शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

श्रीमद् शंकराचार्यकृत चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् का भावानुवाद






श्रीमद् शंकराचार्यकृत चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् 
                     का भावानुवाद

-अरुण मिश्र.


भज गोविन्द  मूढ़मते,  भज  गोविंद  के  चरण।
मृत्यु के  समीप,   साथ   देता  नहीं  व्याकरण।।

रात्रि-दिवस, प्रात-साँझ,  शेष हुई  जाती  आयु।
क्रीड़ा करे कालचक्र,   छूटे  पर  न  आशा-वायु।।

जागे,  सहे अग्नि-भानु;  सोये, धरे चिबुक जानु।
भिक्षा-भोग, तरु-निवास; छूटे पर न आशा-पाश।।

कमा  सकेगा  जब तक,   देगा   परिवार  स्नेह।
जर्जर  जब   हुई   देह,   पूछे  नहीं   कोई   गेह।।

जटा बढ़ा,  केश घुटा,  भगवा   धरे   नाना-वेष।
देख के न देखा;  सहे,   उदर के निमित्त  क्लेश।।

किंचित   भगवद्गीता,   बूँद    मात्र    गंगाजल।
जिसपे  हरि-चर्चा-बल,  उसको यम है निर्बल।।

गलित अंग, पलित  मुंड;  दशनहीन हुआ तुंड।
हुआ वृद्ध,  गहा दंड;   छूटा पर  न  आशा-पिंड।।

क्रीड़ा  में  बाल्यकाल;   तरुणाई   तरुणी  संग।
वृद्ध  तदपि चिंतामग्न;  प्रभु का  ना  चढ़ा रंग।।

पुनः-पुनः  जन्म-मरण;   गर्भ-शयन  बार-बार।
ले कर हरि-शरण,   करो,   दुस्तर  संसार  पार।।

रात्रि-दिवस-पक्ष-मास-अयन-वर्ष    बार-बार।
साथ   पर   नहीं   छोड़े    आशा-ईर्ष्या-विकार।।

नष्ट-आयु,  कैसा काम?   शुष्क-नीर-सर,   न अर्थ।
नष्ट-द्रव्य, परिजन कहाँ ? तत्व-ज्ञान,जगत, व्यर्थ।।

नारीस्तन-नाभि   हैं,    माँस-मेद   के   विकार।
मिथ्या  ये  माया-मोह,    सोचो  मन  बार-बार।।

कौन तुम?  कहाँ  से हो?   सबको   असार   जान।
जननी औ’ तात कौन?  तजो विश्व,  स्वप्न मान।।

पढ़ो गीता-सहस्त्रनाम;   श्री-पति का धरो ध्यान।
चित्त  लहे   सत्संगति;   दीनजनों  को   दो  दान।।

जब तक तन बसें प्राण, तब तक सब पूँछें  कुशल।
होती,   मृत-देह  देख,   भार्या भी   भय से  विकल।।

पहले    तो    सुःख-भोग;   पीछे,  रोगमय  शरीर।
नश्वर   संसार    तदपि,    मन   पाप  को   अधीर।।

चिथड़ों से रचा कंथ;   पुण्यापुण्य  विचलित  पंथ।
‘मैं, तू औ’ विश्व शून्य’  जान के भी,   शोक? हंत!!

गंगासागर-गमन,      व्रत-पालन    तथा      दान।
मुक्ति    नहीं   सौ जन्मों तक  होगी,  बिना  ज्ञान।।

                      *

                   इति श्री शंकराचार्य-विरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् 
                                           का भावानुवाद संपूर्ण।

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