रविवार, 17 मार्च 2019

नन्द के द्वार मची होली : श्रीनाथ जी होली

https://youtu.be/zxpkgFKyg98

नन्द के द्वार मची होली 

नन्द के द्वार मची होलीबाबा नन्द के |


इधर खड़े हैं कुँवर कन्हैया-लाला
      उधर खड़ी राधा गोरीबाबा नन्द के || नन्द के द्वार....
पाँच बरस के कुँवर कन्हैया-लाला
      सात बरस-की राधा गोरीबाबा नन्द के || नन्द के द्वार....

 हाथ में लाल गुलाल पिचकरा
      मारत हैं भर बरजोरीबाबा नन्द के || नन्द के द्वार....
सूरदास प्रभु तिहारे मिलन को
      अविचल रहियो यह जोड़ीबाबा नन्द के || नन्द के द्वार....
                                  *

शनिवार, 16 मार्च 2019

रंग डारूँगी नंद के लालन पे (होली गीत)

https://youtu.be/3cIqoodAgww

रंग डारूँगी नंद के लालन पे (होली गीत)

रंग डारूंगी नन्द के लालन पे हाँ रंग डारूंगी नन्द के लालन पे, रँग डारूंगी साँवर रँग लाल कर द्‍इयों, मल गुलाल दो‍उ गालन पे, रंग डारूंगी रंग डारूंगी नन्द के लालन पे, रंग डारूंगी नारी बनाई नचाई छोड़ियों, ढप मृदंग के तालन पे, रंग डारूंगी रंग डारूंगी नन्द के लालन पे, रंग डारूंगी रे…

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

जब फागुन रंग झमकते हों

https://youtu.be/xE1aNMh7tNE

रचना : नज़ीर अक़बराबादी 
गायन : कविता सेठ 

जब फागुन रंग झमकते हों

-नज़ीर अक़बराबादी

नज़ीर अकबराबादी (१७३५-१८३०), जिन का असली नाम वली मुहम्मद था, को उर्दू 'नज़्म का पिता' करके जाना जाता है । वह आम लोगों के कवि थे । उन्होंने आम जीवन, ऋतुयों, त्योहारों, फलों, सब्जियों आदि विषयों पर लिखा । वह धर्म-निरपेक्षता की ज्वलंत उदाहरण हैं । कहा जाता है कि उन्होंने लगभग दो लाख रचनायें लिखीं । परन्तु उनकी छह हज़ार के करीब रचनायें मिलती हैं और इन में से ६०० के करीब ग़ज़लें हैं।

होली

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की ।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की ।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की ।
ख़म शीशए, जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की ।
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की ।।1।।

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे ।
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो-अदा के ढंग भरे ।
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे ।
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुँहचंग भरे ।
कुछ घुँघरू ताल झनकते हों तब देख बहारें होली की ।।2।।

सामान जहाँ तक होता है इस इशरत के मतलूबों का ।
वो सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो ख़ूबों का ।
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का ।
इस ऐश मज़े के आलम में इक ग़ोल खड़ा महबूबों का ।
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की ।।3।।

गुलज़ार खिले हों परियों के, और मजलिस की तैयारी हो ।
कपड़ों पर रंग के छीटों से ख़ुशरंग अजब गुलकारी हो ।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में पिचकारी हो ।
उस रंग भरी पिचकारी को, अँगिया पर तककर मारी हो ।
सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की ।।4।।

इस रंग रंगीली मजलिस में, वह रंडी नाचने वाली हो ।
मुँह जिसका चाँद का टुकड़ा हो औऱ आँख भी मय की प्याली हो ।
बदमस्त, बड़ी मतवाली हो, हर आन बजाती ताली हो ।
मयनोशी हो बेहोशी हो 'भड़ुए' की मुँह में गाली हो ।
भड़ुए भी भड़ुवा बकते हों, तब देख बहारें होली की ।।5।।

और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवैयों के लड़के ।
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट-घट के कुछ बढ़-बढ़ के ।
कुछ नाज़ जतावें लड़-लड़ के कुछ होली गावें अड़-अड़ के ।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन फ़ड़के ।
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की ।।6।।

यह धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का छक्कड़ हो ।
उस खींचा-खींच घसीटी पर और भडुए रंडी का फक्कड़ हो ।
माजून शराबें, नाच, मज़ा और टिकिया, सुलफ़ा, कक्कड़ हो ।
लड़-भिड़के 'नज़ीर' फिर निकला हो कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो ।
जब ऐसे ऐश झमकते हों तब देख बहारें होली की ।।7।।







