शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

चलो ये रूप का दर्या उतर के देखते हैं....





चलो ये रूप का दर्या उतर के देखते हैं....

-अरुण मिश्र 

चलो,  ये  रूप का  दर्या  उतर के  देखते हैं।
जो तय है डूबना तो,  डूब कर के  देखते हैं।।

सुना है,  बाग़ में   रुख़ से  नक़ाब पलटेगा।
तो चलो  आज,  नज़ारे  उधर के  देखते हैं।।

सुना है  हॅस दे तो, बाग़ों में बहार आ जाये।
चलो ख़िज़ाँ को आज, तंग कर के देखते हैं।।

सुना है, मोरनी मरती है, चाल  पर उसकी।
सुना है हँस भी, अचरज से भर के देखते हैं।।

अगर नहाये तो,झीलों में कँवल खिल जायें।
कि,  भौंरे राह  बहुत  आस भर के  देखते हैं।।

सुना कि, सुब्ह को सूरज  गुलाल मलता है।
सितारे, रात  उसकी माँग  भर के  देखते हैं।।

कलायें चाँद की,  शायद  इसी ख़याल से हैं।
कि चलो, रूप उसका  नाप कर के देखते हैं।।

सुना है, बिखरें  जो गेसू  तो, रात  हो जाये।
 तो चलो  एक रात,  वाँ  ठहर के  देखते  हैं।।

सुना  है  सोये  रात,  जागे  सुब्ह  हो  जाये।
तो चलो  एक शाम,  सुब्ह कर के  देखते हैं।।

सुना है, ख़्वाब है, जागो तो बिखर जायेगा।
सो सारी रात, पलक बन्द कर के देखते हैं।।

सुना कि, मद भरे नयनों में, मैक़दे हैं खुले।
सुना है, लोग  अपने जाम भर के  देखते हैं।।

सुना है , हूर है,  मिलता है  बस  सवाबों से।
तो चलो कोई,  नेक  काम कर के  देखते हैं।।
 

सुना है, आँखों में उसके,तिलिस्म बसते हैं।
‘अरुन’ चलो, नये एहसास कर के देखते हैं।।
                                 *

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

सन्नाटा और कोलाहल

 सन्नाटा और कोलाहल

 - अरुण मिश्र



सन्नाटा होता है,
आयोजन से पहले।
और बाद में
फिर होता, विराट सन्नाटा।
कोलाहल तो बस,
आयोजन तक है सीमित।।

 
यही प्रकृति है।
यही नियति है।
यही सृष्टि है।
सारे जग-प्रपंच के पीछे,
विधि का शायद यही प्रयोजन।
सन्नाटों के अन्तराल में,
कुछ कोलाहल का आयोजन।।


                 *
 


 
 

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

तुम्हारा जन्म दिवस....

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तुम्हारा जन्म दिवस------

&अरुण मिश्र 

तुम्हारा जन्म दिवस
तुमको मुबारक साथी।

कि साथ&साथ गुज़ारी है
हमने उम्र तमाम।
तमाम ख़ुशियाँ मिलीं
और ग़म हुये हैं कम।
पिये हैं साथ मसर्रत के
छलकते हुये जाम।


तुम्हारा जन्म दिवस
तुमको मुबारक साथी।।


उम्र का क्या है \
ये तो यूँ ही बढ़ती जायेगी।
असल है ज़िन्दगी
जो लौट कर न आयेगी।
मैंने भी कब का साठ पार किया।
तुम्हारी उम्र भी]
इस बीच कुछ बढ़ी होगी।
गो कि] अन्दाज़ा नहीं लगता है।
इस लिये जन्म दिवस पर तेरे]
दिल से बस ये ही
निकलती है दुआ-
तुम न पचपन से कभी आगे बढ़ो।
शोखि़याँ बचपने की]
तुझ में सदा जिन्दा रहें]
तुम न इस बचपन से कभी आगे बढ़ो।
मुस्कराहट से] चहक से] तमाम जीवट से]
यूँ ही गुलज़ार सदा करती रहो-
हमारी ज़िन्दगी की बगि़या को।
मेरी साथी की तरह]
बच्चों की मम्मी की तरह।


तुम्हारा जन्म दिवस
तुमको मुबारक साथी।।


           *
          
        

 

 

 

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

लगता था जिसे हीरे की तरह........


