ग़ज़ल (२००४) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग़ज़ल (२००४) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

तुम्हारा है हुनर ताजा सितम ईज़ाद कर लेना...........


ग़ज़ल 


-अरुण मिश्र   

कभी  भूले से ही  हमको,  कोई  दिन  याद  कर लेना। 
मेरी  बरबादियों पे  ख़ुश हो,  तो दिल शाद  कर लेना॥

ये तुम पे है,  हमारे हक़ में,  क्या  इन्साफ  करते हो। 
हमारे  हाथ  में  है,  रो  के   बस  फ़रियाद  कर लेना॥

हमारा  हौसला  है,  हर  जफ़ा  को   हॅस के  सह लेंगे। 
तुम्हारा  है  हुनर,  ताजा  सितम   ईज़ाद  कर  लेना॥

'अरुन' के मुँह पे ही,उनकी बुराई  यूँ  न कर ज़ालिम। 
वो  महफ़िल  से चले जायें,  तो उसके बाद कर लेना॥
                                      *

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

चली हवा तो रुकी कश्तियां लगीं हिलने......


ग़ज़ल   

-अरुण मिश्र. 

चली हवा तो,  रुकी कश्तियां, लगीं हिलने। 
घटायें फिर से, तेरी यादों की,  लगीं घिरने॥
  
तुम्हारे टाँके  बटन,  औ'  तेरा बुना  स्वेटर। 
बदन पे मेरे,  तेरी उँगलियाँ,  लगीं  फिरने॥
  
हरा  है  हो रहा,  फिर से  शज़र  उमीदों का। 
उदासियों  की  ज़र्द  पत्तियां,  लगीं  गिरने॥
  
समाईं  झील सी  आँखें, जो  मेरी आँखों में। 
हसीन ख़्वाबों की हैं मछलियां लगीं तिरने॥
  
'अरून'  जो अब्र हैं  छाये, तेरे  तसव्वुर  के। 
फुहारें रस की हैं  अ'शआर से, लगीं गिरने॥
                            *

रविवार, 9 जनवरी 2011

सिवा हमारे फरिश्ता न कोई आयेगा..

ग़ज़ल 

- अरुण मिश्र 

सिवा    हमारे,   फरिश्ता    न    कोई   आयेगा।
हमारी    डूबती    कश्ती    को    जो   बचायेगा।।
 
सुनहरी  फ़स्ल  की  उमीद  किस  बिना पे करें।
बाड़ का  बॉस ही ,   जब  बढ़ के  खेत  खायेगा।।
 
करो   ये  ख़ुद  से  अहद,  क़ामयाब  होंगे   हम।
न  हारे  मन,   तो  हमें   कौन  फिर   हरायेगा??
 
जले    मशाल,    तभी   ख़त्म  अँधेरा   होगा।
हमीं  में    होगा   कोई,   जो   इसे   जलायेगा।। 


हैं  राह  ताक   रहे   लोग,   रहनुमा  के  लिये।
सही   दिशा   में,  कोई  तो    क़दम  बढ़ायेगा।।
 
हो जिसके  हाथ को  दायें,  न  यकीं  बायें पर।
उससे   उम्मीद  हो   कैसे,  वजन   उठायेगा?? 


‘अरुन’ शमा की तरह,खुद को जलाओ पहले।
फिर तो परवानों का,  तय है, हुज़ूम आयेगा।। 
                              *