सोमवार, 4 अप्रैल 2022

शम्भुस्तुतिः / श्रीब्रह्ममहापुराण / श्री राम द्वारा की गई भगवान शिव की स्तुति / स्वर : नैशा जोशी

 https://youtu.be/xaoOTKu0DSI  

शम्भुस्तुतिः

श्रीराम उवाच -

नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं नमामि सर्वज्ञमपारभावम् ।
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥ १॥
श्रीराम बोले--मैं पुराणपुरुष शम्भुको नमस्कार करता हूँ ।
जिनकी असीम सत्ताका कहीं पार या अन्त नहीं है, उन सर्वज्ञ
शिवकोमैं प्रणाम करता हूँ। अविनाशी प्रभु रुद्रको नमस्कार
करता हूँ।सबका संहार करनेवाले शर्वको मस्तक झुकाकर
प्रणाम करता हूँ ॥ १॥
नमामि देवं परमव्ययं तमुमापतिं लोकगुरुं नमामि ।
नमामि दारिद्र्यविदारणं तं नमामि रोगापहरं नमामि ॥ २॥
अविनाशी परमदेवको नमस्कार करता हूँ। लोकगुरु उमापतिको
प्रणामकरता हूँ। दरिद्रताको विदीर्ण करनेवाले [शिव]-को
नमस्कार करता हूँ। रोगोंका विनाश करनेवाले महेश्वर को
प्रणाम करता हूँ ॥ २॥
नमामि कल्याणमचिन्त्यरूपं नमामि विश्वोद्भवबीजरूपम् ।
नमामि विश्वस्थितिकारणं तं नमामि संहारकरं नमामि ॥ ३॥
जिनका रूप चिन्तनका विषय नहीं है, उन कल्याणमय शिवको
नमस्कारकरता हूँ । विश्व की उत्पत्तिके बीजरूप भगवान भवको
प्रणाम करताहूँ । जगतका पालन करनेवाले परमात्माको नमस्कार
करता हूँ । संहारकारी रुद्रको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ ॥ ३॥
नमामि गौरीप्रियमव्ययं तं नमामि नित्यं क्षरमक्षरं तम् ।
नमामि चिद्रूपममेयभावं त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥ ४॥
पार्वतीजीके प्रियतम अविनाशी प्रभुको नमस्कार करता हूँ । नित्य
क्षर-अक्षरस्वरूप शंकरको प्रणाम करता हूँ । जिनका स्वरूप
चिन्मय है और अप्रमेय है, उन भगवान त्रिलोचनको मैं मस्तक
झुकाकर बारम्बार नमस्कार करता हूँ ॥ ४॥
नमामि कारुण्यकरं भवस्य भयंकरं वाऽपि सदा नमामि ।
नमामि दातारमभीप्सितानां नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥ ५॥
करुणा करनेवाले भगवान शिवको प्रणाम करता हूँ तथा संसारको भय
देनेवाले भगवान भूतनाथको सर्वदा नमस्कार करता हुँ । मनोवांछित
फलोंके दाता महेशवरको प्रणाम करता हूँ । भगवती उमाके स्वामी
श्रीसोमनाथको नमस्कार करता हूँ ॥ ५॥
नमामि वेदत्रयलोचनं तं नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् ।
नमामि पुण्यं सदसद्व्यतीतं नमामि तं पापहरं नमामि ॥ ६॥
तीनों वेद जिनके तीन नेत्र हैं, उन त्रिलोचनको प्रणाम करता हूँ ।
त्रिविध मूर्तिसे रहित सदाशिवको नमस्कार करता हूँ । पुण्यमय शिवको
प्रणाम करता हूँ । सत्-असत्से पृथक् परमात्माको नमस्कार करता हूँ ।
पापोंको नष्ट करनेवाले भगवान हरको प्रणाम करता हूँ ॥ ६॥
नमामि विश्वस्य हिते रतं तं नमामि रूपाणि बहूनि धत्ते ।
यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥ ७॥
जो विश्वके हितमें लगे रहते हैं, बहुत-से रूप धारण करते हैं,
उन भगवान शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । जो संसारके रक्षक
तथा सत् और असत्के निर्माता हैं, उन विशवपति (भगवान् विश्वनाथ)
-को मैं नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ ॥ ७॥
यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं तथागतिं लोकसदाशिवो यः ।
आराधितो यश्च ददाति सर्व नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ॥ ८॥
हव्य-कव्यस्वरूप यज्ञेश्वरको नमस्कार करता हूँ । सम्पूर्ण लोकोंका
सर्वदा कल्याण करनेवाले जो भगवान शिव आराधना करनेपर उत्तम
गति एवं सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, उन दानप्रिय
इष्टदेवको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ८॥
नमामि सोमेशवरमस्वतन्त्रमुमापतिं तं विजयं नमामि ।
नमामि विघ्नेशवरनन्दिनाथं पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥ ९॥
भगवान सोमनाथको प्रणाम करता हूँ । जो स्वतन्त्र न रहकर भक्तोंके
वश रहते हैं, उन विजयशील उमानाथको मैं नमस्कार करता हूँ ।
विघ्नराज गणेश तथा नन्दीके स्वामी पुत्रप्रिय भगवान् शिवको मैं
मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९॥
नमामि देवं भवदुःखशोकविनाशनं चन्द्रधरं नमामि ।
नमामि गङ्गाधरमीशमीड्यमुमाधवं देववरं नमामि ॥ १०॥
संसारके दुःख और शोकका नाश करनेवाले देवता भगवान
चन्द्रशेखरको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ । जो स्तुति करने
योग्य और मस्तकपर गंगाजीको धारण करनेवाले हैं, उन महेश्वर
को नमस्कार करता हूँ । देवताओंमें श्रेष्ठ उमापतिको प्रणाम
करता हूँ ॥ १०॥
नमाम्यजादीशपुरन्दरादिसुरासुरैरचितपादपद्मम् ।
नमामि देवीमुखवादनानामीक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत् ॥ ११॥
जगदीश, पुरंदर आदि एवं सुर-असुर जिनके चरण-कमलों की पूजा
करते हैं, उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ।
जिन्होंने पार्वतीदेवी के मुखसे निकलने वाले वचनों पर दृष्टिपात
करने की इच्छा से मानो तीन नेत्र धारण कर रखे हैं, उन भगवानको
प्रणाम करता हूँ ॥ ११॥
पञ्चामृतैर्गन्धसुधूपदीपैर्विचित्रपुष्पैर्विविधैश्च मन्त्रैः ।
अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥ १२॥
पंचामृत, चन्दन, उत्तम धूप, दीप, भाँति-भाँतिके विचित्र
पुष्प, मन्त्र तथा अन्न आदि समस्त उपचारोंसे पूजित भगवान सोमको
में नमस्कार करता हूँ ॥ १२॥
॥ इति श्रीब्रह्ममहापुराणे शम्भुस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
॥ इस प्रकार श्रीब्रह्ममहापुराण में शम्भुस्तुति सम्पूर्ण हुई ॥

