बुधवार, 13 दिसंबर 2023

जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया.../ प्रस्तुति : इन्दु ठाकुर एवं अभिजीत शर्मा

 https://youtu.be/NkjgbSXAcK0?si=foHdCZN6LfrIveJM   

जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया... फिल्म :परिवार गायन : लता मंगेशकर एवं मन्ना डे संगीत : सलिल चौधरी गीत : शैलेन्द्र

उपरोक्त प्रस्तुति :
गायन : इन्दु ठाकुर एवं अभिजीत शर्मा
ऑर्केस्ट्रा : ए वाई भट्टी एवं आसिफ सोरठिया
होटल हिल व्यू, भुज, कच्छ

जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया 
जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया 
राह चलत पकड़े मोरी बइयाँ 
राह चलत पकड़े मोरी बइयाँ
जा तोसे नहीं, 
जा जा तोसे नहीं
जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया 

रुठी राधिके कृश्न मनावत
मुरली की सौगंध उठावत 
रूठी राधिके 
रूठी राधिके कृश्न मनावत
मुरली की सौगंध उठावत 
आ मानत नहीं राधा
मानत नहीं राधा
मानत नहीं राधा
जा जा जा 
जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया 
राह चलत पकड़े मोरी बइयाँ
राह चलत पकड़े मोरी बइयाँ
जा तोसे नहीं 
जा जा तोसे नहीं
जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया 

झुनक झुनक जब चूड़ियाँ खनकी 
लहर लहर ओढ़निया लहकी 
झुनक झुनक जब चूड़ियाँ खनकीं  
झुनक झुनक जब चूड़ियाँ खनकी  
लहर लहर ओढ़निया लहकी 
मृदंग थंका
ढ ढ ढ दिने डा
मान गयी राधा
मान गयी राधा
मान गयी राधा

जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया 
जा तोसे नहीं बोलूँ कन्हैया 
राह चलत पकड़े मोरी बइयाँ
राह चलत पकड़े मोरी बइयाँ
जा तोसे नहीं 
जा जा तोसे नहीं
जा तोसे नहीं बोलूँ 
कन्हैया 

रविवार, 10 दिसंबर 2023

रामचन्द्राय जनकराजजा मनोहराय.../ भद्राचलराममङ्गलम् / श्रीभद्रगिरिरामदासविरचितं / गायन : सूर्यगायत्री

https://youtu.be/1cRajHEoPWw?si=f6oZsUBkUPnXrF20  

भद्राचलराममङ्गलम्
रामचन्द्राय जनकराजजा मनोहराय
मामकाभीष्टदाय महित मङ्गलम् ॥पल्लवि॥
कोसलेन्द्राय मन्दहासदासपोषणाय
वासवादि विनुत सर्वदाय मङ्गलम् ॥१॥
चारुकुंकुमोपेतचन्दनादिचर्चिताय
हारकटकशोभिताय भूरिमङ्गलम् ॥२॥
ललितरत्नकुण्डलाय तुलसीवनमालिकाय
जलजसदृशदेहाय चारुमङ्गलम् ॥३॥
देवकीसुपुत्राय देवदेवोत्तमाय
चावजातगुरुवराय भव्यमङ्गलम् ॥४॥
पुण्डरीकाक्षाय पूर्णचन्द्राननाय
अण्डजातवाहनाय अतुलमङ्गलम् ॥५॥
विमलरूपाय विविधवेदान्तवेद्याय
सुमुखचित्तकामिताय शुभदमङ्गलम् ॥६॥
रामदास मृदुलहृदयतामरसनिवासाय
स्वामि भद्रगिरिवराय सर्वमङ्गलम् ॥७॥
इति श्रीभद्रगिरिरामदासविरचितं श्रीभद्राचलराममङ्गलम् ।

रामचन्द्राय मंगलम

रामचंद्राय मंगलम
(रामचंद्र के लिए शुभ हो) भद्रगिरि रामदास कृत 
अनुवाद (आंशिक) : पी. आर. रामचंदर द्वारा 

