बुधवार, 14 मई 2025
ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते.../ शायर : हैदर अली आतिश / गायन : उस्ताद अमानत अली
ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते
पयाम्बर न मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ
हमेशा मैं ने गरेबाँ को चाक चाक किया
मिरी तरह से मह-ओ-मेहर भी हैं आवारा
न पूछ आलम-ए-बरगश्ता-तालई 'आतिश'
रविवार, 4 मई 2025
हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या.../ सन्त कबीर / गायन : मधुप मुद्गल
हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आज़ाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या
जो बिछड़े हैं पियारे से भटकते दर-ब-दर फिरते
हमारा यार है हम में हमन को इंतिज़ारी क्या
न पल बिछ्ड़ें पिया हम से न हम बिछड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागी है हमन को बे-क़रारी क्या
'कबीरा' इश्क़ का माता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है हमन सर बोझ भारी क्या
आगे माई, जोगिया मोर जगत सुखदायक, दुःख ककरो नहिं देल.../ महाकवि विद्यापति / गायन : सृष्टि एवं अनुष्का
दुःख ककरो नहिं देल
दुःख ककरो नहिं देल महादेव,
एही जोगिया के भाँग भुलैलक,
आगे माई, कार्तिक गणपति दुई जन बालक,
तिनक अभरन किछओ न टिकइन,
आगे माई, सोना रूपा अनका सूत,
आगे माई, छन में हेरथी कोटिधन बकसथी,
भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइन
इहो थिका दिगम्बर मोर
शनिवार, 3 मई 2025
राम गुन बेलड़ी रे.../ भजन / रचना : सन्त कबीर / गायन : मधुप मुद्गल
https://youtu.be/9sC2NisiCV8
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।
vine(creeper) made of qualities of Ram
is known to Avdhoo(saint) Goraknath.
नाति सरूप न छाया जाके,
बिरध करैं बिन पाँणी॥
It neither has form nor shadow,
it grows without water(Maya).
राम गुन बेलड़ी रे,
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।
बेलड़िया द्वे अणीं
पहूँती गगन पहूँती सैली।
The vine has two ends(Ida and pingala ),
it has reached by itself to the sky.
सहज बेलि जल फूलण लागी,
डाली कूपल मेल्ही॥
When this vine by its own nature
(unforced,effortless smadhi) blossomed,
then new braches and shoots come out.
राम गुन बेलड़ी रे,
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।
मन कुंजर जाइ बाड़ा बिलब्या,
सतगुर बाही बेली।
When elephant nature mind rests
in this garden of this vine, Satguru helps this vine grow further.
पंच सखी मिसि पवन पयप्या,
बाड़ी पाणी मेल्ही॥
Now five senses help life force
further to remove water(Maya).
राम गुन बेलड़ी रे,
अवधू गोरषनाथि जाँणीं।
काटत बेली कूपले मेल्हीं,
सींचताड़ी कुमिलाँणों।
This vine grows further when one cuts oneself further from worldliness, if one enjoys worldly cravings
the this vine become lifeless.
कहै कबीर ते बिरला जोगी,
सहज निरंतर जाँणीं।।
Sayes Kabir he is a rare yogi,
who can understand this effortless
बुधवार, 30 अप्रैल 2025
तू मन अनमना न कर अपना.../ गीतकार भारत भूषण अपने स्वर में..
https://youtu.be/Ar7qK7Fn_F0
धरती के काग़ज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी
रेती पर लिखा नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था
मलियानिल के बहकाने से, बस एक प्रभात निखारना था
गूंगे के मनो-भाव जैसे वाणी स्वीकार न कर पाए
वैसे ही मेरा ह्रदय-कुसुम असमर्पित सूख बिखरना था
कोई प्यासा मरता जैसे जल के अभाव में विष पी ले
मेरे जीवन में भी कोई ऐसी मजबूरी रहनी थी
इच्छाओं से उगते बिरवे, सब के सब सफल नहीं होते
हर कहीं लहर के जूड़े में अरुणारे कमल नहीं होते
माटी का अंतर नहीं मगर अंतर तो रेखाओं का है
