मंगलवार, 23 जून 2026

जॊ जो जो जो जो साधुवंत.../ लोरी / भाषा : कन्नड़ / सन्त पुरन्दर दास कृति / गायन : बाम्बे जय श्री

https://youtu.be/kUvYeK189jU  


जॊ जो जो जो जो साधुवंत...

सन्त पुरन्दर दास कृति
गायन : बाम्बे जय श्री

जॊ जो जो जो जो साधुवंत
जो जॊ जो जो जो भाग्यवंत
जो जो जो जो गुणवंत
जो जो जो जो लक्ष्मीकांत

भक्तवत्सल भवहरने जो जो तप्तिवास प्रिय कृष्णने जो जो
मुक्ति दायक मुरहरने जो जो चित्तजनय्य परवस्तुवे जो जो
करुणाकर करि वरदने जो जो सुरनर मुनि वंदितने जो जो
गरुड वाहन नागधरने जो जो खर दूषण संहारने जो जो

सोमवार, 22 जून 2026

कन्ननिदम् एदुत्तु.../ संगीतकार : अंबुजम् कृष्ण / भाषा: तमिल / गायन : सितारा कृष्ण कुमार (सिथु मनी)

https://youtu.be/E0x027psWlU  

Text and meaning of the song

This is a song set in the 'heroine-heroine' vein. In it, the heroine (Radha/Gopi) sends her friend (played by a parrot in the song) to convey her heart-melting love to Kannan (Krishna)

Below is a summary of the main meaning of the lyrics:


• Pallavi:


Meaning: "Tell Kannan, parrot, about this deep love I, a virgin, have for Kannan." 


• Anupallavi:


Meaning: "Let him understand that I am losing my sleep and physical strength at the thought of him, and my mind is melting.


*कन्ननिदम् एदुत्तु*
*रागम् : रागमालिका*
*तालम्: आदि*
*संगीतकार: अंबुजम् कृष्ण*
*भाषा: तमिल*
*गायन : सितारा कृष्ण कुमार (सिथु मनी)*


*पल्लवी*


कन्ननिदम् एदुत्तु शोल्लादि किलिये कन्नी नान अवनमेल कोंडा कडलाई


*अनुपल्लवी*


उनुरक्कम् विट्टु अवनै निनैन्दु उल्लम् मेझुगै ऐ उरुगुगिरेन एनरु


चरणम् १


एन्ननि निदम् नान कन्निर पोझिंडुम एन्नै निनैक्कडा करणम् केल किलिये (कन्नी नान)


चरणम् २


अम्बुजअक्सा अन अंबु केटका वेम्बिये वादुरल विरेनदु शेल्वे एनरु

रविवार, 21 जून 2026

राम की जल समाधि' - महान गीतकार भारत भूषण के स्वर में...

https://youtu.be/3VGNls6nzmc


कविता की पृष्ठभूमि--

   भगवान श्री राम के अवतार लेने का  प्रयोजन पूर्ण होने पर, ब्रह्मा जी ने कहा आप जैसे चाहें वैसे विष्णु-लोक में आएँ। केवल योगमाया सीतादेवी आपको यथार्थ रूप को पहचानती हैं। ब्रह्मा जी की बात सुनकर वे सरयू नदी में प्रवेश कर, अपने वैष्णव तेज रूप में  समा गए थे। उस समय अप्सराओं ने नृत्य किया , गंधर्वों ने गान किया, देवताओं ने पुष्पवर्षा की। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के उत्तर काण्ड के ११० वें सर्ग में इसका वर्णन है। 

    भारत भूषण जी ने एक कवि सम्मलेन में कहा था कि वे सरयू-तट पर बैठे थे, उन्हें रामायण का उपरोक्त प्रसंग याद आया। वे वहाँ दिव्य  भावों में खो गये। कैसे राम को सीता का स्मरण ने विचलित किया होगा। विशाल राज्य,सारा सुख तुच्छ लगा होगा। सीता का बिछोह असहनीय हो गया होगा। कैसे जल में प्रवेश किया होगा। पानी पहले घुटनों तक, फिर नाभि से होता हुआ छाती तक आया होगा। राम कैसे सरयू में आगे बढे होंगे। माँ सीता और उनकी सखियों ने कैसे उनका स्वागत किया होगा। इस तरह उनकी यह कविता बन गयी। 

   आप यह कालजयी रचना पढ़ें, सुनें और महसूस करें। शब्द और स्वर, एक दिव्य अनुभूति दे जाते हैं। 

राम की जल समाधि

पश्चिम में ढलका सूर्य 
उठा वंशज सरयू की रेती से 
हारा-हारा रीता-रीता 
निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम 
निःशब्द अधर, पर रोम-रोम 
था टेर रहा सीता-सीता 

