- अरुण मिश्र
दश्त-ओ-सह्रा में भी चुपचाप खिला करते हैं |
ग़ुल कहाँ , किस के तगाफुल का गिला करते हैं??
हज़ार साल भी नर्गिस कहाँ मायूस हुई |
दीदावर, हुस्न को तय है कि, मिला करते हैं ||
कोई समझे न ग़र, इन हीरों की असली कीमत|
तो ये पत्थर हैं, ख़दानों में मिला करते हैं ||
*
