बुधवार, 2 सितंबर 2026

कुछ न कुछ तो जरूर होना है.../ शायरा : वाजिदा तबस्सुम / गायन : निताशा शर्मा

https://youtu.be/0PULSsRE17M  


कुछ न कुछ तो ज़रूर होना है,
सामना आज उनसे होना है


तोड़ो, फेंकों, रखो, करो कुछ भी,
दिल हमारा है, क्या खिलौना है


ज़िंदगी और मौत का मतलब,
तुमको पाना है, तुमको खोना है


इतना डरना भी क्या है दुनिया से,
जो भी होना है सो तो होना है


उठ के महफ़िल से मत चले जाना,
तुमसे रोशन ये कोना-कोना है

रविवार, 30 अगस्त 2026

पद्मनाभा नारायणा.../ अभंग : सन्त तुकाराम / गायन : आर्या अम्बेकर

https://youtu.be/oBokNBRiWrQ 



श्रीअनंता मधुसूदना । 
पद्मनाभा नारायणा ॥१॥ 

सकळदेवा आदिदेवा । 
कृपाळुवा जी केशवा । 
महानंदा महानुभावा । 
सदाशिवा सहजरूपा ॥२॥ 

अगा ये सगुणा निर्गुणा । 
जगज्जनित्या जगज्जीवना । 
वसुदेवदेवकीनंदना । 
बाळरांगणा बाळकृष्णा ॥३॥ 

तुका आला लोटांगणी । 
मज ठाव द्यावा जी चरणीं । 
हे चि करीतसें विनवणी । 
भवबंधनीं सोडवावें ॥४॥

सोमवार, 24 अगस्त 2026

ब्रज नव तरुणि-कदम्ब मुकुटमणि.../ श्री हित चौरासी – पद संख्या 29

https://youtu.be/U_vGie0HaRk  


ब्रज नव तरुणि-कदम्ब मुकुटमणि,
श्यामा आजु बनी।
नख-सिख लौं अँग-अंग माधुरी,
मोहे श्याम धनी॥

यौं राजत कवरी गूँथित कच,
कनक-कंज-वदनी।
चिकुर चंद्रिकन बीच अर्ध बिधु,
मानौँ ग्रसित फनी॥

सौभग रस सिर स्रवत पनारी,
पिय सीमन्त ठनी।
भृकुटि काम-कोदंड नैंन-सर,
कज्जल रेख अनी॥

तरल तिलक, ताटंक गंड पर,
नासा जलज मनी।
दसन कुन्द, सरसाधर पल्लव,
प्रीतम मन समनी॥

चिबुक मध्य अति चारु सहज सखि,
साँवल बिंदुकनी।
प्रीतम प्राण रतन संपुट कुच,
कंचुकि कसिब तनी॥

भुज-मृनाल बल हरत बलय जुत,
परस सरस स्रवनी।
श्याम सीस तरु मनौ मिडवारी,
रची रुचिर रवनी॥

नाभि गंभीर मीन मोहन मन,
खेलन कौँ हृदनी।
कृस कटि, पृथु नितम्ब किंकिनि व्रत,
कदलि-खंभ जघनी॥

पद अम्बुज जावक जुत भूषण,
प्रीतम उर अवनी।
नव-नव भाय विलोभि भाम इभ,
बिहरत वर करिनी॥

(जै श्री) हित हरिवंश प्रशंसित श्यामा,
कीरति विशद घनी।
गावत स्रवनन सुनत सुखाकर,
विश्व दुरित दवनी॥

रविवार, 23 अगस्त 2026

ये बातें झूटी बातें हैं.../ शायर : इब्न-ए-इंशा / गायन : ग़ुलाम अली

https://youtu.be/2OOcNnWwYPs  


ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

हैं लाखों रोग ज़माने में क्यूँ इश्क़ है रुस्वा बे-चारा
हैं और भी वजहें वहशत की इंसान को रखतीं दुखियारा
हाँ बे-कल बे-कल रहता है हो पीत में जिस ने जी हारा
पर शाम से ले कर सुब्ह तलक यूँ कौन फिरेगा आवारा

ये बातें झूटी बातें ये लोगों ने फैलाईं हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

ये बात अजीब सुनाते हो वो दुनिया से बे-आस हुए
इक नाम सुना और ग़श खाया इक ज़िक्र पे आप उदास हुए
वो इल्म में अफ़लातून सुने वो शेर में तुलसीदास हुए
वो तीस बरस के होते हैं वो बी-ए एम-ए पास हुए

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

गर इश्क़ किया है तब क्या है क्यूँ शाद नहीं आबाद नहीं
जो जान लिए बिन टल न सके ये ऐसी भी उफ़्ताद नहीं
ये बात तो तुम भी मानोगे वो 'क़ैस' नहीं फ़रहाद नहीं
क्या हिज्र का दारू मुश्किल है क्या वस्ल के नुस्ख़े याद नहीं

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

वो लड़की अच्छी लड़की है तुम नाम न लो हम जान गए
वो जिस के लम्बे गेसू हैं पहचान गए पहचान गए
हाँ साथ हमारे 'इंशा' भी इस घर में थे मेहमान गए
पर उस से तो कुछ बात न की अंजान रहे अंजान गए

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

जो हम से कहो हम करते हैं क्या 'इंशा' को समझाना है
उस लड़की से भी कह लेंगे गो अब कुछ और ज़माना है
या छोड़ें या तकमील करें ये इश्क़ है या अफ़साना है
ये कैसा गोरख-धंदा है ये कैसा ताना-बाना है

ये बातें कैसी बातें हैं जो लोगों ने फैलाई हैं
तुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं

शनिवार, 22 अगस्त 2026

तेरी काया नगर का कुण धणी.../ रचना : सन्त कबीर / गायन : शबनम वीरमानी

https://youtu.be/Z3H7NmiNtnc  


तेरी काया नगर का कुण धणी, मारग में लूटे पांच जणी
पांच जनी, पच्चीस जनी, मारग में लूटे पांच जणी

आशा तृष्णा नदियां भारी, बह गये संत बड़ा ब्रह्मचारी, हरे हरे
जो उबरया जो शरण तुम्हारी, चमक रही है सेलाणी

बन में लुट गये मुनीजन नंगा, डस गयी ममता उल्टा टांगा, 
हरे-हरे

जाके कान गुरु नहीं लागे, सृंगी ऋषी पर आन पड़ी
साधू संत मिल रोके घांटा, साधु चढ़ ग्या उल्टी बाटा, 
हरे-हरे

घेर लिया सब औघट घाटा, पार उतारो आप धणी
ईन्द्र बिगाड़ी गौतम नारी, कुबजा भई गया कृष्ण मुरारी, 
हरे-हरे

राधा रुखमा बिलकति हारी, राम चन्द्र पर आन बणी
शंकर लुट गये नेजाधारी, रईयत उनकी कौन बिचारी, 
हरे-हरे

भूल रही कर मन की मारी, तीन युग झुक रही तीन जणी
साहेब कबीर गुरु दीन्हा हेला, धर्मदास सुनो निज चेला, 
हरे-हरे

लंबा मारग पंथ दुहेला, सिमरो सिरजन हार धनी

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

मेरा तो क्या ख़ुशी में रहूँ या मलाल में.../ शायर : नज़ीर मोहम्मद आरज़ू जयपुरी / गायन : हीरा देवी मिश्रा

https://youtu.be/toxvr57T1U0. 

