https://youtu.be/BxT2TJwhNrI
प्रसिद्ध मराठी भावगीत,"मधु मागशी
माझ्या सख्या परी" रचनाकार : कवि
भास्कर रामचंद्र तांबे, का हिंदी अर्थ
और भावार्थ इस प्रकार है :
◦मराठी :
मधु मागशी माझ्या सख्या, परी
मधुघटचि रिकामे पडती घरी !
हिंदी अर्थ :
हे मेरे मित्र (सखा), तुम मुझसे अमृत या मधु
(कविता/प्रेम/मधुरता) मांग रहे हो, लेकिन मेरे
घर (जीवन/मन) में तो अब मधु के घड़े खाली
हो चुके हैं।
◦मराठी :
आजवरी कमळाच्या द्रोणीं
मधू पाजिला तुला भरोनी,
सेवा ही पूर्विची स्मरोनी,
करिं न रोष सख्या, दया करीं.
हिंदी अर्थ :
मैंने आज तक तुम्हें कमल के पत्तों के द्रोण में
भरकर खूब मधु (प्यार/रचनाएँ) पिलाया है।
मेरी उन पुरानी सेवाओं को याद करके, हे सखा,
मुझ पर गुस्सा मत करो और मुझ पर दया करो।
मराठी :
नैवेद्याची एकच वाटी
अता दुधाची माझ्या गाठीं;
देवपुजेस्तव ही कोरांटी
बाळगीं अंगणीं कशी तरी.
हिंदी अर्थ :
अब तो बस मेरे पास नैवेद्य (भक्ति या
जीवन-ऊर्जा) की केवल एक ही दूध की
वाटी बची है, और भगवान की पूजा के
लिए आंगन में बमुश्किल एक कोरांटी
(फूल) ही खिल पाता है (अर्थात अब
जीवन में सामर्थ्य बहुत कम बचा है)।
◦मराठी :
तरुण-तरुणिंची सलज्ज कुजबुज,
वृक्षझर्यांचे गूढ मधुर गुज,
संसाराचें मर्म हवें तुज,
मधु पिळण्या परि बळ न करीं !
हिंदी अर्थ :
तुम्हें युवाओं की शर्मीली फुसफुसाहट,
पेड़ों और झरनों का गहरा मधुर रहस्य
और इस संसार का सार चाहिए, लेकिन
अब मुझमें उस जीवन का रस (मधु)
निचोड़ने का बल नहीं बचा है।
◦मराठी :
ढळला रे ढळला दिन सखया !
हिंदी अर्थ : हे सखा, अब दिन ढल चला है
(यानी जीवन का संध्याकाल आ गया है,
बुढ़ापा या अंत नजदीक है)।
गीत का मूल भाव :
यह कविता/गीत जीवन के उत्तरार्ध, शारीरिक
थकान, बढ़ती उम्र और ऊर्जा के क्षीण होने का
प्रतीक है। कवि जीवन के अंतिम पड़ाव पर है,
जहाँ वह दुनिया को या अपने आराध्य/मित्र को
बताता है कि अब उसके पास देने के लिए कोई
सृजनात्मक रस (मधु) नहीं बचा है, इसलिए अब
उस पर कोई बल न डाला जाए।
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