रविवार, 21 जून 2026

राम की जल समाधि' - महान गीतकार भारत भूषण के स्वर में...

https://youtu.be/3VGNls6nzmc


कविता की पृष्ठभूमि--

   भगवान श्री राम के अवतार लेने का  प्रयोजन पूर्ण होने पर, ब्रह्मा जी ने कहा आप जैसे चाहें वैसे विष्णु-लोक में आएँ। केवल योगमाया सीतादेवी आपको यथार्थ रूप को पहचानती हैं। ब्रह्मा जी की बात सुनकर वे सरयू नदी में प्रवेश कर, अपने वैष्णव तेज रूप में  समा गए थे। उस समय अप्सराओं ने नृत्य किया , गंधर्वों ने गान किया, देवताओं ने पुष्पवर्षा की। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के उत्तर काण्ड के ११० वें सर्ग में इसका वर्णन है। 

    भारत भूषण जी ने एक कवि सम्मलेन में कहा था कि वे सरयू-तट पर बैठे थे, उन्हें रामायण का उपरोक्त प्रसंग याद आया। वे वहाँ दिव्य  भावों में खो गये। कैसे राम को सीता का स्मरण ने विचलित किया होगा। विशाल राज्य,सारा सुख तुच्छ लगा होगा। सीता का बिछोह असहनीय हो गया होगा। कैसे जल में प्रवेश किया होगा। पानी पहले घुटनों तक, फिर नाभि से होता हुआ छाती तक आया होगा। राम कैसे सरयू में आगे बढे होंगे। माँ सीता और उनकी सखियों ने कैसे उनका स्वागत किया होगा। इस तरह उनकी यह कविता बन गयी। 

   आप यह कालजयी रचना पढ़ें, सुनें और महसूस करें। शब्द और स्वर, एक दिव्य अनुभूति दे जाते हैं। 

राम की जल समाधि

पश्चिम में ढलका सूर्य 
उठा वंशज सरयू की रेती से 
हारा-हारा रीता-रीता 
निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम 
निःशब्द अधर, पर रोम-रोम 
था टेर रहा सीता-सीता 

किसलिए रहे अब ये शरीर 
ये अनाथ मन किसलिए रहे 
धरती को मैं किसलिए सहूँ 
धरती मुझको किसलिए सहे

तू कहाँ खो गई वैदेही 
वैदेही तू खो गई कहाँ 
मुरझे राजीव नयन बोले 
काँपी सरयू, सरयू काँपी 

देवत्व हुआ लो पूर्णकाम 
नीली माटी निष्काम हुई 
इस स्नेहहीन देह के लिए 
अब साँस-साँस संग्राम हुई 

ये राजमुकुट ये सिंहासन 
ये दिग्विजयी वैभव अपार 
ये प्रिया-हीन जीवन मेरा 
सामने नदी की अगम धार

माँग रे भिखारी-लोक माँग 
कुछ और माँग अंतिम बेला 
आदर्शों के जल-महल बना 
फिर राम मिले न मिले तुझको 
फिर ऐसी शाम ढले न ढले 

ओ खंडित प्रणयबंध मेरे 
किस ठौर कहाँ तुझको जोड़ूँ 
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य 
बोलूँ भी तो किससे बोलूँ 
सिमटे अब ये लीला सिमटे 
भीतर-भीतर गूँजा भर था 
छप से पानी में पॉंव पड़ा 
चरणों से लिपट गई सरयू 

फिर लहरों पर वाटिका खिली 
रतिमुख सखियाँ नतमुख सीता 
सम्मोहित मेघबरन बरसे 
पानी घुटनों-घुटनों आया 
आया घुटनों-घुटनों पानी 

फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा 
लहरों-लहरों धारा-धारा 
व्याकुलता फिर पारा-पारा 

फिर एक हिरन -सी किरण देह 
दौड़ती चली आगे-आगे 
नयनों में जैसे बाण सधा 
दो पाँव उड़े जल में आगे 

पानी लो नाभि-नाभि आया 
आया लो नाभि-नाभि पानी 
जल में तम, तम में जल बहता  
ठहरो बस, और नहीं, कहता 
जल में कोई जीवित दहता 

फिर एक तपस्विनी शांत-सौम्य 
धक्-धक् लपटों -सी निर्विकार 
सशरीर सत्य-सी सन्मुख थी 

उन्माद नीर चीरने लगा 
पानी छाती-छाती आया 
आया छाती-छाती पानी 

भीतर लहरें, बाहर लहरें 
आगे जल था, पीछे जल था 
केवल जल था, वक्ष स्थल था 
वक्ष-स्थल तक केवल जल था 

