'वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्त्तव्य मार्ग पर डट जावें' नामक कविता के लेखक मुरारीलाल शर्मा बालबंधुथे। जिनका जन्म 1893 ई. में ग्राम 'साइमल की टिकड़ी' जिला मेरठ, उत्तर-प्रदेश में हुआ था।
आश्चर्य की बात ये कि इतनी ज्यादा लोकप्रिय प्रार्थना/कविता के लेखक के बारे में लोगों को पता नहीं है। इन्टरनेट पर भी इस कविता के लेखक के बारे में मतभेद पाया गया है। कई वेबसाइट्स पर लिखा है कि इसके लेखक मुरारीलाल शर्मा 'बालबंधु' थे परंतु कई विद्वानों ने कहा है कि ये कविता श्री परशुराम पान्डे जी द्वारा लिखित है। परशुराम पान्डे जी मध्यप्रदेश के रीवा जिले की गुढ तहसील में द्वारी ग्राम के निवासी थे।
वह शक्ति हमें दो दयानिधे,
कर्त्तव्य मार्ग पर डट जावें।
पर-सेवा पर-उपकार में हम,
जग-जीवन सफल बना जावें॥
॥ वह शक्ति हमें दो दयानिधे…॥
हम दीन-दुखी निबलों-विकलों के,
सेवक बन संताप हरें।
जो हैं अटके, भूले-भटके,
उनको तारें खुद तर जावें॥
॥ वह शक्ति हमें दो दयानिधे…॥
छल, दंभ-द्वेष, पाखंड-झूठ,
अन्याय से निशिदिन दूर रहें।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना,
शुचि प्रेम-सुधा रस बरसावें॥
॥ वह शक्ति हमें दो दयानिधे…॥
निज आन-मान, मर्यादा का,
प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे।
जिस देश-जाति में जन्म लिया,
बलिदान उसी पर हो जावें॥
॥ वह शक्ति हमें दो दयानिधे…॥
महावीराष्टकं स्तोत्रं भक्त्या 'भागेन्दु' ना कृतम्। यः पठे च्छ्रणुयाच्चापि स याति परमां गतिम्॥(९)
अर्थ
जिस प्रकार सन्मुख समागम पदार्थ दर्पण में झलकते है, उसी प्रकार जिनके केवलज्ञान में समस्त जीव-अजीव अनंत पदार्थ उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य | सहित युगपत् प्रतिभासित होते रहते है; तथा जिस प्रकार सूर्य लौकिक मार्गों को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मोक्षमार्ग को प्रकाशित करनेवाले जो जगत के ज्ञाता–दृष्टा हैं; वे भगवान महावीर मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे।।१।।
स्पन्द (टिमकार ) और लालिमा रहित जिनके दोनों नेत्रकमल मनुष्यों को | बाह्य और अभ्यंतर क्रोधादि विकारों का प्रभाव प्रगट कर रहे हैं; और जिनकी मुद्रा स्पष्ट रूप से पूर्ण शान्त और अत्यंत विमल है; वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे।।२।।
नम्रीभूत इन्द्रों के समूह के मुकुटों की मणियों के प्रभाजाल से जटिल ( मिश्रित ) जिनके कान्तिमान दोनों चरणकमल, स्मरण करने मात्र से ही, शरीरधारियों की सांसारिक दुःख–ज्वालाओं का, जल के समान शमन कर देते | हैं; वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे | ( हमें ) दर्शन दे ।।३।।
जब पूजा करने के भाव मात्र से प्रसन्नचित्त मेढ़क ने क्षण भर में गुणगणों से समृद्ध सूख की निधि स्वर्गसंपदा को प्राप्त कर लिया, तब यदि उनके सद्भक्त मुक्ति-सुख को प्राप्त करलें तो कौनसा आश्चर्य हैं अर्थात् उनके सद्भक्त अवश्य ही मुक्ति को प्राप्त करेंगे। वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।। ४ ।।
जो अंतरंग दृष्टि से ज्ञानशरीरी ( केवलज्ञान के पुज ) एवं बहिरंग दृष्टि से तप्त स्वर्ण के समान आभामय शरीरवान होने पर भी शरीर से रहित हैं; अनेक ज्ञेय उनके ज्ञान मे झलकते हैं - अतः विचित्र ( अनेक ) होते हुए भी एक (अखण्ड ) हैं; महाराजा सिद्धार्थ के पुत्र होते हुए भी अजन्मा हैं; और केवलज्ञान तथा समवशरणादि लक्ष्मी से युक्त होने पर भी संसार के राग से रहित हैं । इस प्रकार के आश्चर्यो के निधान वे भगवान महावीर स्वामी मेरे (हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।।५।।
जिनकी वाणीरूपी गंगा नाना प्रकार के नयरूपी कल्लोलों के कारण निर्मल हैं और अगाध ज्ञानरूपी जल से जगत की जनता को स्नान कराती रहती है तथा इस समय भी विद्वज्जनरूपी हंसों के परिचित है, वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।।६।।
अनिर्वार हैं वेग जिसका और जिसने तीन लोकों को जीत लिया हैं, ऐसे कामरूपी सुभट को जिन्होने स्वयं आत्मबल से कुमारावस्था में ही जीत लिया हैं, परिणामस्वरूप जिनके अनन्तशक्ति का साम्राज्य एवं शाश्वतसुख स्फुरायमान हो रहा हैं; वे भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे (हमें ) दर्शन दे ।। ७ ।।
जो महा मोहरूपी रोग को शान्त करने के लिए निरपेक्ष वैद्य हैं, जो जीव मात्र के नि:स्वार्थ बन्धु हैं, जिनकी महिमा से सारा लोक परिचित हैं, जो महामंगल के करने वाले हैं, तथा भव-भय से भयभीत साधुओं को जो शरण हैं; वे उत्तम गुणो के धारी भगवान महावीर स्वामी मेरे ( हमारे ) नयनपथगामी हों अर्थात् मुझे ( हमें ) दर्शन दे ।। ८ ।।
जो कविवर भागचंद द्वारा भक्तिपूर्वक रचित इस महावीराष्टक स्तोत्र का पाठ
करता हैं व सुनता हैं, वह परमगति ( मोक्ष ) को पाता हैं।।। ९ ।।