मेरा तो क्या ख़ुशी में रहूँ या मलाल में
तुम ख़ुश रहो जहाँ भी रहो जिस ख़याल में


हूँ महव मैं तो ऐसा किसी के ख़याल में
कुछ इम्तियाज़ ही नहीं हिज्र-ओ-विसाल में


तेरे ख़याल ही की बदौलत है ज़िंदगी
तू है तो इक जहान है मेरे ख़याल में


हाइल अगर हज़ार हों पर्दे तो कुछ नहीं
तुम हो मिरी निगाह में दिल में ख़याल में


होता रहे करम जो यूँही ऐ ख़याल-ए-यार
लग़्ज़िश न हो कभी मिरे पाए-ए-ख़्याल में


है तू तो हर घड़ी मिरी आँखों के सामने
आता हूँ मैं भी क्या कभी तेरे ख़याल में


शेर-ओ-सुख़न की 'आरज़ू' अब दाद क्या मिले
ज़ौक़-ए-सुख़न ही जब नहीं अहल-ए-कमाल में

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे.../ शायर : बहज़ाद लखनवी / गायन : निर्मला देवी

https://youtu.be/0LPDgc9Q8yI 


दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे

ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे

मैं ढूँढ रहा हूँ मिरी वो शम्अ कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की
काबा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे

'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे

बुधवार, 19 अगस्त 2026

देखो माई ये बड़भागी मोर.../ रचना : भक्त सूरदास / गायन : मुदिता एवं रुचिरा जमरिया

https://youtu.be/hr0MyKc616U  


देखो माई ये बड़भागी मोर।
जिनकी पंख को मुकुट बनत है, शिर धरें नंदकिशोर॥१॥

ये बडभागी नंद यशोदा, पुन्य किये झकझोर।
वृंदावन हम क्यों न भई रज लागत पग की कोर॥२॥

ब्रह्मदिक सनकादिक नारद, ठाढ़े हैं कर जोर।
सूरदास संतन को सरबस देखियत माखन चोर॥३॥

सोमवार, 17 अगस्त 2026

उमड़ घुमड़ घन सावन आये.../ रचना : महाप्राण सूर्य कान्त त्रिपाठी 'निराला' / गायन : डाॅ शरद मणि त्रिपाठी

https://youtu.be/_plJmt8KJI0  


उमड़-घुमड़-घन
सावन आये।
मन-मन के
मनभावन आये ।

मोर शोर करते हैं वन में,
नाच रहे हैं फिर निर्जन में,
दादुर की रट भी छन-छन में,
विपुल-बलाक की धावन आये ।

बूंदों की रिमझिम फुहार है,
पवन-अवनि, फिर-फिर बुहार है,
खगकुल की पुलकित गुहार है,
पुर के पाहुन पावन आये।

रविवार, 16 अगस्त 2026

आँसू किसी का देख के बीमार मर गया.../ शायर : क़मर जलालवी / गायन : ग़ुलशन आरा सईद

https://youtu.be/NgjefMWpdfI?si=sOBtvYMsTVRk8PAW


आँसू किसी का देख कि बीमार मर गया
जाम-ए-हयात एक ही क़तरे में भर गया

छोड़ो वफ़ा का नाम वफ़ादार मर गया
तुम जिस हवा में हो वो ज़माना गुज़र गया

सय्याद देख ली कशिश-ए-मौसम-ए-बहार 
उड़ उड़ के बाग़ में मिरा एक एक पर गया

देखा न तुम ने आँख उठा कर भी बज़्म में
आँसू तो मैं न था जो नज़र से उतर गया

वक़्त आ गया है यार के वा'दे का ऐ 'क़मर'
देखो वो आसमान सितारों से भर गया

बुधवार, 12 अगस्त 2026

परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण, कामप्रजाळण नाच करे.../ छंद - दुर्मिला / कवि : श्री दुला भाया काग बापू / गायन : मुक्ति दान गढ़वी

https://youtu.be/UYVG4sj_z0w  


गुजरात के चारण कवि
पद्म श्री दुला भाया काग बापू 
की कलम से रचित यह शिव स्तुति है।

कविश्री काग बापू का नाम गुजरात के 
लोक साहित्य में बड़े गौरव और सम्मान 
के साथ लिया  जाता है।


भभके गण भूत भयंकर भुतळ, नाथ अधंखर ते नखते,
भणके तळ अंबर बाधाय भंखर , गाजत जंगर पांह गते ;
डमरुय डडंकर बाह जटंकर , शंकर ते कईलास सरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे, (१)


हडडं खडडं ब्रह्मांड हले, दडडं दडदा कर डाक बजे,
जळळं दंग ज्वाल कराल जरे , सचरं थडडं गण साज सजे ;
कडके धरणी कडडं , हडडं मुख नाथ ग्रजंत हरे ,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(२)


हदताळ मृदंग हुहूकट,हाकट धाकट धीकट नाद धरं,
द्रहद्राह दिदीकट वीकट दोक्ट,कट्ट फरंगट फेर फरं ;
धधडे नग धोम धधा कर धीकट,धेंकट घोर कृताळ धरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(३)


नट तांडवरो भट देव घटां नट उलट गूलट धार अजं,
चहँ थाक दुदूवट दूवट खेंखट,गेंगट भू कईलास ग्रजं ;
तत तान त्रिपुरारि त्रेकट त्रुकट, भूलट धुहर ठेक भरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(४)


सहणाई छेंछ अपार छटा,चहुथ नगारांय चोब रडे,
करताल थपाट झपाट कटाकट, ढोल धमाकट मेर धडे ;
उमया संग नाट गणं सरवेश्वर,ईश्वर 'थईततां,' उचरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(५)


पहरी गंगधार भेंकार भुजंगाय , भार अढारिंय वृक्ष भजे,
गडताळ अपार उठे पडघा,गढ सागर त्रीण ब्रह्मांड ग्रजे,
हदभार पगांय हिमाचळ हालत,हालत नृत्य हजार हरे ,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(६)


बह अंग परां धर खाख अडंबर डंबर सुर नभं दवळा,
डहके डहकं डहकं डमरु बह,डूहक डूहक थे बनळा ;
हदपाळ कराळ विताळरी हाकल, पाव उपाडत ताळ परे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(७)


ब्रह्मादिक देख सतं भ्रमना भर,सुर तेत्रीशांय पाव सबे,
खडडं कर हास्य ब्रह्मांड खडेडत,अंग उमा अरधंग अबे ;
जग जावण आवण जोर नचावण, आवत *काग* तणे उपरे,
परमेश्वर मोद धरी पशुपाळण,कामप्रजाळण नाच करे,(८)