जल पर तिरता था नीलकमल 
बिखरा -बिखरा-सा नीलकमल 
कुछ और-और-सा नीलकमल 

फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर 
धरती से नभ तक जगर-मगर 
दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे 
जैसे सूरज के हस्ताक्षर 

बाँहों के चन्दन घेरे से 
दीपित जयमाल उठी ऊपर 
सर्वस्व सौंपता शीश झुका 
लो शून्य राम, लो राम लहर 

फिर लहर-लहर लहरें-लहरें 
सरयू-सरयू सरयू-सरयू 
लहरें -लहरें लहरें-लहरें 
केवल तम ही तम
तम ही तम 

जल ही जल 
जल ही जल केवल 
हे राम-राम 
हे राम-राम 
हे राम-राम 
हे राम-राम

अज़ दैर-ए-मुग़ाँ आयम बे-गर्दिश-ए-सहबा मस्त.../ अल्लामा इक़बाल / गायन : मुंशी रज़ीउद्दीन

 https://youtu.be/-R3OxAAlOx8


अज़ दैर-ए-मुग़ाँ आयम बे-गर्दिश-ए-सहबा मस्त
दर मंज़िल-ए-ला बूदम अज़ बादः-ए-इल्ला मस्त

मैं पीर-ए-मुग़ाँ के दैर (मय-ख़ाने) से शराब पिए बिना ही ब-हालत-ए-मस्ती आ रहा हूँ, मैं ‘ला’ (कोई नहीं) की मंज़िल में ‘इल्ला’ (इस के सिवाय) की शराब से मस्त रहा।

दानम कि निगाह-ए-ऊ ज़र्फ़-ए-हमः कस बीनद
कर्दस्त मरा साक़ी अज़ 'इश्वः-ओ-ईमा मस्त

मुझे मालूम है कि उसकी निगाह हर एक का ज़र्फ़ देख लेती है, चुनाँचे साक़ी ने मुझे अपने नाज़-ओ-अदा ही से मस्त कर दिया है।

वक़्तस्त कि ब-गुशायम मय-ख़ानः-ए-रूमी बाज़
पीरान-ए-हरम दीदम दर सेहन-ए-कलीसा मस्त

अब वक़्त आ गया है कि मैं मौलाना रूम का मय-ख़ाना फिर से खोल दूँ, मैंने पीरान-ए-हरम को कलीसा के सहन में मस्त देखा है।

ईं कार-ए-हकीमे नीस्त दामान-ए-कलीमे गीर
सद बंदः-ए-साहिल मस्त यक बंदः-ए-दरिया मस्त

यह काम समझदार लोगों का नहीं है, तुम तो हज़रत मूसा के दामन को पकड़ लो, साहिल पर मस्त रहने वाले सौ आदमी भी समुंदर में डूबकर मस्त होने वाले एक व्यक्ति के बराबर नहीं होते।

दिल रा ब-चमन बुर्दम अज़ बाद-ए-चमन अफ़सुर्द
मीरद ब-ख़याबाँ-हा ईं लालः-ए-सहरा मस्त

मैं अपने दिल को चमन में ले गया, वह खिलने के बजाए उल्टा बाग़ की हवा से अफ़्सुर्दा हो गया, सहरा में मस्त रहने वाला यह लाला (मेरा दिल) फुलवारियों में मुरझा के रह जाता है।

अज़ हर्फ़-ए-दिल आवेज़िश असरार-ए-हरम पैदा
दी काफ़िरके दीदम दर वादी-ए-बतहा मस्त

उसकी दिल-आवेज़ आवाज़ से हरम के असरार ज़ाहिर हो रहे थे, कल मैं ने बतहा की वादी में एक काफ़िर को बे-ख़ुदी के आलम में ये कहते हुए देखा:

सीनास्त कि फ़ारान अस्त या-रब चे मक़ाम अस्त ईं
हर ज़र्रः-ए-ख़ाक-ए-मन चश्मेस्त तमाशा मस्त

यह वादी-ए-सीना है या फ़ारान की वादी, या रब यह कौन सी जगह है, कि मेरी ख़ाक-ए-बदन का हर ज़र्रा आँख बन कर मस्त-ए-तमाशा है।

शनिवार, 20 जून 2026

अन्नपूर्णे विशालाक्षी.../ मुथुस्वामी दीक्षितार कृति / गायन : मीरा राम मोहन

https://youtu.be/ei0kt6QkaZk?si=FSNBlyvJRzwmYeox


*संगीत रचना : मुथुस्वामी दीक्षितार*
*गायन : मीरा राम मोहन*
*भाषा: संस्कृत*


*पल्लवी*

अन्नपूर्णे विशालाक्षी (रक्षा)
अखिला भुवन साक्षी कटाक्षी

*अनुपल्लवी*

उन्नत गर्त्ता तीरा विहारिणी
ओंकारिणी दुरितादि निवारिणी

*मध्यकालम्*

पन्नगभरण रजनी पुराणी
परमेश्वर विश्वेश्वर भास्वरी (अन्नपूर्णे)

