सोमवार, 6 दिसंबर 2010

ज़रा विसाल के बाद...

 ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ! दोस्त,
 तेरे   जमाल  की   दोशीज़गी   निखर  आयी ||
                                                                             - फ़िराक गोरखपुरी. 

प्रथम-भोर...
- अरुण मिश्र 







                                      

2 टिप्‍पणियां:

  1. उस सौम्य मदिर प्रभात की स्मृति हो आई है आज वापस :)

    वाकई शब्द नहीं मिलते हैं आपकी रचनाओ के लिए कहने के लिए, एक से बढ़कर एक उज्जवल किरणे हैं इस "रश्मि रेख" में

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रिय अमित जी, मुझे भी आप की इस आत्मीयता का आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे हैं |
    - अरुण मिश्र.

    उत्तर देंहटाएं