किसलिए रहे अब ये शरीर 
ये अनाथ मन किसलिए रहे 
धरती को मैं किसलिए सहूँ 
धरती मुझको किसलिए सहे

तू कहाँ खो गई वैदेही 
वैदेही तू खो गई कहाँ 
मुरझे राजीव नयन बोले 
काँपी सरयू, सरयू काँपी 

देवत्व हुआ लो पूर्णकाम 
नीली माटी निष्काम हुई 
इस स्नेहहीन देह के लिए 
अब साँस-साँस संग्राम हुई 

ये राजमुकुट ये सिंहासन 
ये दिग्विजयी वैभव अपार 
ये प्रिया-हीन जीवन मेरा 
सामने नदी की अगम धार

माँग रे भिखारी-लोक माँग 
कुछ और माँग अंतिम बेला 
आदर्शों के जल-महल बना 
फिर राम मिले न मिले तुझको 
फिर ऐसी शाम ढले न ढले 

ओ खंडित प्रणयबंध मेरे 
किस ठौर कहाँ तुझको जोड़ूँ 
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य 
बोलूँ भी तो किससे बोलूँ 
सिमटे अब ये लीला सिमटे 
भीतर-भीतर गूँजा भर था 
छप से पानी में पॉंव पड़ा 
चरणों से लिपट गई सरयू 

फिर लहरों पर वाटिका खिली 
रतिमुख सखियाँ नतमुख सीता 
सम्मोहित मेघबरन बरसे 
पानी घुटनों-घुटनों आया 
आया घुटनों-घुटनों पानी 

फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा 
लहरों-लहरों धारा-धारा 
व्याकुलता फिर पारा-पारा 

फिर एक हिरन -सी किरण देह 
दौड़ती चली आगे-आगे 
नयनों में जैसे बाण सधा 
दो पाँव उड़े जल में आगे 

पानी लो नाभि-नाभि आया 
आया लो नाभि-नाभि पानी 
जल में तम, तम में जल बहता  
ठहरो बस, और नहीं, कहता 
जल में कोई जीवित दहता 

फिर एक तपस्विनी शांत-सौम्य 
धक्-धक् लपटों -सी निर्विकार 
सशरीर सत्य-सी सन्मुख थी 

उन्माद नीर चीरने लगा 
पानी छाती-छाती आया 
आया छाती-छाती पानी 

भीतर लहरें, बाहर लहरें 
आगे जल था, पीछे जल था 
केवल जल था, वक्ष स्थल था 
वक्ष-स्थल तक केवल जल था 

जल पर तिरता था नीलकमल 
बिखरा -बिखरा-सा नीलकमल 
कुछ और-और-सा नीलकमल 

फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर 
धरती से नभ तक जगर-मगर 
दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे 
जैसे सूरज के हस्ताक्षर 

बाँहों के चन्दन घेरे से 
दीपित जयमाल उठी ऊपर 
सर्वस्व सौंपता शीश झुका 
लो शून्य राम, लो राम लहर 

फिर लहर-लहर लहरें-लहरें 
सरयू-सरयू सरयू-सरयू 
लहरें -लहरें लहरें-लहरें 
केवल तम ही तम
तम ही तम 

जल ही जल 
जल ही जल केवल 
हे राम-राम 
हे राम-राम 
हे राम-राम 
हे राम-राम

अज़ दैर-ए-मुग़ाँ आयम बे-गर्दिश-ए-सहबा मस्त.../ अल्लामा इक़बाल / गायन : मुंशी रज़ीउद्दीन

 https://youtu.be/-R3OxAAlOx8


अज़ दैर-ए-मुग़ाँ आयम बे-गर्दिश-ए-सहबा मस्त
दर मंज़िल-ए-ला बूदम अज़ बादः-ए-इल्ला मस्त

मैं पीर-ए-मुग़ाँ के दैर (मय-ख़ाने) से शराब पिए बिना ही ब-हालत-ए-मस्ती आ रहा हूँ, मैं ‘ला’ (कोई नहीं) की मंज़िल में ‘इल्ला’ (इस के सिवाय) की शराब से मस्त रहा।

दानम कि निगाह-ए-ऊ ज़र्फ़-ए-हमः कस बीनद
कर्दस्त मरा साक़ी अज़ 'इश्वः-ओ-ईमा मस्त

मुझे मालूम है कि उसकी निगाह हर एक का ज़र्फ़ देख लेती है, चुनाँचे साक़ी ने मुझे अपने नाज़-ओ-अदा ही से मस्त कर दिया है।

