https://youtu.be/kLlLjwt1ZMg
दुष्यंत कुमार त्यागी (27 सितंबर 1931-30 दिसंबर 1975) एक हिन्दी
कवि , कथाकार और ग़ज़लकार थे। दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह
के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है।
कवि , कथाकार और ग़ज़लकार थे। दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह
के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है।
दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद
के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया
में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा
क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा
गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम
आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़
44 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।
उनके पिता का नाम भगवत सहाय और माता का नाम रामकिशोरी देवी था। प्रारम्भिक
शिक्षा गाँव की पाठशाला तथा माध्यमिक शिक्षा नहटौरऔर चंदौसी से हुई। दसवीं कक्षा
से कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया। इंटरमीडिएट करने के दौरान ही राजेश्वरी कौशिक
से विवाह हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में बी०ए० और एम०ए० किया।
डॉ० धीरेन्द्र वर्मा और डॉ० रामकुमार वर्मा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। कथाकार कमलेश्वर
और मार्कण्डेय तथा कविमित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेवनारायण साही आदि के संपर्क से
साहित्यिक अभिरुचि को नया आयाम मिला।
मुरादाबाद से बी०एड० करने के बाद 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में आये। मध्यप्रदेश के
संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में रहे। आपातकाल के समय उनका कविमन
क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई,
जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं। सरकारी सेवा में रहते हुए सरकार
विरोधी काव्य रचना के कारण उन्हें सरकार का कोपभाजन भी बनना पड़ा। 30 दिसंबर
1975 की रात्रि में हृदयाघात से उनकी असमय मृत्यु हो गई। उन्हें मात्र 44 वर्ष की
अल्पायु मिली।
1975 में उनका प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह'साये में धूप' प्रकाशित हुआ। इसकी ग़ज़लों को इतनी
लोकप्रियता हासिल हुई कि उसके कई शेर कहावतों और मुहावरों के तौर पर लोगों द्वारा
व्यवहृत होते हैं। 52 ग़ज़लों की इस लघुपुस्तिका को युवामन की गीता कहा जाय, तो
अत्युक्ति नहीं होगी।
के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया
में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा
क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा
गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम
आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़
44 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।
उनके पिता का नाम भगवत सहाय और माता का नाम रामकिशोरी देवी था। प्रारम्भिक
शिक्षा गाँव की पाठशाला तथा माध्यमिक शिक्षा नहटौरऔर चंदौसी से हुई। दसवीं कक्षा
से कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया। इंटरमीडिएट करने के दौरान ही राजेश्वरी कौशिक
से विवाह हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में बी०ए० और एम०ए० किया।
डॉ० धीरेन्द्र वर्मा और डॉ० रामकुमार वर्मा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। कथाकार कमलेश्वर
और मार्कण्डेय तथा कविमित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेवनारायण साही आदि के संपर्क से
साहित्यिक अभिरुचि को नया आयाम मिला।
मुरादाबाद से बी०एड० करने के बाद 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में आये। मध्यप्रदेश के
संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में रहे। आपातकाल के समय उनका कविमन
क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई,
जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं। सरकारी सेवा में रहते हुए सरकार
विरोधी काव्य रचना के कारण उन्हें सरकार का कोपभाजन भी बनना पड़ा। 30 दिसंबर
1975 की रात्रि में हृदयाघात से उनकी असमय मृत्यु हो गई। उन्हें मात्र 44 वर्ष की
अल्पायु मिली।
1975 में उनका प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह'साये में धूप' प्रकाशित हुआ। इसकी ग़ज़लों को इतनी
लोकप्रियता हासिल हुई कि उसके कई शेर कहावतों और मुहावरों के तौर पर लोगों द्वारा
व्यवहृत होते हैं। 52 ग़ज़लों की इस लघुपुस्तिका को युवामन की गीता कहा जाय, तो
अत्युक्ति नहीं होगी।
डॉ. सोमा घोष
बनारस में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुंबई में रह रही सोमा एक समय के महान
फिल्मकार नवेंदु घोष की पुत्रवधू है। पिता मनमोहन चक्रवर्ती स्वतंत्रता सेनानी
रहे है और माँ अर्चना गायिका। वह अपनी संगीत प्रतिभा का श्रेय माँ को ही देती
हैं। व्यक्तित्व पर संगीत की कोमलता के साथ पिता की संघर्षशीलता की भी
पूरी छाप है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने
के लिए संघर्षरत है।
भारत के प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खान ने इन्हें अपना दत्तक पुत्री
बनाया था। सोमा घोष, बनारसी संगीत के परंपरा अनुसार चैती, कजरी, टप्पा, ठुमरी,
दादरा के अलावा गजल गायकी में भी प्रसिद्ध हैं ।भारत सरकार ने इनके कला के क्षेत्र
में योगदान के लिए इनको पद्मश्री सम्मान दिया है।
बनारस में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुंबई में रह रही सोमा एक समय के महान
फिल्मकार नवेंदु घोष की पुत्रवधू है। पिता मनमोहन चक्रवर्ती स्वतंत्रता सेनानी
रहे है और माँ अर्चना गायिका। वह अपनी संगीत प्रतिभा का श्रेय माँ को ही देती
हैं। व्यक्तित्व पर संगीत की कोमलता के साथ पिता की संघर्षशीलता की भी
पूरी छाप है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने
के लिए संघर्षरत है।
भारत के प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खान ने इन्हें अपना दत्तक पुत्री
बनाया था। सोमा घोष, बनारसी संगीत के परंपरा अनुसार चैती, कजरी, टप्पा, ठुमरी,
दादरा के अलावा गजल गायकी में भी प्रसिद्ध हैं ।भारत सरकार ने इनके कला के क्षेत्र
में योगदान के लिए इनको पद्मश्री सम्मान दिया है।
चांदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी
फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी
बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी
कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी
ये उदासी न कल रही होगी
सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शमअ-सी जल रही होगी
एक शमअ-सी जल रही होगी
तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी
बाजरे की फ़सल रही होगी
जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी
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