बुधवार, 14 मई 2025

ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते.../ शायर : हैदर अली आतिश / गायन : उस्ताद अमानत अली

https://youtu.be/AJeltGldEFU   

ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तुगू करते


पयाम्बर न मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ
ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शरह-ए-आरज़ू करते


हमेशा मैं ने गरेबाँ को चाक चाक किया
तमाम उम्र रफ़ूगर रहे रफ़ू करते


मिरी तरह से मह-ओ-मेहर भी हैं आवारा
किसी हबीब की ये भी हैं जुस्तुजू करते


न पूछ आलम-ए-बरगश्ता-तालई 'आतिश'
बरसती आग जो बाराँ की आरज़ू करते

रविवार, 4 मई 2025

हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या.../ सन्त कबीर / गायन : मधुप मुद्गल

https://youtu.be/EXHMj42N7BQ  

हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आज़ाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या


जो बिछड़े हैं पियारे से भटकते दर-ब-दर फिरते
हमारा यार है हम में हमन को इंतिज़ारी क्या


न पल बिछ्ड़ें पिया हम से न हम बिछड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागी है हमन को बे-क़रारी क्या


'कबीरा' इश्क़ का माता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है हमन सर बोझ भारी क्या

आगे माई, जोगिया मोर जगत सुखदायक, दुःख ककरो नहिं देल.../ महाकवि विद्यापति / गायन : सृष्टि एवं अनुष्का

https://youtu.be/bS4l4jhuIkU  


आगे माई, जोगिया मोर जगत सुखदायक, 
दुःख ककरो नहिं देल

दुःख ककरो नहिं देल महादेव, 
दुःख ककरो नहिं देल

एही जोगिया के भाँग भुलैलक, 
धतुर खोआई धन लेल। 

आगे माई, कार्तिक गणपति दुई जन बालक, 
जन भरी के नहिं जान 
तिनक अभरन किछओ न टिकइन, 
रतियक सन नहिं कान 

आगे माई, सोना रूपा अनका सूत, 
अभरन अपने रूद्रक माल
अभरन अपना मँगलो किछ नै जुरलनी, 
अनका लै जंजाल 

आगे माई, छन में हेरथी कोटिधन बकसथी, 
वाहि देवा नहिं थोर 
भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइन 
इहो थिका दिगम्बर मोर

शनिवार, 3 मई 2025

राम गुन बेलड़ी रे.../ भजन / रचना : सन्त कबीर / गायन : मधुप मुद्गल

https://youtu.be/9sC2NisiCV8  


राम गुन बेलड़ी रे,
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।


vine(creeper) made of qualities of Ram 
is known to Avdhoo(saint) Goraknath.  

नाति सरूप न छाया जाके,
बिरध करैं बिन पाँणी॥


It neither has form nor shadow, 
it grows without water(Maya). 

राम गुन बेलड़ी रे,
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।



बेलड़िया द्वे अणीं 
पहूँती गगन पहूँती सैली।


The vine has two ends(Ida and pingala ),
 it has reached by itself to the sky.

सहज बेलि जल फूलण लागी,
डाली कूपल मेल्ही॥

When this vine by its own nature
(unforced,effortless smadhi) blossomed, 
then new braches and shoots come out.

राम गुन बेलड़ी रे,
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।


मन कुंजर जाइ बाड़ा बिलब्या, 
सतगुर बाही बेली।


When elephant nature mind rests
 in this garden of this vine, Satguru helps this vine grow further.
 
पंच सखी मिसि पवन पयप्या, 
बाड़ी पाणी मेल्ही॥

Now five senses help life force 
further to remove water(Maya).

 
राम गुन बेलड़ी रे,
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।



काटत बेली कूपले मेल्हीं,
सींचताड़ी कुमिलाँणों।

This vine grows further when one cuts oneself further from worldliness, if one enjoys worldly cravings
the this vine become lifeless.
 
कहै कबीर ते बिरला जोगी, 
सहज निरंतर जाँणीं।।


Sayes Kabir he is a rare yogi, 
who can understand this effortless 
eternal yoga.

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

तू मन अनमना न कर अपना.../ गीतकार भारत भूषण अपने स्वर में..

https://youtu.be/Ar7qK7Fn_F0  

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा
धरती के काग़ज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी 

रेती पर लिखा नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था 
मलियानिल के बहकाने से, बस एक प्रभात निखारना था 
गूंगे के मनो-भाव जैसे वाणी स्वीकार न कर पाए 
वैसे ही मेरा ह्रदय-कुसुम असमर्पित सूख बिखरना था 

कोई प्यासा मरता जैसे जल के अभाव में विष पी ले 
मेरे जीवन में भी कोई ऐसी मजबूरी रहनी थी

इच्छाओं से उगते बिरवे, सब के सब सफल नहीं होते 
हर कहीं लहर के जूड़े में अरुणारे कमल नहीं होते 
माटी का अंतर नहीं मगर अंतर तो रेखाओं का है 
हर एक दीप के जलने को शीशे के महल नहीं होते 

दर्पण में परछाईं जैसे दीखे तो पर अनछुई रहे 
सारे सुख सौरभ की मुझसे, वैसी ही दूरी रहनी थे
 