*चरणम्*

पायसअन्नपुरिता माणिक्य
पात्र हेमादर्वी विधृतकरे कायाजादि रक्षणा
निपुणतारे
कंचनमय भूषणा अंबरधारे

*मध्यकालम्*

तोयाजासनादि सेवितापारे तुम्बुरु नारदादि नुता वारे
त्रयातिता मोक्षप्रदा चतुरे त्रिपदा शोभिता गुरुगुहासादरे

*अर्थ: (टी.के. गोविंदा राव की पुस्तक से)*

हे अन्नपूर्णा देवी, विशालाक्षी - विशाल नेत्रों वाली, कृपया मेरी रक्षा करें। आप संसार में घटित होने वाली सभी घटनाओं की साक्षी हैं ("अखिलभुवनसाक्षी")। कृपया मुझे अपनी दृष्टि से अनुग्रहित करें ("कटाक्षी")। वह प्रसिद्ध ("उन्नत") गर्त्ततिरा-कुझिक्कराई ("गर्त-तिरा-विहारिणी") में निवास करती हैं। वह ओंकार ("ओंकारिणी") के रूप में हैं। वह दुखों ("दुरितादि") को दूर करती हैं ("निवारिणी")। वह भगवान शिव की संगिनी ("रजनी") हैं, जो स्वयं को सर्पों ("पन्नग") से सुशोभित करते हैं ("आभरण")। वह प्राचीन ("पुरानी") हैं। वह भगवान परमेश्वर ("विश्वेश्वर") की ज्योति ("भास्वरी") हैं। वह एक हाथ में रत्नजड़ित पात्र (मणिक्य पात्र) मीठे चावल-पायसन से भरा हुआ (पुरिता) और दूसरे हाथ में सोने का चम्मच (दर्वी) धारण किए हुए हैं। वह कामदेव और अन्य लोगों की रक्षा करने में निपुण हैं। वह अलंकृत सोने के आभूषणों और सुनहरे रेशम से सुशोभित हैं। ब्रह्मा और तुम्बुरु एवं नारद जैसे प्रख्यात ऋषियों द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वह धर्म-अर्थ-काम से परे मोक्ष प्रदान करने में कुशल हैं।वह गुरुगुहा ("त्रिपदा सोभिता") ("गुरुगुहा-सदारे") की प्रिय मां हैं।


गुरुवार, 18 जून 2026

अम्बा स्तवम् / ब्रह्मर्षि सदाशिवन कृत

https://youtu.be/O_0PVXI4RJ0?si=Z7MhM4zarVmYwku1


वन्देऽहन्तेऽनन्ते सुपदर -
विन्दे विन्दे शन्ते निजसुख -
कन्देऽमन्दे स्पन्दे शुभकरि
बहुदयहृदययुते ।
मायेऽमेये लीये पुरहर -
जायेऽजेये ज्ञेये ननु भव -
दीये ध्येयेऽभ्येये निरुपम -
पदि हृदि मृदितमृते ॥१॥

रुन्धे हतनतबन्धे मम हृदयन्ते स्मितजितकुन्दे
अमलतररूपेऽपापे दीपे भवकूपे पतितं व्यथितं
देवि समुद्धर करुणाजलराशे सुरुचिरवेषे॥२॥

धीरे वीरे शूरे सदमृत -
धारे तारेऽसारे बत भव -
कारागारे घोरे निपतित -
मव शिशुमतुलबले ।
अम्बालम्बे लम्बोदरपरि -
पाले बाले काले खलुजग -
दीशे धीशेऽनीशे हृदि शिव -
मनुमनुदिनममले ॥३॥

शिष्टहितैषिणि दुष्टविनाशिनि
कष्टविभेदिनि दृष्टिविनोदिनि
सङ्कटकण्टकभिन्दनकुशलकले सकले सबले
श्रद्धाबद्धे न्यस्ताभयहस्ते सुरगणविनुते॥४॥

श्रेष्ठे प्रेष्ठे ज्येष्ठे हिमगिरि -
पुष्टे जुष्टे तिष्ठे: शिवपरि -
निष्ठे स्पष्टे हृष्टे मम हृदि
मुनिजननुतिमुदिते ।
आद्ये वेद्ये वैद्ये त्रिजगति
रामे वामे श्यामे कुरु करु -
णान्ते दान्ते शान्ते भयहर -
भगवति सति शिवदे ॥५॥

