मक्खन दो।” 

चरणम् २. 
वह पीछे से उनकी चोटी खींचेगा और 
मीठी-मीठी बातें करेगा और 
धीरे-धीरे उनकी चोटी खोलेगा। 
और यदि वे पूछें, “आपने मेरी चोटी क्यों खींची?”, 
तो वह कहेगा, “मेरे मन ने इसे और सुंदर आँखें 
पाने के लिए खींचा।” 

चरणम् ३. 
वह पड़ोस के घर की लड़की को बुलाएगा और 
उससे मुकारी राग गाने को कहेगा और 
उसे बेवजह परेशान करेगा। 
और मान लीजिए वह कहे, “मुझे नहीं पता, 
क्या यह मुकारी राग है, मुझे नहीं पता”, 
तो वह दया का नाटक करते हुए उसे चुटकी काटेगा। 
और जब वह बेकाबू होकर रोने लगेगी, 
तो वह कहेगा, “यह मुकारी राग है।” 

चरणम् ४. 
उन्होंने कहा था कि “मक्खन का पात्र बंद नहीं किया जाना चाहिए। शहर के सभी मक्खन के पात्र बंद नहीं किए जाने चाहिए।”