अष्टभुजी माँ की पताका लहराती है....... -अरुण मिश्र
गंगा के तीर एक ऊँची पहाड़ी पर , अष्टभुजी माँ की पताका लहराती है | विन्ध्य-क्षेत्र का है, माँ सिद्ध-पीठ तेरा घर , आ के यहाँ भक्तों को सिद्धि मिल जाती है | जर्जर, भव-सागर के ज्वार के थपेड़ो से , जीवन के तरनी को पार तू लगाती है | जो है बड़भागी, वही आता है शरण तेरे , तेरे चरण छू कर ही, गंग, बंग जाती है || * * * * आठ भुजा वाली, हे! अष्टभुजी मैय्या, निज- बालक की विनती को करना स्वीकार माँ | जननी जगत की तुम, पालतीं जगत सारा , तेरी शरण आ के, जग पाए उद्धार माँ | तुम ने सुनी है सदा सब की पुकार , आज- कैसे सुनोगी नहीं मेरी पुकार माँ | दुष्ट -दल -दलन हेतु , काफ़ी है एक भुजा , शेष सात हाथन ते , भक्तन को तार माँ || * टिप्पणी : वर्ष १९९५ में इन छंदों की रचना माँ अष्टभुजी देवी, (विन्ध्याचल,उ.प्र.) के चरणों में हुई थी | (पूर्वप्रकाशित )
यूँ हवाओं में, घुल गई होली। रंग बरसे तो, धुल गई होली। सारे आलम में, मस्तियाँ बिखरीं। इक पिटारी सी,खुल गई होली।। बेल-बूटों सी, है कढ़ी होली। फ्रेम में मन के, है मढ़ी होली। रंग का इक तिलिस्म है, हर-सू। सर पे जादू सी, है चढ़ी होली।। सीढ़ी दर सीढ़ी है, उतरी होली। आके अब लान में, पसरी होली। संग हवा के, गुलाल बन के उड़ी। रंग में भीगी तो, निखरी होली।। हाथ यूँ ही, हिला रही होली। खेल मुझको, खिला रही होली। कितनी मुश्क़िल से, पहुँचा आंगन तक। शायद छत पे, बुला रही होली।। देखो हौले से, आ रही होली। मेरे जी को, लुभा रही होली। उम्र तक को, धकेल कर पीछे। कानों में होली, गा रही, होली।। मीठी यादें, जगा रही होली। चैन मन का, भगा रही होली। रंग की बारिशों, न थम जाना। आग दिल में, लगा रही होली।। ख़ुश्क है ’औ कभी पुरनम होली। कभी शोला, कभी शबनम होली। रंग है, रस है, रूप है, कि महक। एक मौसम है, कि सरगम होली।। प्यासी आँखों का, ख़्वाब है होली। चप्पा- चप्पा, गुलाब है होली। लब पे आने से, झिझकता जो सवाल। उसका, मीठा जवाब है होली।। फूली सरसों, संवर रही होली। आम बौरे, निखर रही होली। कोयलें कूकीं, पपीहे पागल। रस के झरने सी झर रही होली।। यूँ मज़े में, शुमार है होली। ज़ोश , मस्ती, ख़ुमार, है होली। इस बरस, कैश जो किया सो किया। बाकी तुम पर, उधार है होली।।
कालचक्र है सतत परिभ्रमित, बदल-बदल ऋतुओं के चोले। कभी शुष्क है, कभी आर्द्र है; आतप-शीत रंग बहु घोले।। जीर्ण-पत्र सब झरे द्रुमों से, शिशिर-गलित, हेमन्त-विदारित। फिर वसंत ने ली अँगड़ाई, फिर से आम्र, मंजरी-भारित।। पत्रोत्कंठित एक-एक तरु, विटप-विटप नव-पल्लव-भूषित। मन्मथ-दुन्दुभि सुन वसंत की, प्रकृति, सृजन-आतुर मन-हर्षित।। नवल हरित पत्रों की चूड़ी, बाँह-बाँह भर पहने डाली। मेंहदी रची हथेली, पल्लव; है वसंत की छटा निराली।। कोयल की मीठी तानें हैं; विहगों के मनहर हैं कलरव। हृदयों में उल्लास भर रहा, है वसंत, जीवन का उत्सव।। * (वर्ष २०१३ में पूर्वप्रकाशित )