रविवार, 3 अप्रैल 2022

निगाहें मिलाने को जी चाहता है.../ शायर : साहिर लुधियानवी / गायन : सयाली काम्बले

 https://youtu.be/PxUTGegOKIU

निगाहें मिलाने को जी चाहता है...
फिल्म : दिल ही तो है (१९६३)
गीतकार : साहिर लुधियानवी
संगीत : रोशन
गायन : आशा भोंसले (फिल्म में)
गायन : सयाली काम्बले (इस वीडियो में)

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

श्री वेङ्कटेश मङ्गलाशासनम् .../ गायन : बॉम्बे सिस्टर्स

 https://youtu.be/gzvZJkOsWhc 

Lord Venkateswara also known as Srinivasa, Balaji, is a form of the
Hindu god Vishnu. Venkateswara's most prominent shrine is the
Tirumala Venkateswara Temple located in Tirupathi, Andhra Pradesh
in Southern India. Venkataweswara literally means Lord of Venkata.
The word is a combination of the words venkata, the name of a hill in
South India and iswara.

The Bombay sisters, C. Saroja (b. 7 December 1936) and 
C. Lalitha (b. 26 August 1938), are a Carnatic music singing duo.
The Bombay Sisters, C. Saroja and C. Lalitha, were born in Trichur
Kerala to Mukthambal and N. Chidambaram Iyer. The sisters were 
brought up in Bombay. Saroja and Lalitha had their education in the 
S.I.E.S Matunga, passed their intermediate privately from Bhopal, M.P. 
and completed their graduation from Delhi University. They had their 
musical training with H. A. S. Mani, Musiri Subramania Iyer and 
T. K. Govinda Rao.
After they were groomed in Carnatic Music in Mumbai, the sisters moved 
to Chennai. But a swami addressed them as 'Bombay Sahodarigal' and 
blessed them, and the name stuck. Saroja's husband Rajaram was the 
chief secretary of Lalit Kala Akademi, and Lalitha's husband Chandran was 
an advocate. The sisters credited their husbands in helping them to continue 
to perform together after they got married. 

श्री वेङ्कटेश मङ्गलाशासनम्

श्रियः कान्ताय कळ्याण निधये निधयेऽर्थिनाम् । 
श्रीवेङ्कट निवासाय श्रीनिवासाय मङ्गळम् ‖ १ ‖ 

May all auspiciousness be unto Srinivasa,
who is the Lord of Lakshmi; resides in the
abode of auspiciousness; is a treasure trove
of supplicants and dwells on the Venkatachala!

लक्ष्मी सविभ्रमालोक सुभ्रू विभ्रम चक्षुषे ।
चक्षुषे सर्वलोकानां वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ २ ‖

May all auspiciousness be unto Sri Venkatesa
whose charming eyes with beautiful eyebrows
gaze at Lakshmi and who is the eye of all the worlds!

श्रीवेङ्कटाद्रि शृङ्गाग्र मङ्गळाभरणाङ्घ्रये ।
मङ्गळानां निवासाय श्रीनिवासाय मङ्गळम् ‖ ३ ‖

May all auspiciousness be unto Sri Srinivasa
whose feet are an auspicious ornament for the crest
of Venkatachala, and who is the abode of auspiciousness

सर्वावयव सौन्दर्य सम्पदा सर्वचेतसाम् ।
सदा सम्मोहनायास्तु वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ ४ ‖

May all auspiciousness be unto
Sri Venkatesawhose wealth of bodily
charm causes wonder in all living beings

नित्याय निरवद्याय सत्यानन्द चिदात्मने ।
सर्वान्तरात्मने शीमद्वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ ५ ‖

May all auspiciousness be unto Sriananda
who is the Inner Soul of all, and to Venkatesa
who is eternal, blemishless, and of the form
of sat (existence) chit (consciousness) andanand (bliss)

स्वतस्सर्वविदे सर्व शक्तये सर्वशेषिणे।
सुलभाय सुशीलाय वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ ६ ‖

May all auspiciousness be unto Sri Venkatesa who is self-omniscient, omnipotent, principal of all, easily attainable and of good character

परस्मै ब्रह्मणे पूर्णकामाय परमात्मने ।
प्रयुञ्जे परतत्त्वाय वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ ७ ‖

May all auspiciousness be unto Sri Venkatesa who is the Supreme Brahman, whose desires are fulfilled, and who is the Supreme Soul

आकालतत्त्व मश्रान्त मात्मना मनुपश्यताम् ।
अतृप्त्यमृत रूपाय वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ ८ ‖

May auspiciousness be unto Sri Venkatesa whose ever-charming form is like nectar to living beings who gaze upon Him incessantly as long as Time lasts

प्रायः स्वचरणौ पुंसां शरण्यत्वेन पाणिना ।
कृपयाऽऽदिशते श्रीमद्वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ ९ ‖

May auspiciousness be unto Sri Venkatesa, whose right hand
(called Varadahasta) points to His feet, which is the refuge for all human beings

दयाऽमृत तरङ्गिण्या स्तरङ्गैरिव शीतलैः ।
अपाङ्गै स्सिञ्चते विश्वं वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ १० ‖

May all auspiciousness be unto Sri Venkatesa who cools the Universe with His glances, which are like the waves of the river of nectar of compassion

स्रग्भूषाम्बर हेतीनां सुषमाऽऽवहमूर्तये ।
सर्वार्ति शमनायास्तु वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ ११ ‖

May all auspiciousness be unto Sri Venkatesa whose form lends splendour to the garlands, ornaments, garments and weapons which He bears, and whose form subdues all afflictions

श्रीवैकुण्ठ विरक्ताय स्वामि पुश्ह्करिणीतटे ।
रमया रममाणाय वेङ्कटेशाय मङ्गळम् ‖ १२ ‖