श्रीविनायकाष्टकम्.../ श्रीनारायणगुरुविरचितं / गायन : सितारा कृष्ण कुमार एवं मिथुन

https://youtu.be/a8qr-tVdY8o  


नमद्देववृन्दं लसद्वेदकन्दं
शिरःश्रीमदिन्दुं श्रितश्रीमुकुन्दम् ।
बृहच्चारुतुन्दं स्तुतश्रीसनन्दं
जटाहीन्द्रकुन्दं भजेऽभीष्टसन्दम् ॥ १॥

किलद्देवगोत्रं कनद्धेमगात्रं
सदानन्दमात्रं महाभक्तमित्रम् ।
शरच्चन्द्रवक्त्रं त्रयीपूतपात्रं।
समस्तार्त्तिदात्रं भजे शक्तिपुत्रम् ॥ २॥

गलद्दानमालं चलद्भोगिमालं
गलाम्भोदकालं सदा दानशीलम् ।
सुरारातिकालं महेशात्मबालं
लसत्पुण्ड्रभालं भजे लोकमूलम् ॥ ३॥

उरस्तारहारं शरच्चन्द्रहीरं
सुरश्रीविचारं हृतार्त्तारिभारम् ।
कटे दानपूरं जटाभोगिपूरं
कलाबिन्दुतारं भजे शैववीरम् ॥ ४॥

करारूढमोक्षं विपद्भङ्गदक्षं
चलत्सारसाक्षं पराशक्तिपक्षम् ।
श्रितामर्त्यवृक्षं सुरारिद्रुतक्षं
परानन्दपक्षं भजे श्रीशिवाक्षम् ॥ ५॥

सदाशं सुरेशं सदा पातुमीशं
निदानोद्भवं शाङ्करप्रेमकोशम् ।
धृतश्रीनिशेशं लसद्दन्तकोशं
चलच्छूलपाशं भजे कृत्तपाशम् ॥ ६॥

ततानेकसन्तं सदा दानवन्तं
बुधश्रीकरन्तं गजास्यं विभान्तम् ।
करात्मीयदन्तं त्रिलोककैकवृन्तं
सुमन्दं परन्तं भजेऽहं भवन्तम् ॥ ७॥

शिवप्रेमपिण्डं परं स्वर्णवर्णं
लसद्दन्तखण्डं सदानन्दपूर्णम् ।
विवर्णप्रभास्यं धृतस्वर्णभाण्डं
चलच्चारुशुण्डं भजे दन्तितुण्डम् ॥ ८॥

इति श्रीनारायणगुरुविरचितं श्रीविनायकाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

अर्थ

नमद्देववृन्दं लसद्वेदकन्दं शिरःश्रीमदिन्दुं श्रितश्रीमुकुन्दम् ।
बृहच्चारुतुन्दं स्तुतश्रीसनन्दं जटाहीन्द्रकुन्दं भजेऽभीष्टसन्दम् ॥

अर्थ:जिन्हें देवताओं का संपूर्ण समूह निरंतर नमन करता है, जो सभी वेदों के प्रकाशमान मूल (जड़) हैं, जिनके मस्तक पर अत्यंत सुंदर चंद्रमा सुशोभित है, जो भगवान श्रीविष्णु(मुकुंद) के परम आश्रय हैं। जिनका उदर (पेट) अत्यंत विशाल और मनोहर है, जिनकी स्तुति महर्षि सनंद करते हैं, जिनकी जटाओं में सर्पों के राजा (शेषनाग) चमेली (कुंद) के पुष्प के समान लिपटे हुए हैं, उन सभी अभीष्ट (मनोवांछित) फलों को देने वाले भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक २

किलद्देवगोत्रं कनद्धेमगात्रं सदानन्दमात्रं महाभक्तमित्रम् ।
शरच्चन्द्रवक्त्रं त्रयीपूतपात्रं समस्तार्त्तिदात्रं भजे शक्तिपुत्रम् ॥

अर्थ:जो देवताओं के कुल (वंश) कीरक्षाकरने वाले और उनका पालन करने वाले हैं, जिनका शरीर चमकते हुए शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जो सदैव आनंद स्वरूप हैं और अपने महान भक्तों के परम मित्र हैं। जिनका मुख शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान अत्यंत सौम्य है, जो तीनों वेदों (त्रयी) के पवित्र पात्र हैं, और जो अपने भक्तों की समस्त दुखों एवं पीड़ाओं का नाश करने वाले हैं, उनमाता पार्वती(शक्ति) के पुत्र भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ३

गलद्दानमालं चलद्भोगिमालं गलाम्भोदकालं सदा दानशीलम् ।
सुरारातिकालं महेशात्मबालं लसत्पुण्ड्रभालं भजे लोकमूलम् ॥

अर्थ:जिनके गंडस्थल (कनपटी) से निरंतर मदजल की धारा बहती रहती है, जिनके गले में चंचल सर्पों की माला सुशोभित है, जिनका कंठ जल से भरे हुए काले बादल के समान सुंदर है, और जो सदैव दान देने के स्वभाव वाले हैं। जो देवताओं के शत्रुओं (असुरों) के लिए साक्षात् काल (मृत्यु) हैं, जो भगवानशिव(महेश) के आत्मज (पुत्र) हैं, जिनके भाल (मस्तक) पर सुंदर तिलक दमक रहा है, उन संपूर्ण लोकों के मूल कारण भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ४

उरस्तारहारं शरच्चन्द्रहीरं सुरश्रीविचारं हृतार्त्तारिभारम् ।
कटे दानपूरं जटाभोगिपूरं कलाबिन्दुतारं भजे शैववीरम् ॥

अर्थ:जिनके वक्षस्थल (छाती) पर तारों और शरद् ऋतु के चंद्रमा के समान चमकते हुए अत्यंत सुंदर हीरों का हार सुशोभित है, जो देवताओं कीसमृद्धिऔर जगत के कल्याण का विचार करते हैं, और जो दुखों तथा शत्रुओं के भारी बोझ को हरने वाले हैं। जिनके गंडस्थलों से मदजल की धारा बहती है, जिनकी जटाओं में सर्प भरे हुए हैं, जो कला, बिन्दु और ॐकार (तार) के साक्षात् स्वरूप हैं, उन भगवान शिव के परम वीर पुत्र विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ५

करारूढमोक्षं विपद्भङ्गदक्षं चलत्सारसाक्षं पराशक्तिपक्षम् ।
श्रितामर्त्यवृक्षं सुरारिद्रुतक्षं परानन्दपक्षं भजे श्रीशिवाक्षम् ॥

अर्थ:जिनके हाथों में मोक्ष अत्यंत सुलभता से रखा हुआ है, जो बड़ी से बड़ी विपत्तियों (संकटों) को नष्ट करने में अत्यंत कुशल (दक्ष) हैं, जिनके नेत्र कमल के समान चंचल और सुंदर हैं, जो पराशक्ति (माता जगदंबा) के सदैव पक्ष में रहते हैं। जो अपने आश्रित भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान फल देने वाले हैं, जो देवताओं के शत्रुओं को बहुत शीघ्र नष्ट कर देते हैं, जो परमानंद के पक्षधर हैं और जो भगवान शिव की आँखों के तारे (अत्यंत प्रिय) हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ६

