रविवार, 13 मार्च 2011

फागुन रितु आई रे!














फागुन रितु आई रे!
-अरुण मिश्र

आई  रे!  फागुन रितु  आई रे!
पोर - पोर में , अंग - अंग में,
किस अनंग ने, अलख  जगाई रे!

        फूली   सरसों , फूली  अरहर।   
        बौरे  बाग , आम के  मनहर।   
        दहके   टेसू , महके   महुआ।   
        चली फगुनहट स-र-र-र सरसर।।
 
नव वसन्त ने  ली  अँगड़ाई रे!
आई  रे!  फागुन रितु  आई रे!

        गेहूँ   -  जौ   झूमें    गदराये।               
        चना - मटर सब  लट छितराये।               
        अल्हड़  फलियां   बाट  जोहतीं,               
        किस  पाहुन का, सुधि बिसराये??
    
होली   बजा  रही  शहनाई रे!   
आई  रे!  फागुन रितु  आई रे!

        अवध - वीथिकायें, ब्रज-गलियां।       
        मना रहीं  निसि-दिन, रंगरलियां।       
        राम - श्याम, दुइ भ्रमर गुंजरत,       
        खेलत, हॅसत, खिलावत कलियां।।
     
भारत  भर में, धूम  मचाई  रे!
आई  रे!  फागुन रितु  आई रे!
                       *

कविता / फाल्गुन पूर्णिमा, २००४

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति| धन्यवाद|

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  2. ToDear,Patali-The-Village:
    आपका आभार एवं होली की शुभकामनायें!
    -अरुण मिश्र

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