             

लगता था जिसे हीरे की तरह........

-अरुण मिश्र


लगता था  जिसे  हीरे  की  तरह,  कोई एक फ़क़ीर  मेरे  जैसा। 
उसको भी  ख़ुशी की  ख़ातिर अब,  लगने है ज़रूरी  लगा पैसा।।

माना  कि,   अगर  पैसे  हों  तो,   ढेरों  सपने   सच  हो  सकते। 
पर  सोचो कि,  देख भी पाओगे,  क्या  सपना  वो  पहले जैसा।।

सपने ही तो सच्ची पूँजी हैं,  दौलत का क्या,  कल हो या न हो।
अपने  सपने   मत   खो  देना,   पाओगे   न   सरमाया   ऐसा।।

उसको भी हमारी बातों में, कुछ रस तो  मिलता होगा  'अरुन '। 
वर्ना  क्यूँ  सुना कर  शेर' मेरे,   वो  पूँछे  सभी से,  लगा कैसा ?? 

                                             *
 
 

LAWN MEN SHAAM KO GUNGUNATEY HUYE..


सोमवार, 21 सितंबर 2015

प्रिय कुशाग्र के जन्म दिवस पर आशीर्वाद एवं शुभकामनायें

 प्रिय कुशाग्र के जन्म दिवस पर विशेष 


नवांकुर...


-अरुण मिश्र
                                                                                                                                                                 
HAPPY BIRTH DAY KUSHAGRA




यह    नवांकुर    कुक्षि   से,   
रुचिरा ऋचा के जो उगा है |
मिश्र -कुल-वंशावली-मणि-
माल, नव-कौस्तुभ लगा है ||


          प्रज्ज्वलित   नव - दीप   सा,
          जो  आज  घर की  देहरी  पर |
          क्षितिज पर  कुल - व्योम के,
          चमका  नया  नक्षत्र  भास्वर ||


लहलहाई,    वंश   की    फिर-
बेल,    फूटी     नई     कोंपल|
दूध  से   आँचल   भरा;  कुल -
तरु,  फला  है  पूत  का  फल|| 


           पुष्प    जो    अभिनव   खिला,
            परिवार-बगिया में विहंस कर |
            गोद  दादी   के,  पितामह  के, 
            ह्रदय    में ,   मोद    दे     भर ||


हो 'कुशाग्र', कुशाग्र-मेधायुत,
अपरिमित    बुद्धि - बल    हो|
मंगलम, मधुरं,  शुभम, प्रिय,
प्रोज्ज्वल,  प्रांजल,  प्रबल हो||

                      *
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शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

कान्हा ! श्याम ! मुरारी !

जन्माष्टमी पर सब के लिए मंगलकामनाएं


कान्हा ! श्याम ! मुरारी !











कान्हा ! श्याम ! मुरारी !

-अरुण मिश्र


हे! मोहन, राधा।
बसहु चित्त, छवि जुगल सदा;
हरहु सकल बाधा।।


हे! गुपाल गिरिधारी।
बिगरी कौन बनावै तुम बिन;
राखो लाज हमारी।।


हे! नटवर नागर।
इक तुम्हरो भरोस हिय माँही;
तारो भव सागर।।


कान्हा! श्याम! मुरारी!
गोविंद! माधव! नंद के लाला!
टारो विपति हमारी।।


साँवले, सलोने श्याम!
सोलह कलाओं से पूर्ण; पूर्णकाम।
स्वीकारो कोटिशः प्रणाम।।


                *

(तीन पदों की कुछ छोटी-छोटी तुकांत रचनाएँ, 
पदवार  क्रमशः  तीन, पाँच एवं तीन के शब्द-विधान में। )