सदाशं सुरेशं सदा पातुमीशं निदानोद्भवं शाङ्करप्रेमकोशम् ।
धृतश्रीनिशेशं लसद्दन्तकोशं चलच्छूलपाशं भजे कृत्तपाशम् ॥
अर्थ:जो सभी की आशाओं को पूर्ण करने वाले हैं, देवताओं के स्वामी (सुरेश) हैं, जो सदैव सबकीरक्षाकरने में समर्थ ईश्वर हैं, जो सभी कारणों के मूल उद्भव हैं, और जो भगवान शंकर के विशुद्ध प्रेम के खजाने (कोश) हैं। जिन्होंने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया हुआ है, जिनके दाँत (गजदंत) अत्यंत सुशोभित हैं, जिनके हाथों में त्रिशूल और पाश लहरा रहे हैं, तथा जो मोह और अज्ञान रूपी बंधनों (पाश) को काट देते हैं, उन भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ७

ततानेकसन्तं सदा दानवन्तं बुधश्रीकरन्तं गजास्यं विभान्तम् ।
करात्मीयदन्तं त्रिलोककैकवृन्तं सुमन्दं परन्तं भजेऽहं भवन्तम् ॥

अर्थ:जो अनेक संतों और सज्जनों के रक्षक हैं, जो सदैव दान देने में अग्रणी हैं, जो बुद्धिमानों को समृद्धि (श्री) और ज्ञान प्रदान करते हैं, जिनका हाथी (गज) के समान मुख अत्यंत शोभायमान है। जिन्होंने अपने हाथ में अपना ही टूटा हुआ दाँत (एकदंत) धारण किया है, जो इन तीनों लोकों के एकमात्र आधार (वृंत) हैं, जो स्वभाव से अत्यंत सौम्य (सुमन्द) हैं और जो परम सत्ता (परन्त) हैं, उन आप भगवान विनायक को मैं भजता हूँ।

श्लोक ८

शिवप्रेमपिण्डं परं स्वर्णवर्णं लसद्दन्तखण्डं सदानन्दपूर्णम् ।
विवर्णप्रभास्यं धृतस्वर्णभाण्डं चलच्चारुशुण्डं भजे दन्तितुण्डम् ॥

अर्थ:जो भगवान शिव और माता पार्वती के अथाह प्रेम के साक्षात् स्वरूप (पिण्ड) हैं, जिनका वर्ण (रंग) शुद्ध स्वर्ण (सोने) के समान है, जिनका टूटा हुआ दाँत दमक रहा है, और जो सदैव आनंद से परिपूर्ण रहते हैं। जिनका मुख अद्भुत प्रभा (कांति) से चमक रहा है, जिन्होंने अपने हाथ में स्वर्ण का कलश (मोदक का पात्र) धारण किया हुआ है, और जिनकी अत्यंत सुंदर सूंड हिल रही है, उन गजमुख भगवान विनायक को मैं निरंतर भजता हूँ।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे.../ शायर : कलीम चाँदपुरी / गायन : ग़ुलाम अली

https://youtu.be/AvZRXU4eSmk  


मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे
ये ज़हर मेरे लहू में उतर गया कैसे

कुछ उसके दिल में लगावट ज़रूर थी वरना
वो मेरा हाथ दबाकर गुज़र गया कैसे

ज़रूर उसकी  तवज्जो की रहबरी होगी
नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे

जिसे भुलाये कई साल हो गये 'कलीम'
मैं आज उसकी गली से गुज़र गया कैसे

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा.../ शायर : अहमद नदीम क़ासमी / गायन : गुलाम अली

https://youtu.be/jNj-QE4Zb7c  


कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा

अब तिरे शहर में आऊँगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊँगा

तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वर्ना सोचा था कि जब चाहूँगा मर जाऊँगा

ज़िंदगी शम्अ' की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुब्ह तो कर जाऊँगा

रविवार, 9 अगस्त 2026

जोई-जोई प्यारौ करै, सोई मोहि भावै.../ श्री हित चौरासी – पद १

https://youtu.be/4khE2AKeAGI  

*प्रस्तुत है श्री हित चौरासी का प्रथम पद — "जोई-जोई प्यारौ करै"। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की दिव्य रसपूर्ण वाणी का मंगलाचरण स्वरूप प्रथम पद है। इस पद में श्रीजी और प्रियतम के मधुर, निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। भक्त और भगवान के मध्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का यह पद श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय की माधुर्य-रस परम्परा का अनुपम रत्न है।*

*इस पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु बताते हैं कि जो कुछ प्रियतम को प्रिय है वही भक्त को भी प्रिय है। भक्त का मन, प्राण, प्रेम और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल युगल सरकार में समर्पित हो जाता है। "मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय" तथा "अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे" जैसी पंक्तियाँ दिव्य प्रेम की चरम अवस्था का दर्शन कराती हैं। अंतिम चरण में श्री राधा-कृष्ण की साँवल-गौर युगल छवि को जल की तरंगों से भी अधिक अभिन्न बताया गया है।*

*श्री हित चौरासी – पद १*

जोई-जोई प्यारौ करै,
सोई मोहि भावै॥

भावै मोहि जोई,
सोई-सोई करैं प्यारे॥

मोकों तौ भावती ठौर,
प्यारे के नैंनन में॥

प्यारौ भयौ चाहै,
मेरे नैंनन के तारे॥

मेरे तन मन प्राण हूँ ते,
प्रीतम प्रिय॥

अपने कोटिक प्राण,
प्रीतम मोसों हारे॥

जै श्री हित हरिवंश,
हंस-हंसिनी साँवल-गौर॥

कहौ कौन करै,
जल-तरंगनि न्यारे॥

शनिवार, 8 अगस्त 2026

डिमिक-डिमिक डमरू कर बाजे.../ स्वर : पण्डित छन्नूलाल मिश्र

https://youtu.be/fd6AGwXSmMY 


ऊँ नम: पार्वतीपतये हर-हर महादेव !


नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्त्तुकामो सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥
 
अर्थ : नृत्य (ताण्डव) की समाप्ति पर नटराज भगवान शिव ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना की पूर्ति के लिए चौदह (नौ + पाँच) बार डमरू बजाया। इस प्रकार इन चौदह शिवसूत्रों का यह जाल (वर्णमाला) प्रकट हुआ। 


डिमिक-डिमिक डमरू कर बाजे...
स्वर : पण्डित छन्नूलाल मिश्र


डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥


सिंघी नाद बजावत गावत,
सिंघी नाद बजावत गावत,
लटक रही बगली झोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥


नाग फणन सो करत आरती,
नाग फणन सो करत आरती,
देव देव गति अनमोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥



भालचंद्र सिर गंगा लहरे,
भालचंद्र सिर गंगा लहरे,
हाथ लिए भंग की गोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥



डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे,
प्रेम मगन नाचे भोला, भोला,
डिमिक डिमिक डमरू कर बाजे॥

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे बुंदिया बरसन लागे ना.../ मैथिल कजरी लोक गीत

https://youtu.be/JevTe_AhECM  

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..
बुंदिया बरसन लागी न....!!

दादुर-मोर-पपीहा गाबय, 
जिया उमताबे न.... !
हाय हो रामा.! जिया उमताबे न..!!