वक़्तस्त कि ब-गुशायम मय-ख़ानः-ए-रूमी बाज़
पीरान-ए-हरम दीदम दर सेहन-ए-कलीसा मस्त

अब वक़्त आ गया है कि मैं मौलाना रूम का मय-ख़ाना फिर से खोल दूँ, मैंने पीरान-ए-हरम को कलीसा के सहन में मस्त देखा है।

ईं कार-ए-हकीमे नीस्त दामान-ए-कलीमे गीर
सद बंदः-ए-साहिल मस्त यक बंदः-ए-दरिया मस्त

यह काम समझदार लोगों का नहीं है, तुम तो हज़रत मूसा के दामन को पकड़ लो, साहिल पर मस्त रहने वाले सौ आदमी भी समुंदर में डूबकर मस्त होने वाले एक व्यक्ति के बराबर नहीं होते।

दिल रा ब-चमन बुर्दम अज़ बाद-ए-चमन अफ़सुर्द
मीरद ब-ख़याबाँ-हा ईं लालः-ए-सहरा मस्त

मैं अपने दिल को चमन में ले गया, वह खिलने के बजाए उल्टा बाग़ की हवा से अफ़्सुर्दा हो गया, सहरा में मस्त रहने वाला यह लाला (मेरा दिल) फुलवारियों में मुरझा के रह जाता है।

अज़ हर्फ़-ए-दिल आवेज़िश असरार-ए-हरम पैदा
दी काफ़िरके दीदम दर वादी-ए-बतहा मस्त

उसकी दिल-आवेज़ आवाज़ से हरम के असरार ज़ाहिर हो रहे थे, कल मैं ने बतहा की वादी में एक काफ़िर को बे-ख़ुदी के आलम में ये कहते हुए देखा:

सीनास्त कि फ़ारान अस्त या-रब चे मक़ाम अस्त ईं
हर ज़र्रः-ए-ख़ाक-ए-मन चश्मेस्त तमाशा मस्त

यह वादी-ए-सीना है या फ़ारान की वादी, या रब यह कौन सी जगह है, कि मेरी ख़ाक-ए-बदन का हर ज़र्रा आँख बन कर मस्त-ए-तमाशा है।

शनिवार, 20 जून 2026

अन्नपूर्णे विशालाक्षी.../ मुथुस्वामी दीक्षितार कृति / गायन : मीरा राम मोहन

https://youtu.be/ei0kt6QkaZk?si=FSNBlyvJRzwmYeox


*संगीत रचना : मुथुस्वामी दीक्षितार*
*गायन : मीरा राम मोहन*
*भाषा: संस्कृत*


*पल्लवी*

अन्नपूर्णे विशालाक्षी (रक्षा)
अखिला भुवन साक्षी कटाक्षी

*अनुपल्लवी*

उन्नत गर्त्ता तीरा विहारिणी
ओंकारिणी दुरितादि निवारिणी

*मध्यकालम्*

पन्नगभरण रजनी पुराणी
परमेश्वर विश्वेश्वर भास्वरी (अन्नपूर्णे)

*चरणम्*

पायसअन्नपुरिता माणिक्य
पात्र हेमादर्वी विधृतकरे कायाजादि रक्षणा
निपुणतारे
कंचनमय भूषणा अंबरधारे

*मध्यकालम्*

तोयाजासनादि सेवितापारे तुम्बुरु नारदादि नुता वारे
त्रयातिता मोक्षप्रदा चतुरे त्रिपदा शोभिता गुरुगुहासादरे

*अर्थ: (टी.के. गोविंदा राव की पुस्तक से)*

हे अन्नपूर्णा देवी, विशालाक्षी - विशाल नेत्रों वाली, कृपया मेरी रक्षा करें। आप संसार में घटित होने वाली सभी घटनाओं की साक्षी हैं ("अखिलभुवनसाक्षी")। कृपया मुझे अपनी दृष्टि से अनुग्रहित करें ("कटाक्षी")। वह प्रसिद्ध ("उन्नत") गर्त्ततिरा-कुझिक्कराई ("गर्त-तिरा-विहारिणी") में निवास करती हैं। वह ओंकार ("ओंकारिणी") के रूप में हैं। वह दुखों ("दुरितादि") को दूर करती हैं ("निवारिणी")। वह भगवान शिव की संगिनी ("रजनी") हैं, जो स्वयं को सर्पों ("पन्नग") से सुशोभित करते हैं ("आभरण")। वह प्राचीन ("पुरानी") हैं। वह भगवान परमेश्वर ("विश्वेश्वर") की ज्योति ("भास्वरी") हैं। वह एक हाथ में रत्नजड़ित पात्र (मणिक्य पात्र) मीठे चावल-पायसन से भरा हुआ (पुरिता) और दूसरे हाथ में सोने का चम्मच (दर्वी) धारण किए हुए हैं। वह कामदेव और अन्य लोगों की रक्षा करने में निपुण हैं। वह अलंकृत सोने के आभूषणों और सुनहरे रेशम से सुशोभित हैं। ब्रह्मा और तुम्बुरु एवं नारद जैसे प्रख्यात ऋषियों द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वह धर्म-अर्थ-काम से परे मोक्ष प्रदान करने में कुशल हैं।वह गुरुगुहा ("त्रिपदा सोभिता") ("गुरुगुहा-सदारे") की प्रिय मां हैं।


