सोमवार, 20 दिसंबर 2010

है जीवन-भट्ठी में दहना...

ग़ज़ल

- अरुण मिश्र


मुश्क़िल  क्या है,  मुश्क़िल कहना।
मुश्क़िल   तो    है,    आसां   रहना।।


यूँ  ही   कुछ  कम,  मुश्क़िलात  हैं?
फिर क्यू मुश्क़िल   कहना-सुनना।।


ऊँची  -  ऊँची        मीनारों       को।
आज   नहीं    तो,   कल  है  ढहना।।


रोटी   के    कुन्दन    की   ख़ातिर।
है   जीवन -  भट्ठी    में     दहना।।


फूलों   के    अचकन   उतार  कर।
परियों  ने  क्यूँ   बख्तर    पहना??


नाज़ुक,  नर्म,  गुलबदन   ग़ज़लें।
उफ़ !   लफ़्ज़ों  का   भारी  गहना।।


आसां   शेर'   नहीं    कह   सकते।
अगर  ’अरुन’  तो  चुप ही  रहना।।
                       *

2 टिप्‍पणियां:

  1. @ मुश्क़िल तो है, आसां रहना।।

    बिलकुल सही फरमाया है आपने, आज कितनी मुश्किल जिन्दगी बना ली है सभी ने ................हर कोई परेशान है,

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  2. समर्थन के लिए आभार अमित जी |
    -अरुण मिश्र .

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