- अरुण मिश्र
मंगलवार, 25 जनवरी 2022
जय हे ! भारत... / कविता / अरुण मिश्र / गणतन्त्र दिवस पर विशेष
नन्दलाल निहार लिये जबते...
नन्दलाल निहार लिये जबते,
निज देह न गेह सभांरन दे..!
धरि धीरज बोल उठी बरुनी,
पद नीरज की रज झारन दे॥
पुतली कहे सामने से हट जा,
अँसुआ कहे पांय पखारन दे।
पलकें कहें झांप ले मोहन को,
अँखियां कहें और निहारन दे।।
बरुनी - बरौनी
सोमवार, 24 जनवरी 2022
चाहत में क्या दुनिया-दारी इश्क़ में कैसी मजबूरी.../ मोहसिन भोपाली / गायन : गुल बहार बानो
https://youtu.be/nkh2KkJPy2g
(Born 1932, Bhopal, India - Died 17 January 2007, Karachi, Pakistan)
was a Pakistani poet. He was known for a travelogue Hairaton ki Sarzamin
and a book of verses Shahr-i-Ashob in opposition to the 1992 military operation
in Karachi.
singing career in 70s and early 80s from Radio Pakistan, Bahawalpur station.
She moved to Karachi in 80s and moved her focus to ghazal singing. Later
she moved to Lahore. She recieved Pakistan's Presidential Award, 'Pride of
Performance" in 2006.
Khanqah Sharif, Bahawalpur District. She has lost senses since last few
years and is not able to spend an ordinary life.
चाहत में क्या दुनिया-दारी इश्क़ में कैसी मजबूरी
लोगों का क्या समझाने दो उन की अपनी मजबूरी
मैं ने दिल की बात रखी और तू ने दुनिया वालों की
मेरी अर्ज़ भी मजबूरी थी उन का हुक्म भी मजबूरी
रोक सको तो पहली बारिश की बूंदों को तुम रोको
कच्ची मिट्टी तो महकेगी है मिट्टी की मजबूरी
ज़ात-कदे में पहरों बातें और मिलीं तो मोहर ब-लब
जब्र-ए-वक़्त ने बख़्शी हम को अब के कैसी मजबूरी
जब तक हँसता गाता मौसम अपना है सब अपने हैं
वक़्त पड़े तो याद आ जाती है मसनूई मजबूरी
इक आवारा बादल से क्यूँ मैं ने साया माँगा था
मेरी भी ये नादानी थी उस की भी थी मजबूरी
मुद्दत गुज़री इक वा'दे पर आज भी क़ाएम हैं 'मोहसिन'
हम ने सारी उम्र निबाही अपनी पहली मजबूरी
रविवार, 23 जनवरी 2022
कितना दिल-सोज़ वो मंज़र वो नज़ारा होगा.../ सूफी क़व्वाली / क़व्वाल : मुक़र्रम अली वारसी
https://youtu.be/CkiFCZvsc5E
कितना दिल-सोज़ वो मंज़र वो नज़ारा होगा
जब मसीहा ने मरीज़ों को पुकारा होगा
तुमने जब ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ को सँवारा होगा
सदक़ा-ए-हुस्न घटाओं ने उतारा होगा
संग-दिल तेरे भी आँसू निकल आए होंगे
डूबने वाले ने जब तुझको पुकारा होगा
हाथ फैलाऊँ जो मैं ग़ैर की चौखट पे कभी
मेरे सरकार को ये कैसे गवारा होगा
बस अली फ़ातिमा हसनैन-ओ-मुहम्मद के सिवा
ख़ुल्द में और भला किस का इजारा होगा
शनिवार, 22 जनवरी 2022
सारसदल नयने शारदे अम्बा.../ कृति : मुथ्थैया भगवतार / गायन : अनन्या अशोक
https://youtu.be/Lp2VdO1CpMo
(15 November 1877–30 June 1945),
commonly known as Muthiah Bhagavatar,
is one of Carnatic classical music's famous
created about 20 ragas.
Song : SaarasadhaLa nayanE
Composer: H.N. Muttayyah Bhaagavatar
Ragam Charumathi
Talam aAdhi
Language: Sanskrit
Translated by
P.R.Ramachander
कामिता फलदे कच्छपि निरते
हरिकेशादि अखिल सुरार्चिते
आनन्द हृदये आदरीचु मये
शुक्रवार, 21 जनवरी 2022
न मी दानम कि आख़िर चूँ दम-ए-दीदार मी रक़्सम.../ शायर : ख़्वाजा उसमान हारूनी (१२वीं शताब्दी)
https://youtu.be/14vTC5AuuS8
न मी दानम कि आख़िर चूँ दम-ए-दीदार मी रक़्सम
मगर नाज़म ब-ईं-ज़ौक़े कि पेश-ए-यार मी रक़्सम
तर्जुमा
नहीं मालूम वक़्त-ए-दीद कैसे रक़्स करता हूँ
मगर इक नाज़ से दिलबर के आगे रक़्स करता हूँ
ब-सद सामान-ए-रुस्वाई सर-ए-बाज़ार मी रक़्सम
तर्जुमा
ज़रा मेरी तरफ़ भी देख अपने जां निसारों में
ख़ुद अपनी हर तरह तज़लील करके रक़्स करता हूँ
तो आँ क़ातिल कि अज़ बहर-ए-तमाशा खून-ए-मन रेज़ि
मन आँ बिस्मिल कि जे़रे ख़ंजर-ए-ख़ूँ-ख़्वार मी रक़्सम
तर्जुमा
तो क़ातिल है जो ख़ूँ करता है बस तफ़रीह की ख़ातिर
मैं बिस्मिल हूँ , तिरे ख़ंजर के नीचे रक़्स करता हूँ