May all auspiciousness be unto Sri Venkatesa who, giving up His attachment to Sri Vaikunta, sports gracefully with Lakshmi on the banks of the Swamipushkarini

श्रीमत्सुन्दरजा मातृमुनि मानसवासिने ।
सर्वलोक निवासाय श्रीनिवासाय मङ्गळम् ‖ १३ ‖

Mayall auspiciousness be unto Sri Srinivasa who dwells in the heart of the sage Manavala and all the worlds

मङ्गळा शासनपरैर्मदाचार्य पुरोगमैः ।
सर्वैश्च  पूर्वैराचार्यैः सत्कृतायास्तु मङ्गळम् ‖ १४ ‖

May all auspiciousness be unto Sri Venkatesa who has been worshipped by 
my teachers and their predecessors, and all those devoted to reciting the 
Mangalasasanam  

श्री पद्मावती समेत श्री श्रीनिवासपरब्रह्मणे नमः

बुधवार, 30 मार्च 2022

यूं ही कोई मिल गया था.../ गीतकार : कैफ़ी आज़मी/ गायिका : चाँदनी मिर्जा

 https://youtu.be/kYbsf-6l9iw  

गीत : चलते चलते, यूँही कोई मिल गया था...

फिल्म : पाक़ीज़ा  (१९७२)
संगीतकार : ग़ुलाम मोहम्मद 
गीतकार : कैफ़ी आज़मी
गायिका  : लता मंगेशकर (फिल्म में)
             चाँदनी मिर्ज़ा (इस वीडियो में)

Chandni Mirza on Twitter :
My self Chandni Mirza, I'm a professional singer.
My institute name is "Shree Ram Bhartiya Kala Kendra"
and "Prayag Sangeet Samiti".
My gurus are Charanjit Soni and Meera Chakrobarty M'ams.


चलते चलते, 
चलते चलते
यूँही कोई मिल गया था, 
यूँही कोई मिल गया था
सरे राह चलते चलते, 
सरे राह चलते चलते
वहीं थमके रह गई है, 
वहीं थमके रह गई है
मेरी रात ढलते ढलते, 
मेरी रात ढलते ढलते

जो कही गई है मुझसे, 
जो कही गई है मुझसे
वो ज़माना कह रहा है, 
वो ज़माना कह रहा है
के फ़साना,
के फ़साना बन गई है, 
के फ़साना बन गई है
मेरी बात टलते टलते, 
मेरी बात टलते टलते

यूँही कोई मिल गया था, 
यूँही कोई मिल गया था
सरे राह चलते चलते, 
सर-ए-राह चलते चलते ...

शब-ए-इंतज़ार आखिर, 
शब-ए-इंतज़ार आखिर
कभी होगी मुख़्तसर भी, 
कभी होगी मुख़्तसर भी
ये चिराग़,
ये चिराग़ बुझ रहे हैं, 
ये चिराग़ बुझ रहे हैं
मेरे साथ जलते जलते, 
मेरे साथ जलते जलते

ये चिराग़ बुझ रहे हैं, 
ये चिराग़ बुझ रहे हैं 
मेरे साथ जलते जलते, 
मेरे साथ जलते जलते
यूँही कोई मिल गया था, 
यूँही कोई मिल गया था
सर-ए-राह चलते चलते, 
सर-ए-राह चलते चलते ...

मंगलवार, 29 मार्च 2022

प्रेम मुदित मन से कहो राम, राम, राम.../ गायन : श्रीमती कौशिकी चक्रवर्ती

 https://youtu.be/MKoCxBGi3iM 

प्रेम मुदित मन से कहो राम राम राम,
राम राम राम, श्री राम राम राम |

पाप कटें दुःख मिटें लेत राम नाम |
भव समुद्र सुखद नाव एक राम नाम ||

परम शांति सुख निधान नित्य राम नाम |
निराधार को आधार एक राम नाम ||

परम गोप्य परम इष्ट मंत्र राम नाम | 
संत हृदय सदा बसत एक राम नाम ||

महादेव सतत जपत दिव्य राम नाम |
कासी मरत मुक्ति करत, कहत राम नाम ॥

मात पिता बंधु सखा सब ही राम नाम |
भक्त जनन जीवन धन एक राम नाम ||

सोमवार, 28 मार्च 2022

नटराज राज नमो नमः .../ नटराज स्तुति / स्वर : माधवी मधुकर झा

https://youtu.be/mKyoAa42YZM  

सत सृष्टि तांडव रचयिता
नटराज राज नमो नमः...
हेआद्य गुरु शंकर पिता
नटराज राज नमो नमः...