विरह के आगि कुहुकी कुहुकाबय 
बैरी कोयलिया ना...!

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..!

पिऊ के पाती लिखल हम कत-विधि, 
तैय्यो न पिघलथि ना..!
हाय हो रामा..! तैय्यो न पिघलथि ना..!!

कंत हमर हियहंत भेल छथि, 
दरदो न जाने ना..!

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, 
बुंदिया बरसन लागी ना..!

बुधवार, 5 अगस्त 2026

शिव हो उतरब पार कवन विधि.../ रचना : महाकवि विद्यापति / गायन : चन्दन तिवारी

https://youtu.be/0U48LrrBLzE 


सिव हो उतरब पार कओन बिधि।

लोढब कुसुम तोरब बेल पात।
पुजब सदासिब गौरिक सात॥

बसहा चढ़ल सिव फिरहूँ मसान।
भँगिया जरठ दरदो नहिं जान॥

जप-तप नहिं कैलहुँ नित दान।
बित गेला तिन पन करईत आन॥

भन विद्यापति सुन हे महेस।
निरधन जानि के हरहु कलेस॥

अर्थ

हे शिव। मैं भवसागर से किस प्रकार पार उतर सकूँगा। मैं पुष्प चुनूँगा, बेल-पत्र और नैवेद्यों के द्वारा सनातन शिव की, उनकी अभिन्न शक्तिरूपा पार्वती के साथ पूजा करूँगा। हे शिव! आप बैल पर आरूढ़ होकर श्मशान भूमि में घूमते फिरते हो; आप भंग के नशे में उन्मत्त रहते हैं, इसलिए मुझ आराधक की पीड़ा तक से अनवगत हैं। हे प्रभो! मैंने अपने जीवन में न तो तुम्हारे नाम का ही स्मरण किया है और न ही कठिन तप ही किया है। इसके अतिरिक्त न ही मैंने दूसरों की हित-साधना के लिए अपनी किंचित-मात्र भी सुख-सुविधा की अर्पणा की है अर्थात् मुझसे प्रतिदिन का दान भी देते नहीं बन पड़ा है। मेरे जीवन की तीनों अवस्थाएँ-बालापन, यौवन तथा वृद्धपन इस जप-तप-दान की पुण्य-त्रयी के बिना ही व्यतीत हुआ है। विद्यापति कहते हैं कि हे महेश! मेरी प्रार्थना सुनिए। आप मुझे नितांत अकिंचन जान कर ही मेरे क्लेशों का हरण कीजिए।

जोई-जोई प्यारौ करै, सोई मोहि भावै.../ श्री हित चौरासी – पद १

https://youtu.be/4khE2AKeAGI  


प्रस्तुत है श्री हित चौरासी का प्रथम पद — "जोई-जोई प्यारौ करै"। यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की दिव्य रसपूर्ण वाणी का मंगलाचरण स्वरूप प्रथम पद है। इस पद में श्रीजी और प्रियतम के मधुर, निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का अत्यंत कोमल वर्णन किया गया है। भक्त और भगवान के मध्य प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का यह पद श्री राधा वल्लभ सम्प्रदाय की माधुर्य-रस परम्परा का अनुपम रत्न है।

इस पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु बताते हैं कि जो कुछ प्रियतम को प्रिय है वही भक्त को भी प्रिय है। भक्त का मन, प्राण, प्रेम और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल युगल सरकार में समर्पित हो जाता है। "मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय" तथा "अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे" जैसी पंक्तियाँ दिव्य प्रेम की चरम अवस्था का दर्शन कराती हैं। अंतिम चरण में श्री राधा-कृष्ण की साँवल-गौर युगल छवि को जल की तरंगों से भी अधिक अभिन्न बताया गया है।

श्री हित चौरासी – पद १

जोई-जोई प्यारौ करै,
सोई मोहि भावै॥

भावै मोहि जोई,
सोई-सोई करैं प्यारे॥

मोकों तौ भावती ठौर,
प्यारे के नैंनन में॥

प्यारौ भयौ चाहै,
मेरे नैंनन के तारे॥

मेरे तन मन प्राण हूँ ते,
प्रीतम प्रिय॥

अपने कोटिक प्राण,
प्रीतम मोसों हारे॥

जै श्री हित हरिवंश,
हंस-हंसिनी साँवल-गौर॥

कहौ कौन करै,
जल-तरंगनि न्यारे॥

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

कोई गाता मैं सो जाता.../ रचना : हरिवंश राय बच्चन / गायक : येसुदास

https://youtu.be/uuYZ39Unars  


संगीत : जय देव
फिल्म : आलाप (1977)

कोई गाता मैं सो जाता, कोई गाता मैं सो जाता
कोई गाता

संसृति के विस्तृत सागर पर, सपनो की नौका के अंदर
सुख दुख की लहरो पर उठ गिर, बहता जाता, मैं सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता

आँखो मे भरकर प्यार अमर, आशीष हथेली मे भर कर
कोई मेरा सर गोदी मे रख, सहलाता, मैं सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता

मेरे जीवन का खारा जल, मेरे जीवन का हालाहल
मेरे मेरे जीवन का खारा जल, मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर मे मधुमयकर बरसाता, मे सो जाता
कोई गाता मैं सो जाता कोई गाता मैं सो जाता

मैं सो जाता मैं सो जाता, कोई गाता मैं सो जाता

सोमवार, 3 अगस्त 2026

वेढा वेढा रे पंढरी.../ शब्द - संत तुकाराम / गायक - विश्वजीत बोरवणकर

https://youtu.be/o8vEdhKHMms 


वेढा वेढा रे पंढरी। मोर्चे लावा भीमातीरी ।।१।।
चला चला संतजन। करू देवासी भांडण।।२।।
लुटा लुटा पंढरपूर। धरा रखुमाईचा वर ।।।।
तुका म्हणे चला चला। घाव निशाणी घातका ।।४।।

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

आपकी याद आती रही रात भर.../ शायर : मखदूम मोहिउद्दीन / गायन : छाया गांगुली

https://youtu.be/IHS8QBdGPlU  



आप की याद आती रही रात भर
चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर

रात भर दर्द की शम्अ जलती रही
ग़म की लौ थरथराती रही रात भर

बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा
याद बन बन के आती रही रात भर

याद के चाँद दिल में उतरते रहे
चाँदनी जगमगाती रही रात भर

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज़ आती रही रात भर

रविवार, 26 जुलाई 2026

जगन्नाथाष्टकं... / श्रीमत् शंकराचार्यविरचितं / गायन : सुनन्दा पटनायक

https://youtu.be/3CHPZwy  


कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः
रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥

महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥

कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥

रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥

परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥

न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥

हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥

जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।
सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥

॥ इति श्रीमत् शंकराचार्यविरचितं जगन्नाथाष्टकं संपूर्णम् ॥

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

कर कटावरी तुळसीच्या माळा। ऐसे रूप डोळा दावी हरी.../ अभंग / सन्त तुकाराम महाराज / गायन : दीपिका भिडे भागवत

https://youtu.be/nw6r-sJMvuM. 

