He goes to the houses of those who bring flowers and those who bring grass. Oh, the consort of Lakshmi (Lord Krishna), He has absolutely no ego or pride!
If one offers just a single Tulsi leaf and a drop of holy Ganga water to the Lord of Indira (Lakshmi), and sincerely calls Him the one who reclines on the ocean (Lord Vishnu/Mukunda) with a single-minded devotion, He will forever reside in the devotee's heart.
The remaining verses, as documented in source, describe how the Lord accepts various flower offerings with grace and rewards devotees with a place in his abode. The song concludes by highlighting Krishna's role as a humble servant to his true followers, citing his actions for the Pandavas.
Peeliyodotha karkoonthalum ketti...lyrics and meaning
"Peeliyodotha Karkoonthalum" is a popular Malayalam devotional bhajan dedicated to Lord Krishna. It is a visual prayer that describes the enchanting appearance and divine qualities of the Lord.
The song visually paints the iconic, beautiful form of Lord Krishna and pleads for His blessings and liberation (Moksha).
*Physical Appearance:* It describes Krishna tying His dark, curly hair with a peacock feather (peeliyodotha). He wears a holy mark (thilakam) on His forehead and has a radiant face that shines like a crescent moon.
*Adornments:* It mentions Him wearing specific traditional ornaments like the aarani malar, palakka mothiram (a traditional Kerala necklace/pendant), and a tiger claw pendant typically worn by children.
*Divine Instruments & Attire:* The song visually seeks His form holding a flute (murali), draped in yellow silk garments (peethambaram), and adorned with peacock feathers.
*Prayer for Grace:* The devotee praises Krishna as the One with a dark, rain-cloud complexion and prays to Him to remove all sorrows and grant liberation, just as He showered immense blessings on His devotee, Kuchela.
I shall seat Lord Hari, who is the admirer of music, in the grand hall of wisdom decorated with nine precious gems and shall worship the Lord through meditation.
I shall worship through performing the aarathi with the lamp made of pearls, kept in the plate of devotion made of gold decked with pearls and jewels, through which I wish to become liberated.
I would not leave you and will neither allow you to leave me. Oh Lord the one who recline on a serpent, Oh Vijaya Vittala, kindly hear the plea of your devotees.
जॊ जो जो जो जो साधुवंत जो जॊ जो जो जो भाग्यवंत जो जो जो जो गुणवंत जो जो जो जो लक्ष्मीकांत
भक्तवत्सल भवहरने जो जो तप्तिवास प्रिय कृष्णने जो जो मुक्ति दायक मुरहरने जो जो चित्तजनय्य परवस्तुवे जो जो करुणाकर करि वरदने जो जो सुरनर मुनि वंदितने जो जो गरुड वाहन नागधरने जो जो खर दूषण संहारने जो जो
This is a song set in the 'heroine-heroine' vein. In it, the heroine (Radha/Gopi) sends her friend (played by a parrot in the song) to convey her heart-melting love to Kannan (Krishna) . Below is a summary of the main meaning of the lyrics:
• Pallavi:
Meaning: "Tell Kannan, parrot, about this deep love I, a virgin, have for Kannan."
• Anupallavi:
Meaning: "Let him understand that I am losing my sleep and physical strength at the thought of him, and my mind is melting.