गंभीर नाद मृदंगना धबके उरे ब्रह्मांडना
नित होत नाद प्रचंडना
नटराज राज नमो नमः...

शिर ज्ञान गंगा चंद्रमा चिद्ब्रह्म ज्योति ललाट मा
विषनाग माला कंठ मा
नटराज राज नमो नमः...

तवशक्ति वामांगे स्थिता हे चंद्रिका अपराजिता
चहु वेद गाए संहिता
नटराज राज नमोः...

रविवार, 27 मार्च 2022

चांदनी छत पे चल रही होगी.../ दुष्यंत कुमार (१९३१-१९७५) / गायन : डॉ. सोमा घोष

 https://youtu.be/kLlLjwt1ZMg   

दुष्यंत कुमार त्यागी (27 सितंबर 1931-30 दिसंबर 1975) एक हिन्दी 
कवि , कथाकार और ग़ज़लकार थे। दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह 
के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है।
दुष्यंत कुमार का जन्‍म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद 
के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया 
में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा 
क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा 
गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम 
आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 
44 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।
उनके पिता का नाम भगवत सहाय और माता का नाम रामकिशोरी देवी था। प्रारम्भिक 
शिक्षा गाँव की पाठशाला तथा माध्यमिक शिक्षा नहटौरऔर चंदौसी से हुई। दसवीं कक्षा 
से कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया। इंटरमीडिएट करने के दौरान ही राजेश्वरी कौशिक 
से विवाह हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में बी०ए० और एम०ए० किया। 
डॉ० धीरेन्द्र वर्मा और डॉ० रामकुमार वर्मा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। कथाकार कमलेश्वर 
और मार्कण्डेय तथा कविमित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेवनारायण साही आदि के संपर्क से 
साहित्यिक अभिरुचि को नया आयाम मिला।
मुरादाबाद से बी०एड० करने के बाद 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में आये। मध्यप्रदेश के 
संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में रहे। आपातकाल के समय उनका कविमन 
क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई, 
जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं। सरकारी सेवा में रहते हुए सरकार 
विरोधी काव्य रचना के कारण उन्हें सरकार का कोपभाजन भी बनना पड़ा। 30 दिसंबर 
1975 की रात्रि में हृदयाघात से उनकी असमय मृत्यु हो गई। उन्हें मात्र 44 वर्ष की 
अल्पायु मिली।
1975 में उनका प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह'साये में धूप' प्रकाशित हुआ। इसकी ग़ज़लों को इतनी 
लोकप्रियता हासिल हुई कि उसके कई शेर कहावतों और मुहावरों के तौर पर लोगों द्वारा 
व्यवहृत होते हैं। 52 ग़ज़लों की इस लघुपुस्तिका को युवामन की गीता कहा जाय, तो 
अत्युक्ति नहीं होगी। 

डॉ. सोमा घोष 
बनारस में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुंबई में रह रही सोमा एक समय के महान 
फिल्मकार नवेंदु घोष की पुत्रवधू है। पिता मनमोहन चक्रवर्ती स्वतंत्रता सेनानी 
रहे है और माँ अर्चना गायिका। वह अपनी संगीत प्रतिभा का श्रेय माँ को ही देती 
हैं। व्यक्तित्व पर संगीत की कोमलता के साथ पिता की संघर्षशीलता की भी 
पूरी छाप है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने 
के लिए संघर्षरत है। 
भारत के प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खान ने इन्हें अपना दत्तक पुत्री 
बनाया था। सोमा घोष, बनारसी संगीत के परंपरा अनुसार चैतीकजरी, टप्पा, ठुमरी, 
दादरा के अलावा गजल गायकी में भी प्रसिद्ध हैं ।भारत सरकार ने इनके कला के क्षेत्र 
में योगदान के लिए इनको पद्मश्री सम्मान दिया है। 

चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी
फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी
कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी
सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शमअ-सी जल रही होगी
तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी
जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी