बुधवार, 23 सितंबर 2026

https://youtu.be/mq6PzpD3tTU  


झूमें जहर चरण के नीचे मैं उमंग में गाऊँ.
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में,
यह बाँसुरी बजी अविनाशी के संदेह गहन में
अस्तित्वों के अनस्तित्व में,महाशांति के तल में,
यह बाँसुरी बजी शून्यासन की समाधि निश्चल में।
कम्पहीन तेरे समुद्र में जीवन-लहर उठाऊँ
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


अक्षयवट पर बजी बाँसुरी,गगन मगन लहराया
दल पर विधि को लिए जलधि में नाभि-कमल उग आया
जन्मी नव चेतना, सिहरने लगे तत्व चल-दल से,
स्वर का ले अवलम्ब भूमि निकली प्लावन के जल से।
अपने आर्द्र वसन की वसुधा को फिर याद दिलाऊँ.
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


फूली सृष्टि नाद-बंधन पर, अब तक फूल रही है,
वंशी के स्वर के धागे में धरती झूल रही है।
आदि-छोर पर जो स्वर फूँका,दौड़ा अंत तलक है,
तार-तार में गूँज गीत की,कण-कण-बीच झलक है।
आलापों पर उठा जगत को भर-भर पेंग झूलाऊँ.
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


जगमग ओस-बिंदु गुंथ जाते सांसो के तारों में,
गीत बदल जाते अनजाने मोती के हारों में।
जब-जब उठता नाद मेघ,मंडलाकार घिरते हैं,
आस-पास वंशी के गीले इंद्रधनुष तिरते है।
बाँधू मेघ कहाँ सुरधनु पर? सुरधनु कहाँ सजाऊँ?
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


उड़े नाद के जो कण ऊपर वे बन गए सितारे,
नीचे जो रह गए, कहीं है फूल, कहीं अंगारे।
भीगे अधर कभी वंशी के शीतल गंगा जल से,
कभी प्राण तक झुलस उठे हैं इसके हालाहल से।
शीतलता पीकर प्रदाह से कैसे ह्रदय चुराऊँ?
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


इस वंशी के मधुर तान पर माया डोल चुकी है
पटावरण कर दूर भेद अंतर का खोल चुकी है।
झूम चुकी है प्रकृति चांदनी में मादक गानों पर,
नचा चुका है महानर्तकी को इसकी तानों पर।
विषवर्षी पर अमृतवर्षिणी का जादू आजमाऊँ,
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


यह बाँसुरी बजी, मधु के सोते फूटे मधुबन में,
यह बाँसुरी बजी, हरियाली दौड़ गई कानन में।
यह बाँसुरी बजी, प्रत्यागत हुए विहंग गगन से,
यह बाँसुरी बजी, सरक विधु चरने लगा गगन से।
अमृत सरोवर में धो-धो तेरा भी जहर बहाऊँ।
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


यह बाँसुरी बजी, पनघट पर कालिंदी के तट में,
यह बाँसुरी बजी, मुरदों के आसन पर मरघट में।
बजी निशा के बीच आलुलायित केशों के तम में,
बजी सूर्य के साथ यही बाँसुरी रक्त-कर्दम में।
कालिय दह में मिले हुए विष को पीयूष बनाऊँ.
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


फूँक-फूँक विष लपट, उगल जितना हो जहर ह्रदय में,
वंशी यह निर्गरल बजेगी सदा शांति की लय में।
पहचाने किस तरह भला तू निज विष का मतवाला?
मैं हूँ साँपों की पीठों पर कुसुम लादने वाला।
विष दह से चल निकल फूल से तेरा अंग सजाऊँ
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


ओ शंका के व्याल! देख मत मेरे श्याम वदन को,
चक्षुःश्रवा! श्रवण कर वंशी के भीतर के स्वर को।
जिसने दिया तुझको विष उसने मुझको गान दिया है,
ईर्ष्या तुझे, उसी ने मुझको भी अभिमान दिया है।
इस आशीष के लिए भाग्य पर क्यों न अधिक इतराऊँ?
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।


विषधारी! मत डोल, कि मेरा आसन बहुत कड़ा है,
कृष्ण आज लघुता में भी साँपों से बहुत बड़ा है।
आया हूँ बाँसुरी-बीच उद्धार लिए जन-गण का,
फन पर तेरे खड़ा हुआ हूँ भार लिए त्रिभुवन का।
बढ़ा, बढ़ा नासिका रंध्र में मुक्ति-सूत्र पहनाऊँ
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

कालभैरव अष्टकम्.../ आदि शंकराचार्य विरचित / गायन : माधवी मधुकर झा

https://youtu.be/BEPZqeBSeig  



देवराज सेव्यमान पावनाङ्घ्रि पङ्कजं
व्यालयज्ञ सूत्रमिन्दु शेखरं कृपाकरम् 
नारदादि योगिवृन्द वन्दितं दिगंबरं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥ १॥ 