जवानी के ज़रखे़ज़ ख़्वाबों की, रुड़की। सवालों की रुड़की, जवाबों की रुड़की।। रगों में हमारे, बहे खून बन कर, उसूलों की रुड़की, किताबों की रुड़की।। ये रुड़की का गुरुकुल, इसी सरज़मीं पर, मुक़म्मल हुई, तर्बियत थी हमारी। बसी इसकी खु़शबू है, सांसों में मेरे, है आँखों में, इसकी फ़िज़ा प्यारी-प्यारी।। उफ़क-ता-उफ़क है, तसव्वुर पे छाई, उजालों की, औ’, आफ़ताबों की, रुड़की।। ये बिल्डिंग, जिसे मेन-बिल्डिंग हैं कहते, इमारत नहीं सिर्फ, पुरखों की थाती। बड़े हम हुये लान में खेल जिसके, जिसे याद कर, चौड़ी होती है छाती।। जे़हन में हमारे, महकती है हरदम, वो बारिश में भीगे गुलाबों की रुड़की।। वो बिलियर्ड्स,टी.टी.,वो कैरम,वो म्यूज़िक, वो गपशप, वो क्लब जाके पढ़ना रिसाले। हमें भूलना मत, ऐ! ’गंगा’, ऐ! ‘गोविन्द’; ये जज़्बात, करता हूँ तेरे हवाले।। दिलों में हमारे, हमेशा बजाती- है संगीत, मीठे रबाबों की रुड़की।। ये गुलशन हमारा, हम हैं इसकी बुलबुल, जहाँ में जहाँ भी रहें, चहचहायें। हसीं अंजुमन, ऐ! मुकद्दस चमन! हम- तेरी शानो-अज़मत के ही गीत गायें।। दुआयें हमारी, सलामत रहे, इल्मो- फ़न में नये इन्क़लाबों की रुड़की।। हो यूरोप, अमरीका, जापान, कोई, हो दुनिया में हर ओर इज़्ज़त हमारी। नई पौध, आती रहे साल-दर-साल, न सूखे कभी, टेक्नोलॉजी की क्यारी।। गरजतें रहें शेर, रुड़की के यूँ ही, बनी ये रहे, कामयाबों की रुड़की।। * (टिप्पणी : मैं रुड़की विश्वविद्यालय का वर्ष 1975 का स्नातक हूॅ। वर्ष 2000 में रजत जयंती सम्मान हेतु आमंत्रण के अवसर पर, मैंने अपने गुरुकुल को श्रद्धासुमन स्वरूप यह नज़्म अर्पित की थी। -अरुण मिश्र.)
ARUN MISHRA B.E.(CIVIL)1975
Khvaabon Kee Rudakee (ROORKEE)
Javaanee ke zarkhez khvaabon kee, Rudakee.
Savaalon kee rudakee, javaabon kee Rudakee..
Ragon men hamaare, bahe khoon ban
kar,
Usoolon kee rudakee, kitaabon kee Rudakee.
Ye Rudakee kaa gurukul, isi sarazameen par,
Muqammal huii, tarbiyat thee hamaaree.
Basee iskee khushboo hai, saanson men
mere,
Hai aankhon men, iskee phizaa pyaaree-pyaaree.
Uphak-taa-uphak hai, tasavvur pe chhaaii,
Ujaalon kee, au’, aaphataabon kee, Rudakee.
Ye building, jise main-builḍing hain kahate,
Imaarat naheen sirf, purkhon kee thaatee.
Bade ham huye lawn men khel
jiske,
Jise yaad kar, chaudee hotee hai chhaatee.
Zehan men hamaare, mahakatee hai haradam,
Vo baarish men bheege gulaabon kee Rudakee.
Vo billiards, T.T. , vo carom,
vo music,
Vo gap-shap, vo club jaake paḍhanaa risaale.
Hamen bhoolnaa mat, ai! ‘gngaa’, ai! ‘govind’;
Ye jazbaat, kartaa hoon tere
havaale..
Dilon men hamaare, hameshaa bajaatee -
Hai sngeet, meeṭhe rabaabon kee
Rudakee.
Ye gulshan hamaraa, ham hain iskee bulbul,
Jahaan men jahaan bhee rahen,
chahachahaayen.
Haseen anjuman, ai! Mukaddas chaman! Ham-
teree shaano-azamat ke hee geet
gaayen.
Duaayen hamaree, salaamat rahe, ilmo-
phan men naye inqalaabon kee
Rudakee.
Ho Europe,Amareekaa(America), Jaapaan(Japan), koii,