बुधवार, 17 जून 2026

दर्द हो दिल में तो दवा कीजे.../ दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए.../ शायर : मिर्ज़ा ग़ालिब / गायन : दीक्षा तूर

https://youtu.be/aDi1Bj98-mY?si=gYq5AqmA63uEnLLM


दर्द हो दिल में तो दवा कीजे
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजे

हमको फ़रियाद करनी आती है
आप सुनते नहीं तो क्या कीजे

रंज उठाने से भी ख़ुशी होगी
पहले दिल दर्द आशना कीजे

मौत आती नहीं कहीं, ग़ालिब
कब तक अफ़सोस जीस्त का कीजे

************

दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फ़लत-शिआरी हाए हाए

तेरे दिल में गर न था आशोब-ए-ग़म का हौसला
तू ने फिर क्यूँ की थी मेरी ग़म-गुसारी हाए हाए

क्यूँ मिरी ग़म-ख़्वार्गी का तुझ को आया था ख़याल
दुश्मनी अपनी थी मेरी दोस्त-दारी हाए हाए

उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बाँधा तो क्या
उम्र को भी तो नहीं है पाएदारी हाए हाए

ज़हर लगती है मुझे आब-ओ-हवा-ए-ज़िंदगी
या'नी तुझ से थी इसे ना-साज़गारी हाए हाए

रविवार, 14 जून 2026

मैं गीत बेचकर घर आया.../ कवि : स्वर्गीय भारत भूषण

https://youtu.be/Y4QBJXGdpRM?si=s_IxrEZuFf21J3ys


मैं गीत बेचकर घर आया, सीमेंट ईंट लोहा लाया 
कवि-मन माया ने भरमाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !

जनमा था आँसू गाने को, खोया झूठी मुसकानों  में 
भीतर का सुख खोजता फिरा , बाहर से सजी दुकानों में 
मैं अश्रु बेचकर घर आया, प्लास्टिक के गुलदस्ते लाया 
अपनी आत्मा को बहकाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना ! 

शब्दों-शब्दों सौंदर्य गढ़ा, नगरों-नगरों नीलाम किया 
संतों की संगत छोड़ किसी, वैश्या के घर विश्राम किया 
मैं प्यार  बेचकर घर आया, चुटकी भर सुविधाएँ लाया 
क्या करना था क्या कर आया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना ! 

सारे दागों को ढके रहा, छंदों की शिल्पित चादर से 
गोरे कागज काले करता, टेढ़े-मेढ़े हस्ताक्षर से 
मैं शर्म बेचकर घर आया, गहरे रंग का चश्मा लाया 
दर्पण पर परदा लटकाया हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !

शुक्रवार, 12 जून 2026

नृसिंह आरती हिंदी में – अर्थ के साथ

https://youtu.be/aw83W-y-0_A?si=0KR35wVa7YNXjbIr

(१)
नमस्ते नरसिंहाय 
    प्रह्लादाह्लाद-दायिने। 
   हिरण्यकशिपोर्वक्षः- 
        शिला-टङ्क-नखालये।।


मैं नृसिंह भगवान्‌ को प्रणाम करता हूँ जो प्रह्लाद महाराज को आनन्द प्रदान करने वाले हैं तथा जिनके नख दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पाषाण सदृश वक्षस्थल के ऊपर छेनी के समान हैं।


(२) 
  इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो 
       यतो यतो यामि ततो नृसिंहः। 
बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो 
नृसिंहमादि शरणं प्रपद्ये॥


नृसिंह भगवान्‌ यहाँ है और वहाँ भी हैं। मैं जहाँ कहीं भी जाता हॅूँ वहाँ नृसिंह भगवान्‌ हैं। वे हृदय में हैं और बाहर भी हैं। मैं नृसिंह भगवान्‌ की शरण लेता हूँ जो समस्त पदार्थों के स्रोत तथा परम आश्रय हैं।


(3) 
तव कर-कमल-वरे नखम्‌ 
अद्‌भुत-श्रृंङ्गम्‌ 
दलित-हिरण्यकशिपु-
तनु-भृंङ्गम्‌ 
केशव धृत-नरहरिरूप 
जय जगदीश हरे॥


हे केशव! हे जगत्पते! हे हरि! आपने नरसिंह का रूप धारण किया है आपकी जय हो। जिस प्रकार कोई अपने नाखूनों से भ्रमर को आसानी से कुचल सकता है उसी प्रकार भ्रमर सदृश दैत्य हिरण्यकशिपु का शरीर आपके सुन्दर कर-कमलों के नुकीले नाखूनों से चीर डाला गया है।