रविवार, 17 अगस्त 2014

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् .....


 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् .....
 
भावानुवाद :
 
नवनीरद   आभायुत 
वंशीविभूषित    कर।
 
पीताम्बरधर;  अरुण 
विम्बफल सम अधर।
 
पूर्णेन्दुसुन्दर    मुख,
अरविन्द सदृश  नेत्र;
 
कृष्ण से इतर,  जानूँ 
मैं न परमतत्व अपर।। 
 
          
                              -अरुण मिश्र
 
मूल :
 
वन्शीविभूषित्करान्नवनीरदाभात
 
         पीताम्बराद  अरुणविम्बफलाधरोष्ठात 
 
पूर्णेन्दुसुन्दर्मुखारर्विन्दनेत्रात
 
         कृष्णात्परं किमपि तत्वमहम् न जाने ।।

    
 
     




 
 

शनिवार, 31 मई 2014

आज-कल श्रीनगर (कश्मीर) प्रवास पर हूँ।
इस क्रम में कल दिनांक ३० मई, २०१४ को दूध-पथरी
नामक स्थल पर पहुँचा। नैसर्गिक सुषमा के इस सुरम्य 
दिव्यता को काव्यात्मक प्रणामञ्जलि।   











दूध-पथरी (कश्मीर)

-अरुण मिश्र.  


दूध-पथरी। 
दूध की नदियां हों जैसे 
पत्थरोँ के बीच ठहरी। 
बर्फ की सुन्दर लकीरें 
हैं ढलानों पर, छरहरी।
दूध-पथरी।।

शुभ्र हिम से ढँके
ऊपर, शिखर उन्नत।
और, नीचे हरित चादर से 
बिछे हैं, घास के मैदान,
मनहर, दीर्घ, विस्तृत।
जिन्हें चारों ओर से घेरे हुए हैं,
देवदारु तमाम यूँ 
जैसे कि हों 
सजग औ सन्नद्ध 
अनगिन  प्रकृति -प्रहरी।
दूध-पथरी।।

शान्ति का साम्राज्य अद्भुत;
ध्यान केवल भंग  करती है 
नदी की धार कल-कल। 
जिसे छू कर 
बह रही है, हवा चंचल।
फेरती मन-प्राण पर 
शीतल फुरहरी।
दूध-पथरी।।   
       *

            

शुक्रवार, 16 मई 2014

चँहु-दिशि कमल खिले.......

चँहु-दिशि कमल खिले.......

-अरुण मिश्र.

lotus pond : Sunrise over a spring lake with a white lilies

नव प्रभात है 
भारत-भू पर 
चँहु-दिशि कमल खिले।।   

जन-मानस-सर 
शुचि-जल पूरित;  
शुभ-संकल्प फले।। 

छद्म बौद्धिकताएं,
परास्त हैं;
झूठे दम्भ जले।। 

ऊर्जा, श्रम, 
मेधा की जय हो;
सुख-सौभाग्य मिले।।        

भारत की जय हो;
समृद्धि की 
गंगा बह निकले।।  
              *

रविवार, 11 मई 2014

माँ !...........मातृ दिवस (मदर्स' डे) पर विशेष


मातृ दिवस (मदर्स' डे) पर विशेष
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                   माँ ! 
-अरुण मिश्र. 

सर्व  प्रथम  तेरी   ही   गोदी-
में,  मैंने   माँ !  आँखें  खोली।
मेरे   कानों   में  गूँजी    माँ !
सब  से  पहले   तेरी   बोली।।

 
          तेरे  आँचल  में  छुप,  पहली-
          क्षुधा  मिटाने  को   रोया  हूँ।
          तेरे   चुम्बन   से   जागा  हूँ ;
          तेरी   थपकी  से   सोया   हूँ।।

 
माँ !  मैं  तेरा  रक्त-माँस हूँ,
तेरा  सब से अधिक  सगा हूँ।
इस दुनिया में  सब से  पहले,
माँ !  मैं  तेरे  गले  लगा    हूँ।।