*कन्ननिदम् एदुत्तु* *रागम् : रागमालिका* *तालम्: आदि* *संगीतकार: अंबुजम् कृष्ण* *भाषा: तमिल* *गायन : सितारा कृष्ण कुमार (सिथु मनी)*
भगवान श्री राम के अवतार लेने का प्रयोजन पूर्ण होने पर, ब्रह्मा जी ने कहा आप जैसे चाहें वैसे विष्णु-लोक में आएँ। केवल योगमाया सीतादेवी आपको यथार्थ रूप को पहचानती हैं। ब्रह्मा जी की बात सुनकर वे सरयू नदी में प्रवेश कर, अपने वैष्णव तेज रूप में समा गए थे। उस समय अप्सराओं ने नृत्य किया , गंधर्वों ने गान किया, देवताओं ने पुष्पवर्षा की। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के उत्तर काण्ड के ११० वें सर्ग में इसका वर्णन है।
भारत भूषण जी ने एक कवि सम्मलेन में कहा था कि वे सरयू-तट पर बैठे थे, उन्हें रामायण का उपरोक्त प्रसंग याद आया। वे वहाँ दिव्य भावों में खो गये। कैसे राम को सीता का स्मरण ने विचलित किया होगा। विशाल राज्य,सारा सुख तुच्छ लगा होगा। सीता का बिछोह असहनीय हो गया होगा। कैसे जल में प्रवेश किया होगा। पानी पहले घुटनों तक, फिर नाभि से होता हुआ छाती तक आया होगा। राम कैसे सरयू में आगे बढे होंगे। माँ सीता और उनकी सखियों ने कैसे उनका स्वागत किया होगा। इस तरह उनकी यह कविता बन गयी।
आप यह कालजयी रचना पढ़ें, सुनें और महसूस करें। शब्द और स्वर, एक दिव्य अनुभूति दे जाते हैं।
राम की जल समाधि
पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से हारा-हारा रीता-रीता निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम निःशब्द अधर, पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता
किसलिए रहे अब ये शरीर ये अनाथ मन किसलिए रहे धरती को मैं किसलिए सहूँ धरती मुझको किसलिए सहे
तू कहाँ खो गई वैदेही वैदेही तू खो गई कहाँ मुरझे राजीव नयन बोले काँपी सरयू, सरयू काँपी
देवत्व हुआ लो पूर्णकाम नीली माटी निष्काम हुई इस स्नेहहीन देह के लिए अब साँस-साँस संग्राम हुई
ये राजमुकुट ये सिंहासन ये दिग्विजयी वैभव अपार ये प्रिया-हीन जीवन मेरा सामने नदी की अगम धार
माँग रे भिखारी-लोक माँग कुछ और माँग अंतिम बेला आदर्शों के जल-महल बना फिर राम मिले न मिले तुझको फिर ऐसी शाम ढले न ढले
ओ खंडित प्रणयबंध मेरे किस ठौर कहाँ तुझको जोड़ूँ कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य बोलूँ भी तो किससे बोलूँ सिमटे अब ये लीला सिमटे भीतर-भीतर गूँजा भर था छप से पानी में पॉंव पड़ा चरणों से लिपट गई सरयू
फिर लहरों पर वाटिका खिली रतिमुख सखियाँ नतमुख सीता सम्मोहित मेघबरन बरसे पानी घुटनों-घुटनों आया आया घुटनों-घुटनों पानी
फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा लहरों-लहरों धारा-धारा व्याकुलता फिर पारा-पारा
फिर एक हिरन -सी किरण देह दौड़ती चली आगे-आगे नयनों में जैसे बाण सधा दो पाँव उड़े जल में आगे
पानी लो नाभि-नाभि आया आया लो नाभि-नाभि पानी जल में तम, तम में जल बहता ठहरो बस, और नहीं, कहता जल में कोई जीवित दहता
फिर एक तपस्विनी शांत-सौम्य धक्-धक् लपटों -सी निर्विकार सशरीर सत्य-सी सन्मुख थी
उन्माद नीर चीरने लगा पानी छाती-छाती आया आया छाती-छाती पानी