कर कटावरी तुळसीच्या माळा। ऐसे रूप डोळा दावी हरी॥
ठेविले चरण दोन्ही विटेवरी। ऐसे रूप हरी दावी डोळा॥
कटी पितांबर कास मिरवली। दाखवी वहिली ऐसी मूर्ती॥
गरुडपारावरी उभा राहिलासी। आठवे मानसी तेचि रूप॥
झुरोनि पांझरा होऊ पाहे आता। येई पंढरीनाथा भेटावया॥
तुका म्हणे माझी पुरवावी आस। विनंती उदास करू नये॥


अर्थ  :

हे हरी, कमरपर हाथ रखे और गले में तुलसीकी माला पहने ऐसा रूप मैं अपनी आँखों से देखूं। और हे हरी, दोनो चरण ईंट पर रखे हुए ऐसा रूप मैं इन आँखों से देखूं। त्वरित, अपनी कमर में पीतांबर पहनी मूर्ती मुझे दिखाओ। गरुडपर खडे हुए आपका रूप मैं मन में याद कर रहा हूँ। आपकी इस मूर्ती को देखने की तीव्र इच्छा की वजह से मैं अब अस्थिपंजर का सा हो गया हूँ। अब तो, हे पंढरीनाथ, मेरी इच्छापूर्ती करो। मेरी विनती को न दुत्कारो। 

शनिवार, 18 जुलाई 2026

भरि नगरी मे शोर.../ मैथिल लोक गीत / रचना : रवीन्द्र नाथ ठाकुर / गायन : सुमन कल्याणपुर

https://youtu.be/zLRkBPfDH4w


भरि नगरी मे शोर 
बउआ मामी तोहर गोर 
मामा चाँद सन !

नानी-नाना दूनो तोहर 
खाली गाल बजाबय
बाबी तोहर गंगा तन छौ
बाबा बनल हिमालय 
अरे !
मौसा तोहर चोर 
मौसी मुंहक बड्डजोर 
मैया पान सन !

थैया-थैया चलू कन्हैया 
थैया-थैया ता-ता थैया
थैया-थैया चलू कन्हैया
जहिना भोर बसाय 
धरती मैया सब दुःख हरनि
खसबले कोनो बाय
बउआ मोती सन इ लोर
बीछत खाली आंचल मोर
अपने प्रान सन !

अपना कुल के लाल कमल 
त काकिक सूगा-मैना
एहि दुखिया के हंसी-खुसी
आ बापक नइ हय खिलौना
कहु बाबू
तो आसि के चकमक भोर 
हंसिबे खोलिके दूनू ठोर 
कूटल धान सन !

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

हनुमद्भुजंग स्तोत्रम्.../

https://youtu.be/RsdiYVHWr4Y  


प्रसन्नांगरागं प्रभाकांचनांगं
जगद्भीतशौर्यं तुषाराद्रिधैर्यम् ।
तृणीभूतहेतिं रणोद्यद्विभूतिं
भजे वायुपुत्रं पवित्राप्तमित्रम् ॥ १ ॥

भजे पावनं भावना नित्यवासं
भजे बालभानु प्रभा चारुभासम् ।
भजे चंद्रिका कुंद मंदार हासं
भजे संततं रामभूपाल दासम् ॥ २ ॥

भजे लक्ष्मणप्राणरक्षातिदक्षं
भजे तोषितानेक गीर्वाणपक्षम् ।
भजे घोर संग्राम सीमाहताक्षं
भजे रामनामाति संप्राप्तरक्षम् ॥ ३ ॥

कृताभीलनाधक्षितक्षिप्तपादं
घनक्रांत भृंगं कटिस्थोरु जंघम् ।
वियद्व्याप्तकेशं भुजाश्लेषिताश्मं
जयश्री समेतं भजे रामदूतम् ॥ ४ ॥

चलद्वालघातं भ्रमच्चक्रवालं
कठोराट्टहासं प्रभिन्नाब्जजांडम् ।
महासिंहनादा द्विशीर्णत्रिलोकं
भजे चांजनेयं प्रभुं वज्रकायम् ॥ ५ ॥

रणे भीषणे मेघनादे सनादे
सरोषे समारोपणामित्र मुख्ये ।
खगानां घनानां सुराणां च मार्गे
नटंतं समंतं हनूमंतमीडे ॥ ६ ॥

घनद्रत्न जंभारि दंभोलि भारं
घनद्दंत निर्धूत कालोग्रदंतम् ।
पदाघात भीताब्धि भूतादिवासं
रणक्षोणिदक्षं भजे पिंगलाक्षम् ॥ ७ ॥

महाग्राहपीडां महोत्पातपीडां
महारोगपीडां महातीव्रपीडाम् ।
हरत्यस्तु ते पादपद्मानुरक्तो
नमस्ते कपिश्रेष्ठ रामप्रियाय ॥ ८ ॥

जराभारतो भूरि पीडां शरीरे
निराधारणारूढ गाढ प्रतापी ।
भवत्पादभक्तिं भवद्भक्तिरक्तिं
कुरु श्रीहनूमत्प्रभो मे दयालो ॥ ९ ॥

महायोगिनो ब्रह्मरुद्रादयो वा
न जानंति तत्त्वं निजं राघवस्य ।
कथं ज्ञायते मादृशे नित्यमेव
प्रसीद प्रभो वानरेंद्रो नमस्ते ॥ १० ॥

नमस्ते महासत्त्ववाहाय तुभ्यं
नमस्ते महावज्रदेहाय तुभ्यम् ।
नमस्ते परीभूत सूर्याय तुभ्यं
नमस्ते कृतामर्त्य कार्याय तुभ्यम् ॥ ११ ॥

नमस्ते सदा ब्रह्मचर्याय तुभ्यं
नमस्ते सदा वायुपुत्राय तुभ्यम् ।
नमस्ते सदा पिंगलाक्षाय तुभ्यं
नमस्ते सदा रामभक्ताय तुभ्यम् ॥ १२ ॥

हनूमद्भुजंगप्रयातं प्रभाते
प्रदोषेऽपि वा चार्धरात्रेऽपि मर्त्यः ।
पठन्नश्नतोऽपि प्रमुक्तोघजालो
सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रयाति ॥ १३ ॥

इति श्रीमदांजनेय भुजंगप्रयात स्तोत्रम् ।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

देवन के पति इन्द्र तारा के पति चन्द्र.../ महाराज स्वाति तिरुनाल कृति / भाषा : अवधी / गायन : श्रीवाल्सन जे. मेनन

https://youtu.be/QMHUq_Sp3DA  


पल्लवी

देवन के पति इन्द्र तारा के पति चन्द्र 
विद्या के पति गणेश दुःख भार हारी

चरणम्  १

रागपति कन्नड़ भजन के पति वीणा
ऋतुपति है वसंत रतिपति सुखकारी

चरणम्  २

मुनिजन पति व्यास पक्षीपति हंस 
नरपति राम अवधविहारी

चरणम्  ३

गिरिपति हिमाचल भूतों के पति महेश्वर 
तीन लोक पति श्री पद्मनाभ गिरिधारी

बुधवार, 15 जुलाई 2026

श्री राधिका आज आनन्द में डोले.../ रचना : संत श्रीभट्ट देवाचार्य जी महाराज / गायन : आनन्द भैय्या जी, वृन्दावन

https://youtu.be/XFW3Tdjj29U  


(दोहा)
सांवर ससि संग लसि प्रिया, भरी सरस रस छंद।
डोलत हैं श्री राधिका, अति ही आज आनंद।।