(भद्रगिरि रामदास आंध्र प्रदेश के एक महान संत थे। उन्होंने राम का भद्राचलम मंदिर 
बनवाया था। ऐसा लगता है कि उन्होंने इसे बनाने के लिए निज़ाम के पैसे का इस्तेमाल 
किया था। बाद में) उन्हें कैद कर लिया गया और हैदराबाद के गोलकुंडा किले में रखा गया। 
राम ने स्वयं उनकी ओर से हस्तक्षेप किया, निज़ाम को धन का भुगतान किया और संत 
को रिहा कराया।) 

जनक की पुत्री के सुन्दर स्वामी रामचन्द्र को मंगलम, और जो मेरी सभी इच्छाओं को 
बिना किसी असफलता के पूरा करते हैं, कोसल के भगवान को मंगलम, जो अपने भक्तों 
को मुस्कुराहट के साथ प्रोत्साहित करते हैं, और जिन्हें इंद्र और उनकी प्रजा नमस्कार 
करती है। 
 
उसके लिए मंगलम जो सुंदर बादल की तरह है, जो चंदन के लेप से लेपित है और वह जो 
अपने कंगन में चमकता है, सुंदर मंगलम उसे जो सुंदर रत्न जड़ित कान की बालियां पहनता 
है, जो तुलसी की माला पहनता है, और वह जिसके पास कमल के समान शरीर.

देवकी के पुत्र को सभी मंगलम, जो देवों के देवता हैं, और जो एक महान शुद्ध शिक्षक हैं, 
उनके लिए अमूल्य मंगलम, जिनकी कमल जैसी आंखें हैं, जिनका चंद्रमा जैसा चेहरा है 
और जो गरुड़ पर सवार हैं।

शुद्ध रूप को प्रसन्न करने वाले मंगलम जो वेदों और वेदांतों के विशेषज्ञ हैं,
जो सुंदर चेहरे वाले लोगों के मन को देखना पसंद करते हैं,
दिव्य मंगलम उन्हें जो रामदास के कोमल मन में रहते हैं,
और भगवान को जो भद्राचलम में रहते हैं।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

बंदउँ चरन-सरोज तिहारे.../ सन्त सूरदास / गायन : स्वर्णिमा गुसाईं

 https://youtu.be/QUhyxQ5ij-c

बंदउँ चरण सरोज तुम्हारे...
-सन्त सूरदास

बंदउँ चरन-सरोज तिहारे। सुंदर स्‍याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान-पियारे। जे पद-पदुम सदा शिव के धन, सिंधु-सुता उर तैं नहिं टारे। जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारे। जे पद-पदुम-परस-जल-पावन-सुरसरि-दरस कटत अघ भारे। जे पद-पदुम-परस-रिषि-पतिनी, बलि, नृग, व्‍याध पतित बहु तारे। जे पद-पदुम-रमत वृन्‍दावन अहि-सिर धरि, अगनित रिपु मारे। जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनि सरबस दै, सुत-सदन विचारे। जे पद-पदुम रमत पांडव-दल दूत भए, सब काज सँवारे। सूरदास तेई पद-पंकज त्रिविध-ताप-दुख-हरन हमारे।।

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

आँसू / जयशंकर प्रसाद / स्वर : डॉ कुमार विश्वास

 https://youtu.be/Qb2yFj_DZ7o?si=Kr7NJB_mCWR8ZPZp  

इस करुणा कलित हृदय में 
अब विकल रागिनी बजती
क्यों हाहाकार स्वरों में
वेदना असीम गरजती?

मानस सागर के तट पर
क्यों लोल लहर की घातें
कल कल ध्वनि से हैं कहती
कुछ विस्मृत बीती बातें?

आती हैं शून्य क्षितिज से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती बिलखाती-सी
पगली-सी देती फेरी?

क्यों व्यथित व्योम गंगा-सी
छिटका कर दोनों छोरें
चेतना तरंगिनी मेरी
लेती हैं मृदल हिलोरें?

