मंगलवार, 18 जून 2013

मिथिलानन्दनि-नयननंदन का वंदन आज......


श्री हनुमते नमः 



भावानुवाद :

पूँछ से बुहार  उदधि-अम्बर के  मध्य  मार्ग 
            चलते   उछल,   बने   कारण  इन्द्र-मोद  के। 
फैली  भुजाओं   से    फूट  रहे    पर्वत-खण्ड
            मिथिलानन्दनि-नयननंदन का वंदन आज ।।    
                                                *
                                                                -अरुण मिश्र 


मूल संस्कृत :

लाङ्गूलमृष्टवियदम्बुधिमध्य्मार्ग-
          मुत्प्ल्युत्य यान्त्ममरेन्द्रमुदो निदानम् । 
आस्फालितस्वकभुजस्फुटिताद्रिकाण्डं 
          द्राङ्मैथिलीनयननन्दनमद्य           वन्दे ।।
                                                *   

टिप्पणी : कविपति श्री उमापति द्विवेदी विरचित वीरविंशतिका नामक २० श्लोकों की 
श्री हनुमतस्तुति के प्रथम श्लोक का भावानुवाद, ज्येष्ठ मास के अंतिम मंगलवार को 
श्रद्धा सहित प्रस्तुत है।        
                                                                                                  -अरुण मिश्र 


                                          


रविवार, 16 जून 2013

दुआ दो ‘मीर’ को........

दुआ दो  ‘मीर’  को........

-अरुण मिश्र
.
दुआ दो  ‘मीर’  को,  टुक चैन से  ज़न्नत में  वो सोवे। 
‘अरुन’ तुम यां रखो क़ायम वही अन्दाज़े-दर्द-आगीं।।
  
छलकतीं  रात-दिन  जो दर्द से,  अल्ला के आलम में। 
सुला के  ख़्वाहिशें  कितनी,  ये आँखें  रात भर जागीं।।
  
बहुत  ग़म हैं  ज़माने में,  तो  थोड़ी  सी  खुशी  भी  है। 
मिलन  के  एक  पल   में,   सैकड़ों  तन्हाइयां   भागीं।।

हैं  मीठी,  तल्खि़यों,  दुशवारियों  में,   राहते-ज़ां  सी। 
न   जाने   कैसी   शीरीनी  में,   ये   बातें  तिरी,  पागीं।।
  
न  जाओ  श्याम ! रो-रो   गोपियां,  पइयां परन लागीं। 
तो झरने सी झरन लागी हैं,उनकी चश्मे-अश्क-आगीं।।
                                                *


सोमवार, 3 जून 2013

मगर उससा मिला कोई नहीं.....




मगर उससा मिला कोई नहीं.....

-अरुण मिश्र.

बारहा   ढूँढा,   मगर   उससा  मिला  कोई   नहीं। 
है  ‘अरुन’  सा  एक  ही,  याँ   दूसरा  कोई  नहीं।। 

तू  क़रम की  ओट में,  मुझ पर  क़हर ढाता रहा। 
यूँ   कि   तू  मेरा   ख़ुदा ;  तेरा  ख़ुदा   कोई  नहीं??
  
ज़र्रे - ज़र्रे   में   नुमाया   नूर    से,  गाफि़ल  रहा। 
ज़ुस्तज़ू   उसकी रही,  जिसका  पता  कोई  नहीं।।
  
हमसे   पहले  भी    हुये,  फ़रहादो-कै़सो-रोमियो। 
फिर भी लगता हमको, हमसा आशना कोई नहीं।।
                                              * 
  

रविवार, 19 मई 2013

प्यार के ग़फ़लत में जिसके...

प्यार के ग़फ़लत में जिसके....

-अरुण मिश्र 

प्यार के ग़फ़लत में  जिसके,  है गुज़ारी  ज़िन्दगी        
रंज  उसकोमैंने  ही,  उसकी  बिगाड़ी  ज़िन्दगी।।
  
चहचहों से जिसकेमुझको घर सदा गुलशन लगा। 
उसको ये ग़मपिंजरे मेंउसने गुज़ारी  ज़िन्दगी।।
  
प्यार में क्या खोया-पायाइसका भी होगा हिसाब। 
यूँ  कभी  सोचा  था ,   प्यारी-प्यारी  ज़िन्दगी।।
  
हँसने-रोने  के   हुनर  ने,   है  इसे,  आसां  किया। 
रोये जो अक्सरतो हॅस कर भी गुज़ारी  ज़िन्दगी।।
  
तल्खि़यां ,  मज्बूरियां ,  नाकामियां ,  लाचारियां। 
जाने कितने वज़्न हैं , जिनसे  है  भारी  ज़िन्दगी।।
  