भीतर लहरें, बाहर लहरें आगे जल था, पीछे जल था केवल जल था, वक्ष स्थल था वक्ष-स्थल तक केवल जल था
जल पर तिरता था नीलकमल बिखरा -बिखरा-सा नीलकमल कुछ और-और-सा नीलकमल
फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर धरती से नभ तक जगर-मगर दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे जैसे सूरज के हस्ताक्षर
बाँहों के चन्दन घेरे से दीपित जयमाल उठी ऊपर सर्वस्व सौंपता शीश झुका लो शून्य राम, लो राम लहर
फिर लहर-लहर लहरें-लहरें सरयू-सरयू सरयू-सरयू लहरें -लहरें लहरें-लहरें केवल तम ही तम तम ही तम
जल ही जल जल ही जल केवल हे राम-राम हे राम-राम हे राम-राम हे राम-राम
मैं पीर-ए-मुग़ाँ के दैर (मय-ख़ाने) से शराब पिए बिना ही ब-हालत-ए-मस्ती आ रहा हूँ, मैं ‘ला’ (कोई नहीं) की मंज़िल में ‘इल्ला’ (इस के सिवाय) की शराब से मस्त रहा।
यह काम समझदार लोगों का नहीं है, तुम तो हज़रत मूसा के दामन को पकड़ लो, साहिल पर मस्त रहने वाले सौ आदमी भी समुंदर में डूबकर मस्त होने वाले एक व्यक्ति के बराबर नहीं होते।
मैं अपने दिल को चमन में ले गया, वह खिलने के बजाए उल्टा बाग़ की हवा से अफ़्सुर्दा हो गया, सहरा में मस्त रहने वाला यह लाला (मेरा दिल) फुलवारियों में मुरझा के रह जाता है।
अज़ हर्फ़-ए-दिल आवेज़िश असरार-ए-हरम पैदा दी काफ़िरके दीदम दर वादी-ए-बतहा मस्त
उसकी दिल-आवेज़ आवाज़ से हरम के असरार ज़ाहिर हो रहे थे, कल मैं ने बतहा की वादी में एक काफ़िर को बे-ख़ुदी के आलम में ये कहते हुए देखा:
सीनास्त कि फ़ारान अस्त या-रब चे मक़ाम अस्त ईं हर ज़र्रः-ए-ख़ाक-ए-मन चश्मेस्त तमाशा मस्त
यह वादी-ए-सीना है या फ़ारान की वादी, या रब यह कौन सी जगह है, कि मेरी ख़ाक-ए-बदन का हर ज़र्रा आँख बन कर मस्त-ए-तमाशा है।
हे अन्नपूर्णा देवी, विशालाक्षी - विशाल नेत्रों वाली, कृपया मेरी रक्षा करें। आप संसार में घटित होने वाली सभी घटनाओं की साक्षी हैं ("अखिलभुवनसाक्षी")। कृपया मुझे अपनी दृष्टि से अनुग्रहित करें ("कटाक्षी")। वह प्रसिद्ध ("उन्नत") गर्त्ततिरा-कुझिक्कराई ("गर्त-तिरा-विहारिणी") में निवास करती हैं। वह ओंकार ("ओंकारिणी") के रूप में हैं। वह दुखों ("दुरितादि") को दूर करती हैं ("निवारिणी")। वह भगवान शिव की संगिनी ("रजनी") हैं, जो स्वयं को सर्पों ("पन्नग") से सुशोभित करते हैं ("आभरण")। वह प्राचीन ("पुरानी") हैं। वह भगवान परमेश्वर ("विश्वेश्वर") की ज्योति ("भास्वरी") हैं। वह एक हाथ में रत्नजड़ित पात्र (मणिक्य पात्र) मीठे चावल-पायसन से भरा हुआ (पुरिता) और दूसरे हाथ में सोने का चम्मच (दर्वी) धारण किए हुए हैं। वह कामदेव और अन्य लोगों की रक्षा करने में निपुण हैं। वह अलंकृत सोने के आभूषणों और सुनहरे रेशम से सुशोभित हैं। ब्रह्मा और तुम्बुरु एवं नारद जैसे प्रख्यात ऋषियों द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वह धर्म-अर्थ-काम से परे मोक्ष प्रदान करने में कुशल हैं।वह गुरुगुहा ("त्रिपदा सोभिता") ("गुरुगुहा-सदारे") की प्रिय मां हैं।
मैं गीत बेचकर घर आया, सीमेंट ईंट लोहा लाया कवि-मन माया ने भरमाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !
जनमा था आँसू गाने को, खोया झूठी मुसकानों में भीतर का सुख खोजता फिरा , बाहर से सजी दुकानों में मैं अश्रु बेचकर घर आया, प्लास्टिक के गुलदस्ते लाया अपनी आत्मा को बहकाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !
शब्दों-शब्दों सौंदर्य गढ़ा, नगरों-नगरों नीलाम किया संतों की संगत छोड़ किसी, वैश्या के घर विश्राम किया मैं प्यार बेचकर घर आया, चुटकी भर सुविधाएँ लाया क्या करना था क्या कर आया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !
सारे दागों को ढके रहा, छंदों की शिल्पित चादर से गोरे कागज काले करता, टेढ़े-मेढ़े हस्ताक्षर से मैं शर्म बेचकर घर आया, गहरे रंग का चश्मा लाया दर्पण पर परदा लटकाया हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !
मैं नृसिंह भगवान् को प्रणाम करता हूँ जो प्रह्लाद महाराज को आनन्द प्रदान करने वाले हैं तथा जिनके नख दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पाषाण सदृश वक्षस्थल के ऊपर छेनी के समान हैं।
नृसिंह भगवान् यहाँ है और वहाँ भी हैं। मैं जहाँ कहीं भी जाता हॅूँ वहाँ नृसिंह भगवान् हैं। वे हृदय में हैं और बाहर भी हैं। मैं नृसिंह भगवान् की शरण लेता हूँ जो समस्त पदार्थों के स्रोत तथा परम आश्रय हैं।
हे केशव! हे जगत्पते! हे हरि! आपने नरसिंह का रूप धारण किया है आपकी जय हो। जिस प्रकार कोई अपने नाखूनों से भ्रमर को आसानी से कुचल सकता है उसी प्रकार भ्रमर सदृश दैत्य हिरण्यकशिपु का शरीर आपके सुन्दर कर-कमलों के नुकीले नाखूनों से चीर डाला गया है।
One of the original renditions of Mann Atkeya Beparwah, immortalized by the legendary Wadali Brothers -
उठ फरीदा सुत्तिया, तू झाड़ू दे मसीत तू सुत्ता रब जागदा, तेरी ढाढ़े नाल परीत
"Awaken Fareed, and go broom the mosque. You’re asleep while your Lord, whom you so dearly love, is awake."
मन अटक्या बेपरवाह दे नाल उस दीन दुनी दे शाह दे नाल
My soul is entangled with the indifferent one Lord of all things visible and invisible
क़ाज़ी मुल्ला मत्ती दैन्दे ख़रय सियाने राह दसेंदे इश्क़ की लागे राह दे नाल
Judges and clerics are full of advice, The righteous and wise show you the path, But love itself needs no guidance
नदियों पार रांझन दा थाना कीते क़ोल ज़रूरी जाना मिंतां कर्रन मल्लाह दे नाल
Ranjha’s dwelling is across the stream, Having given my word, I must go I will beseech the boatman
कहे हुसैन फ़क़ीर साईं दा दर ते छोलियां अद्दियां में उस दीन दुनी दे शाह दे नाल
I am a novice, what do I know of committed love? The separation pulls at my sinews Says Hussain, Gods faqir, I spread my robe before you Lord of all things visible and invisible
कहे हुसैन फ़क़ीर नुमांरहा सच्चे साहिब नू में जाना औरहक कम अल्लाह दे नाल
Says Hussain, the worthless faqir, I know the true Lord In the end I will meet my Creator
𝗧𝗵𝗲 𝗪𝗮𝗱𝗮𝗹𝗶 𝗕𝗿𝗼𝘁𝗵𝗲𝗿𝘀 - Ustad Puranchand Wadali And Late Ustad Pyarelal Wadali, Rendering Soulful Poetry Of Shah Hussain Sufi Poet Of 𝗣𝘂𝗻𝗷𝗮𝗯𝗶 In Their Mystical Style “The Punjabi Sufi Music And Classic Folk Gayaki Of Punjab At Its Very Best, Pure Classicism Of This Kind Rarely Heard These Days.
