https://youtu.be/GfEfplHXJ2s
rashmi rekh
सोमवार, 2 नवंबर 2026
ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ.../ शायर : सदा अम्बालवी / गायन : डाॅ. राधिका चोपड़ा
ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ
तुझे एक बार देखा तो ये दिल ने दी दु'आएँ
ये सियाही क्या उतारे छवी रूप की तुम्हारे
तिरे लब खुलें सनम जब तो कली को लाज आए
तू सँवार ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ ये दो नैन रख के आगे
मिरे बोल बे-नवा हैं तिरे साज़ बे-सदा हैं
रविवार, 1 नवंबर 2026
श्री लक्ष्मी सुक्तम्.../ (श्री सूक्त) / ऋग्वेद
https://youtu.be/M8u5uoySFJA?si=37vwJ4LgKZdxe8hY
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥
फलश्रुति : श्लोक २४
पद्मप्रिये पद्मिनि पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥
शब्दार्थ और हिंदी भावार्थ
पद्मप्रिये : जिन्हें कमल का फूल अत्यंत प्रिय है।
पद्मिनि : जो कमल के समान कोमल और सुंदर हैं (या जो कमल धारण करती हैं)।
पद्महस्ते : जिनके हाथों में कमल का पुष्प सुशोभित है।
पद्मालये : जिनका निवास स्थान कमल का फूल है।
पद्मदलायताक्षि : जिनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों के समान विशाल और सुंदर हैं।
विश्वप्रिये : जो समस्त संसार को प्रिय हैं (पूरे विश्व की चहेती हैं)।
विष्णुमनोऽनुकूले : जो भगवान श्री विष्णु के मन के अनुकूल चलने वाली उनकी प्रिय भार्या हैं।
त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व : हे देवी! आप अपने उन दिव्य चरण-कमलों को मेरे हृदय और मेरे गृह में स्थापित करें (मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें)।
सरल अर्थ
हे कमल को प्रेम करने वाली, कमल के समान सुंदर, हाथों में कमल धारण करने वाली, कमल में निवास करने वाली और कमल की पंखुड़ियों जैसे विशाल नेत्रों वाली माता महालक्ष्मी! आप पूरे संसार की प्रिय हैं और भगवान विष्णु के मन को आनंद देने वाली हैं। हे माँ, आप अपने पावन चरण-कमलों को सदैव के लिए मेरे हृदय और मेरे घर में स्थापित कर दीजिए।
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
आशियाने की बात करते हो.../ शायर : जावेद क़ुरैशी / गायन : प्रियंका बर्वे
https://youtu.be/toK3KLzVjD8?si=sxY_4xA8arhrgrH_
आशियाने की बात करते हो
दिल जलाने की बात करते हो
दिल जलाने की बात करते हो
सारी दुनिया के रंज-ओ-ग़म दे कर
मुस्कुराने की बात करते हो
हम को अपनी ख़बर नहीं यारो
तुम ज़माने की बात करते हो
ज़िक्र मेरा सुना तो चिढ़ के कहा
किस दिवाने की बात करते हो
हादसा था गुज़र गया होगा
किस के जाने की बात करते हो
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
तुम एक बार प्रिय आ जाओ.../ रचना एवं स्वर : माया गोविन्द (१९४०-२०२२)
https://youtu.be/t7NWereIXsk?si=igN7IHKsXbyvRyXX
तुम एक बार प्रिय आ जाओ,
तो आँचल भर सुहाग ओढ़ूँ।।
तो आँचल भर सुहाग ओढ़ूँ।।
काजल आँजूं
पायल बांधूं
दृग में झांकूं
दर्पण तोडूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
आशायें अलख जगाती हैं
बीमार कल्पना के द्वारे
अधरों ने बंद किवाड़ किए
नैना जीते, बिना हारे
कोलाहल के बाजारों में
वंदन के छंद बिके सारे
ननदी जैसी नटखट संथ्या
भर-भर सिंदूर ताने मारे
तुम मेरा सम्बोधन वर लो
मैं टूटा चन्दन तन जोड़ूं।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
कलियां चटकें, डाली लचके
माली विहंसे, भौंरे झूमे
भौरों के पंख पराग पगे
माली कलियां तोड़े चूमे
एक रसिक और एक व्यापारी
एक लूटे एक बेचे रितु में
सम्मान सहित मुरझा जाती
मैं खिलती अगर किसी वन में
तुम पवन बनो मुझको छू दो
मैं जूठी पंखुरियां तोड़ूं ।।
तुम एक बार प्रिय आ जाओ...
बुधवार, 28 अक्टूबर 2026
ज़िस्म ये रूह है, मिटटी है, ख़ला है, क्या है ? / ग़ज़ल : अरुण मिश्र / संगीत एवं स्वर : केवल कुमार
https://youtu.be/LezXhC6AMKs?feature=shared
Gazal by Arun Mishra, Lucknow.
Composed and sung by Kewal Kumar.
Composed and sung by Kewal Kumar.
ज़िस्म ये रूह है, मिटटी है, ख़ला है, क्या है ?
रूह है, आग है, पानी है, हवा है, क्या है ?
आँखें इसरार करें, लब पे मुसल्सल इनक़ार
कोई आदत है, जिद है, के अदा है, क्या है?
कभी डसती, कभी लहराती, कभी छा जाती
कोई नागिन है, ज़ुल्फ़ है, कि घटा है, क्या है?
साँस की बंसरी को रोज़ नए सुर देता
कोई फ़नकार है, शायर है, ख़ुदा है, क्या है ?
हुस्न को इश्क़ के रखते हो, मुक़ाबिल जो 'अरुन'
है ये ख़ुद्दारी, ज़ुनूं है, कि अना है, क्या है?
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
*हे ! राम-राम, हे ! राम चन्द्र.../ कविता / अरुण मिश्र
https://youtu.be/7Qxp38Kjyc4?si=JjvbOddE8G1TfkgS
जय राम, राम, जय रामचन्द्र।
शोषित- जन- मन-विश्राम,चन्द्र।
दशरथ - हृत्व्योम - बिहारी हे!
रघुकुल के चिर-अभिराम चन्द्र।।
शुचि, जीवन-मूल्यों के मापक।
हे पूर्ण-पुरुष! अग-जग-व्यापक।
यश-वाहक, संस्कृति-संवाहक।
मर्यादाओं के संस्थापक।।
हे! दीन - हीन के मन के बल।
मुनि-हृदय-मीन, तव-भक्ति सुजल।
हे! चिर-नवीन- शुभ-आस-रश्मि।
हे! आर्त - दुखी- जन के संबल।।
भारत-भुवि के गौरव ललाम।
हे! संत- सरल- चित- परमधाम।
निष्काम ! करो लीला- सकाम।
हे! राम, राम, जय राम-राम।।
*
*विजय दशमी की शुभकामनायें*
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026
अवलम्ब / कविता / अरुण मिश्र
https://youtu.be/CMyjLBVII_s?si=1AqGd7s8FJuM39cb
जीवन संगिनी को समर्पित कर रहा हूँ, जो दो दिन पहले हम सब को छोड़ गईं।
-अरुण मिश्र.
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