भानुकोटि भास्वरं भवाब्धितारकं परं
नीलकण्ठम् ईप्सितार्थ दायकं त्रिलोचनम्।
कालकालम् अंबुजाक्षम् अक्षशूलम् अक्षरं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥२॥ 

शूलटङ्क पाशदण्ड पाणिमादि कारणं
श्यामकायम् आदिदेवम् अक्षरं निरामयम्।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥३॥ 

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
विनिक्वणन् मनोज्ञहेमकिङ्किणी लसत्कटिं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥४॥ 

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं
कर्मपाश मोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।
स्वर्णवर्णशेषपाश शोभिताङ्गमण्डलं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ५॥ 

रत्नपादुका प्रभाभिराम पादयुग्मकं
नित्यम् अद्वितीयम् इष्टदैवतं निरञ्जनम्।
मृत्युदर्पनाशनं कराळदंष्ट्रमोक्षणं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥६॥ 

अट्टहास भिन्नपद्मजाण्डकोश सन्ततिं
दृष्टिपातनष्टपाप जालमुग्रशासनम्।
अष्टसिद्धिदायकं कपाल मालिकन्धरं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥७॥ 

भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोक पुण्यपापशोधकं विभुम्।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥८॥ 

कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम्।
शोक मोह दैन्य लोभ कोप ताप नाशनं
ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रि सन्निधिं ध्रुवम् ॥९॥ 

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकं संपूर्णम्॥

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

बन्दउं चरण सरोज तिहारे.../ सन्त सूरदास / गायन : स्वर्णिमा गोसाईं

https://youtu.be/QUhyxQ5ij-c  


बंदौ चरन-सरोज तिहारे ।
सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान-पियारे।

जे पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तैं नहिं टारे।
जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारे ।।

जे पद-पदुम-परस जल-पावन-सुरसरि-दरस कटत अघ भारे।
जे पद-पदुम-परस रिषि-पतिनी, बलि, नृग, ब्याध, पतित बहु तारे।।

जे पद-पदुम रमत बृंदाबन अहि-सिर धरि,  अगनित रिपु मारे।
जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनी सरबस दै, सुत-सदन बिसारे ।। 

जे पद-पदुम रमत पांडव-दल, 
दूत भए, सब काज सँवारे।
सूरदास तेई पद-पंकज, त्रिबिध-ताप-दुख-हरन हमारे ।।


भावार्थ :

प्राणप्यारे त्रिभंगसुन्दर कमलदललोचन श्यामसुन्दर! 
मैं आपके चरणकमलों की वन्दना करता हूँ। 
(प्रभो! आपके) जो चरणकमल भगवान् शंकर के 
सदा (परम) धन हैं, (जिन्हें) सन्धुसुता लक्ष्मी जी अपने 
हृदय से कभी दूर नहीं करतीं, (अपने) पिता हिरण्यकशिपु 
के क्रोध से कष्ट पाते हुए भी प्रह्लाद जी ने जिन पादपद्मों को मन, वचन और कर्म से सँभाल रखा (घोर कष्ट में भी जिनको 
वे भूले नहीं), जिन पादकमलों के स्पर्श से पवित्र हुआ जल (पादोदक) ही भगवती गंगा हैं, जिनका दर्शन करने से ही महान् पाप भी नष्ट हो जाते हैं, जिन चरणों का स्पर्श करके ऋषि पत्नी अहल्या तथा दैत्यराज बलि, राजा नृग, व्याध एवं (दूसरे भी) बहुत से पतित मुक्त हो गये, जो चरणकमल वृन्दावन में विचरण करते थे, (जिन्हें) कालियनाग के सिर पर (आपने) धरा और (जिन चरणों से व्रज में चलकर) अगणित शत्रुओं का संहार किया, जिन चरणकमलों का स्पर्श पाकर व्रजगोपियों ने (उनपर अपना) सर्वस्व न्योछावर कर दिया 
तथा घर, पुत्रादिकों को भी विस्मृत हो गयीं, जिन चरणकमलों से (आप) पाण्डवदल में घूमते रहे, उनके दूत बने तथा उनके सब काम बनाये, सूरदास जी कहते हैं कि (हे श्यामसुन्दर!) आपके वही चरणकमल हमारे (आधिभौतिक, आधिदैविक 
एवं आध्यात्मिक) तीनों तापों को तथा समस्त दुःखों को हरण करने वाले हैं।

सोमवार, 21 सितंबर 2026

मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं.../ मधुश्रावणी / मैथिल लोक गीत

https://youtu.be/4kUcv_5QP3I  


मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं,
नहि ऐला बालम हमार हे!
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 
नहि ऐला बालम हमार हे!

सासु बेदर्दी दरदो ने जानल,
ने देलनि भार पठाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 

गोतनी बेदर्दी दरदो ने जानल, 
ने देलनि गौर बनाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 

ननदी बेदर्दी दरदो ने जानल 
ने देलनि डाली सजाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौं... 