मन अटक्या बेपरवाह दे नाल उस दीन दुनी दे शाह दे नाल
मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।
वसदी हरदम मन मेरे विच, सूरत यार प्यारे दी अपने शाह नू आप रजावां, हाजत नई पसराय दी काहे हुसैन फकीर नुमान्हा, थीवां खाक दवारे दी
प्रियतम की छवि मेरी आत्मा में निरंतर बसी रहती है। मैं केवल अपने प्रेम को ही प्रसन्न कर सकता हूँ, मुझे किसी दिखावे की आवश्यकता नहीं है। निकम्मे फकीर हुसैन कहते हैं, मैं तुम्हारे द्वार की धूल हूँ।
मन अटक्या बेपरवाह दे नाल उस दीन दुनी दे शाह दे नाल
मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।
क़ाज़ी मुल्ला मत्ती दैन्दे ख़रय सियाने राह दसेंदे इश्क़ की लागे राह दे नाल
न्यायाधीश और धर्मगुरु सलाहों से परिपूर्ण हैं, धर्मी और बुद्धिमान लोग आपको मार्ग दिखाते हैं, परन्तु प्रेम को स्वयं किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं होती। मेरी आत्मा उदासीन व्यक्ति से बंधी हुई है
नदियों पार रांझन दा थाना कीते क़ोल ज़रूरी जाना मिंतां कर्रन मल्लाह दे नाल
रांझा का घर नदी के उस पार है, मैंने वचन दे दिया है, मुझे जाना ही होगा, मैं नाविक से विनती करूँगा।
मन अटक्या बेपरवाह दे नाल उस दीन दुनी दे शाह दे नाल
मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।
साजन बिन रतन होइयां वड्डियां रांझा जोगी में जोगियाणी कमली कर कर सद्दियां साजन बिन रतन होइयां वड्डियां में हन अयानी नूह की जाणा बिरहोन तनावां गड्डियां
मेरे प्रियतम के बिना रातें लंबी लगती हैं, रांझा एक संत है और मैं उसका अनुयायी हूँ। उसने मुझे बेसुध कर दिया है।
कहे हुसैन फ़क़ीर सईं दा डर ते छोलियां अद्दियां में उस दीन दुनी दे शाह दे नाल
मैं तो नौसिखिया हूँ, मुझे सच्चे प्रेम का क्या ज्ञान है? जुदाई मेरे शरीर को जकड़ लेती है। हुसैन, अल्लाह के फ़कीर, कहते हैं, मैं आपके सामने अपना वस्त्र बिछाता हूँ, हे समस्त दृश्य और अदृश्य वस्तुओं के स्वामी। मेरी आत्मा उदासीन व्यक्ति से बंधी हुई है
कहे हुसैन फ़क़ीर नुमांरहा सच्चे साहिब नू में जाना औरहक कम अल्लाह दे नाल
हुसैन, निकम्मे फकीर, कहते हैं, मैं सच्चे ईश्वर को जानता हूँ। अंत में मैं अपने सृष्टिकर्ता से मिलूंगा।
मन अटक्या बेपरवाह दे नाल उस दीन दुनी दे शाह दे नाल
मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।
केसनवोन्दु युगावगि त्रनकिन्त कादेयि एनिसलआरादा भवाडी नोंदे नानु सनकादि मुनि वन्द्या वनज संभव जनक फणिशायी प्रह्लादगोलिड श्री कृष्ण
चरणम् ३
भक्तवत्सलनेम्ब बिरुड़ पोट्टा मेले भक्तअधिनानगिरा बेदावे मुक्ति दायक निनु होन्नुरु पूर्वसा शाक्त गुरु पुरंदर विट्ठल श्री कृष्ण
English Translation :
Geetha Naresh May 5, 2024 at 6:45 AM
Meaning:
O pundarikAksha, purushottama Hare, Ranga will you (Ni enna) leave(biDuvare) my hand(kai) (after having) seen(kanDu) me so far. (will you stop your protection to me now?)
