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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

तुम्हारा काँधा हमें आज फिर रुलावेगा.......

ग़ज़ल 

तुम्हारा काँधा हमें आज फिर रुलावेगा.......

-अरुण मिश्र.

तुम्हारा  काँधा   हमें,  आज  फिर   रुलावेगा ।
हाल   पूछोगे   तो ,   आजार   याद   आवेगा ।।

न  वज्हे-तर्के-तअल्लुक़,  बयां करो  सब  से ।  
कि इससे  मुझको,  तेरा प्यार,  याद आवेगा ।।

ये क़फ़स सोने का, मैंने है,  खुद पसंद किया ।
मुझे  पता था,  वो ज़ालिम,  बहुत  सतावेगा ।।

दिल मेरा चीर के,  ख़ुद देखेगा  अपनी सूरत ।
मेरे  कहे  से  भला,   क्यूँ  वो   मान  जावेगा ।।

हस्ती-ए-हुस्न   तो,   यूँ   ही  हुबाब  जैसी  है ।
ख़ूब  पर  दावा  है,   हस्ती   मेरी   मिटावेगा ।।

'अरुन' सुलावे; पिला चाँद, चाँदनी की शराब ।
अब  हमें   भोर   में,    ख़ुर्शीद   ही    उठावेगा ।। 
                                       * 









बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

हे! राम राम जय राम राम....

 हे!  राम राम जय राम राम....




 हे!  राम राम जय राम राम....

  - अरुण मिश्र

 जय  राम,  राम,  जय  रामचन्द्र।
 शोषित- जन- मन-विश्राम,चन्द्र।
 दशरथ -  हृत्व्योम - बिहारी    हे!
 रघुकुल  के  चिर-अभिराम चन्द्र।।

               शुचि, जीवन-मूल्यों के  मापक।
               हे पूर्ण-पुरुष! अग-जग-व्यापक।
               यश-वाहक,   संस्कृति-संवाहक। 
               मर्यादाओं       के       संस्थापक।।

    हे!   दीन - हीन   के   मन  के   बल।
    मुनि-हृदय-मीन, तव-भक्ति सुजल।
    हे!    चिर-नवीन- शुभ-आस-रश्मि।
    हे!  आर्त - दुखी- जन    के    संबल।।

               भारत-भुवि  के   गौरव   ललाम।
               हे! संत- सरल- चित- परमधाम।
               निष्काम !  करो  लीला- सकाम।
               हे!  राम,  राम,   जय   राम-राम।।
                                         *
(17 अक्टूबर , 2010 की पोस्ट में पूर्वप्रकाशित।)

                                      *विजय दशमी की शुभकामनायें *




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गुरुवार, 9 अगस्त 2012

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष


मधुराष्टक ( भावानुवाद ) 

-अरुण मिश्र. 

अधर  मधुर   है,   हास्य  मधुर  है,  वदन   मधुर  है,  नयन   मधुर है।
हृदय  मधुर  है,  गमन  मधुर  है,  मधुराधिपति  का  अखिल मधुर है॥

चरित   मधुर  है,  वचन   मधुर  है,  वलय  मधुर  है,  वसन  मधुर  है।
चाल मधुर है,   भ्रमण  मधुर है,  मधुराधिपति   का  अखिल  मधुर है॥

वेणु  मधुर,   पद-रेणु  मधुर,   शुभ-पाणि  मधुर,  मृदु-चरण  मधुर है।
नृत्य   मधुर  है,  सख्य  मधुर  है, मधुराधिपति  का  अखिल मधुर है॥

भोज्य  मधुर  है,   पान  मधुर   है,   गीत   मधुर  है,   शयन  मधुर  है।
तिलक  मधुर है,  रूप  मधुर  है,  मधुराधिपति   का  अखिल  मधुर है॥

कार्य  मधुर   है,   तरण  मधुर  है,   हरण   मधुर,   स्मरण   मधुर   है।
कथन  मधुर है,  शमन  मधुर  है,  मधुराधिपति  का  अखिल मधुर है॥

शिखा  मधुर   है,    हार  मधुर   है,    यमुना  मधुर,    तरंग   मधुर  है।
सलिल मधुर है,  कमल मधुर है,  मधुराधिपति  का  अखिल  मधुर है॥

लीला   मधुर,    गोपियां   मधुरा,    योग  मधुर   है,    भोग  मधुर   है।
मधुर  प्रेक्षण,   मधुर  आचरण,   मधुराधिपति   का  अखिल  मधुर है॥

गौयें   मधुर,   गोप   सब  मधुरा,   मधुर   लकुटिया,   सृष्टि   मधुर  है।
दलन मधुर, प्रतिफलन मधुर अति, मधुराधिपति का अखिल मधुर है॥
                                                              *
                                ( इति श्रीमद वल्लभाचार्य कृत मधुराष्टक संपूर्ण।)


मूल संस्कृत पाठ :