गुरुवार, 18 जून 2026

अम्बा स्तवम् / ब्रह्मर्षि सदाशिवन कृत

https://youtu.be/O_0PVXI4RJ0?si=Z7MhM4zarVmYwku1


वन्देऽहन्तेऽनन्ते सुपदर -
विन्दे विन्दे शन्ते निजसुख -
कन्देऽमन्दे स्पन्दे शुभकरि
बहुदयहृदययुते ।
मायेऽमेये लीये पुरहर -
जायेऽजेये ज्ञेये ननु भव -
दीये ध्येयेऽभ्येये निरुपम -
पदि हृदि मृदितमृते ॥१॥

रुन्धे हतनतबन्धे मम हृदयन्ते स्मितजितकुन्दे
अमलतररूपेऽपापे दीपे भवकूपे पतितं व्यथितं
देवि समुद्धर करुणाजलराशे सुरुचिरवेषे॥२॥

धीरे वीरे शूरे सदमृत -
धारे तारेऽसारे बत भव -
कारागारे घोरे निपतित -
मव शिशुमतुलबले ।
अम्बालम्बे लम्बोदरपरि -
पाले बाले काले खलुजग -
दीशे धीशेऽनीशे हृदि शिव -
मनुमनुदिनममले ॥३॥

शिष्टहितैषिणि दुष्टविनाशिनि
कष्टविभेदिनि दृष्टिविनोदिनि
सङ्कटकण्टकभिन्दनकुशलकले सकले सबले
श्रद्धाबद्धे न्यस्ताभयहस्ते सुरगणविनुते॥४॥

श्रेष्ठे प्रेष्ठे ज्येष्ठे हिमगिरि -
पुष्टे जुष्टे तिष्ठे: शिवपरि -
निष्ठे स्पष्टे हृष्टे मम हृदि
मुनिजननुतिमुदिते ।
आद्ये वेद्ये वैद्ये त्रिजगति
रामे वामे श्यामे कुरु करु -
णान्ते दान्ते शान्ते भयहर -
भगवति सति शिवदे ॥५॥

बुधवार, 17 जून 2026

दर्द हो दिल में तो दवा कीजे.../ दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए.../ शायर : मिर्ज़ा ग़ालिब / गायन : दीक्षा तूर

https://youtu.be/aDi1Bj98-mY?si=gYq5AqmA63uEnLLM


दर्द हो दिल में तो दवा कीजे
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजे

हमको फ़रियाद करनी आती है
आप सुनते नहीं तो क्या कीजे

रंज उठाने से भी ख़ुशी होगी
पहले दिल दर्द आशना कीजे

मौत आती नहीं कहीं, ग़ालिब
कब तक अफ़सोस जीस्त का कीजे

************

दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फ़लत-शिआरी हाए हाए

तेरे दिल में गर न था आशोब-ए-ग़म का हौसला
तू ने फिर क्यूँ की थी मेरी ग़म-गुसारी हाए हाए

क्यूँ मिरी ग़म-ख़्वार्गी का तुझ को आया था ख़याल
दुश्मनी अपनी थी मेरी दोस्त-दारी हाए हाए

उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बाँधा तो क्या
उम्र को भी तो नहीं है पाएदारी हाए हाए

ज़हर लगती है मुझे आब-ओ-हवा-ए-ज़िंदगी
या'नी तुझ से थी इसे ना-साज़गारी हाए हाए

रविवार, 14 जून 2026

मैं गीत बेचकर घर आया.../ कवि : स्वर्गीय भारत भूषण

https://youtu.be/Y4QBJXGdpRM?si=s_IxrEZuFf21J3ys


मैं गीत बेचकर घर आया, सीमेंट ईंट लोहा लाया 
कवि-मन माया ने भरमाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !

जनमा था आँसू गाने को, खोया झूठी मुसकानों  में 
भीतर का सुख खोजता फिरा , बाहर से सजी दुकानों में 
मैं अश्रु बेचकर घर आया, प्लास्टिक के गुलदस्ते लाया 
अपनी आत्मा को बहकाया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना ! 

शब्दों-शब्दों सौंदर्य गढ़ा, नगरों-नगरों नीलाम किया 
संतों की संगत छोड़ किसी, वैश्या के घर विश्राम किया 
मैं प्यार  बेचकर घर आया, चुटकी भर सुविधाएँ लाया 
क्या करना था क्या कर आया, हे ईश्वर मुझे क्षमा करना ! 

सारे दागों को ढके रहा, छंदों की शिल्पित चादर से 
गोरे कागज काले करता, टेढ़े-मेढ़े हस्ताक्षर से 
मैं शर्म बेचकर घर आया, गहरे रंग का चश्मा लाया 
दर्पण पर परदा लटकाया हे ईश्वर मुझे क्षमा करना !

शुक्रवार, 12 जून 2026

नृसिंह आरती हिंदी में – अर्थ के साथ

https://youtu.be/aw83W-y-0_A?si=0KR35wVa7YNXjbIr

(१)
नमस्ते नरसिंहाय 
    प्रह्लादाह्लाद-दायिने। 
   हिरण्यकशिपोर्वक्षः- 
        शिला-टङ्क-नखालये।।


मैं नृसिंह भगवान्‌ को प्रणाम करता हूँ जो प्रह्लाद महाराज को आनन्द प्रदान करने वाले हैं तथा जिनके नख दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पाषाण सदृश वक्षस्थल के ऊपर छेनी के समान हैं।


(२) 
  इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो 
       यतो यतो यामि ततो नृसिंहः। 
बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो 
नृसिंहमादि शरणं प्रपद्ये॥


नृसिंह भगवान्‌ यहाँ है और वहाँ भी हैं। मैं जहाँ कहीं भी जाता हॅूँ वहाँ नृसिंह भगवान्‌ हैं। वे हृदय में हैं और बाहर भी हैं। मैं नृसिंह भगवान्‌ की शरण लेता हूँ जो समस्त पदार्थों के स्रोत तथा परम आश्रय हैं।


(3) 
तव कर-कमल-वरे नखम्‌ 
अद्‌भुत-श्रृंङ्गम्‌ 
दलित-हिरण्यकशिपु-
तनु-भृंङ्गम्‌ 
केशव धृत-नरहरिरूप 
जय जगदीश हरे॥


हे केशव! हे जगत्पते! हे हरि! आपने नरसिंह का रूप धारण किया है आपकी जय हो। जिस प्रकार कोई अपने नाखूनों से भ्रमर को आसानी से कुचल सकता है उसी प्रकार भ्रमर सदृश दैत्य हिरण्यकशिपु का शरीर आपके सुन्दर कर-कमलों के नुकीले नाखूनों से चीर डाला गया है।

गुरुवार, 11 जून 2026

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल.../ शाह हुसैन फकीर / वडाली बन्धु

https://youtu.be/-qk67qMDuaM  


One of the original renditions of Mann Atkeya Beparwah, immortalized by the legendary Wadali Brothers -

उठ फरीदा सुत्तिया, तू झाड़ू दे मसीत 
तू सुत्ता रब जागदा, तेरी ढाढ़े नाल परीत 

"Awaken Fareed, and go broom the mosque.
You’re asleep while your Lord, whom you so dearly love, is awake."

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

My soul is entangled with the indifferent one
Lord of all things visible and invisible

क़ाज़ी मुल्ला मत्ती दैन्दे
ख़रय सियाने राह दसेंदे
इश्क़ की लागे राह दे नाल

Judges and clerics are full of advice,
The righteous and wise show you the path,
But love itself needs no guidance

नदियों पार रांझन दा थाना
कीते क़ोल ज़रूरी जाना
मिंतां कर्रन मल्लाह दे नाल

Ranjha’s dwelling is across the stream,
Having given my word, I must go
I will beseech the boatman

कहे हुसैन फ़क़ीर साईं दा
दर ते छोलियां अद्दियां में
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

I am a novice, what do I know of committed love?
The separation pulls at my sinews
Says Hussain, Gods faqir, I spread my robe before you
Lord of all things visible and invisible

कहे हुसैन फ़क़ीर नुमांरहा
सच्चे साहिब नू में जाना
औरहक कम अल्लाह दे नाल

Says Hussain, the worthless faqir,
I know the true Lord
In the end I will meet my Creator

𝗧𝗵𝗲 𝗪𝗮𝗱𝗮𝗹𝗶 𝗕𝗿𝗼𝘁𝗵𝗲𝗿𝘀 - Ustad Puranchand Wadali And Late Ustad Pyarelal Wadali, Rendering Soulful Poetry Of Shah Hussain Sufi Poet Of 𝗣𝘂𝗻𝗷𝗮𝗯𝗶 In Their Mystical Style “The Punjabi Sufi Music And Classic Folk Gayaki Of Punjab At Its Very Best, Pure Classicism Of This Kind Rarely Heard These Days.

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

वसदी हरदम मन मेरे विच, सूरत यार प्यारे दी
अपने शाह नू आप रजावां, हाजत नई पसराय दी
काहे हुसैन फकीर नुमान्हा, थीवां खाक दवारे दी

प्रियतम की छवि मेरी आत्मा में निरंतर बसी रहती है।
मैं केवल अपने प्रेम को ही प्रसन्न कर सकता हूँ, मुझे किसी दिखावे की आवश्यकता नहीं है।
निकम्मे फकीर हुसैन कहते हैं, मैं तुम्हारे द्वार की धूल हूँ।

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

क़ाज़ी मुल्ला मत्ती दैन्दे
ख़रय सियाने राह दसेंदे
इश्क़ की लागे राह दे नाल

न्यायाधीश और धर्मगुरु सलाहों से परिपूर्ण हैं,
धर्मी और बुद्धिमान लोग आपको मार्ग दिखाते हैं,
परन्तु प्रेम को स्वयं किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं होती।
मेरी आत्मा उदासीन व्यक्ति से बंधी हुई है

नदियों पार रांझन दा थाना
कीते क़ोल ज़रूरी जाना
मिंतां कर्रन मल्लाह दे नाल

रांझा का घर नदी के उस पार है,
मैंने वचन दे दिया है, मुझे जाना ही होगा,
मैं नाविक से विनती करूँगा।

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

साजन बिन रतन होइयां वड्डियां
रांझा जोगी में जोगियाणी
कमली कर कर सद्दियां
साजन बिन रतन होइयां वड्डियां
में हन अयानी नूह की जाणा
बिरहोन तनावां गड्डियां

मेरे प्रियतम के बिना रातें लंबी लगती हैं,
रांझा एक संत है और मैं उसका अनुयायी हूँ।
उसने मुझे बेसुध कर दिया है।

कहे हुसैन फ़क़ीर सईं दा
डर ते छोलियां अद्दियां में
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मैं तो नौसिखिया हूँ, मुझे सच्चे प्रेम का क्या ज्ञान है?
जुदाई मेरे शरीर को जकड़ लेती है।
हुसैन, अल्लाह के फ़कीर, कहते हैं, मैं आपके सामने अपना वस्त्र बिछाता हूँ,
हे समस्त दृश्य और अदृश्य वस्तुओं के स्वामी।
मेरी आत्मा उदासीन व्यक्ति से बंधी हुई है

कहे हुसैन फ़क़ीर नुमांरहा
सच्चे साहिब नू में जाना
औरहक कम अल्लाह दे नाल

हुसैन, निकम्मे फकीर, कहते हैं,
मैं सच्चे ईश्वर को जानता हूँ।
अंत में मैं अपने सृष्टिकर्ता से मिलूंगा।

मन अटक्या बेपरवाह दे नाल
उस दीन दुनी दे शाह दे नाल

मेरी आत्मा समस्त दृश्य एवं अदृश्य वस्तुओं के उदासीन स्वामी से बंधी हुई है।

बुधवार, 10 जून 2026

रघुपति राघव राजाराम.../ श्री लक्ष्माचार्य कृत / स्वर : अरुणा साईराम

https://youtu.be/7V5dQnLtaus 


रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम ॥

शुक्रवार, 5 जून 2026

घाट पर ठाड़े श्री मदनगोपाल.../ गायन : मुदिता एवं रुचिता जमरिया

https://youtu.be/WIKkpp2liSU?si=O2Q6KbL6F3BqdqKl


घाट पर ठाड़े श्री मदनगोपाल ।
कौन युक्ति कर भरों री यमुनाजल पर्यो है हमारे ख्याल ।।

घोस बढ़्यो घर सास  रिसैहै चल न सकत एक चाल ।
कहा करुं अब यो नहीं मानत सुंदर नंदको लाल ।।

कछुक संकोच कछु चोप मिलन की परी प्रेम की जाल ।
परमानंद स्वामी चित चोर्यों वेणु बजाय रसाल ।।

कण्डु कण्डु नियन्ना.../ संत पुरंदर दासर कृति / गायन : सुषमा अनिल / भाषा: कन्नड़

https://youtu.be/92RwKoSfukI?si=l1jzfH3Du9jSiuQa


पल्लवी

कण्डु कण्डु नियन्ना कइया बिदुवारे पुंडरीकाक्ष पुरूषोत्तम हरे

चरणम् १

बन्धुगालू एनगिला बदुकिनाली सुखविल्ला निन्देयली नन्देनै निराजाक्ष
तन्दे तैय्यु निने बन्धु बालगावु नी इने एंडेन्डिगु निन्ना नम्बिडेनो कृष्ण

चरणम्  २

केसनवोन्दु युगावगि त्रनकिन्त कादेयि एनिसलआरादा भवाडी नोंदे नानु
सनकादि मुनि वन्द्या वनज संभव जनक फणिशायी प्रह्लादगोलिड श्री कृष्ण

चरणम्  ३

भक्तवत्सलनेम्ब बिरुड़ पोट्टा मेले भक्तअधिनानगिरा बेदावे
मुक्ति दायक निनु होन्नुरु पूर्वसा शाक्त गुरु पुरंदर विट्ठल श्री कृष्ण

English Translation  :

Geetha Naresh May 5, 2024 at 6:45 AM

Meaning: 

O pundarikAksha, purushottama Hare, Ranga will you (Ni enna) leave(biDuvare) my hand(kai) (after having) seen(kanDu) me so far. (will you stop your protection to me now?)

