https://youtu.be/WSUn45v_fGo
क्या है जो क़र्ज़-ए-शहर-ए-जाँ आज अदा हो या न हो
आग लगी हो या नहीं ख़ून बहा हो या न हो
आग लगी हो या नहीं ख़ून बहा हो या न हो
मेरी तो किश्त-ए-जाँ में आज ज़ख़्म ही ज़ख़्म खिल उठे
अब मुझे क्या कि सहन में फूल खिला हो या न हो
‘अर्सा-ए-शौक़ में नहीं फ़ुर्सत-ए-पेश-ओ-पस का वहम
ज़ख़्म-तलब रहेंगे हम ज़ख़्म मिला हो या न हो
हम ने तो माजरा-ए-ग़म बर-सर-ए-‘आम कह दिया
अश्क बहे हों या नहीं शोर उठा हो या न हो
उस को तो ताज़ा-कारी-ओ-ज़ख़्म-गरी का शौक़ है
ज़ख़्म दबे हों या नहीं दर्द थमा हो या न हो
महरम-ए-राज़ है हवा फ़ाश है सारा माजरा
उस ने कहा हो या नहीं हम ने सुना हो या न हो
उस के तो है नसीब में शब-नज़री-ओ-जाँ-कनी
भड़के है ख़ुद चराग़-ए-शौक़ तेज़ हवा हो या न हो
हम तो फ़रेब-कारी-ए-शब को बयान कर गए
अब ये नसीब-ए-शहर है जाग उठा हो या न हो
उस की गली से आज तो गुज़रे थे सर-ब-दस्त हम
उस ने ब-यक निगाह-ए-शौक़ देख लिया हो या न हो
पीरज़ादा क़ासिम रज़ा सिद्दीकी
जन्म 8 फरवरी 1943), एक पाकिस्तानी विद्वान,
लेखक, कवि, वैज्ञानिक और शिक्षाविद् हैं।
उन्होंने कई विश्वविद्यालयों के कुलपति के रूप में
कार्य किया है।
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