रविवार, 19 सितंबर 2010

प्रिय पौत्र कुशाग्र के जन्म-दिवस पर

नवांकुर...


-अरुण मिश्र
कुशाग्र  मिश्र



यह    नवांकुर    कुक्षि   से,   
रुचिरा ऋचा के जो उगा है |
मिश्र -कुल-वंशावली-मणि-
माल, नव-कौस्तुभ लगा है ||


          प्रज्ज्वलित   नव - दीप   सा,
          जो  आज  घर की  देहरी  पर |
          क्षितिज पर  कुल - व्योम के,
          चमका  नया  नक्षत्र  भास्वर ||


लहलहाई,    वंश   की    फिर-
बेल,    फूटी     नई     कोंपल|
दूध  से   आँचल   भरा;  कुल -
तरु,  फला  है  पूत  का  फल|| 


           पुष्प    जो    अभिनव   खिला,
            परिवार-बगिया में विहंस कर |
            गोद  दादी   के,  पितामह  के, 
            ह्रदय    में ,   मोद    दे     भर ||


हो 'कुशाग्र', कुशाग्र-मेधायुत,
अपरिमित    बुद्धि - बल    हो|
मंगलम, मधुरं,  शुभम, प्रिय,
प्रोज्ज्वल,  प्रांजल,  प्रबल हो||
 

टिप्पणी :  अपने पौत्र चिरंजीव  'कुशाग्र' के जन्म पर, गत वर्ष लिखी गई यह कविता, उसके प्रथम वर्ष-गांठ
                पर दुनिया के सभी दादाओं की ओर से दुनिया के सभी पोतों के लिए ब्लागार्पित/लोकार्पित करता 
                हूँ|    -अरुण मिश्र    
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बुधवार, 15 सितंबर 2010

अभियंता-दिवस पर विशेष

 
श्री मोक्षगुण्डम विश्वेशरैया को कोटिशः नमन ...
- अरुण मिश्र

अभियन्त्रण के हे ! महा-प्राण।
संरचना के हे ! अग्रदूत ।
निर्माण-कला-कौशल- प्रवीण;
इस मिटटी के सच्चे सपूत !!

अभियंताओं के शीर्ष-पुरुष !
भारत -भुवि के गौरव ललाम
।
है कीर्ति तुम्हारी, अजर-अमर ;
यश-काया को शत-शत प्रणाम।।



मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिंदी-दिवस पर विशेष

कुछ तो हिंदी में बोलिए साहिब...

-अरुण मिश्र

कुछ तो हिंदी में बोलिए साहिब।
मन की गांठों को खोलिए साहिब।।

पाँच-तारे से निकल कर तो कभी।
गाँव - गलियों में डोलिए साहिब।।

फ़र्ज़ कुछ आप का भी बनता है।
अपना दिल तो टटोलिये साहिब।।

आप ने है बहुत तरक्की की।
आप गैरों के हो लिए साहिब।।

आप ने भी मनाया हिंदी-दिवस।
सब के संग थोड़ा रो लिए साहिब।।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

ईद मुबारक़ पर विशेष




ईद मुबारक़ ...

-
अरुण मिश्र


हो मुहब्बत का ये त्यौहार, मुबारक़ सबको।
भाईचारे का ये व्यौहार, मुबारक़ सबको।
मुफ़्त में बॅंट रही , घर-घर से प्यार की सौगात;
कोई ताजिर, न ख़रीदार, मुबारक़ सबको।।
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ईद मुबारक़ पर विशेष



चॉंद ईद का देखे


-अरुण मिश्र


चॉंद चौदहवीं का भी, चॉंद ईद का देखे।
‘अरुन’ की नज़रों ने भी, क्या-क्या नज़ारे देखे।।

जैसे दरिया की कशिश, ऑखों में समन्दर के।
कहकशॉं जैसे, कोई नन्हा सितारा देखे।।

जो थी हसरत, वो मसर्रत हो,
सुकूं में बदली।
मैंने उन नयनों में, पल-पल नये जादू देखे।।

गोरी को पिउ की झलक,
इंतिज़ार के लम्हे।
याद आवें बहुत, छत पर खड़ी, एक-टक देखे।।

दुआयें अपनी, आसमानों को हो जायें
क़बूल।
बहन ने भाई, मॉं ने बच्चों के मुखड़े देखे।।

क़र्ज़ ने स्वाद सिवइयों का कसैला है किया।
चॉंद को देखे , या ठंढा पड़ा चूल्हा देखे।।

सिर्फ देखो नहीं , इस दर्द को महसूस करो।
तंगी हर हाल में, उम्मीद का पहलू देखे।।


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रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षक दिवस पर...

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को शतशः नमन ...

गुरु - गरिमा के सर्वोच्च शिखर


-अरुण मिश्र

तुम अध्यापक , तुम अध्येता,

तुम राजनयिक, शास्त्रज्ञ महा ।

शिक्षा - संस्कृति के अग्रदूत ,

तुम को पा , दर्शन, धर्म लहा । ।



भारत माँ के गौरव ललाम ,
गुरु - गरिमा के सर्वोच्च शिखर।

यह श्रद्धांजलि , स्वीकार करो ,

गाँधी - युग के ,अंतिम ऋषिवर । ।


बुधवार, 1 सितंबर 2010

जन्माष्टमी पर विशेष


क्या
ख़ूब साँवले! हो

- अरुण मिश्र


जब चाँदनी खिली हो, और चाँद सामने हो।
देखूँ तुम्हें , न उसको , क्या ख़ूब साँवले! हो।।

भादों की बदलियाँ थीं, थी रैन भी अँधेरी।
आँगन में आ अचानक, तुम चाँद सा खिले हो।।

चितचोर हो, छलिया हो,फिर भी यकीं तुम्हीं पे।
ब्रज की दही से मीठे, तुम दूध के धुले हो।।

तुम राम हो,कान्हा हो,इस मिट्टी की ख़ुशबू हो।
हर साँस में रवां हो, अहसास में घुले हो।।

तुझ साँवरे सा उजला, देखा न ‘अरुन’ हमने।
गो-रस में छलकते हो, मक्खन में तुम सने हो।।


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