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मंगलवार, 8 मई 2012

देखता हूँ मैं अक्सर गौर से जमाने को..........

ग़ज़ल

देखता हूँ मैं अक्सर गौर से जमाने को......... 

-अरुण मिश्र   


देखता   हूँ   मैं   अक्सर,  गौर  से   जमाने  को।
हँस  के  दिल लगाने को, फिर  फ़रेब  खाने को॥


दिल पे चोट लगती है,फिर भी दिल मचलता है। 
मीठे-मीठे  वादे  को ,   दिलशिकन   बहाने  को॥


इन  नज़र  के तीरों की , माना है  बहुत शोहरत।
मैं ही क्या  मिला  तुझको , तीर  आज़माने को??


देख इन शरीफों  को,  किसका मन नहीं मचले?
कीच   में   लिपटने   को,  इत्र   में   नहाने  को॥ 

इन्तजामे - कुदरत    है,  दाँत  दो  तरह  के  हैं।
ढेर   सारे   खाने   को ,  एक - दो   दिखाने  को॥


पाप   की    बहे   गंगा ,   आदमी    खड़ा    नंगा।
हैं   यहाँ   सभी  आतुर ,   डुबकियाँ   लगाने को॥


आप'अरुन' दुनिया में,किसको समझिये अपना। 
शुक्रिया   मगर  कहिये,  इस   यतीमखाने   को॥
                                     *


   

रविवार, 18 दिसंबर 2011

बस जरा ही तो बढ़ा है तेरा मुझसे फासला...............









ग़ज़ल


-अरुण मिश्र.


तुम  न आये  मेरी मय्‌यत पे  चलो अच्छा हुआ। 
सांस के संग साथ का भी सिलसिला जाता रहा॥
  
लोग  जो  रिश्तों  को ले इक उम्र गफ़लत में रहे। 
उनकी  भी  छाती  हुई  ठंढी ,  सुकूँ  इसका  रहा॥
  
जब तलक थे मंच पे , पर्दा तआल्लुक  का  रहा। 
और  तब  पर्दा उठा,  जब   अंत  में   पर्दा  गिरा॥
  
सख्श जो ख़ातिर तिरे, मुझसे सदा जलता रहा। 
आज वो भी ग़मज़दा,  उसका भरम   टूटा हुआ॥


मैं नहीं, फिर भी 'अरुन'  ज़िन्दा मेरे एहसास हैं। 
बस  जरा ही तो बढ़ा  है ,  तेरा  मुझसे  फासला॥
                                *

सोमवार, 17 जनवरी 2011

कहॉ हो मेरे सूरज , चॉद, तारों ...

 ग़ज़ल 


- अरुण मिश्र 


जो   मेरी   बात   को,   यूँ   लोगे   हलके।
बहुत  पछताओगे  फिर,  हाथ  मल  के।।
 
तुम्हारी     राह     अँगारों      भरी    थी।
मैं   फिर  भी  आया  नंगे  पॉव  चल के।।
 
अभी  वो   इस  तरफ से  कौन  गुज़रा?
कि, महफ़िल  रह गई  पहलू बदल के।।
 
कहॉ   हो    मेरे   सूरज,   चॉद,   तारों?
उफ़क से  क्यूँ  नहीं  मिटते  धुंधलके??
 
कमल-दल पर सजीं शबनम की बूँदें।
जो मोती  ऑख से,  गालों  पे  ढलके।।
 
शज़र की ओट  अब,  है चॉद छुपता।
चला तो आया  बदली से निकल के।।
 
सुबह से  शाम  तक,  दर  पे  हूँ  तेरे।
कभी तो   आओगे  साहब  टहल के??
 
‘अरुन’  धोखे बहुत,  राहे-वफ़ा  में।
यहॉ  चलना जरा,   बाबू  सॅभल के।।
                         *