शायद मैंने गत जनमों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे 
चातक का स्वर सुनने वाले बादल वापस मोड़े होंगे
ऐसा अपराध हुआ होगा, फिर जिसकी क्षमा नहीं मिलती  
तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे 

अनगिनती क़र्ज़ चुकाने थे, इसलिए ज़िंदगी भर मेरे 
तन को बेचैन भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी

सोमवार, 28 अप्रैल 2025

हम नहिं आज रहब यहि आँगन जो बुढ़ होएत जमाई, गे माई.../ महाकवि विद्यापति / गायन : रजनी पल्लवी

https://youtu.be/nqxQ3-Uz1Ss  


हम नहिं आज रहब यहि आँगन जो बुढ़ होएत जमाई, गे माई।

एक त बइरि भेला बीध बिधाता दोसरे धिया कर बाप॥
तीसरे बइरि भेला नारद बाभन जै बूढ़ आनल जमाई, गे माई॥

पहिलुक बाजन डोमरु तोरब दोसरे तोरब रुँडमाला।
बरद हाँकि बरियात वेलाइब धिआ लेजाइब पराइ, गे माई॥

धोती लोटा पतरा पोथी एहो सभ लेबन्हि छिनाई।
जो किछु बजता नारद बाभन दाढ़ी दे धिसिआएब, गे माई॥

भन विद्यापति सुनु हे मनाइन दृढ़ कर अपन गेआन।
सुभ सुभ कए सिरी गौरी बियाहू गौरी हर एक समान, गे माई॥

*व्याख्या*

हे सखी! यदि इस वृद्ध शिव को मेरा जामाता बनाया गया तो फिर मैं इस घर में नहीं रहूँगी। मेरी इस कन्या के तीन शत्रु हो गए। एक तो ब्राह्मण ही शत्रु हुआ जिसने मेरी कन्या का इस बूढ़े से विवाह का संयोग-विधान किया। दूसरे इसके पिता हिमालय ने ऐसे वृद्ध एवं सुरुचिहीन वर का चयन कर शत्रुता का व्यवहार किया है। तीसरा शत्रु ब्राह्मण नारद है जो मेरी कन्या की विधि मिलाकर इस वृद्ध दामाद को मेरे द्वार पर ले आया। मैना कहती है कि मैं शिव के डमरु और रुंडमाला को तोड़ डालूँगी। मैं इसके बैल को खदेड़ दूँगी और बरात को भगा दूँगी और फिर अपनी पुत्री को भगाकर कहीं दूर ले जाऊँगी। हे सखी! मैं इस ब्राह्मण नारद का धोती, लोटा, पोथी-पत्रा सब छिनवा लूँगी और यदि इसने अनाकानी की तो मैं स्वयं उसकी दाढ़ी पकड़ कर घसीटूँगी। मैना के इन बचनों को सुनकर विद्यापति के शब्दों में ही उसकी सखी कहती है कि मैना! सुनो, तू जो शिव के वरत्व के संबंध में अनर्गल प्रलाप कर रही है वह अज्ञान के कारण ही है। तू शिव एवं पार्वती के विवाह का मंगल विधि के साथ विवाह कर, क्योंकि ये दोनों एक समान अर्थात् एक दूसरे के सर्वथा उपयुक्त हैं।

शनिवार, 26 अप्रैल 2025

पाप.../ कविता / कवि : भारत भूषण

https://youtu.be/skitjHRld0A?si=F9LlDiqWL9gm1zfI


न जन्म लेता अगर कहीं मैं
धरा बनी ये मसान होती
न मन्दिरों में मृदंग बजते
न मस्जिदों में अजान होती

लिए सुमिरनी डरे हुए से
बुला रहे हैं मुझे पुजेरी
जला रहे हैं पवित्र दीये
न राह मेरी रहे अन्धेरी
हजार सजदे करें नमाजी
न किंतु मेरा जलाल घटता
पनाह मेरी यही शिवाला
महान गिरजा सराय मेरी
मुझे मिटा के न धर्म रहता
न आरती में कपूर जलता
न पर्व पर ये नहान होता
न ये बुतों की दुकान होती

न जन्म लेता अगर कहीं मैं...

मुझे सुलाते रहे मसीहा
मुझे मिटाने रसूल आये
कभी सुनी मोहनी मुरलिया
कभी अयोध्या बजे बधाये
मुझे दुआ दो बुला रहा हूं
हजार गौतम, हजार गान्धी
बना दिये देवता अनेकों
मगर मुझे तुम ना पूज पाये
मुझे रुला के न सृष्टि हँसती
न सूर, तुलसी, कबीर आते
न क्रास का ये निशान होता
न ये आयते कुरान होती

न जन्म लेता अगर कहीं मैं....

बुरा बता दे मुझे मौलवी
या दे पुरोहित हजार गाली
सभी चितेरे शकल बना दें
बहुत भयानक, कुरूप, काली
मगर यही जब मिलें अकेले
सवाल पूछो, यही कहेंगे कि;
पाप ही जिन्दगी हमारी
वही ईद है वही दिवाली
न सींचता मैं अगर जडों को
तो न जहां मे यूं पुण्य खिलता
न रूप का यूं बखान होता
न प्यास इतनी जवान होती

न जन्म लेता अगर कहीं मैं
धरा बनी ये मशान होती
न मन्दिरों में मृदंग बजते
न मस्जिदों में अजान होती