कुछ तो हिंदी में बोलिए साहिब। मन की गांठों को खोलिए साहिब।।
पाँच-तारे से निकल कर तो कभी। गाँव - गलियों में डोलिए साहिब।।
फ़र्ज़ कुछ आप का भी बनता है। अपना दिल तो टटोलिये साहिब।।
आप ने है बहुत तरक्की की। आप गैरों के हो लिए साहिब।।
आप ने भी मनाया हिंदी-दिवस। सब के संग थोड़ा रो लिए साहिब।।
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(पूर्वप्रकाशित)
सोमवार, 3 सितंबर 2018
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष
मधुराष्टक( भावानुवाद )
-अरुण मिश्र.
अधर मधुर है, हास्य मधुर है, वदन मधुर है, नयन मधुर है। हृदय मधुर है, गमन मधुर है, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ चरित मधुर है, वचन मधुर है, वलय मधुर है, वसन मधुर है। चाल मधुर है, भ्रमण मधुर है, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ वेणु मधुर, पद-रेणु मधुर, शुभ-पाणि मधुर, मृदु-चरण मधुर है। नृत्य मधुर है, सख्य मधुर है, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ भोज्य मधुर है, पान मधुर है, गीत मधुर है, शयन मधुर है। तिलक मधुर है, रूप मधुर है, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ कार्य मधुर है, तरण मधुर है, हरण मधुर, स्मरण मधुर है। कथन मधुर है, शमन मधुर है, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ शिखा मधुर है, हार मधुर है, यमुना मधुर, तरंग मधुर है। सलिल मधुर है, कमल मधुर है, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ लीला मधुर, गोपियां मधुरा, योग मधुर है, भोग मधुर है। मधुर प्रेक्षण, मधुर आचरण, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ गौयें मधुर, गोप सब मधुरा, मधुर लकुटिया, सृष्टि मधुर है। दलन मधुर, प्रतिफलन मधुर अति, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥ * ( इति श्रीमद वल्लभाचार्य कृत मधुराष्टक संपूर्ण।)
(पूर्वप्रकाशित)
रविवार, 2 सितंबर 2018
जन्माष्टमी पर विशेष
क्या ख़ूब साँवले! हो
- अरुण मिश्र
जब चाँदनी खिली हो, और चाँद सामने हो। देखूँ तुम्हें , न उसको , क्या ख़ूब साँवले! हो।।
भादों की बदलियाँ थीं, थी रैन भी अँधेरी। आँगन में आ अचानक, तुम चाँद सा खिले हो।।
चितचोर हो, छलिया हो,फिर भी यकीं तुम्हीं पे। ब्रज की दही से मीठे, तुम दूध के धुले हो।।
तुम राम हो,कान्हा हो,इस मिट्टी की ख़ुशबू हो। हर साँस में रवां हो, अहसास में घुले हो।।
तुझ साँवरे सा उजला, देखा न ‘अरुन’ हमने। गो-रस में छलकते हो, मक्खन में तुम सने हो।।