C1:
O nIrajaksha, I have no(enagilla) relatives(bandhu galu), there is no happiness(sukha) in life(baduku), I am pained(nonde) at the ridicule(ninde) directed towards me. You are my mother(tAyi) and father(tande), you are all that there is as my relatives(bandhu-baLaga), O Krishna, I believe (nambideno) in you at all times(endendigU)
C2:
A moment(kSaNa) has become an age(yuga - like dwaparayuga), I have been (treated) lower than a blade of grass(by others), I have suffered(nonde) uncountable(eNisalarada) indignities(bhava). O krishna, respected by sages like sanaka, vanaja sambhava janaka, the one resting on a snake, and the one who blessed Prahlada.(don’ leave me…)
C3:
(Tell me) Once you assume (potta mele) the title of bhaktavatsala(the one who protects his devotees), don’t you have to be under the control(AdhIna) of your devotees? O Krishna, the one who lives in Honnuru (honnuru puravAsa), the almighty(shakta) guru purandaravithala. (don’t leave me…)
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री कृष्णाष्टक भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति का एक अत्यंत दिव्य स्रोत है। इसमें आठ श्लोक हैं जो उनकी मनमोहक छवि, लीलाओं और महिमा का वर्णन करते हैं।
अर्थ: जो ब्रजभूमि के एकमात्र आभूषण हैं, समस्त पापों को नष्ट करने वाले हैं और अपने भक्तों के चित्त को आनंदित करने वाले हैं, उन नंदनन्दन (नंद के पुत्र) का मैं सदा भजन करता हूँ। जिनके मस्तक पर सुंदर मोर मुकुट है, हाथों में सुरीली बांसुरी है और जो कामदेव के समान सौंदर्य के सागर हैं, उन चतुर श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ।
अर्थ: जो कामदेव के अहंकार को नष्ट करने वाले हैं, विशाल और चंचल नेत्रों वाले हैं तथा ग्वालों के कष्टों को दूर करने वाले हैं, उन कमल नयन (पद्मलोचन) श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने अपने कमल रूपी हाथों से गोवर्धन पर्वत को धारण किया, जिनकी मंद मुस्कान अत्यंत सुंदर है तथा जिन्होंने देवराज इंद्र के मान (अहंकार) को तोड़ा था, उन नटखट कृष्ण को मेरा प्रणाम है।
श्लोक ३ कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं व्रजाङ्गनाङ्कवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् ॥३॥(पंक्ति का तीसरा चरण) यशोषया समोदया सगोपया सनन्दया युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥३॥
अर्थ: जिनके कानों में कदम्ब के फूलों के कुण्डल हैं, जिनके गाल अत्यंत आकर्षक हैं, जो ब्रज की गोपियों के प्रियतम हैं और जो बड़े-बड़े देवताओं को भी दुर्लभ हैं, उन श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। जो यशोदा माता के साथ अत्यंत प्रसन्न हैं, गोपगणों और नंदजी से घिरे हुए हैं और भक्तों को एकमात्र आनंद प्रदान करने वाले हैं, उन गोपों के नायक को मैं नमन करता हूँ।
अर्थ: जिनके चरण कमल सदैव मेरे मन में बसे रहते हैं, जो घुंघराले बालों से सुशोभित हैं, उन नन्दबालक को मैं प्रणाम करता हूँ। जो सभी दोषों/बुराइयों का नाश करने वाले हैं, समस्त लोकों का पोषण करने वाले हैं और सभी ग्वालों के मन में निवास करने वाले हैं, उन नंदलाल को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक ५ भुवोभरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदासदालसङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसंभवम् ॥५॥