हर एक दीप के जलने को शीशे के महल नहीं होते
दर्पण में परछाईं जैसे दीखे तो पर अनछुई रहे
सारे सुख सौरभ की मुझसे, वैसी ही दूरी रहनी थे
शायद मैंने गत जनमों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे
चातक का स्वर सुनने वाले बादल वापस मोड़े होंगे
ऐसा अपराध हुआ होगा, फिर जिसकी क्षमा नहीं मिलती
तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे
अनगिनती क़र्ज़ चुकाने थे, इसलिए ज़िंदगी भर मेरे
तन को बेचैन भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी
सोमवार, 28 अप्रैल 2025
हम नहिं आज रहब यहि आँगन जो बुढ़ होएत जमाई, गे माई.../ महाकवि विद्यापति / गायन : रजनी पल्लवी
https://youtu.be/nqxQ3-Uz1Ss
एक त बइरि भेला बीध बिधाता दोसरे धिया कर बाप॥
तीसरे बइरि भेला नारद बाभन जै बूढ़ आनल जमाई, गे माई॥
पहिलुक बाजन डोमरु तोरब दोसरे तोरब रुँडमाला।
बरद हाँकि बरियात वेलाइब धिआ लेजाइब पराइ, गे माई॥
धोती लोटा पतरा पोथी एहो सभ लेबन्हि छिनाई।
जो किछु बजता नारद बाभन दाढ़ी दे धिसिआएब, गे माई॥
भन विद्यापति सुनु हे मनाइन दृढ़ कर अपन गेआन।
सुभ सुभ कए सिरी गौरी बियाहू गौरी हर एक समान, गे माई॥
*व्याख्या*
हे सखी! यदि इस वृद्ध शिव को मेरा जामाता बनाया गया तो फिर मैं इस घर में नहीं रहूँगी। मेरी इस कन्या के तीन शत्रु हो गए। एक तो ब्राह्मण ही शत्रु हुआ जिसने मेरी कन्या का इस बूढ़े से विवाह का संयोग-विधान किया। दूसरे इसके पिता हिमालय ने ऐसे वृद्ध एवं सुरुचिहीन वर का चयन कर शत्रुता का व्यवहार किया है। तीसरा शत्रु ब्राह्मण नारद है जो मेरी कन्या की विधि मिलाकर इस वृद्ध दामाद को मेरे द्वार पर ले आया। मैना कहती है कि मैं शिव के डमरु और रुंडमाला को तोड़ डालूँगी। मैं इसके बैल को खदेड़ दूँगी और बरात को भगा दूँगी और फिर अपनी पुत्री को भगाकर कहीं दूर ले जाऊँगी। हे सखी! मैं इस ब्राह्मण नारद का धोती, लोटा, पोथी-पत्रा सब छिनवा लूँगी और यदि इसने अनाकानी की तो मैं स्वयं उसकी दाढ़ी पकड़ कर घसीटूँगी। मैना के इन बचनों को सुनकर विद्यापति के शब्दों में ही उसकी सखी कहती है कि मैना! सुनो, तू जो शिव के वरत्व के संबंध में अनर्गल प्रलाप कर रही है वह अज्ञान के कारण ही है। तू शिव एवं पार्वती के विवाह का मंगल विधि के साथ विवाह कर, क्योंकि ये दोनों एक समान अर्थात् एक दूसरे के सर्वथा उपयुक्त हैं।
शनिवार, 26 अप्रैल 2025
पाप.../ कविता / कवि : भारत भूषण
https://youtu.be/skitjHRld0A?si=F9LlDiqWL9gm1zfI
न जन्म लेता अगर कहीं मैं
धरा बनी ये मसान होती
न मन्दिरों में मृदंग बजते
न मस्जिदों में अजान होती
लिए सुमिरनी डरे हुए सेबुला रहे हैं मुझे पुजेरी
जला रहे हैं पवित्र दीये
न राह मेरी रहे अन्धेरी
हजार सजदे करें नमाजी
न किंतु मेरा जलाल घटता
पनाह मेरी यही शिवाला
महान गिरजा सराय मेरी
मुझे मिटा के न धर्म रहता
न आरती में कपूर जलता
न पर्व पर ये नहान होता
न ये बुतों की दुकान होती
न जन्म लेता अगर कहीं मैं...
मुझे सुलाते रहे मसीहा
मुझे मिटाने रसूल आये
कभी सुनी मोहनी मुरलिया
कभी अयोध्या बजे बधाये
मुझे दुआ दो बुला रहा हूं
हजार गौतम, हजार गान्धी
बना दिये देवता अनेकों
मगर मुझे तुम ना पूज पाये
मुझे रुला के न सृष्टि हँसती
न सूर, तुलसी, कबीर आते
न क्रास का ये निशान होता
न ये आयते कुरान होती
न जन्म लेता अगर कहीं मैं....
बुरा बता दे मुझे मौलवी
या दे पुरोहित हजार गाली
सभी चितेरे शकल बना दें
बहुत भयानक, कुरूप, काली
मगर यही जब मिलें अकेले
सवाल पूछो, यही कहेंगे कि;
पाप ही जिन्दगी हमारी
वही ईद है वही दिवाली
न सींचता मैं अगर जडों को
तो न जहां मे यूं पुण्य खिलता
न रूप का यूं बखान होता
न प्यास इतनी जवान होती
न जन्म लेता अगर कहीं मैं
धरा बनी ये मशान होती
न मन्दिरों में मृदंग बजते
न मस्जिदों में अजान होती