ससुर जी निदर्दा दरदो ने जानल 
नहिं देलन पानी पठाय हे !
मन छल पाबनि बलम संगे पूजीतौ...

रविवार, 20 सितंबर 2026

बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी है.../ शकील बदायूँनी

https://youtu.be/jxJJ_DoaM-8  


बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी है
तर्क-ए-तअल्लुक़ काम न आया उन से मोहब्बत आज भी है

सख़्त सही हस्ती के मराहिल-ए-इश्क़ में राहत आज भी है
ऐ ग़म-ए-जानाँ हो न गुरेज़ाँ तेरी ज़रूरत आज भी है

गुलशन-ए-हुस्न-ए-यार में करते हैं जो तलाश-ए-कैफ़-ओ-सुकूँ
लाख है बरहम नज़्म-ए-दो-आलम ज़ुल्फ़ में निकहत आज भी है

नूर-ए-सहर है जान-ए-तसव्वुर ज़ुल्मत-ए-शब से कौन डरे
लाख बनी है ज़ीस्त जहन्नम सामने जन्नत आज भी है

सुब्ह-ए-बहार आई थी ले कर रुत भी नई शाख़ें भी नई
ग़ुंचा-ओ-गुल से प्यार है लेकिन शाख़ से नफ़रत आज भी है

अर्ज़-ए-तमन्ना कर के गँवाया हम ने भरम ख़ुद्दारी का
हो गई गो तकमील-ए-तमन्ना दिल को नदामत आज भी है

कर के सितम की पर्दा-पोशी हम ने उन्हें बे-ऐब किया
वर्ना 'शकील' अपने होंटों पर हर्फ़-ए-शिकायत आज भी है

शनिवार, 19 सितंबर 2026

लक्ष्मी रावे मा इन्टिकी...(लक्ष्मी मेरे घर पधारो !) / गायन : जे. जया हंसिनी / भाषा : तेलगु

https://youtu.be/vg6Roz65nqY  


लक्ष्मि रावे मा इंटिकि वरलक्ष्मि रावे मा इंटिकि
क्षीराब्धि पुत्रि वरलक्ष्मि रावे मा इंटिकि

लक्ष्मि रावे मा इंटिकि राजितमुग नॆलकॊन्न
सूक्ष्ममुग मोक्षमिच्चु सुंदरि बृंदावन धारि
कुंकुम पच्च कस्तूरि कोरिकतोनु गोरोजनमु
जाजि पुव्वु जलजलोचिनि मुदमुतोन अर्पिंतूमु

चल्लनि गंधमु चंदनमुतो साम्राणि धूपमु
माता नीकु प्रीतिग प्रख्यातीग समर्पिंतुनम्म
पसुपु अक्षतलु परिमळ द्रव्यं
पंच बिल्वमुलु पूर्ण कलशमु
माता नीकु प्रीतिग प्रख्यातीग समर्पिंतुनम्म

गुंडु मल्लॆ मॊगलि पूलु
दंडिग चामंति पूलु मेलैन पारिजातमु
माता नीकु प्रीतिग प्रख्यातीग समर्पिंतुनम्म
अंदमुग जरि अंचु चीर कुंदनमु पच्चनि रविक
मॊगलि पुव्वुल जडने अल्लि जडगुच्चुलनु कट्टेनम्म

माता नीकु मुदमुतो मेमु चेतुमम्म चक्कनि पूज
अंदमुग अडवि पंड्लु कदलि पंड्लु रेगु पंड्लु
मेलैन दानिम्म पंड्लु घनमुगा कर्जुर पंड्लु
पंडु वॆन्नॆलतो नीकु पद्मासिनि ने पूजिंप

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ.../अहमद फ़राज़

https://youtu.be/EuaUphyh9Pw 

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
याद क्या तुझ को दिलाएँ तिरा पैमाँ जानाँ


यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इंसाँ जानाँ


ज़िंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है
हम ने जैसे भी बसर की तिरा एहसाँ जानाँ


दिल ये कहता है कि शायद है फ़सुर्दा तू भी
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ


अव्वल अव्वल की मोहब्बत के नशे याद तो कर
बे-पिए भी तिरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ


आख़िर आख़िर तो ये आलम है कि अब होश नहीं
रग-ए-मीना सुलग उट्ठी कि रग-ए-जाँ जानाँ


मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उमीद
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ


हम भी क्या सादा थे हम ने भी समझ रक्खा था
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है ग़म-ए-जानाँ जानाँ


अब के कुछ ऐसी सजी महफ़िल-ए-याराँ जानाँ
सर-ब-ज़ानू है कोई सर-ब-गरेबाँ जानाँ


हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है
हर कोई अपने ही साए से हिरासाँ जानाँ


जिस को देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िंदाँ जानाँ


अब तिरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आए
और से और हुए दर्द के उनवाँ जानाँ


हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ


होश आया तो सभी ख़्वाब थे रेज़ा रेज़ा
जैसे उड़ते हुए औराक़-ए-परेशाँ जानाँ