अर्थ: जो पृथ्वी का भार उतारने वाले और संसार रूपी सागर से पार लगाने वाले (नाविक) हैं, यशोदा माता के दुलारे हैं और भक्तों के चित्त को चुराने वाले हैं, उन्हें मेरा प्रणाम। जिनकी तिरछी और सुंदर चितवन मन मोह लेती है, जो भक्तों के सदा संग रहते हैं और जो प्रतिदिन नए और मनोहर प्रतीत होते हैं, उन नंदनंदन को मैं नमन करता हूँ।
अर्थ: जिनके अंग सुगंधित लेप से सुशोभित हैं, गले में मोतियों की माला और आभूषण झिलमिलाते हैं और जिनके नख चंद्रमा के समान चमकते हैं, उन परम सुंदर श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। जो सभी गोप-बालकों को आनंदित करने वाले हैं, सबके हृदय रूपी कमल में वास करने वाले हैं और ब्रज की स्त्रियों का मन मोह लेने वाले हैं, उन सुंदर कृष्ण को मेरा नमन है।
श्लोक ७ पिनाङ्कपाणिमण्डलं सदाविकासिसद्गुणं जगत्त्रयाकतारकं नमामि कृष्णतत्त्वम् ॥७॥
अर्थ: जो अपने हाथों में मुरली धारण किए रहते हैं, जिनके दिव्य गुण सदा विकसित रहते हैं और जो तीनों लोकों का उद्धार करने वाले हैं, उस परमतत्त्व रूपी श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय बनारस की कचौड़ी गली से एक क्रांतिकारी को रात तब पकड़ लिया जब वह अपनी प्रेयसी के साथ था। उसे पकड़ कर वे बनारस के पास एक शहर है मिर्जापुर, वहाँ ले गए। वहाँ से फिर उसे सजा देकर काला पानी (रंगून) भेज दिया। जहाँ से वह कभी न लौट सके!
यहाँ कचौड़ी गली में उसकी प्रेयसी तड़प उठी। उसने उसके विरह में घर बार त्याग दिया और संन्यासिन की तरह विचरने लगी। जब थोड़ा उसे देह और आत्मा की सच्चाई का कुछ भान हुआ तो उसने अपनी विरह पीड़ा को निर्गुण भजन में लोकगीत की प्रख्यात कजरी शैली में लिपिबद्ध किया है। इसे मशहूर ठुमरी गायिका गौहर जान ने बड़े दिल से गाया है।
मिर्जापुर कैले गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमू
एही मिर्जापुर से उड़ेले जहजिया, सैंया चल गइले रंगून हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमू
पनवा से पातर भइल तोर धनिया, देहिया गलेला जइसे नून हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमू
ये दुनिया बनाना और बनाके फिर चलाना बस उसी का काम है बड़ा जोरदार उसका इंतज़ाम है हो बड़ा जबर दस्त उसका इंतज़ाम है
रात को ही रात परभात को परभात शाम ही को शाम है बड़ा जोरदार उसका इंतज़ाम है हो बड़ा जबर दस्त उसका इंतज़ाम है ये दुनिया बनाना और बनाके फिर चलाना बस उसी का काम है बड़ा जोरदार उसका इंतज़ाम है हो बड़ा जबर दस्त उसका इंतज़ाम है
जल पे है थल और थल पे आसमान है फिर भी एक दुजे पे न बोझ के समान है जल पे है थल और थल पे आसमान है फिर भी एक दुजे पे न बोझ के समान है गजब का ये जहान है बिन खम्बे का मकान है गजब का ये जहान है बिन खम्बे का मकान है जहा का एक एक तन उसका गुलाम है बड़ा जोरदार उसका इंतज़ाम है हो बड़ा जबर दस्त उसका इंतज़ाम है ये दुनिया बनाना और बनाके फिर चलाना बस उसी का काम है बड़ा जोरदार उसका इंतज़ाम है हो बड़ा जबर दस्त उसका इंतज़ाम है
सूर्य चंदर तारे अपने धरम से न टल सके इंसान की मजाल क्या जो उसका क्रम बदल सके सूर्य चंदर तारे अपने धरम से न टल सके इंसान की मजाल क्या जो उसका क्रम बदल सके इक फूल भी खिले नहीं एक पत्ता भी हिले नहीं इक फूल भी खिले नहीं एक पत्ता भी हिले नहीं सारे जहाँ की उसके हाथ में लगाम है बड़ा जोरदार उसका इंतज़ाम है हो बड़ा जबर दस्त उसका इंतज़ाम है ये दुनिया बनाना और बनाके फिर चलाना बस उसी का काम है बड़ा जोरदार उसका इंतज़ाम है हो बड़ा जबर दस्त उसका इंतज़ाम है
Navaneetha Chora Namo Namo is a beautiful Carnatic composition written by the 15th-century saint-poet Talapaka Annamacharya. Dedicated to Lord Krishna, the song praises his various incarnations and divine attributes.