C1: 

O nIrajaksha, I have no(enagilla) relatives(bandhu galu), there is no happiness(sukha) in life(baduku), I am pained(nonde) at the ridicule(ninde) directed towards me. You are my mother(tAyi) and father(tande), you are all that there is as my relatives(bandhu-baLaga), O Krishna, I believe (nambideno) in you at all times(endendigU)

C2: 

A moment(kSaNa) has become an age(yuga - like dwaparayuga), I have been (treated) lower than a blade of grass(by others), I have suffered(nonde) uncountable(eNisalarada) indignities(bhava). O krishna, respected by sages like sanaka, vanaja sambhava janaka, the one resting on a snake, and the one who blessed Prahlada.(don’ leave me…)

C3: 

(Tell me) Once you assume (potta mele) the title of bhaktavatsala(the one who protects his devotees), don’t you have to be under the control(AdhIna) of your devotees? O Krishna, the one who lives in Honnuru (honnuru puravAsa), the almighty(shakta) guru purandaravithala. (don’t leave me…)

पर्यावरण वन्दना.../ कविता / अरुण मिश्र

https://youtu.be/pc4LKrM5qH4  

वन्दना करिये धरा की;
धरा के पर्यावरण की।।

झर रहे निर्झर सुरीले,
और नदियाँ बहें कल-कल।
ताल, पोखर, झील, सागर,
हर तरफ है, नीर निर्मल।।

चर-अचर जिसमें सुरक्षित,
स्नेहमय उस आवरण की।।

मन्द, मन्थर पवन शाीतल;
आँधियों का तीव्रतर स्वर।
सर्वव्यापी वायु पर ही,
प्राणियों की साँस निर्भर।।

जीव-जग-जीवनप्रदायिनि-
प्रकृति के, शुभ आचरण की।।

अन्न के भण्डार दे भर,
भूमि उर्वर, शस्य-श्यामल।
भूख सबकी मेटने को-
वृक्ष, फलते हैं मधुर फल।।

माँ धरा की गोद के,
इस मोदमय वातावरण की।।
                   *
(काव्य-संग्रह 'कस्मै देवाय' से साभार)

गुरुवार, 4 जून 2026

श्री कृष्णाष्टकं.../ आदि शंकराचार्य कृत/ गायन : गीता, कल्पिता एवं श्रुति उपासनी

https://youtu.be/a7fMQVfZHY8?si=ygzjk_EyP7Vs7UdD

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री कृष्णाष्टक भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति का एक अत्यंत दिव्य स्रोत है। इसमें आठ श्लोक हैं जो उनकी मनमोहक छवि, लीलाओं और महिमा का वर्णन करते हैं। 

श्लोक १
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् ।
सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम् ॥१॥ 


अर्थ: जो ब्रजभूमि के एकमात्र आभूषण हैं, समस्त पापों को नष्ट करने वाले हैं और अपने भक्तों के चित्त को आनंदित करने वाले हैं, उन नंदनन्दन (नंद के पुत्र) का मैं सदा भजन करता हूँ। जिनके मस्तक पर सुंदर मोर मुकुट है, हाथों में सुरीली बांसुरी है और जो कामदेव के समान सौंदर्य के सागर हैं, उन चतुर श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक २
मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् ।
करारविन्दभूधरं स्मतावलोकसुन्दरं महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ॥२॥ 


अर्थ: जो कामदेव के अहंकार को नष्ट करने वाले हैं, विशाल और चंचल नेत्रों वाले हैं तथा ग्वालों के कष्टों को दूर करने वाले हैं, उन कमल नयन (पद्मलोचन) श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने अपने कमल रूपी हाथों से गोवर्धन पर्वत को धारण किया, जिनकी मंद मुस्कान अत्यंत सुंदर है तथा जिन्होंने देवराज इंद्र के मान (अहंकार) को तोड़ा था, उन नटखट कृष्ण को मेरा प्रणाम है। 


श्लोक ३
कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं व्रजाङ्गनाङ्कवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् ॥३॥(पंक्ति का तीसरा चरण)
यशोषया समोदया सगोपया सनन्दया युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥३॥ 