राधिका आज आनन्द में डोले॥
सांवर चंद गोविन्द के रस भरी दूसरी कोकिला मधुर स्वर बोले।।


पहर तन नील पट कनक हारावली हाथ ले आरसी रूप को तोले॥


कहत श्रीभट्ट व्रजनारिन नागर बनी कृष्ण के शील की ग्रन्थिका खोले॥

नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं.../ रचना : डाॅ रूरू कुमार महापात्रा / गायन : अभिलिप्सा पंडा

https://youtu.be/8NagbHO9LvY  


नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
गृणामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

आनन्दकन्दं सुचन्दस्यान्दं
पूर्णारविन्दं सदैव वन्द्यम्
आनन्दकन्दं सुचन्दस्यान्दं
पूर्णारविन्दं सदैव वन्द्यम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
मुखारविन्दं पदारविन्दं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

अशेषतोषं सुहासवासं
मधुप्रकाशं विषविनाशम्
अशेषतोषं सुहासवासं
मधुप्रकाशं विषविनाशम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
श्रीशं सुरेशं जगत्-ईशमीशं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

सदावसन्तं हृदयहसन्तं
श्रीयालसन्तं शुभं स्मरन्तम्
सदावसन्तं हृदयहसन्तं
श्रीयालसन्तं शुभं स्मरन्तम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
संसारसारं करुणावतारं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

मनोभिरामं निकामकामं
स्वयंप्रमाणं पूर्णपुराणम्
मनोभिरामं निकामकामं
स्वयंप्रमाणं पूर्णपुराणम्
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नौमि प्रणोमि नमस्कारोमि
नारायणं च प्रणोमि नोमि
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं
नीलाद्रिनाथं नमामि नित्यं
नमामि नित्यं नीलाद्रिनाथं

सोमवार, 13 जुलाई 2026

अता मुझे ये नेमत कर दे या अल्लाह.../ अरुण मिश्र

स्वर्गीय क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल 
'दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह...' 
की तर्ज पर, संगीतकार श्री केवल कुमार जी 
के अनुरोध पर कहे गए कुछ शेर' :

-अरुण मिश्र 

अता मुझे ये नेमत कर दे या अल्लाह 
रहमत की एक नज़र तो कर दे या अल्लाह 

मत दे मुझको माल-ओ-ज़र मत दे
अपने दर का चाकर कर दे या अल्लाह 

किसी दुखी के दुःख को थोड़ा बाँट सकूँ
इतने भर का लायक कर दे या अल्लाह 

नूर से तेरे है ये सारा जग जग-मग
मेरा दिल भी रोशन कर दे या अल्लाह 

भले छीन ले मुझसे मेरी हर दौलत 
पर अपना दीवाना कर दे या अल्लाह

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

वातापि गणपतिं भजेऽहं.../ सन्त मुथुस्वामी दीक्षितर् कृति / भाषा : संस्कृत / गायन : सूर्य गायत्री

https://youtu.be/XDcPvMFmtE8  

वातापि गणपतिं भजेऽहं
वारणाश्यं वरप्रदं श्री ।

भूतादि संसेवित चरणं
भूत भौतिक प्रपंच भरणम् ।
वीतरागिणं विनुत योगिनं
विश्वकारणं विघ्नवारणम् ।

पुरा कुंभ संभव मुनिवर
प्रपूजितं त्रिकोण मध्यगतं
मुरारि प्रमुखाद्युपासितं
मूलाधार क्षेत्रस्थितम् ।

परादि चत्वारि वागात्मकं
प्रणव स्वरूप वक्रतुंडं
निरंतरं निखिल चंद्रखंडं
निजवामकर विद्रुतेक्षुखंडम् ।

करांबुज पाश बीजापूरं
कलुषविदूरं भूताकारं
हरादि गुरुगुह तोषित बिंबं
हंसध्वनि भूषित हेरंबम् ।

"वातापि गणपतिं भजेहं" कर्नाटक संगीत की सबसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध स्तुतियों में से एक है।
 इसे महान संगीतकार मुथुस्वामी दीक्षितर ने संस्कृत भाषा और हंसध्वनि राग में रचा था।
इस स्तुति में भगवान गणेश (वातापी गणपति) की स्तुति की जाती है।

गीत का मुख्य भाव और अर्थ :

'वातापी' उस स्थान का नाम है जहाँ के यह गणपति हैं (वर्तमान में कर्नाटक का बदामी)।

इस कीर्तन की शुरुआती पंक्तियाँ हैं : 

वातापि गणपतिं भजेऽहं वारणाश्यं वरप्रदं श्री।
भूतादि संसेवित चरणं भूत भौतिक प्रपञ्च भरणं।

इसका अर्थ है: "मैं वातापी (बदामी) में स्थित भगवान गणपति की पूजा (भजन) करता हूँ, जो हाथी के मुख वाले (वारणाश्य) और वरदान देने वाले (वरप्रद) हैं। जिनके चरणों की सेवा भूत-प्रेत आदि करते हैं और जो सम्पूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं।

गुडिय नोडिरण्णा देहद.../ भाषा : कन्नड़ / रचना : सन्त शिशुनाल शरीफ / स्वर : कुमारी अनन्या भट कडाटोका एवं कुमारी सहाना हेगडे होन्नावर

https://youtu.be/6LB-uhHoCAk  


गुडिय नोडिरण्णा देहद
गुडिय नोडिरण्णा
गुडिय नोडिरदु
पॊडविगॆ ऒडॆयनु
अडगिकॊंडु कडुबॆडगिनॊळिरुतिह ।।

मूरु मूलिय कल्लु अदनु
एरि कूतु डॊळ्ळु,
धीर निर्गुणन सार सगुणदलि
तोरि अडगि ता ब्यारागिरुतिह ।।

आरु मूरु कट्टि मेलकॆ
एरिदवनॆ घट्टि,
भेरि कहळि शंख भारिसुनाददि
मीरिदानंद तोरि हॊळॆयुतिह ।।

सागुतिहवु दिवस सेविसि
तेगि हॊळिगि पायस,
योगिराज शिशुनाळधीश तानागि
परत्पर ब्रह्मरूपनिह गुडिय नोडिरण्णा ।।

गीत का हिन्दी में अर्थ

इस गीत का मूल भाव यह है कि हमें भौतिक शरीर को केवल मांस-मज्जा का ढांचा नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे ईश्वर का मंदिर मानना चाहिए
इसका विस्तृत अर्थ निम्नलिखित है :  

• शरीर ही मंदिर है : कवि कहते हैं कि इस नश्वर भौतिक शरीर को देखो。 यह कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमात्मा का निवास स्थान—एक जीवंत मंदिर (देहद गुडी) है।

