रविवार, 9 जनवरी 2011

सिवा हमारे फरिश्ता न कोई आयेगा..

ग़ज़ल 

- अरुण मिश्र 

सिवा    हमारे,   फरिश्ता    न    कोई   आयेगा।
हमारी    डूबती    कश्ती    को    जो   बचायेगा।।
 
सुनहरी  फ़स्ल  की  उमीद  किस  बिना पे करें।
बाड़ का  बॉस ही ,   जब  बढ़ के  खेत  खायेगा।।
 
करो   ये  ख़ुद  से  अहद,  क़ामयाब  होंगे   हम।
न  हारे  मन,   तो  हमें   कौन  फिर   हरायेगा??
 
जले    मशाल,    तभी   ख़त्म  अँधेरा   होगा।
हमीं  में    होगा   कोई,   जो   इसे   जलायेगा।। 


हैं  राह  ताक   रहे   लोग,   रहनुमा  के  लिये।
सही   दिशा   में,  कोई  तो    क़दम  बढ़ायेगा।।
 
हो जिसके  हाथ को  दायें,  न  यकीं  बायें पर।
उससे   उम्मीद  हो   कैसे,  वजन   उठायेगा?? 


‘अरुन’ शमा की तरह,खुद को जलाओ पहले।
फिर तो परवानों का,  तय है, हुज़ूम आयेगा।। 
                              *

2 टिप्‍पणियां:

  1. shuruwat khud se karni chahiye ....

    bahut khub ji


    mere yaha bhi padhare

    http://anubhutiras.blogspot.com

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  2. प्रिय अजय जी, धन्यवाद | 'अनुभूति -रस' का आस्वादन किया | आपकी अनुभूतियाँ सरस, चिंतन सुस्पष्ट तथा लेखन सुन्दर है | शुभकामनायें !
    - अरुण मिश्र.

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