सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

थी तलाश जिसकी, कँहा मिला?

ग़ज़ल

- अरुण मिश्र

किया ज़िन्दगी का  हिसाब तो, है 'अरुन' ये मुझ पे भरम खुला |
जो  गवां दिया  वो अमोल था ; थी तलाश जिसकी, कँहा मिला??

जो   गुज़ारे   दिन   तेरे  गाँव  में,  कभी  धूप में   कभी  छाँव  में |
कभी  नन्हीं  खुशियाँ  हँसा  गईं ,  कभी  ग़म गराँ  है गया  रुला ||

न   बहार   सारी   बहार  थी ,  न   खिज़ां  ही   सारी   खिज़ां   हुई |
कभी  दिल जले  हैं  बहार में,  कभी है  खिज़ां में भी  ग़ुल  खिला ||

जो है  सुब्हो-शाम  बिखेरता, यूँ   उफ़क़  पे,  अपने  शफ़क़ के  रंग |
नहीं तोड़ सकता वो शम्स भी , कभी रोज़ो-शब का  ये सिलसिला ||
                                             *
 

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

कभी बरसों-बरस न हो सका, तय हाथ भर का भी फ़ासला

गजल़

- अरुण मिश्र

कभी ख़त्म होगा  नहीं ‘अरुन’, ये दिलों का अपने मुआमला। 
चाहे  हॉ कहो, चाहे  ना कहो, या  कहो बुरा, या   कहो  भला।।  

कभी   रीता-रीता,   भरा-भरा,   कभी   सूखा-सूखा, हरा-हरा। 
कई   रंग   देखें हैं बाग़ ने, कभी गुल खिला, कभी दिल जला।।   

कभी कोसों-कोस की  दूरियां भी, पलक झपकते  सिमट गईं। 
कभी  बरसों-बरस  न हो सका, तय हाथ भर का भी फ़ासला।।

                                               *

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

गाँधी जयंती पर विशेष


बापू...

- अरुण मिश्र





हिन्दियों के   हृदय में,  बापू  बसे  प्यारे से हैं।
आसमाने-हिन्द  में, गॉधी जी  ध्रुव-तारे से हैं।। 

तोपें-तलवारें सदा, गल जायेंगी  इस  ऑच से।
सच-अहिंसा, शस्त्र  गॉधी जी के, अंगारे से हैं।। 

संगे-पारस हैं, कि  जो  छू ले उन्हें, सोना बने।
एक ही  क़िरदार  अपनी तरह के, न्यारे से हैं।। 

नूर से इस,हिन्द के, दुनिया हुई रोशन ‘अरुन’।
दूर  होगा  हर  कुहासा, गॉधी, उजियारे से हैं।।

                                     *

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

सोच का सदियों के , ना तोड़ा गया जो दायरा

ग़ज़ल 

- अरुण मिश्र 


मंदिरों   में    हों   अज़ानें ,  मस्जिदों  में   घंटियां। 
तब मैं मानूँगा  कि  सचमुच  एक हैं अल्ला मियां।।  

सोच  का  सदियों  के ,  ना  तोड़ा  गया  जो दायरा। 
तो   नहीं   घट   पायेंगी ,  बढ़ती    हुई   ये   दूरियां।। 

आज, जब  दुनिया सिमट कर,गॉव इक होने को है। 
तब  ये कैसा बचपना,  सबकी  अलग हों  बस्तियां??  

जो   न   हों    ऊँचा   उठातीं   आपके   क़िरदार  को।       
हो  नहीं  सकतीं   कभी   ज़ायज़ हैं , वो  पाबन्दियां।।    

तुम, बनाने वाले की  नज़रों से   ग़र देखो  ‘अरुन’। 
ना तो वे  ही म्लेच्छ हैं , ना ये  ही हैं काफ़िर मियां।।
                                                          *

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

स्वप्न का है रूप कैसा

 
 
टिप्पणी :   यह कविता मेरे काव्य-संग्रह  'अंजलि भर भाव के प्रसून' से साभार उद्धृत है|
              - अरुण मिश्र

शनिवार, 25 सितंबर 2010

पुत्री-दिवस २६, सितम्बर पर विशेष


 सभी बेटिओं को समर्पित  
लाडली बिटिया मेरी....
 - अरुण मिश्र 

                                       मेरे घर की रोशनी है, मेरे आँगन की कली है|
                        बेल में  परिवार के मेरे   फली,  मीठी फली है|
                        संस्कारों में  रची है,  वंश  की   विरुदावली है| 
                        लाडली बिटिया मेरी मासूम,भोली है, भली है|| 

 

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

ग़ज़ल

इश्क़ के गहरे समन्दर को खॅगाला होता....

- अरुण मिश्र

बेवज़ह   गुल   न   मेरे  सिम्त  उछाला  होता।
तो  ये  निस्बत का भरम हमने न पाला होता।।

बिन  तेरे  ज़िन्दगी, तारीक़ियों  का  जंगल है।
तू  चला आता  तो, कुछ मन में उजाला होता।।

हम सॅभल सकते थे, कमज़र्फ  नहीं  थे  इतने। 

काश  उस  शोख़  ने,  पल्लू तो  सॅभाला  होता।।

तर्क़े-उल्फ़त भी, तग़ाफ़ुल भी और तोहमत भी।
कोई   उम्मीद  का   पहलू,  तो  निकाला  होता।।

तुम भी  पा जाते ‘अरुन’,  अश्क़ के  ढेरों मोती।
इश्क़ के   गहरे   समन्दर  को   खॅगाला   होता।।


                                                        *

टिप्पणी :  इस ग़ज़ल के चार शेर', डॉ.  डंडा लखनवी के ब्लाग, 'मानवीय सरोकार' 
                  में १३, जुलाई, २०१० को पूर्व में प्रस्तुत किये जा चुके हैं|
                  - अरुण मिश्र