बस गई एक बस्ती है
स्मृतियों की इसी हृदय में
नक्षत्र लोक फैला है
जैसे इस नील निलय में।

ये सब स्फुर्लिंग हैं मेरी
इस ज्वालामयी जलन के
कुछ शेष चिह्न हैं केवल
मेरे उस महामिलन के।

शीतल ज्वाला जलती हैं
ईधन होता दृग जल का
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर
करती हैं काम अनल का।

बाड़व ज्वाला सोती थी
इस प्रणय सिन्धु के तल में
प्यासी मछली-सी आँखें
थी विकल रूप के जल में। 

बुलबुले सिन्धु के फूटे
नक्षत्र मालिका टूटी
नभ मुक्त कुन्तला धरणी
दिखलाई देती लूटी।

छिल-छिल कर छाले फोड़े
मल-मल कर मृदुल चरण से
धुल-धुल कर वह रह जाते
आँसू करुणा के जल से।

इस विकल वेदना को ले
किसने सुख को ललकारा
वह एक अबोध अकिंचन
बेसुध चैतन्य हमारा।

अभिलाषाओं की करवट
फिर सुप्त व्यथा का जगना
सुख का सपना हो जाना
भींगी पलकों का लगना।

इस हृदय कमल का घिरना
अलि अलकों की उलझन में
आँसू मरन्द का गिरना
मिलना निश्वास पवन में।

मादक थी मोहमयी थी
मन बहलाने की क्रीड़ा
अब हृदय हिला देती है
वह मधुर प्रेम की पीड़ा।

सुख आहत शान्त उमंगें
बेगार साँस ढोने में
यह हृदय समाधि बना हैं
रोती करुणा कोने में। 

चातक की चकित पुकारें
श्यामा ध्वनि सरल रसीली
मेरी करुणार्द्र कथा की
टुकड़ी आँसू से गीली।

अवकाश भला है किसको,
सुनने को करुण कथाएँ
बेसुध जो अपने सुख से
जिनकी हैं सुप्त व्यथाएँ।

जीवन की जटिल समस्या
हैं बढ़ी जटा-सी कैसी
उड़ती हैं धूल हृदय में
किसकी विभूति है ऐसी? 

जो घनीभूत पीड़ा थी
मस्तक में स्मृति-सी छाई
दुर्दिन में आँसू बनकर
वह आज बरसने आई।

मेरे क्रन्दन में बजती
क्या वीणा, जो सुनते हो
धागों से इन आँसू के
निज करुणापट बुनते हो।

रो-रोकर सिसक-सिसक कर
कहता मैं करुण कहानी
तुम सुमन नोचते सुनते
करते जानी अनजानी।

मैं बल खाता जाता था
मोहित बेसुध बलिहारी
अन्तर के तार खिंचे थे
तीखी थी तान हमारी।

झंझा झकोर गर्जन था
बिजली सी थी नीरदमाला,
पाकर इस शून्य हृदय को
सबने आ डेरा डाला।

घिर जाती प्रलय घटाएँ
कुटिया पर आकर मेरी
तम चूर्ण बरस जाता था
छा जाती अधिक अँधेरी।

बिजली माला पहने फिर
मुसकाता था आँगन में
हाँ, कौन बरसा जाता था
रस बूँद हमारे मन में? 

तुम सत्य रहे चिर सुन्दर!
मेरे इस मिथ्या जग के
थे केवल जीवन संगी
कल्याण कलित इस मग के।

कितनी निर्जन रजनी में
तारों के दीप जलाये
स्वर्गंगा की धारा में
उज्जवल उपहार चढायें।

गौरव था , नीचे आए
प्रियतम मिलने को मेरे
मै इठला उठा अकिंचन
देखे ज्यों स्वप्न सवेरे।

मधु राका मुसकाती थी
पहले देखा जब तुमको
परिचित से जाने कब के
तुम लगे उसी क्षण हमको।

परिचय राका जलनिधि का
जैसे होता हिमकर से
ऊपर से किरणें आती
मिलती हैं गले लहर से।

मै अपलक इन नयनों से
निरखा करता उस छवि को
प्रतिभा डाली भर लाता
कर देता दान सुकवि को।

निर्झर-सा झिर झिर करता
माधवी कुँज छाया में
चेतना बही जाती थी
हो मन्त्रमुग्ध माया में।

पतझड़ था, झाड़ खड़े थे
सूखी-सी फूलवारी में
किसलय नव कुसुम बिछा कर
आए तुम इस क्यारी में।

शशि मुख पर घूँघट डाले,
अँचल मे दीप छिपाए।
जीवन की गोधूली में,
कौतूहल से तुम आए।
              *

रविवार, 3 दिसंबर 2023

मधु-रजनी.../ अरुण मिश्र / कविता (१९७३)

मधु-रजनी 
- अरुण मिश्र.

