बुधवार, 5 जनवरी 2011

दूसरों के दर्द को महसूस करने की सिफ़त...

ग़ज़ल



-अरुण मिश्र



जब  मुक़द्दर में  लिखीं,   हमदम   हों  ये   बेचैनियां।
हों   शरीक़े - जां,   शरीक़े - ग़म   हों    ये   बेचैनियां।।

दूसरों  के   दर्द  को ,   महसूस   करने   की   सिफ़त।
जिसमें हो,  उसमें न  क्यूँ ,  पैहम  हों  ये   बेचैनियां।।

दिल को पिघलायेगी,इनकी आँच सुलगायेगी मन।
कर लो ऑखें नम, तो कुछ   मद्धम हो ये  बेचैनियां।।

हर  सुख़न के  फूल में,  रोशन हों  ज्यूं   रंगे-शफ़क।
गुंचों   पे  अशआर  के,   शबनम  हों   ये  बेचैनियां।।

हम   इधर  बेचैन  हैं,   तुम   भी   उधर   बेचैन  हो।
साथ बैठो तो ‘अरुन’,  कुछ   कम हों ये  बेचैनियां।।
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