 
          तेरी   आँखों    से    ही    मैंने,
          दुनिया  को  पहले   पहचाना।
          तुझ   से  रिश्ते-नाते  समझे;
          चन्दा  मामा  तक को  जाना।।

 
माँ  कहना  भी  तुझ से सीखा;
भाषा  सीखी  तुतला   कर   है।
मेरा  कंठ,  तुम्हारी प्रतिध्वनि;
मेरी   वाणी,    तेरा    स्वर   है।।

 
          गिर-गिर कर, उठना सीखा है;
          तेरे  बल  पर,   खड़ा  हुआ   हूँ।
          तुझ से ही  जीवन-रस  ले कर,
          माँ !  मैं   इतना  बड़ा  हुआ हूँ।।

 
तू  भी,  यूँ  निहाल है  मुझ से,
मानो   कोई   मिला   ज़ख़ीरा।
मैं   चाहे   जैसा   भी   हूँ   माँ!
तेरे   लिये,   सदा   हूँ     हीरा।।

 
          माँ !  तू   प्राणों  में   बसती  है;
          साँसों    में    करती   है    फेरा।
          आज,  भले  ही  वृद्ध हो  चला,
          पर,  फिर भी माँ ! शिशु हूँ तेरा।


                                  *
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माँ!, कविता (२०१४), मदर्स डे, अरुण मिश्र   

 

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

राम परम प्रभु तुम्हें नमन है…

रामनवमी की  हार्दिक शुभकामनायें 

राम परम प्रभु तुम्हें नमन है… 

(भावानुवाद)

-अरुण मिश्र 

आते  देव-जन  करते  वन्दन,   
सूर्य-वंश  के  हो तुम नन्दन । 
तेरे  भाल  सुशोभित  चन्दन,   
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥१॥

विश्वामित्र-यज्ञ   के   कारक,   
शिला-अहिल्या   के उद्धारक ।
महादेव    के     धनुर्विदारक,    
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥२॥

पिता-वचन  हित  आज्ञाकारी,  
तप-वन  के  तुम  बने विहारी । 
हे!  निज-कर सुन्दर धनु-धारी,  
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥३॥
  
मृग को मुक्त किया निज सायक,  
हे !  जटायु   के   मोक्ष-प्रदायक ।
बींधा   बालि   कीश-कुल-नायक,   
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥४॥

वानर-जन से संगति-सम्मति,  
बाँधा  पुल  से  महा-सरित्पति । 
दशकंधर का  किया  वंश-क्षति, 
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥५॥
   
दीन  देव-जन   को   कर  हर्षित,  
कपि-जन की इच्छा हित वर्षित ।
स्वजन-शोक  को  करते कर्षित,  
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥६॥

कर  अरि-हीन  राज्य का रक्षण,  
प्रजा  जनों  के  भय का भक्षण । 
करते  अस्त   मोह   के  लक्षण,   
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥७॥

अखिल भूमि का भार लिया हर,  
ले  निज धाम  गए  सब नागर । 
जगत  हेतु   हे ! श्रेष्ठ  दिवाकर,  
राम परम-प्रभु तुम्हें नमन है ॥८॥ 
                          *                                 
भव-भय  उसको  नहीं सताये,  
जो  हो कर  एकाग्र-चित्त  नर। 
रघुवर के  इस उत्तम अष्टक  
का,   करता है  पाठ  निरन्तर ॥
                          ***   

(इति श्री परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द विरचित श्री  रामाष्टक  का भावानुवाद सम्पूर्ण)   


सोमवार, 31 मार्च 2014

नव-संवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें .....



आप के एवं आप के परिवार के लिए 
नव-संवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें।



पुण्य-पंथ  पर,  नव-प्रयाण  हो,
धवल कीर्ति के नवल हों शिखर।
जीवन   का,  नूतन   प्रभात  हो,
मंगलमय  हो,   नव - संवत्सर।।    

                                                            -अरुण मिश्र    
  

सोमवार, 17 मार्च 2014

होली की शुभकामनायें ....

आप को एवं आप के परिवार को 
होली की 
ढेरों शुभकामनायें। 

  -अरुण मिश्र.