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सोमवार, 26 दिसंबर 2011

फिर वही शोख़ पुरजमाल आये............


ग़ज़ल

-अरुण मिश्र . 


बेख़याली   में     ये    ख़याल   आये। 
फिर  वही  शोख़   पुरजमाल   आये॥

फिर  उन्हीं  मस्तियों के  दिन लौटें। 
फिर  वही   रोज़ो-माहो-साल   आये॥

फिर   वही   हो,  जुनून  का   आलम। 
फिर   मेरे  जोश   में   उबाल   आये॥

अब न  क्या  गर्ज कुछ, उसे  मुझसे। 
पहले ख़त जिसके,सालों-साल आये॥

वो  जो  आये, तो  कुछ  ज़वाब मिले। 
उसको   लेकर,   कई   सवाल  आये॥

जी हुआ हल्का  'अरुन', दिल दे कर। 
एक  थी  फॉस,  सो   निकाल  आये॥
                        *

रविवार, 11 दिसंबर 2011

सरापा-नाज़ से क्या पूछें...........

ग़ज़ल









सरापा-नाज़ से  क्या पूछें...........


-अरुण मिश्र.

सरापा-नाज़ से  क्या पूछें,   नाज़ुकी   क्यों है।    
उठी निगाह है, लेकिन पलक  झुकी   क्यों है॥
      
तुम्हारी   खामशी ,  किस्से  बयान करती है।     
मैं जग रहा हूँ ,  मेरी नींद  सो  चुकी  क्यों है॥
     
तुम्हारे बिन  जो  जिये,  सोचते रहे  अक्सर।     
रवां है साँस  पर,  लगती  रुकी-रुकी  क्यों है॥
      
बहुत सलीके से हमने तो दिल की बात कही।     
तुम्ही  कहो भला,  ये  बात   बेतुकी   क्यों है॥
      
कहे था  दिल,  ये  कहेंगे,  वो  कहेंगे  तुझसे।     
पर 'अरुन' रूबरू,हिम्मत चुकी-चुकी क्यों है॥
                             * 

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

अग्नि



शक्ति-रूपा अग्नि! तुझमें जायें सब कल्मष-कलुष जल......

-अरुण मिश्र  

अग्निमय  विस्फोट  से,
          की ब्रह्‌म ने है, सृष्टि रचना। 
अग्निमय आलोक में   ही,   
          देखती    है,   दृष्टि    रचना॥
 
गहन-तम में ज्योति का है,   
          संचरण    भी   अग्निकर्मा। 
और जिससे जग प्रकाशित,  
          वह किरण भी  अग्निधर्मा॥
  
अग्निमय   आकाश-मंडल,   
          अग्नि  से  निर्मित  धरा है। 
अग्नि से  नक्षत्र   चक्रित,   
          अग्नि से  गति  है, त्वरा है॥
  
अग्नि से सब लोक भासित,   
          अग्नि   से    संसार    सारा। 
देवता तक  हवि  पहुँचती,  
          अग्नि  का   ही   ले  सहारा॥
  
है धरा के कुक्षि में, ज्वाला-
          मुखी    की   ज्वाल   चंचल। 
अतल  सागर के तलों  में,   
         तप्त    बड़वानल,  रहा   जल॥
  
सजल  मेघों  के  हृदय में,
         बन चपल  चपला, चमकती। 
शुष्क  कानन-काष्ठ  में  है,
        जड-शिला-घर्षित    दहकती॥
  
अग्नि से ऊष्मा ग्रहण कर,   
        जगत  के   सब   जीव  उपजे। 
ज्योति का कर संक्रमण,
       विधि ने सचेतन प्राण सिरजे॥
  
ताप   से   जल-वायु -मय,  
       ऋतु -चक्र  होता है  नियंत्रित। 
मेघ  झरते,  वन   हुलसते , 
       अन्न  पकते,  सर्व-जन-हित॥
   
अग्नि सर्जक,अग्नि पोषक, 
       अग्नि दाहक तत्व  लौकिक। 
अग्नि रक्षक,अग्नि भासक, 
      अग्नि तमनाशक अलौकिक॥
  
अग्नि   से   उत्पत्ति  सबकी,  
       अग्नि  में   होते   सभी  लय। 
अग्नि अविनाशी,  अमर  है,  
       अग्नि    ऊर्जा-श्रोत    अक्षय॥
   
अग्नि आभा, अग्नि  ऊर्जा,  
       अग्नि  ऊष्मा-ताप, जग  में। 
अन्न-जल-फल-पुष्प-दात्री ,  
        मेटती   हर   पाप,  जग   में॥
  
अग्नि  से   हैं  यज्ञ  धारित,  
        यज्ञ   से    है,   लोक-मंगल। 
शक्ति-रूपा अग्नि!  तुझमें, 
      जायें सब कल्मष-कलुष जल॥
                        *