अर्थ: जिनके कानों में कदम्ब के फूलों के कुण्डल हैं, जिनके गाल अत्यंत आकर्षक हैं, जो ब्रज की गोपियों के प्रियतम हैं और जो बड़े-बड़े देवताओं को भी दुर्लभ हैं, उन श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। जो यशोदा माता के साथ अत्यंत प्रसन्न हैं, गोपगणों और नंदजी से घिरे हुए हैं और भक्तों को एकमात्र आनंद प्रदान करने वाले हैं, उन गोपों के नायक को मैं नमन करता हूँ। 


श्लोक ४
सदैव पादपङ्कजं मदीयमानसे निजं दधानमुत्तमालकं नमामि नन्दबालकम् ।
समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम् ॥४॥


अर्थ: जिनके चरण कमल सदैव मेरे मन में बसे रहते हैं, जो घुंघराले बालों से सुशोभित हैं, उन नन्दबालक को मैं प्रणाम करता हूँ। जो सभी दोषों/बुराइयों का नाश करने वाले हैं, समस्त लोकों का पोषण करने वाले हैं और सभी ग्वालों के मन में निवास करने वाले हैं, उन नंदलाल को मैं नमन करता हूँ। 


श्लोक ५
भुवोभरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् ।
दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदासदालसङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसंभवम् ॥५॥ 


अर्थ: जो पृथ्वी का भार उतारने वाले और संसार रूपी सागर से पार लगाने वाले (नाविक) हैं, यशोदा माता के दुलारे हैं और भक्तों के चित्त को चुराने वाले हैं, उन्हें मेरा प्रणाम। जिनकी तिरछी और सुंदर चितवन मन मोह लेती है, जो भक्तों के सदा संग रहते हैं और जो प्रतिदिन नए और मनोहर प्रतीत होते हैं, उन नंदनंदन को मैं नमन करता हूँ। 


श्लोक ६
वराङ्गकल्कशोभितं गलेचलद्विनिर्जितं लसन्नखन्दुभासुरं नमामि कृष्णसुन्दरम् ।
समस्तगोपनन्दनं हृदम्बुजैकनन्दनं व्रजाङ्गनामनोहरं नमामि कृष्णसुन्दरम् ॥६॥


अर्थ: जिनके अंग सुगंधित लेप से सुशोभित हैं, गले में मोतियों की माला और आभूषण झिलमिलाते हैं और जिनके नख चंद्रमा के समान चमकते हैं, उन परम सुंदर श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। जो सभी गोप-बालकों को आनंदित करने वाले हैं, सबके हृदय रूपी कमल में वास करने वाले हैं और ब्रज की स्त्रियों का मन मोह लेने वाले हैं, उन सुंदर कृष्ण को मेरा नमन है। 


श्लोक ७
पिनाङ्कपाणिमण्डलं सदाविकासिसद्गुणं जगत्त्रयाकतारकं नमामि कृष्णतत्त्वम् ॥७॥


अर्थ: जो अपने हाथों में मुरली धारण किए रहते हैं, जिनके दिव्य गुण सदा विकसित रहते हैं और जो तीनों लोकों का उद्धार करने वाले हैं, उस परमतत्त्व रूपी श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक ८
कृष्णाष्टकमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
कोटिजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥८॥ 


अर्थ: इस पवित्र 'कृष्णाष्टकम्' का जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप केवल इसके स्मरण मात्र से ही नष्ट हो जाते हैं।

बुधवार, 3 जून 2026

कोई तनहाई का एहसास दिलाता है मुझे.../ शायर : शाज़ तमकनत / गायन : वन्दना श्रीनिवासन

https://youtu.be/TXvMTnsZLZ4



कोई तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे
मैं बहुत दूर हूँ नज़दीक बुलाता है मुझे

मैं ने महसूस किया शहर के हंगामे में
कोई सहरा में है, सहरा में बुलाता है मुझे

तू कहाँ है कि तिरी ज़ुल्फ़ का साया साया
हर घनी छाँव में ले जा के बिठाता है मुझे

ऐ मिरे हाल-ए-परेशाँ के निगह-दार ये क्या
किस क़दर दूर से आईना दिखाता है मुझे

ऐ मकीन-ए-दिल-ओ-जाँ मैं तिरा सन्नाटा हूँ
मैं इमारत हूँ तिरी किस लिए ढाता है मुझे

रहम कर मैं तिरी मिज़्गाँ पे हूँ आँसू की तरह
किस क़यामत की बुलंदी से गिराता है मुझे

'शाज़' अब कौन सी तहरीर को तक़दीर कहूँ
कोई लिखता है मुझे कोई मिटाता है मुझे