जान भी प्यारी है ’,  जीना भी है मुश्किल मियाँ         
ख़ूब,   ये   मीठी   कटारी   है    दुधारी,   ज़िन्दगी।।
  
जो  बचे  इस साल,  सूखा - जलजला - सैलाब  से। 
वहशतो- दहशत  ने  ग़ारत  की,  हमारी  ज़िन्दगी।।
  
आस्ताने - कैफ़ो - मस्ती,  यूँ  तो आलम में  हज़ार। 
पर फिराती दर-बदर, क़िस्मत  की मारी  ज़िन्दगी।।
  
बीतते सावन के  बादल भी,    कुछ  लाये  ख़बर। 
आस  कोई तो   मिरे मन में,   जगा  री ! ज़िन्दगी।।
  
आओ साथी  बाँट लें,  आपस में  हर ग़म--ख़ुशी। 
थोड़ा हँस  लें साथ कि,  ख़ुश  हो  बिचारी ज़िन्दगी।।
  
जानो-तन जब तक फँसे हैं,  दामे-दुनिया में ‘अरुन 
क्या गिलाकिस जाल में फँस कर गुज़ारी ज़िन्दगी।। 
                                    * 

                   

शनिवार, 11 मई 2013

गुलाबों का तो बस पैकर रहा है....


You are always on my mind...
उसी की ख़ुश्बुयें औ’ रंग उसके...











गुलाबों का तो बस पैकर रहा है....

-अरुण मिश्र.

जो हम पे, जान  से सौ  मर  रहा है। 
अदा   देखो,  हमीं   से   डर  रहा  है।।
  
उसी  ने  तो    है   ये  परदा  उठाया। 
खुले  में  अब जो नाटक कर रहा है।।
  
मैं इसको लाख अपना घर कहूँ  पर। 
हक़ीकत  में,  उसी  का  घर  रहा है।।
  
हमेशा  से   वो   अपनी    हर  बहारें। 
चमन  के   ही   हवाले  कर  रहा  है।।
  
उसी  की   ख़ुश्बुयें   औ’  रंग उसके। 
गुलाबों  का  तो  बस  पैकर  रहा  है।।
  
‘अरुन’ अल्फाज़ में  अब भी हमारे। 
वो   अहसासात  अपने  भर  रहा है।। 
                                   * 
उसी की ख़ुश्बुयें औ’ रंग उसके...

रविवार, 28 अप्रैल 2013

कोई फूटी किरन माह से.....









कोई फूटी किरन माह से....

-अरुण मिश्र.

इक जरा,   इक जरा,   इक  जरा। 
मुस्करा,     मुस्करा,     मुस्करा।।
  
इक तबस्सुम ने, मुझको  किया। 
उम्र   भर  के    लिये,  सिरफिरा।।
  
चाँदनी      खिलखिलाती     रही। 
रात   भर,   पर   कहाँ   जी  भरा।।
  
मेरे     अरमाँ,     मचलते     हुये। 
तेरा     अन्दाज़,     शोख़ी    भरा।।
  
सारी   कोशिश,   धरी   रह  गयी। 
रह    गया    इल्म    सारा,   धरा।।
  
जितना   ही    हम   छुपाते   गये। 
उतना    खुलता   गया,   माज़रा।।
  
पुतलियाँ    हौले   से   हँस   उठीं। 
लब  थिरक  कर,  खिंचे  हैं  जरा।।
  
कोई     फूटी   किरन,   माह   से। 
कोई    झरना,    कहीं   पे    झरा।।
  
काश !  टूटे   कभी  न,   ‘अरुन’। 
इन    तिलिस्मात   का,   दायरा।। 
                                *

रविवार, 21 अप्रैल 2013

हम न बोलेंगे मगर.......

ग़ज़ल 

हम न बोलेंगे मगर .........

-अरुण मिश्र.



हम न बोलेंगे मगर,  फिर भी बुलाओ तो सही। 
यूँ  कि,  हम रूठे हुये,  हमको मनाओ तो सही।।
   
नाज़ो - अंदाज़  के,  सुनते  हैं,  बड़े  रसिया हो। 
मैं  भी तो  जानूँ ,  मेरे  नाज़  उठाओ तो  सही।।
  
बात  छोटी सी  भी,  तुम  दिल पे लगा लेते हो। 
कुछ बड़ी बात न मैं,  दिल से लगाओ तो सही।।
  
हाँ   हमें   हीरों के  कंगन  की,  तमन्ना  तो है। 
तुम हरे काँच  की कुछ चूड़ियाँ  लाओ तो सही।।
  
हम ‘अरुन’ फूलों को, समझेंगे फ़लक के तारे। 
तुम मेरे जूड़े में,  इक गजरा  लगाओ तो सही।। 
                                         *