पल्लवी
नवनीतचोरा नमो नमो नव महिमार्णव नमो नमो
चरणम् १
हरि नारायण केशव अच्युत कृष्ण नरसिम्हा वामन नमो नमो मुराहर पद्मनाभ मुकुंद गोविंद नारायण नारायण नमो नमो
The song translates to: "Salutations to the stealer of butter, salutations to the ocean of new and divine glories." The stanzas worship Lord Krishna in all his forms, including as Hari, Narayana, and Venkateshwara, as well as the protector of his devotees and the Lord of Dwaraka.
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुर्दात्मत्त्वं सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम्। यत्स्वप्नजागरसुषुपतिमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥
भोर में मुझे उस वास्तविकता की याद आती है जो आत्मा है, जो हृदय में चमक रही है, अस्तित्व-चेतना-खुशी, परमहंससंन्यासियों (संतों) का लक्ष्य, चौथा; जो स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति की अवस्थाओं को सदैव जानता है, वह ब्रह्म जो अंशहीन है, मैं तत्वों का समूह नहीं हूं।
प्रातर्भाजामि मनसा वाचसामगम्यं वाचो विभान्ति निखिला यदनुगृहेन। यन्नेतिनेतिवचनैर्निग्मा अवोचं_ स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुग्रग्र्यम् ॥२॥ भोर में मैं उसकी स्तुति गाता हूं जो मन और वाणी से अप्राप्य है, लेकिन जिसकी कृपा से सभी शब्द चमकते हैं। जिसे शास्त्र 'यह नहीं', 'यह नहीं' शब्दों के माध्यम से घोषित करते हैं - वे कहते हैं कि देवताओं का भगवान अजन्मा और अपरिवर्तनीय है।
भोर में मैं उसे नमस्कार करता हूं जिसे सर्वोच्च आत्मा कहा जाता है जो अंधेरे से परे है, सूर्य के रंग का प्राचीन लक्ष्य है जो पूर्णांक है - वह, अवशिष्ट रूप (यानी संपूर्ण) जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड रस्सी में सांप की तरह प्रकट होता है।
फलश्रुति
श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम्। प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥
यह पुण्यकारी श्लोकों का त्रिक, तीन शब्दों का आभूषण - जो भोर में पढ़ता है, वह परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है।
मत जा, मत जा, जोगी, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
प्रेम भक्ति को पंथ ही न्यारो,
हम को गैल(रास्ता) बता जा जोगी पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा जोगी, जोगी पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
जल जल भयी भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा जोगी पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
मीरा कहे प्रभि गिरधर नगर, ज्योत से ज्योत मिला जा जोगी पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, पाँव पढ़ूँ मैं तोरे, मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी मत जा, मत जा, जोगी, जोगी, जोगी
ईश्वर की कृपा, पूर्वजों के आशीर्वाद, परिवार के स्नेह तथा मित्रों की शुभेच्छाओं के सम्बल पर मैं इस चैत्र कृष्ण चतुर्थी, विक्रम संवत २०८२, आंग्ल दिनांक ०६ मार्च, २०२६ को जीवन के ७५ वर्ष पूर्ण कर रहा हूँ।
सभी का स्नेह-आशीर्वाद अपेक्षित है।🙏
रश्मि-रेख के 5,33,809 पेज व्यूज के लिए कृपापूर्वक ब्लॉग तक पधारे अतिथियों का आभार।