• अहंकार और ज्ञान : गीत में शरीर के भीतर छिपी ईश्वरीय चेतना को देखने का आह्वान किया गयान है。आंतरिक ऊर्जा (योग और प्राणायाम के माध्यम से) को जागृत करने की बात कही गई है। 

• परब्रह्म का वास : संत शिशुनाल शरीफ बताते हैं कि हमारे भीतर ही वह परब्रह्म (सर्वोच्च शक्ति) विद्यमान है。जब साधक अपने अंतर्मन में झांकता है, तब उसे इस बात का ज्ञान होता है कि यह शरीर ही ईश्वर का मंदिर है और आत्मा ही परमात्मा का रूप है।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

हंझूआं दा भाड़ा.../ भाषा : पंजाबी / कवि : शिव कुमार बटालवी / गायन : महेन्द्र कपूर

https://youtu.be/P9rm7PcbnQY  

तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा,
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


भट्ठी वालीए चम्बे दीए डालीए
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


हो ग्या कुवेला मैनूं
ढल गईआं छावां नी
बेलिआं 'चों मुड़ गईआं
मझ्झियां ते गावां नी
पायआ चिड़ियां ने चीक-चेहाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


छेती छेती करीं
मैं ते जाना बड़ी दूर नी
जिथे मेरे हाणियां दा
टुर ग्या पूर नी
योस पिंड दा सुणींदै राह माड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


मेरी वारी पत्त्यां दी
पंड सिल्ल्हिी हो गई
मिट्टी दी कड़ाही तेरी
काहनूं पिल्ली हो गई
तेरे सेक नूं कीह वज्ज्या दुगाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


लप्प कु ए चुंग मेरी
मैनूं पहलां टोर नी
कच्चे कच्चे रक्ख ना नी
रोढ़ थोढ़े होर नी
करां मिन्नतां मुका दे नी पुआड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


सौं गईआं हवावां रो रो
कर विरलाप नी
तार्यां नूं चढ़ ग्या
मट्ठा मट्ठा ताप नी
जंञ साहवां दी दा रुस्स ग्या लाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।


तैनूं दिआं हंझूआं दा भाड़ा
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे
भट्ठी वालीए।

बुधवार, 8 जुलाई 2026

क्या है जो क़र्ज़-ए-शहर-ए-जाँ आज अदा हो या न हो.../ शायर : पीरज़ादा क़ासिम

https://youtu.be/WSUn45v_fGo  


क्या है जो क़र्ज़-ए-शहर-ए-जाँ आज अदा हो या न हो
आग लगी हो या नहीं ख़ून बहा हो या न हो

मेरी तो किश्त-ए-जाँ में आज ज़ख़्म ही ज़ख़्म खिल उठे
अब मुझे क्या कि सहन में फूल खिला हो या न हो

‘अर्सा-ए-शौक़ में नहीं फ़ुर्सत-ए-पेश-ओ-पस का वहम
ज़ख़्म-तलब रहेंगे हम ज़ख़्म मिला हो या न हो

हम ने तो माजरा-ए-ग़म बर-सर-ए-‘आम कह दिया
अश्क बहे हों या नहीं शोर उठा हो या न हो

उस को तो ताज़ा-कारी-ओ-ज़ख़्म-गरी का शौक़ है
ज़ख़्म दबे हों या नहीं दर्द थमा हो या न हो

महरम-ए-राज़ है हवा फ़ाश है सारा माजरा
उस ने कहा हो या नहीं हम ने सुना हो या न हो

उस के तो है नसीब में शब-नज़री-ओ-जाँ-कनी
भड़के है ख़ुद चराग़-ए-शौक़ तेज़ हवा हो या न हो

हम तो फ़रेब-कारी-ए-शब को बयान कर गए
अब ये नसीब-ए-शहर है जाग उठा हो या न हो

उस की गली से आज तो गुज़रे थे सर-ब-दस्त हम
उस ने ब-यक निगाह-ए-शौक़ देख लिया हो या न हो

पीरज़ादा क़ासिम रज़ा सिद्दीकी

जन्म 8 फरवरी 1943), एक पाकिस्तानी विद्वान, 
लेखक, कवि, वैज्ञानिक और शिक्षाविद् हैं। 
उन्होंने कई विश्वविद्यालयों के कुलपति के रूप में 
कार्य किया है।

रविवार, 5 जुलाई 2026

नारायण ते नमो नमो.../ सन्त श्री अन्नमाचार्य कृति / भाषा : संस्कृत / गायन : भावप्रिया

https://youtu.be/GAXzvofZt7E  


नारायण ते नमो नमो 
भव नारद सन्नुत नमो नमो ।।

मुरहर नगधर मुकुंद माधव
गरुडगमन पंकजनाभ
परमपुरुष भव-बंध विमोचन 
नर मृग शरीर नमो नमो ।।

जलधि शयन रविचंद्रविलोचन
जलरुह भवनुत चरणयुग
बलिबंधन गोपीजन वल्लभ
नळिनोदर ते नमो नमो ।।

आदिदेव सकलागम पूजित
यादव कुल मोहन रूप
वेदोद्धर श्रीवॆंकटनायक
नादप्रिय ते नमो नमो ।।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

मा रा ब-ग़मज़: कुश्त-ओ-क़ज़ा रा बहानः साख़्त.../ मिर्ज़ा मुहम्मद हुसैन 'क़तील' (1757-1818) / गायन : इक़बाल बानो

https://youtu.be/MxVfvYvWGVA?si=Miz_kIhZW99NsQt6


मा रा ब-ग़मज़: कुश्त-ओ-क़ज़ा रा बहानः साख़्त
ख़ुद सू-ए-मा न-दीद-ओ-हया रा बहानः साख़्त

उस ने मुझे ग़मज़े से मार डाला और क़ज़ा का बहाना बनाया
उस ने मेरी तरफ नहीं देखा और हया का बहाना बनाया

दस्ते ब-दोश-ए-ग़ैर निहाद अज़ रह-ए-करम
मा रा चू दीद लग़्ज़िश-ए-पा रा बहानः साख़्त

उस ने मोहब्बत से दूसरे के कंधे पर हाथ रखा
लेकिन जब उसने मुझे देखा तो लड़खड़ाने का बहाना बनाया

रफ़्तम ब-मस्जिदे पय-ए-नज़्ज़ार:-ए-रुख़श
दस्ते बरू कशीद व दुआ' रा बहानः साख़्त

मैं उसके चेहरे के दीदार के लिए मस्जिद गया
उस ने अपने चेहरे पर हाथ रख लिया और दुआ का बहाना बनाया

आमद बरून-ए-ख़ानः चूँ आवाज़-ए-मा शनीद
बख़्शीदन-ए-निवाल: गदा रा बहानः साख़्त

जब उसने मेरी आवाज़ सुनी घर से बाहर आ गया
इस बार उसने फ़क़ीर को खाना देने का बहाना बनाया

ख़ून-ए-'क़तील'-ए-बे-सर-ओ-पा रा ब-पा-ए-ख़्वेश
मालीद आँ निगार व हिना रा बहानः साख़्त

उस ने बे-सर-ओ-सामान 'क़तील' के ख़ून को
अपने क़दमों में मल लिया और हिना का बहाना बनाया