आज     सुहानी    रात,    सुन्दरी,
सिहर   रहे   तरु   पात,   सुन्दरी । 
फूली     आशाओं   की     बगिया ,
फलती   मन  की  बात,   सुन्दरी ।।

तुममें    और    प्रकृति   में  देखो 
कैसा   साम्य    सजा   है,    रानी । 
जो       मेरे-तेरे     मन    में     है ,
रात     रचाती,      वही     कहानी ।।

नभ-गंगा   का   मनहर    पनघट ,
सलज  निशा, लेकर   यौवन-घट । 
गूँथ     केश,     तारक-कलिकायें,
नुपुर   से   मुखरित  करती   तट 
।। 


मधुर   चाँद   चेहरा   है  जिसका ,
उमर , उमंगें , सब कुछ, नटखट । 
जाने   क्यूँ    डाले   है   फिर   भी ,
झीने    बादल      वाला      घूँघट ??

किन्तु , हवा  क्या कम  शरारती ?
हटा   रही   है    पल-पल   अंचल । 
बढ़ी    जा   रही    है   मधु-रजनी ,
धरती डगमग, पग प्रति,  चंचल ।।

श्यामल-श्यामल     मेघ-खंड  दो ,
लगा   रहे   हैं ,   काजल     काले । 
राका  के   स्वप्निल  नयनों    में ,
जगा   रहे    हैं ,   सपन    निराले ।।

चूनर,    धवल    उजास,   सुन्दरी। 
तारक,     हीरक-हास ,     सुन्दरी । 
आज   लगा   हो,  ज्यूँ  पूनम  को,
सोलहवाँ      मधुमास      सुन्दरी ।।

क्यूँ    इतना    शरमाई   यामिनि?
झिझक-झिझक बढ़ रही ठगी सी । 
प्राची   में    प्रीतम   का    घर   है ,
प्रात    मिलेगी,   प्रीति  पगी  सी 
।।

यह  शायद   अभिसार  प्रथम  है ,
पथ  मुदमंगल,  मृदुल कुसुम हो ।  
मेरी  तो  यामिनि,  निशि,  राका ,
रजनी ,   तारक ,  चंदा   तुम  हो 
।।
                       * 

राम को देख कर के जनक नंदिनी.../ राम भजन / गायन : सलोनी ठक्कर

 https://youtu.be/EaTr8LqW5So?si=MtL4LNxGPISDTTDe  


राम को देख कर के जनक नंदिनी,
बाग में वो खड़ी की खड़ी रह गयी-2
राम देखे सिया माँ सिया राम को,
चारो अँखिआ लड़ी की लड़ी रह गयी॥

थे जनक पुर गये देखने के लिए,
सारी सखियाँ झरोखो से झाँकन लगे -2
देखते ही नजर मिल गयी प्रेम की,
जो जहाँ थी खड़ी की खड़ी रह गयी॥
॥श्री  राम को देख कर के श्री जनक नंदिनी...॥

बोली एक सखी राम को देखकर,
रच गयी है विधाता ने जोड़ी सुघर।
पर धनुष कैसे तोड़ेंगे वारे कुंवर,
मन में शंका बनी की बनी रह गयी॥
॥श्री  राम को देख कर के श्री जनक नंदिनी...॥

बोली दूसरी सखी छोटन देखन में है,
फिर चमत्कार इनका नहीं जानती।
एक ही बाण में ताड़िका राक्षसी,
उठ सकी ना पड़ी की पड़ी रह गयी॥
॥श्री  राम को देख कर के श्री जनक नंदिनी...॥

राम को देख कर के जनक नंदिनी,
बाग में वो खड़ी की खड़ी रह गयी।
राम देखे सिया को सिया राम को,
चारो अँखिआ लड़ी की लड़ी रह गयी॥

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023

मधुसूदना मनमोहना.../ गीत-संगीत : पद्म विभूषण डॉ प्रभा अत्रे / गायन : पूजा पाण्डेय पुनेठा

 https://youtu.be/ELhy0lbY7Do?si=rq_RYQ5QnWnDPVb3   

 
मधुसूदना मनमोहना माधवा केशवा नारायणा हे श्रीधरा मुरलीधरा नटनगरा माधवा हे श्यामला चंद्रानना राधावरा माधवा योगेश्वरा तुलसीधरा करुणाकरा माधवा जय मंगला जगजीवना सुखसागरा माधवा