निरतत ढंग : पंडित बिन्दा दीन महाराज



https://youtu.be/V3552w_ARN8
                                                                                                 
'निरतत ढंग ' : यह अष्टपदी, पंडित बिन्दा दीन महाराज जी (१८३० -१९१८) की 
शताधिक वर्ष पुरानी  रचना है। 

कोरिओग्राफी : प्रख्यात कत्थक नृत्यांगना शाम्भवी दण्डेकर

Choreography : Shambhavi Dandekar
Dancers : Amruta Gogate, Asmita Thakur, Neha Muthiyan,
Shruti Patki, Sonal Pendse, Sheetal Lalge, Isha Phadke
Singer : Anuradha Kuber 
Music composition : Traditional, Ajay Parad. 

Niratat Dhang is a century old ‘Ashtapadi’,
a creation of Pandit Bindadin Maharaj (1830-1918).
The beautiful composition is choreographed by renowned
Kathak dancer-choreographer Shambhavi Dandekar in 2008
and has been shot in 2013. A unique take on the poetry, it is
rendered beautifully by her talented senior disciples.
The Ashtapadi starts with the landscape of Brindavan,
with its fragrant air, the river Yamuna, with Krishna the
charmer and his soulmate Radha. The verses explain
their beauty, their magical union and its effect on the world.
While Krishna and Radha dance, one comes across various
Kathak terms, strengthening the bond between Krishna and
Kathak. In the end, Maharaj Bindadin begs the Lord to bless
him with his love as it is the only way to get rid of the worldly
chaos and suffering.
Niratat Dhang is one of the most celebrated works of
Shambhavi Dandekar.
*

गुरुवार, 14 मार्च 2019

गल भुजंग भस्म अंग : पंडित छन्नूलाल मिश्र

https://youtu.be/f7WrviQnAiM

।। गल भुजंग भस्म अंग शँकर अनुरागी ।।

गल भुजंग भस्म अंग ‪शंकर अनुरागी । सतगुरु चरणारबिन्द शिव समाधि लागी ॥ गल भुजंग भस्म अंग ...........॥
तीन नयन अमृत भरे गले मुंड माला । रहत नगन फिरत मगन संग गौरी बाला ॥ गल भुजंग भस्म अंग .........॥
अपने पति को निरख-निरख पारवती जागी । औरन आशीष देत आप फिरत त्यागी ॥ गल भुजंग भस्म अंग ........॥
*

आयो म्हारै देश में होळी रौ त्यौंहार : राजस्थानी रचना

आज प्रातः व्हाट्सएप पर श्री राजेन्द्र स्वर्णकार जी ने राजस्थानी 
भाषा में एक अत्यंत सरस होली गीत भेजा है जो उन्हीं के सुमधुर
 स्वर में यू ट्यूब पर उपलब्ध है। 

आप सब भी आनंद लें। 

आयो म्हारै देश में होळी रौ त्यौंहार

-राजेन्द्र स्वर्णकार 

राजस्थानी रचना की एक एक पंक्ति का साथ ही साथ अर्थ भी। 
शब्द, धुन, स्वर © राजेन्द्र स्वर्णकार 



https://youtu.be/LxQIC71tKfw

बुधवार, 13 मार्च 2019

रकार रामचंद्र हैं, मकार मातु जानकी

"रकार निर्विकार निराकार ब्रह्म सारमय 
मकार महातत्व प्रकृति शक्ति है समान की 
रकार में है विधि, हरि, हर, सिद्धि, साध्य सब 
मकार में उमा रमादि होत है कि तान की 
रकार औ मकार की अपार रघुनाथ गाथ 
पावत नहिं पार, शेष-शारदा बखान की 
उपासना अखंड एक नाम की रहे सदा 
रकार रामचंद्र हैं, मकार मातु जानकी"
https://youtu.be/yjfZMe_fwMo

ऐसो को उदार जग माहीं 

गोस्वामी तुलसी दास : विनय पत्रिका 

ऐसो कौ उदार जग माहीं ।
बिनु सेवा जो द्रवे दीन पर, राम सरस कोउ नाहि ॥ 

जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ज्ञानी ।
सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी ॥

जो संपति दस सीस अरप करि रावण सिव पहँ लीन्हीं ।
सो संपदा विभीषण कहँ अति सकुच सहित हरि दीन्हीं ॥

तुलसीदास सब भांति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो ।
तो भजु राम काम सब पूरन करहि कृपानिधि तेरो ॥

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